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  "type": "article",
  "title": "जिस ट्यूमर को इंसानी आंख चूक जाती है, उसे पकड़ रहे हैं ट्रेंड किए गए कबूतर",
  "summary": "मैसाचुसेट्स में हुई एक अनोखी रिसर्च में छह कबूतरों को सीटी स्कैन में फेफड़ों की गांठ पहचानना सिखाया गया, और इस खोज से आगे चलकर मेडिकल AI टूल बनाने की राह खुल सकती है।",
  "content": "कैंसर का नाम सुनते ही लोगों के दिल में डर बैठ जाता है, और इस बीमारी में मरीज की जान बचाने की सबसे बड़ी शर्त है इसका वक्त पर पकड़ में आना। आमतौर पर रेडियोलॉजिस्ट सीटी स्कैन में किसी गड़बड़ी को देखकर कैंसर का पता लगाते हैं, लेकिन इंसानी नजर हमेशा भरोसेमंद नहीं होती। हर दस में से तीन स्कैन ऐसे होते हैं जिनमें रेडियोलॉजिस्ट ट्यूमर पकड़ने से चूक जाते हैं। यह चूक मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है, क्योंकि इलाज में देरी होते-होते बीमारी फैलती चली जाती है। अब इसी मुश्किल का एक बेहद अनोखा तोड़ सामने आया है। अमेरिका के एक रिसर्चर ने इस काम में कबूतरों को जोड़ लिया है, और जी हां, आपने सही पढ़ा, कबूतर अब लंग कैंसर ढूंढने में वैज्ञानिकों का हाथ बंटा रहे हैं।\n\nछह कबूतरों को कैसे सिखाया गया स्कैन पढ़ना\nयह दिलचस्प रिसर्च मैसाचुसेट्स के कॉलेज ऑफ द होली क्रॉस के रिसर्चर डॉ. ग्रेगरी डिगिरोलामो ने अपनी टीम के साथ की है। उन्होंने छह कबूतरों को खास ट्रेनिंग दी और उन्हें सीटी स्कैन के छोटे-छोटे वीडियो दिखाए। कबूतरों को सिर्फ इतना तय करना था कि फेफड़ों में कोई नोड्यूल यानी गांठ मौजूद है या नहीं, वही गांठ जो आगे चलकर कैंसर की शक्ल ले सकती है।\n\nसिखाने का तरीका जितना आसान था, उतना ही दिलचस्प भी। आधे कबूतरों को तब खाने का इनाम मिलता जब वे ट्यूमर को सही पहचानते, और बाकी आधे को तब इनाम मिलता जब वे एकदम साफ स्कैन को सही बताते। धीरे-धीरे इन परिंदों ने यह काम बखूबी सीख लिया और गांठ वाले तथा बिना गांठ वाले स्कैन में आसानी से फर्क करने लगे। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि उन्होंने ऐसे नए स्कैन भी सही पहचाने जो उन्होंने पहले कभी देखे ही नहीं थे।\n\nइंसानी दिमाग ट्यूमर देखकर भी क्यों चूक जाता है\nइंसानी दिमाग की कुछ अपनी हदें हैं जो कई बार भारी पड़ जाती हैं। डॉ. ग्रेगरी ने 2025 में अपनी एक अहम स्टडी छापी थी, जिसमें उन्होंने बताया कि रेडियोलॉजिस्ट का दिमाग स्कैन में ट्यूमर को देख तो लेता है, लेकिन उनका कॉन्शस यानी सचेत दिमाग उसे समझ नहीं पाता और स्कैन को नॉर्मल करार दे देता है।\n\nआई-ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी से एक खास बात सामने आई। जब रेडियोलॉजिस्ट किसी ट्यूमर पर नजर डालते हैं तो उनकी आंखें वहीं ठहर जाती हैं और आंखों की पुतलियां भी फैल जाती हैं, जो एक बड़ा संकेत है। यानी उनकी आंखों और दिमाग को भीतर ही भीतर पता चल जाता है कि कुछ गड़बड़ है, मगर यह जानकारी सचेत दिमाग तक नहीं पहुंच पाती और डॉक्टर उस ट्यूमर को अनदेखा कर देते हैं। डॉ. ग्रेगरी इसी बिना सोचे-समझे काम करने वाले विजुअल सिस्टम को समझना चाहते थे, और इसीलिए उन्होंने कबूतरों को चुना, क्योंकि इनका विजुअल सिस्टम इंसानों के अनकॉन्शस विजुअल सिस्टम की तरह ही काम करता है।\n\nबिना ट्रेनिंग के दो और बीमारियां पकड़ लीं\nइस रिसर्च का सबसे हैरान करने वाला पहलू कुछ वक्त बाद खुला। जब कबूतर लंग नोड्यूल पहचानना सीख चुके थे, तो उन्होंने दो और बीमारियां भी पकड़ लीं, जबकि इनके लिए उन्हें कोई अलग से ट्रेनिंग दी ही नहीं गई थी। इनमें पहली बीमारी एमफिसेमा थी, जिसमें फेफड़ों के एयर सैक पूरी तरह डैमेज हो जाते हैं। दूसरी थी ग्राउंड-ग्लास नोड्यूल, जो शुरुआती लंग कैंसर का एक बड़ा संकेत मानी जाती है।\n\nडॉ. ग्रेगरी ने कहा, ‘इंसानी आंखों को ये दोनों बीमारियां लंग नोड्यूल से बिल्कुल अलग दिखती हैं।’ लेकिन कबूतरों के काम करने के तरीके से एक नई बात निकलकर आई। इससे लगता है कि इन तीनों बीमारियों में कोई एक साझा विजुअल साइन जरूर मौजूद है। शायद इंसानी दिमाग भी इस अहम संकेत को पकड़ लेता है, लेकिन डॉक्टर का सचेत दिमाग स्कैन को पूरी तरह नॉर्मल बता देता है।\n\nकबूतर नहीं, असल मकसद है ताकतवर मेडिकल AI\nराहत की बात यह है कि आपके अगले चेकअप में कोई सफेद कोट पहने कबूतर बैठा नहीं मिलेगा। डॉ. ग्रेगरी इस खोज का इस्तेमाल ताकतवर मेडिकल AI टूल बनाने में करना चाहते हैं। ये एडवांस टूल डॉक्टरों को स्कैन और बारीकी से देखने में मदद करेंगे और इसके लिए आई-ट्रैकिंग तथा आंखों की पुतलियों के फैलने वाले फिजियोलॉजी डेटा का सहारा लिया जाएगा।\n\nइससे यह समझ बनेगी कि रेडियोलॉजिस्ट का दिमाग स्कैन में छुपी छोटी-छोटी बीमारियों पर किस तरह रिस्पॉन्स करता है। फिर यही डेटा नए AI मॉडल में फीड किया जाएगा ताकि चूक की गुंजाइश कम हो। डॉ. ग्रेगरी ने साफ किया, ‘यह मेडिकल AI किसी रेडियोलॉजिस्ट की जगह नहीं लेगा, बल्कि एक टूल की तरह उनकी मदद ही करेगा।’ यह टूल डॉक्टर के सचेत और अनकॉन्शस दिमाग के बीच की खाई को भरकर उनकी क्षमता को बढ़ाएगा।\n\nलंग कैंसर से आगे, कहां तक जा सकती है यह तकनीक\nइस तकनीक का दायरा सिर्फ लंग कैंसर तक सीमित नहीं है, बल्कि कई और क्षेत्रों में बड़े बदलाव ला सकता है। कार्डियोलॉजिस्ट भी इसका फायदा उठा सकते हैं और ईसीजी देखकर हार्ट अटैक का कहीं ज्यादा सटीक पता लगा सकते हैं।\n\nमेडिकल फील्ड के बाहर भी इस तरीके के कई फायदे हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स की आंखों के मूवमेंट को ट्रैक करके AI को बेहतर ट्रेनिंग दी जा सकती है। इसी अप्रोच से एक दिन आर्ट हिस्टोरियन असली मास्टरपीस और बड़ी चालाकी से बनाई गई नकली पेंटिंग के बीच फर्क कर सकेंगे। इसके अलावा एयरपोर्ट पर लगेज चेकिंग में भी यह सिस्टम बहुत काम आ सकता है, क्योंकि जब स्कैनर किसी सामान को सेफ बता दें, तब भी यह सिस्टम उसमें छुपे बम को पकड़ सकता है।\n\nफिलहाल डॉ. ग्रेगरी अपना ध्यान मेडिकल फील्ड पर ही टिकाए हुए हैं। उन्होंने कहा, ‘अभी मैं खुद को सिर्फ मेडिकल फील्ड तक सीमित रख रहा हूं, क्योंकि मेरे लिए यह ज्यादा प्रैक्टिकल है।’ हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे चलकर वे असली और नकली पेंटिंग के बीच फर्क करने में भी इस तकनीक को परखेंगे।\n\nइसका आप पर असर\n• मरीजों के लिए: अगर यह रिसर्च मेडिकल AI टूल में बदलती है, तो सीटी स्कैन में छूट जाने वाले ट्यूमर पकड़ में आ सकते हैं और कैंसर का पता पहले लग सकता है।\n• डॉक्टरों के लिए: यह तकनीक रेडियोलॉजिस्ट की जगह नहीं लेगी, बल्कि एक मददगार टूल की तरह उनकी सटीकता बढ़ाएगी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इस रिसर्च में कबूतर क्या काम कर रहे हैं?\nट्रेनिंग पाए छह कबूतर सीटी स्कैन के वीडियो देखकर बताते हैं कि फेफड़ों में कैंसर वाली गांठ यानी नोड्यूल है या नहीं।\n\n2. यह रिसर्च किसने की है?\nमैसाचुसेट्स के कॉलेज ऑफ द होली क्रॉस के रिसर्चर डॉ. ग्रेगरी डिगिरोलामो ने अपनी टीम के साथ यह रिसर्च की है।\n\n3. रेडियोलॉजिस्ट कितने स्कैन में ट्यूमर पकड़ने से चूक जाते हैं?\nहर दस में से तीन स्कैन में रेडियोलॉजिस्ट ट्यूमर पकड़ने में चूक जाते हैं।\n\n4. कबूतरों को सिखाया कैसे गया?\nआधे कबूतरों को ट्यूमर सही पहचानने पर और बाकी आधे को साफ स्कैन सही पहचानने पर खाने का इनाम दिया गया।\n\n5. कबूतरों ने बिना ट्रेनिंग के कौन सी बीमारियां पकड़ीं?\nउन्होंने बिना अलग ट्रेनिंग के एमफिसेमा और ग्राउंड-ग्लास नोड्यूल भी पहचान लिया।\n\n6. क्या आगे चेकअप में कबूतर स्कैन देखेंगे?\nनहीं, इस खोज का असल मकसद कबूतरों से ली गई सीख से ताकतवर मेडिकल AI टूल बनाना है।\n\n7. यह तकनीक और कहां काम आ सकती है?\nईसीजी से हार्ट अटैक पकड़ने, नकली पेंटिंग पहचानने और एयरपोर्ट पर लगेज में छुपे बम का पता लगाने में यह मददगार हो सकती है।",
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  "category": "विज्ञान",
  "publishedAt": "2026-06-24",
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