मानव भ्रूण में जीन एडिटिंग को नैतिक जिम्मेदारी बताने पर शुरू हुई नई बहस, वैज्ञानिक सुरक्षा मानकों पर बंटे बायोटेक उद्यमी कैथी टाई ने मानव भ्रूणों में आनुवंशिक बदलाव को नैतिक अनिवार्यता बताते हुए नियमों में ढील और सरकारी मदद की मांग की है, लेकिन वरिष्ठ वैज्ञानिक सुरक्षा और अनपेक्षित नतीजों को लेकर आगाह कर रहे हैं। प्रजनन विज्ञान के क्षेत्र में मानव भ्रूण के डीएनए में बदलाव करने की तकनीक को लेकर एक बार फिर वैश्विक स्तर पर गंभीर चर्चा छिड़ गई है। बायोटेक उद्यमी कैथी टाई का कहना है कि गंभीर आनुवंशिक बीमारियों से भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रखने के लिए मानव भ्रूण में जीन एडिटिंग की अनुमति देना केवल एक वैज्ञानिक कदम नहीं, बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता भी है। ओरिजिन जीनोमिक्स नामक नई कंपनी की संस्थापक 30 वर्षीय टाई ने ट्रेंड्स इन जेनेटिक्स पत्रिका में प्रकाशित एक टिप्पणी में तर्क दिया है कि इस तकनीक को प्रयोगशाला से निकालकर आईवीएफ क्लीनिकों तक पहुंचाने के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण और नए विनियामक रास्ते तैयार किए जाने चाहिए। दूसरी ओर, जैव-चिकित्सा और कानूनी मामलों से जुड़े कई प्रमुख विशेषज्ञ इसे जल्दबाजी मान रहे हैं और आगाह कर रहे हैं कि सुरक्षा मानकों के पुख्ता प्रमाणों के बिना इसे क्लीनिकल स्तर पर आजमाना भारी जोखिम भरा हो सकता है। जर्मलाइन जीन एडिटिंग और पीढ़ियों तक पहुंचने वाले जोखिम मानव भ्रूण में किया जाने वाला आनुवंशिक फेरबदल जर्मलाइन जीन एडिटिंग के दायरे में आता है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि प्रजनन कोशिकाओं या प्रारंभिक भ्रूण में किया गया कोई भी बदलाव स्थायी हो जाता है और आने वाली सभी पीढ़ियों तक स्थानांतरित होता है। यदि यह प्रक्रिया पूरी तरह सटीक रहे, तो यह किसी परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही जानलेवा या दुर्बल करने वाली आनुवंशिक विसंगति को हमेशा के लिए समाप्त कर सकती है। हालांकि, इसी सिक्के का दूसरा पहलू अत्यंत गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है, जिसे विज्ञान की भाषा में ऑफ-टारगेट प्रभाव कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि डीएनए में लक्षित स्थान के अलावा अनजाने में किसी अन्य जगह कोई अवांछित कट या परिवर्तन हो सकता है, जिससे नए स्वास्थ्य विकार उत्पन्न हो सकते हैं और वे विकार भी भावी पीढ़ियों में चले जाएंगे। इन्हीं बेहद संवेदनशील और अपरिवर्तनीय खतरों के कारण दर्जनों देशों ने गर्भावस्था के उद्देश्य से मानव भ्रूण के जीन संपादन पर सख्त कानूनी प्रतिबंध लगा रखे हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर लॉ एंड द बायोसाइंसेज के निदेशक और कानून के प्रोफेसर हैंक ग्रीली अतीत के चिकित्सीय अनुभवों का हवाला देते हुए अत्यधिक सतर्कता बरतने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि मानव परीक्षणों के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जहां शुरुआत में किसी तरह का स्पष्ट लाल संकेत या खतरे की चेतावनी नहीं दिखी थी, लेकिन फिर भी मरीजों की जान चली गई। उनका तर्क है कि मौजूदा समय में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ और प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग के जरिए वंशानुगत बीमारियों से पीड़ित माता-पिता को पहले ही बीमारी-मुक्त भ्रूण चुनने की सुविधा मिल रही है। इस वजह से भ्रूण संपादन की वास्तविक आवश्यकता केवल गिने-चुने मामलों में ही रह जाती है, जिसे ग्रीली ने एक बेहद सीमित वर्ग की सहायता करार दिया है। आईवीएफ की सीमाएं और प्रभावित परिवारों का लंबा संघर्ष मौजूदा चिकित्सा प्रणाली में जेनेटिक स्क्रीनिंग की अपनी व्यावहारिक सीमाएं हैं, जिससे गुजरने वाले दंपतियों को भावनात्मक और शारीरिक स्तर पर भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आईवीएफ प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से जटिल और अनिश्चित होती है, जहां सामान्य स्वास्थ्य वाले जोड़ों के लिए भी स्वस्थ भ्रूण तैयार कर पाना आसान नहीं होता। कैलिफोर्निया के लॉन्ग बीच में रहने वाले 36 वर्षीय इंजीनियर इयान वाट्स और उनकी साथी चेयेने जिगलर का अनुभव इस जमीनी हकीकत को स्पष्ट करता है। वाट्स चारकोट-मैरी-टूथ रोग से पीड़ित हैं, जो एक अपक्षयी तंत्रिका संबंधी विकार है और धीरे-धीरे चलने-फिरने की क्षमता तथा सूक्ष्म मोटर कौशल को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। अपने भावी बच्चों में इस बीमारी का संचरण रोकने के लिए इस जोड़े ने तीन चक्रों में आईवीएफ प्रक्रिया करवाई। आईवीएफ के हर दौर में कई बार अंडे निषेचित नहीं हो पाते, और जो निषेचित होते हैं वे अक्सर विकास के दौरान रुक जाते हैं या उनमें गुणसूत्र संबंधी खामियां निकल आती हैं। जब इसमें विशिष्ट बीमारी की अतिरिक्त जेनेटिक जांच जोड़ी जाती है, तो कई विकसित हो सकने वाले भ्रूण भी सूची से बाहर हो जाते हैं। वाट्स और जिगलर के मामले में तीन आईवीएफ चक्रों के बाद गुणसूत्र के लिहाज से सामान्य आठ भ्रूण प्राप्त हुए, लेकिन उनमें से केवल तीन ही ऐसे थे जिनमें वाट्स का आनुवंशिक विकार मौजूद नहीं था। यह दंपती भविष्य में तीन या चार बच्चे पैदा करने की इच्छा रखता है, लेकिन महज तीन भ्रूणों के सहारे उनके लिए यह लक्ष्य हासिल करना बेहद अनिश्चित है। वाट्स का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में उनके जैसे लोगों के पास केवल दो ही विकल्प बचते हैं, या तो वे संतान न पैदा करने का फैसला करें या फिर बार-बार कष्टकारी आईवीएफ चक्रों से गुजरते रहें। उनका मानना है कि जीन एडिटिंग तकनीक उनके जैसे माता-पिता को पूर्ण परिवार बसाने के अधिक अवसर प्रदान कर सकती है। इसके अलावा, यह तकनीक उन दुर्लभ परिस्थितियों में भी एकमात्र उम्मीद बन सकती है जहां माता और पिता दोनों के पास किसी हानिकारक म्यूटेशन की दो-दो प्रतियां हों, जिसके परिणामस्वरूप बनने वाला हर एक भ्रूण आनुवंशिक रूप से बीमार ही होगा। ओरिजिन जीनोमिक्स का एजेंडा और नैतिक दायित्व की दलील थिएल फेलो रह चुकीं कैथी टाई का कहना है कि चिकित्सा विज्ञान का काम केवल बीमार भ्रूणों को छांटकर बाहर कर देना नहीं है, बल्कि बीमारियों का उपचार खोजना है। उनका मानना है कि यदि आधुनिक चिकित्सा किसी बीमारी को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से हमेशा के लिए रोक सकती है, तो उस उपचार का चयन करने का अधिकार माता-पिता की प्रजनन स्वायत्तता का हिस्सा होना चाहिए। अपनी लिखित टिप्पणी में उन्होंने रेखांकित किया है कि चिकित्सा पेशा केवल नुकसान से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि उपलब्ध वैज्ञानिक उपायों के जरिए रोके जा सकने वाले कष्टों को टालना भी उसका एक अनिवार्य दायित्व है। इसके साथ ही टाई ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस तकनीक का उपयोग बच्चों की बुद्धिमत्ता जैसी जन्मजात विशेषताओं को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए कभी नहीं किया जाना चाहिए। जनता की सोच में भी बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। जुलाई में जारी एक यूरोपीय सर्वेक्षण के परिणामों के अनुसार, मानव भ्रूण में जीन एडिटिंग के विरोध की तुलना में इसका समर्थन करने वाले लोगों की संख्या अधिक पाई गई। न्यूयॉर्क शहर स्थित ओरिजिन जीनोमिक्स की स्थापना मार्च में हुई थी और वर्तमान में यह कंपनी आईवीएफ मरीजों द्वारा अनुसंधान के लिए दान किए गए मानव भ्रूणों पर बेस-एडिटिंग और प्राइम-एडिटिंग जैसी उन्नत तकनीकों को परिष्कृत करने में जुटी है। हालांकि कंपनी अभी केवल मानव भ्रूण स्टेम सेल लाइनों में इसका परीक्षण कर रही है। टाई को उम्मीद है कि आने वाले महीनों में उनके पास ऐसे ठोस आंकड़े उपलब्ध होंगे जो यह साबित करेंगे कि उनके संपादन उपकरण पूरी तरह सुरक्षित और कुशल हैं। इससे पहले टाई द्वारा शुरू की गई मानव भ्रूण संपादन कंपनी मैनहट्टन जीनोमिक्स केवल कुछ महीने काम करने के बाद इस वर्ष अचानक बंद हो गई थी। कोलंबिया के शोध परिणाम और सुरक्षा की तकनीकी दीवार जीन एडिटिंग को प्रयोगशाला से सीधे क्लीनिक तक ले जाने की राह में सबसे बड़ी बाधा तकनीकी अनिश्चितता है। हाल ही में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने दर्शाया था कि मानव भ्रूण में सटीक आनुवंशिक बदलाव करना संभव तो है, लेकिन उस अध्ययन में बीमारी पैदा करने वाले म्यूटेशन को ठीक नहीं किया गया था। इसके विपरीत, अनुसंधानकर्ताओं द्वारा विकसित किए गए कुछ संपादन उपकरणों के कारण डीएनए में अवांछित और असंगत बदलाव दर्ज किए गए। इस महीने प्रकाशित अपने शोध पत्र में वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि इस तकनीक के साथ जुड़े अवांछनीय परिणामों के कारण यह फिलहाल क्लीनिकल उपयोग के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। इस शोध का नेतृत्व करने वाले डाइटर एगली के अनुसार, आनुवंशिक भिन्नता का मतलब यह है कि यदि कोई एक संपादन उपकरण किसी एक जगह सही काम करता है, तो यह गारंटी नहीं मिलती कि दूसरा म्यूटेशन भी सुरक्षित रहेगा। प्रत्येक नया म्यूटेशन अपने आप में एक बिल्कुल नई दवा की तरह होगा, जिसके विकास के लिए अलग से भारी समय, तकनीकी जटिलता और भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता पड़ेगी। टाई भी मानती हैं कि यह तकनीक अभी मानव मरीजों पर आजमाने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है, लेकिन उनका जोर इस बात पर है कि कानूनी और वित्तीय बाधाओं को अभी से दूर करना जरूरी है ताकि भविष्य में रास्ता साफ रहे। अमेरिका में संघीय स्तर पर मानव भ्रूण अनुसंधान के वित्तपोषण पर कानूनी पाबंदियां लागू हैं, और फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए को ऐसे किसी भी क्लीनिकल परीक्षण पर विचार करने की अनुमति नहीं है जिसमें वंशानुगत आनुवंशिक संशोधन शामिल हों। गैर-मानव प्राइमेट्स परीक्षण और दीर्घकालिक अनिश्चितताएं वैज्ञानिक समुदाय में इस बात पर तो लगभग सहमति है कि भविष्य में कभी न कभी यह तकनीक क्लीनिकों तक पहुंचेगी, लेकिन इसके लिए सुरक्षा का स्तर क्या होना चाहिए, इस पर भारी मतभेद हैं। ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी में प्रसूति एवं स्त्री रोग की प्रोफेसर और जीन-एडिटिंग कंपनी प्रिवेंटिव की सलाहकार पाउला अमाटो का मानना है कि भ्रूण को मानव गर्भाशय में प्रत्यारोपित करने से पहले प्रयोगशाला में कड़े परीक्षण होने चाहिए, जिसके बाद गैर-मानव प्राइमेट्स यानी वानरों पर परीक्षण किए जाने अनिवार्य हैं। इतना ही नहीं, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई अप्रत्याशित बदलाव न हो, इन अध्ययनों में कई पीढ़ियों तक निगरानी रखी जानी चाहिए। हालांकि, ओरिजिन जीनोमिक्स वर्तमान में जानवरों के मॉडल पर कोई परीक्षण नहीं कर रही है और न ही उसकी ऐसी कोई निकट योजना है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि कोई संपादन उपकरण प्रयोगशाला अध्ययनों में पूरी तरह सटीक परिणाम देता है, तब भी यह शत-प्रतिशत सुनिश्चित करना असंभव रहेगा कि प्रत्यारोपित किया जाने वाला भ्रूण अवांछित बदलावों से पूरी तरह मुक्त है। गर्भाशय में स्थानांतरण से पहले संपादित भ्रूण की बायोप्सी के जरिए आनुवंशिक जांच की जाएगी, लेकिन यह जांच महज कुछ कोशिकाओं के नमूने पर आधारित होती है। यह नमूना पूरे भ्रूण का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, क्योंकि संभव है कि भ्रूण की अलग-अलग कोशिकाओं में अलग-अलग आनुवंशिक बदलाव मौजूद हों। ऐसे में अनपेक्षित परिणाम बच्चे के बड़े होने और अपनी संतान पैदा करने के दशकों बाद भी सामने आ सकते हैं। ओएचएसयू में सेंटर फॉर एम्ब्रियोनिक सेल एंड जीन थेरेपी के निदेशक और मैनहट्टन जीनोमिक्स के पूर्व सलाहकार शौखरत मितालिपोव के शब्दों में, कोई भी शोधकर्ता पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकता कि उसने अपना होमवर्क पूरा कर लिया है, क्योंकि जिसे सुरक्षित समझा जा रहा है, वह वास्तव में एक बंद बक्से को स्थानांतरित करने जैसा हो सकता है। इन जटिलताओं के बावजूद, गंभीर बीमारियों की आशंका से जूझ रहे परिवारों की उम्मीदें इस तकनीक से जुड़ी हैं। वाट्स और जिगलर का मानना है कि अपने प्रभावित भ्रूणों को बीमारी-मुक्त जीवन देने के लिए वे नई तकनीक के जोखिमों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। जिगलर वर्तमान में एक अप्रभावित भ्रूण के जरिए 20 सप्ताह की गर्भवती हैं, लेकिन इस जोड़े ने वाट्स के म्यूटेशन वाले अन्य भ्रूणों को नष्ट करने के बजाय सुरक्षित रखा हुआ है ताकि किसी दिन उन्हें संपादन के जरिए सुधारने का अवसर मिल सके। जिगलर का स्पष्ट मानना है कि भ्रूण को पूरी तरह नष्ट करने की तुलना में किसी नई और आशाजनक तकनीक को मौका देना कहीं अधिक मानवीय और बेहतर रास्ता है। इसका आप पर असर मानव भ्रूण में जीन एडिटिंग तकनीक को क्लिनिकल मंजूरी मिलने पर भविष्य में आनुवंशिक बीमारियों से जूझ रहे दंपतियों के लिए माता-पिता बनने की संभावना और विकल्प काफी बढ़ सकते हैं। • संतान की योजना पर असर: वंशानुगत बीमारियों के वाहक माता-पिता को रोग-मुक्त संतान प्राप्त करने के लिए केवल सीमित भ्रूणों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे बार-बार महंगे और दर्दनाक आईवीएफ चक्रों से गुजरने की मजबूरी कम हो सकती है। • सुरक्षा और कानूनी स्थिति: वर्तमान में अमेरिका सहित कई प्रमुख देशों में गर्भावस्था के लिए संपादित भ्रूणों के उपयोग पर कानूनी पाबंदी जारी है। इसका व्यावहारिक मतलब यह है कि किसी भी मरीज के लिए यह तकनीक फिलहाल आम क्लीनिकों में उपलब्ध नहीं है। • आने वाली पीढ़ियों पर प्रभाव: जर्मलाइन संपादन से जुड़े संभावित ऑफ-टारगेट म्यूटेशन का असर अगली पीढ़ियों तक जा सकता है। इसलिए यदि यह तकनीक भविष्य में शुरू भी होती है, तो मरीजों को इसके दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों पर व्यापक काउंसिलिंग लेनी होगी। • उपचार की लागत और समय: हर विशिष्ट आनुवंशिक विसंगति के लिए अलग मॉलिक्यूलर एडिटर विकसित करना होगा। नतीजतन शुरुआत में यह तकनीक आम मरीजों के लिए बेहद महंगी और लंबी प्रक्रिया वाली साबित हो सकती है। ऐसा क्यों हुआ बायोटेक संस्थापक कैथी टाई ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि मौजूदा आईवीएफ और जेनेटिक स्क्रीनिंग प्रक्रियाएं कई जोड़ों को स्वस्थ संतान देने में असमर्थ साबित हो रही हैं। उनका मानना है कि रोकी जा सकने वाली आनुवंशिक बीमारियों को खत्म करना आधुनिक चिकित्सा का नैतिक कर्तव्य है। • आईवीएफ स्क्रीनिंग की तकनीकी सीमाएं: प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग केवल उपलब्ध भ्रूणों में से स्वस्थ भ्रूण का चयन करती है, लेकिन बीमारियों को ठीक नहीं कर सकती। कई दंपतियों के पास पर्याप्त स्वस्थ भ्रूण नहीं बन पाते, जिससे उनके लिए जैविक माता-पिता बनने के रास्ते बंद हो जाते हैं। • कानूनी और वित्तीय अड़चनें: अमेरिका में संघीय कानून मानव भ्रूण अनुसंधान के वित्तपोषण को सीमित करते हैं और एफडीए को ऐसे क्लिनिकल परीक्षणों पर विचार करने से रोकते हैं। टाई इन नियमों में ढील चाहती हैं ताकि अनुसंधान को गति मिल सके और आवश्यक पूंजी जुटाई जा सके। • अतीत की वैज्ञानिक चेतावनियां: कोलंबिया यूनिवर्सिटी के हालिया शोध में पाया गया कि मौजूदा संपादन उपकरण भ्रूणों में अवांछित जीनोमिक बदलाव पैदा करते हैं। इस तकनीकी अनिश्चितता के कारण वैज्ञानिक समुदाय सुरक्षा की गारंटी दिए बिना इसे इंसानों पर आजमाने का कड़ा विरोध कर रहा है। सवाल-जवाब 1. मानव भ्रूण में जीन एडिटिंग को लेकर मुख्य विवाद क्या है? मुख्य विवाद यह है कि भ्रूण में किए गए आनुवंशिक बदलाव भावी पीढ़ियों में चले जाते हैं, और यदि संपादन के दौरान कोई अनपेक्षित म्यूटेशन हुआ तो वह भी बच्चों और उनकी संतानों में पहुंच सकता है। 2. कैथी टाई कौन हैं और उनकी कंपनी क्या काम कर रही है? कैथी टाई ओरिजिन जीनोमिक्स की 30 वर्षीय संस्थापक हैं, जो आईवीएफ क्लीनिकों में उपयोग के लिए मानव भ्रूणों पर बेस और प्राइम-एडिटिंग तकनीकों को परिष्कृत कर रही हैं। 3. क्या मौजूदा आईवीएफ तकनीक आनुवंशिक बीमारियों को रोकने में पर्याप्त नहीं है? आईवीएफ के साथ जेनेटिक स्क्रीनिंग केवल रोग-मुक्त भ्रूणों का चयन करती है, लेकिन अक्सर दंपतियों के पास इतने स्वस्थ भ्रूण नहीं बन पाते कि वे संतान पैदा कर सकें। 4. वैज्ञानिक इस तकनीक को क्लिनिकल उपयोग के लिए तैयार क्यों नहीं मानते? कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शोध में संपादन के दौरान अवांछित और असंगत जीनोमिक बदलाव देखे गए हैं, जिससे साबित होता है कि अनपेक्षित प्रभावों का जोखिम अभी बना हुआ है। 5. अमेरिका में इस तकनीक पर क्या कानूनी प्रतिबंध हैं? अमेरिका में मानव भ्रूण अनुसंधान के लिए संघीय वित्तपोषण प्रतिबंधित है और एफडीए को वंशानुगत आनुवंशिक संशोधनों वाले किसी भी क्लिनिकल परीक्षण पर विचार करने की कानूनी मनाही है। 6. संपादित भ्रूण की जांच में बायोप्सी की क्या सीमा है? बायोप्सी में केवल कुछ कोशिकाओं की जांच होती है, जिससे यह निश्चित नहीं हो सकता कि भ्रूण की बाकी अन्य कोशिकाओं में कोई आनुवंशिक त्रुटि मौजूद नहीं है। https://trendkia.com/science/manava-bhruna-men-gene-editing-ko-naitika-jimmedari-batane-para-shuru-hui-nai-bahasa-vaijnanika-suraksha-manakon-para-bnte-40520 TrendKia — Har trend, sabse pehle.