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  "type": "article",
  "title": "मंगल की कक्षा में दशकों से डटे नासा के ओडिसी और MRO ऑर्बिटर, जानिए कैसे काम कर रही इनकी तकनीक और क्या है आगे का भविष्य",
  "summary": "नासा के 2001 मार्स ओडिसी और मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर दशकों से मंगल ग्रह का अध्ययन कर रहे हैं। जानिए कैसे बेहतरीन इंजीनियरिंग, 1999 की नाकामियों से मिले सबक और खास तकनीकों के दम पर ये अंतरिक्ष यान अब भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।",
  "content": "मंगल ग्रह की कक्षा में चक्कर लगा रहे नासा के दो सबसे पुराने अंतरिक्ष यान, 2001 मार्स ओडिसी और मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (MRO), उम्मीद से कहीं ज्यादा समय से काम कर रहे हैं। मूल रूप से केवल कुछ वर्षों के मिशन के उद्देश्य से भेजे गए ये दोनों ऑर्बिटर दशकों से लाल ग्रह की सतह और वातावरण का बारीक डेटा पृथ्वी पर भेज रहे हैं। ऊपरी कक्षा से लगातार प्रेक्षण करने की इस क्षमता ने मंगल ग्रह पर पानी के अतीत और वर्तमान के इतिहास को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। इन वृद्ध हो चुके अंतरिक्ष यानों को लगातार चालू रखना केवल उन्नत इंजीनियरिंग, निरंतर समस्या-समाधान और थोड़े सौभाग्य के कारण ही संभव हो पाया है। हालांकि, इन ऐतिहासिक सफलताओं के बावजूद, वैज्ञानिक अब इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या ओडिसी और MRO मंगल ग्रह के लिए नासा के अंतिम प्रमुख और व्यापक वैज्ञानिक ऑर्बिटर साबित होंगे।\n\nदशकों का सफर: कैसे लाल ग्रह की खोज का आधार बने दो महाअभियान\nपर्ड्यू यूनिवर्सिटी की ग्रह वैज्ञानिक ब्रियोनी होर्गन, जो इनमें से किसी भी मिशन से सीधे तौर पर नहीं जुड़ी हैं, बताती हैं कि नासा के समग्र मंगल अनुसंधान कार्यक्रम में इन दोनों यानों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। ब्रियोनी होर्गन के अनुसार, \"ओडिसी और MRO दोनों ही अब तक अस्तित्व में आए सबसे अधिक उत्पादक अंतरिक्ष यानों में से हैं।\" 2001 मार्स ओडिसी ने मंगल ग्रह पर बर्फ की मौजूदगी और उसके वितरण का व्यापक मानचित्र तैयार किया है। वहीं दूसरी ओर, MRO की उच्च-रिजोल्यूशन कैमरों के माध्यम से सतह की सूक्ष्म विशेषताओं में समय के साथ होने वाले बदलावों को ट्रैक करने की क्षमता ने वैज्ञानिकों को अभूतपूर्व अंतर्दृष्टि दी है। इन आंकड़ों की बदौलत ही वैज्ञानिक मंगल को महज एक मृत चट्टान मानने के बजाय एक जीवंत और गतिशील ग्रह के रूप में देख पाए हैं।\n\nवैज्ञानिक डेटा जुटाने के अलावा, ओडिसी और MRO एक अन्य अत्यंत critical कार्य भी संभालते हैं। ये दोनों यान मंगल की सतह पर काम कर रहे नासा के रोवर्स के लिए संचार रिले के रूप में कार्य करते हैं। सतह पर मौजूद रोवर्स में सीधे पृथ्वी तक सिग्नल भेजने के लिए पर्याप्त शक्ति और बड़े एंटेना नहीं होते, इसलिए वे अपने डेटा को पहले इन ऑर्बिटर्स तक पहुंचाते हैं, जो फिर उसे पृथ्वी पर नासा के डीप स्पेस नेटवर्क को भेजते हैं। इस प्रकार, ये ऑर्बिटर मंगल की सतह पर मौजूद मानवीय मशीनों और पृथ्वी के नियंत्रण कक्ष के बीच एक मजबूत सेतु बने हुए हैं।\n\nअंतरिक्ष का क्रूर वातावरण और स्वायत्तता की मजबूरी\nगहरे अंतरिक्ष में किसी भी मशीन को जीवित रखना एक अत्यंत कठिन चुनौती है। अंतरिक्ष में उच्च-ऊर्जा कणों और सौर विकिरण की लगातार बौछार होती रहती है। यदि कोई शक्तिशाली कण किसी नाजुक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से टकरा जाए, तो पूरा अंतरिक्ष यान निष्क्रिय हो सकता है। पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे उपग्रहों पर इंजीनियर 24 घंटे नज़र रख सकते हैं और खराबी आने पर तुरंत निर्देश भेज सकते हैं। इसके विपरीत, मंगल और पृथ्वी के बीच की दूरी के कारण बैंडविड्थ बेहद सीमित होती है। कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के ग्रह और अंतरिक्ष भौतिक विज्ञानी रोब लिलीज़, जिन्होंने मंगल के कई अभियानों पर काम किया है, बताते हैं कि विज्ञान अंतरिक्ष यान केवल सप्ताह में एक या दो बार ही पृथ्वी से विस्तृत निर्देश प्राप्त करते हैं।\n\nइसी वजह से रोब लिलीज़ का कहना है, \"एक मंगल यान को अपने स्तर पर ही प्रबंधन करने में सक्षम होना पड़ता है।\" यदि अंतरिक्ष यान का कोई वैज्ञानिक उपकरण खराब होता है, तो मिशन जारी रह सकता है। लेकिन यदि पावर सिस्टम या मुख्य कंप्यूटर बंद हो जाए, तो पूरा अंतरिक्ष यान हमेशा के लिए एक बेकार मलबा बन सकता है। इससे बचने के लिए नासा अपने यानों में सुरक्षा की दोहरी प्रणाली (रिडंडेंसी) अपनाता है। महत्वपूर्ण कलपुर्जों के दो सेट लगाए जाते हैं ताकि यदि एक मुख्य भाग विफल हो जाए, तो इंजीनियरों द्वारा समस्या को हल किए जाने तक स्पेयर पार्ट यान का संचालन संभाल सके।\n\nगन-पॉइंट जैसी चुनौतियां: खगोलीय नक्शों से लेकर ईंधन के एक-एक कतरे तक\nदशकों तक अंतरिक्ष में रहने के कारण इन यानों के सामने कई अनोखी चुनौतियां आई हैं। MRO अपनी सटीक स्थिति और दिशा (ओरिएंटेशन) का पता लगाने के लिए अपने ऑन-बोर्ड कैमरों द्वारा देखे गए तारों की तुलना एक डिजिटल तारामंडल नक्शे से करता है। लेकिन पिछले साल इंजीनियरों के सामने एक अजीब समस्या आई। नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) के मुख्य इंजीनियर पॉल फीसलर ने खुलासा किया कि MRO इतना पुराना हो चुका है कि रात के आकाश में कुछ तारे अपनी मूल जगह से बहुत सूक्ष्म रूप से खिसक गए हैं। तारों के इस मामूली बदलाव ने यान के नेविगेशन सिस्टम को भ्रमित कर दिया था। इसके समाधान के लिए पिछले वर्ष इंजीनियरों ने पृथ्वी से एक नया, अपडेटेड स्टार मैप अंतरिक्ष में भेजा ताकि MRO सही दिशा में टिका रहे।\n\nदूसरी ओर, 2001 मार्स ओडिसी के लिए सबसे बड़ा खतरा इसका घटता हुआ ईंधन है। यान अंतरिक्ष में अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए छोटे थ्रस्टर्स का उपयोग करता है, जिसके लिए प्रोपेलेंट की आवश्यकता होती है। गुरुत्वाकर्षण की अनुपस्थिति में ईंधन टैंक के निचले हिस्से में जमा नहीं होता, जिससे ईंधन की सही मात्रा मापने के लिए कोई मानक गेज काम नहीं करता। नासा के इंजीनियरों के पास इसका सटीक आंकड़ा नहीं है कि टैंक में कितना ईंधन बचा है। इस अनिश्चितता के बावजूद, जेपीएल में ओडिसी के मिशन मैनेजर ग्लेन हेवेन्स और उनकी टीम ने ऐसी अभिनव उड़ान तकनीकें विकसित की हैं, जिससे यान को ईंधन के महज कुछ कतरों का उपयोग करके कई और वर्षों तक संचालित किया जा सके।\n\n1999 के हादसों से मिले सबक: कैसे बदली नासा की सोच\nविशेषज्ञों के अनुसार, ओडिसी और MRO की यह अद्भुत लंबी उम्र असल में नासा के 1999 के दो भयानक हादसों का नतीजा है। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में नासा ने \"फास्टर, बेटर, चीपर\" (तेज़, बेहतर, सस्ता) का नारा दिया था। लेकिन 1999 में नासा ने मंगल पर पहुंचने वाले दो बड़े मिशन गंवा दिए। सबसे पहले मार्स क्लाइमेट ऑर्बिटर मंगल के वायुमंडल में प्रवेश करते ही जलकर नष्ट हो गया, क्योंकि ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम ब्रिटिश इकाइयों (पाउंड-फोर्स) का उपयोग कर रहा था जबकि अंतरिक्ष यान का सॉफ्टवेयर मीट्रिक इकाइयों (न्यूटन) पर चल रहा था। इसके कुछ ही महीनों बाद, मार्स पोलर लैंडर सॉफ्टवेयर में चूक के कारण मंगल की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।\n\nइन दोनों त्रासदियों के बाद हुई जांच में सामने आया कि ये विफलताएं परीक्षण के दौरान ध्यान न देने और छोटी-मोटी मानवीय भूलों के कारण हुई थीं। ग्लेन हेवेन्स के अनुसार, 1999 के उन नुकसानों ने ओडिसी और MRO की डिजाइन टीमों को गहराई से प्रभावित किया। नासा ने इन यानों के प्रक्षेपण से पहले व्यापक परीक्षणों और मजबूती पर भारी निवेश किया। इस रणनीति का मुख्य सिद्धांत था \"मार्जिन\" रखना, यानी किसी भी आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त संसाधन साथ लेकर चलना। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के अंतरिक्ष यान इंजीनियर निलटन रेनो बताते हैं, \"अप्रत्याशित चीजें हो सकती हैं, और आप यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अंतरिक्ष यान जीवित रहे।\" MRO को जरूरत से ज्यादा बड़ी बैटरी और अतिरिक्त प्रोपेलेंट के साथ लॉन्च किया गया था, जिसके दम पर नासा को उम्मीद है कि यह यान अगले एक दशक तक और सेवा दे सकेगा।\n\nभावी अभियानों को लेकर चिंताएं और 'फास्टर, चीपर' का नया दौर\nमंगल की कक्षा में किसी भी चीज़ को हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता। पिछले ही साल, नासा का 11 साल पुराना MAVEN (मार्स एटमॉस्फियर एंड वोलेटाइल इवोल्यूशन) ऑर्बिटर मंगल के पिछले हिस्से में अचानक बिजली की विफलता के कारण संपर्क खो बैठा। ओडिसी और MRO की ढलती उम्र को देखते हुए वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि नासा के अगले मंगल ऑर्बिटर कौन से होंगे। नासा ने निजी कंपनी ब्लू ओरिजन को कम से कम पांच साल के लिए डेटा रिले करने वाले संचार उपग्रह बनाने का ठेका दिया है। लेकिन ओडिसी और MRO के विपरीत, जो मूल रूप से वैज्ञानिक मिशन थे, यह नया वाणिज्यिक उपग्रह केवल अन्य यानों के सिग्नल रिले करेगा और खुद कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं करेगा।\n\nइसके अलावा, नासा के आगामी मंगल वैज्ञानिक प्रोजेक्ट काफी सीमित बजट और छोटे आकार के हैं। उदाहरण के लिए, रोब लिलीज़ के नेतृत्व में 'एस्कापैड' (EscaPADE) मिशन के तहत दो छोटे ऑर्बिटर भेजे जा रहे हैं, जो सूर्य से आने वाले आवेशित कणों के साथ मंगल के वातावरण के संपर्क का अध्ययन करेंगे। हालांकि लिलीज़ खुद स्वीकार करते हैं कि यह मिशन अच्छा विज्ञान करने की न्यूनतम सीमा पर है। इसी तरह, 'स्काईफॉल' प्रोजेक्ट के तहत दो साल के भीतर एक परमाणु-संचालित यान से तीन छोटे हेलीकॉप्टर भेजने की योजना है, लेकिन इसकी वैज्ञानिक क्षमता बेहद सीमित है। ब्रियोनी होर्गन चेतावनी देती हैं कि नासा एक बार फिर \"फास्टर, चीपर\" दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है, और \"उस वातावरण में अच्छा विज्ञान करना बहुत अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है।\"\n\nइसका आप पर असर\nनासा के ओडिसी और MRO जैसे दीर्घकालिक अभियानों की सफलता भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण की लागत और वैज्ञानिक खोजों की गति को सीधे प्रभावित करती है।\n\n• विश्वभर में: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में विकसित की जा रही रिडंडेंसी और ईंधन दक्षता तकनीकें उपग्रह उद्योग और पृथ्वी की कक्षा में काम कर रहे वाणिज्यिक संचार उपग्रहों के जीवनकाल को बढ़ाएंगी। इससे भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों की लागत कम करने में मदद मिलेगी।\n• भारत में: नासा के इन अनुभवों से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को अपने आगामी मंगलयान-2 (MOM-2) और अन्य अंतरग्रहीय मिशनों के लिए मजबूत इंजीनियरिंग मार्जिन तैयार करने में सहायता मिलेगी। भारतीय वैज्ञानिक भी मंगल ग्रह के जलवायु डेटा का उपयोग शोध के लिए कर सकेंगे।\n• नागरिकों और छात्रों के लिए: मंगल पर पानी और वातावरण की खोज से यह समझने में मदद मिलती है कि ग्रहों की जलवायु कैसे बदलती है। यह शोध भविष्य में मानव युक्त मंगल अभियानों का आधार तैयार कर रहा है।\n• अंतरिक्ष उद्योग के लिए: कम लागत वाले अभियानों ('फास्टर, चीपर') और भारी-भरकम वैज्ञानिक ऑर्बिटर्स के बीच संतुलन बनाने से निजी अंतरिक्ष कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच नई साझेदारियां बनेंगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनासा के ओडिसी और MRO ऑर्बिटर कई दशकों से इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि 1999 की नाकामियों के बाद नासा ने इनकी डिजाइनिंग और टेस्टिंग में व्यापक सुरक्षा मार्जिन और दोहरी प्रणालियां शामिल की थीं।\n\n• 1999 के हादसों से सीख: मार्स क्लाइमेट ऑर्बिटर और मार्स पोलर लैंडर के क्रैश होने के बाद नासा ने 'फास्टर, बेटर, चीपर' मॉडल छोड़कर सुरक्षा और गहन परीक्षण को प्राथमिकता दी।\n• इंजीनियरिंग मार्जिन: MRO और ओडिसी को अतिरिक्त ईंधन, बड़ी बैटरी और हर मुख्य पुर्जे के स्पेयर (रिडंडेंसी) के साथ लॉन्च किया गया था, जिसने संकट के समय यान को बचाए रखा।\n• इनोवेटिव समस्या समाधान: तारों के खिसकने पर MRO का खगोलीय नक्शा अपडेट करना और बिना ईंधन गेज के ओडिसी के प्रोपेलेंट को बूंद-बूंद इस्तेमाल करना जैसी तकनीकों ने इनकी उम्र बढ़ाई।\n• भावी अनिश्चितता का कारण: हाल ही में 11 साल पुराने MAVEN यान की अचानक विफलता और नासा के छोटे व सस्ते अभियानों की ओर झुकाव से भविष्य में व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन पर सवाल खड़े हो गए हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. 2001 मार्स ओडिसी और MRO कितने समय से काम कर रहे हैं?\n2001 मार्स ओडिसी 2001 से (दो दशकों से अधिक) और मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (MRO) 2005 से (लगभग 20 वर्षों से) मंगल की कक्षा में सक्रिय हैं।\n\n2. क्या ये यान मंगल रोवर्स की मदद भी करते हैं?\nहां, क्यूरियोसिटी और परसेवरेंस जैसे मंगल रोवर्स सीधे पृथ्वी से बात करने के बजाय अपना वैज्ञानिक डेटा ओडिसी और MRO को भेजते हैं, जो इसे पृथ्वी तक रिले करते हैं।\n\n3. MRO के नेविगेशन सिस्टम में क्या समस्या आई थी और उसे कैसे ठीक किया गया?\nMRO इतना पुराना हो गया था कि रात के आकाश में तारों की जगह थोड़ी बदल गई थी। नासा के इंजीनियरों ने यान की लोकेशन सही रखने के लिए पृथ्वी से एक नया स्टार मैप अपलोड किया।\n\n4. 1999 में नासा के कौन से दो मार्स मिशन फेल हुए थे?\n1999 में नासा का मार्स क्लाइमेट ऑर्बिटर मीट्रिक और ब्रिटिश इकाइयों की गड़बड़ी से जल गया था, और मार्स पोलर लैंडर सॉफ्टवेयर गलती की वजह से सतह पर क्रैश हो गया था।\n\n5. ओडिसी के ईंधन के साथ क्या चुनौती है?\nशून्य गुरुत्वाकर्षण में ईंधन का स्तर मापने के लिए कोई गेज नहीं होता। नासा को नहीं पता कि कितना प्रोपेलेंट बचा है, इसलिए इंजीनियर बेहद कम ईंधन में थ्रस्टर्स चला रहे हैं।\n\n6. क्या नासा भविष्य में नए मंगल ऑर्बिटर भेज रहा है?\nनासा ने ब्लू ओरिजन को एक वाणिज्यिक संचार उपग्रह बनाने के लिए नियुक्त किया है, लेकिन वैज्ञानिक चिंतित हैं क्योंकि यह नया यान केवल डेटा रिले करेगा, कोई नया विज्ञान नहीं।",
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  "publishedAt": "2026-10-27",
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