# बुध ग्रह की दहलीज पर बेपीकोलंबो: प्रणोदन मॉड्यूल अलग होने के साथ मिशन का अंतिम चरण शुरू

> यूरोपीय और जापानी अंतरिक्ष एजेंसियों का संयुक्त यान बेपीकोलंबो अब बुध ग्रह की अंतिम कक्षा की ओर बढ़ रहा है। 9.9 अरब किलोमीटर के सफर और नौ ग्रेविटी असिस्ट चक्रों के बाद यान ने अपना प्रणोदन मॉड्यूल सफलतापूर्वक अलग कर लिया है।

**Type:** article · **Category:** विज्ञान · **Published:** 2026-09-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/science/mercury-ki-dahalija-para-bepicolombo-pranodana-modyula-alaga-hone-ke-satha-mishana-ka-antima-charana-shuru-35707 · **Language:** Hindi
**Tags:** बेपीकोलंबो, बुध ग्रह, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी, सौरमंडल, अंतरिक्ष विज्ञान

अंतरिक्ष में लगभग आठ वर्षों की बेहद जटिल यात्रा तय करने के बाद बेपीकोलंबो अंतरिक्ष यान अब सौरमंडल के सबसे भीतरी ग्रह बुध के बेहद करीब पहुँच चुका है। 3 सितंबर को ग्राउंड कंट्रोल ने इस बात की पुष्टि की कि यान का मुख्य प्रणोदन मॉड्यूल बाकी अंतरिक्ष यान से पूरी तरह और सफलतापूर्वक अलग हो गया है। यह उपलब्धि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) के इस साझा अभियान के अंतिम और सबसे निर्णायक चरण की शुरुआत को दर्शाती है। पृथ्वी से 200 मिलियन किलोमीटर से भी अधिक दूरी से मिले संकेतों से स्पष्ट हुआ है कि इस अलगाव के दौरान सभी प्रणालियों ने सुचारू रूप से काम किया है।

## सूर्य के प्रचंड गुरुत्वाकर्षण के बीच बुध तक पहुँचना क्यों है कठिन
बुध ग्रह तक पहुँचना अंतरिक्ष विज्ञान के सबसे कठिन अभियानों में गिना जाता है। इससे पहले केवल दो बार नासा के अभियानों ने इस ग्रह का अन्वेषण किया है। किसी भी अंतरिक्ष यान के लिए बुध की ओर बढ़ना दरअसल सूर्य के विशाल गुरुत्वाकर्षण की ओर गिरने जैसा होता है। केंद्र की ओर खिंचे चले जाना तो आसान है, लेकिन चुनौती उस अनियंत्रित खिंचाव को थामने की होती है। यान लगातार सूर्य की ओर गिरता न रहे, इसके लिए भारी मात्रा में ईंधन की आवश्यकता केवल आगे बढ़ने के लिए नहीं, बल्कि गति को नियंत्रित करने और ब्रेक लगाने के लिए रॉकेट दागने में पड़ती है।

## ग्रहों के सहारे गति धीमी करने का पेचीदा मार्ग
गति को संतुलित रखने के लिए अंतरिक्ष यान सौरमंडल के अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल करते हैं, जिसे ग्रेविटी असिस्ट कहा जाता है। हालांकि, इसके लिए यान को आकाशीय पिंडों के चक्कर काटते हुए एक लंबा और घुमावदार रास्ता तय करना पड़ता है। बेपीकोलंबो ने अब तक लगभग 6 अरब मील यानी 9.9 अरब किलोमीटर का विशाल फासला तय किया है। अपनी गति पर नियंत्रण पाने के लिए इस यान ने पृथ्वी का एक बार, शुक्र का दो बार और स्वयं बुध के छह चक्कर लगाकर कुल नौ ग्रेविटी असिस्ट युद्धाभ्यास पूरे किए हैं।

## झुलसाती गर्मी और जमा देने वाली ठंड का सामना
सूर्य के सबसे निकट स्थित होने के कारण बुध की सतह दिन के समय 800 डिग्री फारेनहाइट यानी लगभग 430 डिग्री सेल्सियस तक तप जाती है। दूसरी ओर, इस छोटे ग्रह पर व्यावहारिक रूप से वायुमंडल न होने के कारण रात के समय तापमान गिरकर शून्य से नीचे -290 डिग्री फारेनहाइट यानी -180 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। बेपीकोलंबो को न केवल इन दोनों अत्यधिक तापमानों को झेलना है, बल्कि हर दिन इनके बीच होने वाले भारी बदलावों के बीच भी सुरक्षित बने रहना है।

## दो अलग परिक्रमा यानों में बँटेगा मुख्य ढांचा
अपनी तय स्थिति में पहुँचने के बाद बेपीकोलंबो दो स्वतंत्र कक्षीय यानों में विभाजित हो जाएगा। इनमें पहला मरकरी प्लैनेटरी ऑर्बिटर (MPO) है, जो बुध की सतह और उसकी आंतरिक संरचना का गहराई से अध्ययन करेगा। दूसरा मरकरी मैग्नेटोस्फेरिक ऑर्बिटर है, जिसे 'मियो' नाम दिया गया है। मियो का काम ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र और उसके बेहद विरल वायुमंडल की जाँच करना होगा। यह पहला मौका होगा जब एक साथ दो यान बुध की परिक्रमा करेंगे, ताकि इस रहस्यमयी ग्रह का एक समग्र और विस्तृत वैज्ञानिक चित्र तैयार किया जा सके।

## वैज्ञानिक प्रेक्षणों की समयसीमा
योजना के अनुसार, मियो ग्रह के ध्रुवों के ऊपर से गुजरने वाली एक उच्च दीर्घवृत्ताकार कक्षा में स्थापित होगा। इसके बाद MPO अपनी ऊंचाई को और कम करेगा और मार्च 2027 में अपनी अंतिम लक्षित कक्षा में पहुँचेगा। अपनी अंतिम स्थिति प्राप्त करने के बाद भी वैज्ञानिक अध्ययन तत्काल शुरू नहीं होंगे। जांच शुरू करने से पहले यानों को कई तकनीकी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा, जिसमें मियो के अत्यंत महत्वपूर्ण सनशील्ड को खोलना शामिल है। सभी आवश्यक तैयारियां पूरी होने के बाद मुख्य वैज्ञानिक अवलोकन अप्रैल 2027 से आरंभ होने निर्धारित हैं।

## बुध से जुड़े गहरे रहस्य और सापेक्षता के सिद्धांत की परीक्षा
वैज्ञानिक इस दोहरे मिशन के जरिए बुध ग्रह के कई अनुत्तरित रहस्यों को सुलझाने की उम्मीद कर रहे हैं। प्रमुख सवालों में यह शामिल है कि अपने छोटे आकार के मुकाबले बुध का लोहे का आंतरिक कोर इतना विशाल क्यों है। इसके अलावा, अत्यधिक झुलसाने वाली गर्मी के बावजूद ध्रुवों के हमेशा अंधेरे में रहने वाले क्रेटरों में बर्फ कैसे मौजूद है, और पृथ्वी के अलावा यह एकमात्र ऐसा चट्टानी ग्रह क्यों है जिसका अपना चुंबकीय क्षेत्र है। शोधकर्ता इसकी सतह पर मौजूद रहस्यमयी गड्ढों की असल प्रकृति को भी समझना चाहते हैं, जिन्हें 'हॉलो' कहा जाता है। इन रहस्यों के समाधान से यह समझने में मदद मिलेगी कि पृथ्वी सहित स्थलीय ग्रह सौरमंडल में कैसे बने और विकसित हुए। साथ ही, सूर्य के निकट स्थित होने के कारण बुध अंतरिक्ष-समय के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव की जांच के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है, जिससे खगोलशास्त्री आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत का परीक्षण करने के लिए इसके सटीक कक्षीय डेटा का उपयोग करेंगे।

## इसका आप पर असर
बेपीकोलंबो मिशन से मिलने वाला डेटा हमारे सौरमंडल, पृथ्वी की बनावट और भौतिकी के मूलभूत नियमों की समझ को एक नई दिशा देगा।

- **खगोल विज्ञान और अनुसंधान:** मिशन से जुटाए गए आंकड़े यह स्पष्ट करेंगे कि अरबों साल पहले पृथ्वी सहित चट्टानी ग्रह किस तरह बने थे। इससे हमारे ग्रह के भूगर्भीय इतिहास और आंतरिक संरचना को समझने के नए रास्ते खुलेंगे।
- **भौतिकी के बुनियादी नियम:** बुध के पास सूर्य के विशाल गुरुत्वाकर्षण से मिलने वाले कक्षीय आंकड़े आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत की जांच करेंगे। यह अध्ययन स्पेस-टाइम और आधुनिक भौतिकी के सिद्धांतों को सत्यापित करने में मदद करेगा।
- **भविष्य के अंतरिक्ष अभियान:** गुरुत्वाकर्षण सहायता और अत्यधिक तापमान रोधी तकनीकों की सफलता भविष्य के अंतरग्रहीय अभियानों के लिए नए मानक तय करेगी। गहरे अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले भावी उपग्रहों और रोबोटिक अभियानों के डिजाइन में इसका सीधा लाभ मिलेगा।
- **छात्र और विज्ञान प्रेमी:** इस ऐतिहासिक अभियान के वैज्ञानिक नतीजे अप्रैल 2027 से सामने आने लगेंगे। यह जानकारी अकादमिक शोध, शोधार्थियों और विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए ज्ञान का बड़ा स्रोत बनेगी।

## ऐसा क्यों हुआ
बेपीकोलंबो का यह अभियान इसलिए जरूरी हुआ क्योंकि सूर्य के करीब स्थित होने के कारण बुध तक पहुँचना और वहां काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है, जिससे कई बुनियादी वैज्ञानिक सवाल दशकों से अनसुलझे पड़े हैं।

- **सूर्य का खिंचाव और धीमा होने की चुनौती:** आंतरिक सौरमंडल की यात्रा करते समय यान सूर्य के तीव्र गुरुत्वाकर्षण की ओर खिंचता है, जिससे अनियंत्रित गति से बचने के लिए गति को तोड़ना आवश्यक होता है। भारी ईंधन ले जाने के बजाय वैज्ञानिकों ने 9.9 अरब किलोमीटर के घुमावदार रास्ते और नौ ग्रेविटी असिस्ट चक्करों की योजना बनाई।
- **अत्यधिक तापमान का दबाव:** बुध पर दिन का तापमान 430 डिग्री सेल्सियस और रात का -180 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। उपकरणों को इस अत्यधिक तापीय चक्र से बचाने के लिए विशेष हीट शील्ड और दो अलग-अलग ऑर्बिटर का संयुक्त ढांचा तैयार किया गया।
- **अनुत्तरित रहस्यों को सुलझाने की जरूरत:** इससे पहले केवल दो अमेरिकी अभियानों ने बुध की पड़ताल की थी, जिससे कई पहेलियां अधूरी रह गईं। इसका विशाल लौह कोर, ध्रुवों पर बर्फ और सतह के हॉलो गड्ढे जैसे रहस्यों की विस्तृत पड़ताल के लिए दो अलग-अलग कक्षाओं में यान भेजना जरूरी था।

## सवाल-जवाब

### 1. बेपीकोलंबो मिशन किन अंतरिक्ष एजेंसियों का संयुक्त प्रोजेक्ट है?
यह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) का एक संयुक्त वैज्ञानिक अभियान है।

### 2. 3 सितंबर को अंतरिक्ष यान के साथ क्या हुआ?
ग्राउंड कंट्रोल ने पुष्टि की कि यान का प्रणोदन मॉड्यूल सफलतापूर्वक बाकी अंतरिक्ष यान से अलग हो गया है।

### 3. बुध तक पहुँचने के लिए बेपीकोलंबो ने कितनी दूरी तय की है?
यान ने अब तक लगभग 6 अरब मील यानी 9.9 अरब किलोमीटर का घुमावदार सफर तय किया है।

### 4. यान ने अपनी गति नियंत्रित करने के लिए कितने ग्रेविटी असिस्ट पूरे किए?
यान ने कुल नौ ग्रेविटी असिस्ट किए, जिसमें एक बार पृथ्वी, दो बार शुक्र और छह बार बुध का चक्कर शामिल है।

### 5. बेपीकोलंबो किन दो अलग-अलग यानों में विभाजित होगा?
यह मरकरी प्लैनेटरी ऑर्बिटर (MPO) और मरकरी मैग्नेटोस्फेरिक ऑर्बिटर ('मियो') नामक दो परिक्रमा यानों में बँटेगा।

### 6. बुध की सतह पर तापमान कितना रहता है?
दिन के समय सतह का तापमान 430 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जबकि रात में यह गिरकर -180 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा हो जाता है।

### 7. मिशन के वैज्ञानिक अवलोकन कब शुरू होंगे?
मार्च 2027 में अंतिम कक्षा प्राप्त करने और सनशील्ड जैसी प्रणालियों के खुलने के बाद वैज्ञानिक अध्ययन अप्रैल 2027 में शुरू होंगे।

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