नया हिमयुग शुरू होने से पहले ही जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से बदल गई पृथ्वी की स्थिति हालिया शोध से पता चलता है कि कनाडा के बफिन द्वीप पर स्थित बार्न्स आइस कैप कुछ हजार साल पहले बढ़ने लगा था, लेकिन 1960 के दशक से मानवीय गतिविधियों के कारण हुए कार्बन प्रदूषण के चलते इसमें तेजी से पिघलाव और सिकुड़न दर्ज की गई। पृथ्वी के पर्यावरण और जलवायु इतिहास को लेकर सामने आए नए वैज्ञानिक निष्कर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक नया हिमयुग शुरू होने के आसार बन रहे थे, लेकिन मानवीय गतिविधियों और जीवाश्म ईंधनों के अंधाधुंध उपयोग ने इस प्राकृतिक चक्र को पूरी तरह से पलट दिया। कनाडा के बफिन द्वीप के एक बड़े हिस्से को ढकने वाली बार्न्स आइस कैप हजारों साल पहले विस्तार के दौर में थी, लेकिन 1960 के दशक के बाद से जैसे-जैसे कार्बन प्रदूषण में भारी बढ़ोतरी हुई, इस विशाल बर्फ की चादर का दायरा तेजी से कम होने लगा। प्राकृतिक बदलाव और मिलानोविच चक्र हमारी पृथ्वी पर नियमित अंतराल पर ऐसे चरण आते हैं जब उच्च अक्षांशों से बर्फ का विस्तार नीचे की तरफ होने लगता है। इन्हें आम बोलचाल की भाषा में हिमयुग कहा जाता है, जो पृथ्वी की परिक्रमा और उसकी धुरी के प्राकृतिक बदलावों के कारण होते हैं। इन बदलावों को मिलानोविच चक्र के रूप में जाना जाता है, जिनके बाद अंतर-हिमनद काल आते हैं और बर्फ वापस ध्रुवों की ओर सिकुड़ने लगती है। पृथ्वी का पिछला हिमयुग 12,000 साल पहले समाप्त हुआ था। उस दौर में लॉरेंटाइड आइस शीट नामक विशाल बर्फ की चादर ने पूरे कनाडा को ढका हुआ था और यह दक्षिण में न्यूयार्क तथा मिडवेस्ट तक फैली हुई थी। बाद में यह सिकुड़कर बार्न्स आइस कैप के रूप में सिमट गई, जो बफिन द्वीप पर डेलावेयर राज्य के आकार के बराबर क्षेत्र में फैली है। बर्फ के नीचे दबे इतिहास की खोज सामान्य ग्लेशियरों के विपरीत जो लगातार गतिमान रहते हैं, बार्न्स आइस कैप अपने आधार की चट्टान से पूरी तरह जमी हुई है। इससे इसके नीचे मौजूद वनस्पति और प्राचीन रिकॉर्ड सुरक्षित रूप से संरक्षित रहे हैं। इसी अनूठी विशेषता के कारण वैज्ञानिक यह पता लगाने में सफल रहे हैं कि इस बर्फ की चादर ने कब और कितनी तेजी से विस्तार किया और फिर कब इसमें कमी आई। यह समझने के लिए कि यह अपने मौजूदा आकार तक कब पहुंची थी, वैज्ञानिकों ने एक्सपोजर डेटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया। इस विधि से ग्लेशियर के किनारे से कुछ मीटर दूर पड़ी चट्टानों की जांच की गई ताकि यह जाना जा सके कि वे कितने लंबे समय से खुले आसमान के संपर्क में थीं। खुली चट्टान की सतह पर बनने वाले बेरिलियम-10 तत्व के माप के आधार पर शोधकर्ताओं ने गणना की कि यह आइस चादर पहली बार आज के आकार में लगभग 3,600 साल पहले पहुंची थी। मॉस और लाइकेन से मिला समय का सुराग इसके बाद शोधकर्ताओं ने यह जानने का प्रयास किया कि उस शुरुआती बिंदु के बाद इस बर्फ की चादर ने कितना पुनर्विकास किया था। इस काम के लिए उन्होंने ग्लेशियर के सामने मौजूद टुंड्रा क्षेत्र के छोटे पौधों, यानी मॉस और लाइकेन का सहारा लिया। निकोलस यंग बताते हैं कि जब आइस कैप पीछे हटी, तो इन नई उजागर हुई जमीनों पर मॉस उग आए और सामान्य स्थिति बन गई, लेकिन बाद में आइस कैप ने दोबारा विस्तार करना शुरू किया और बर्फ ने मॉस को ढककर नष्ट कर दिया। नष्ट हुए मॉस के ये अवशेष नई उजागर हुई भूमि में सुरक्षित रह गए, जिससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि समय के साथ बर्फ ने किस तरह से इलाके में अपनी स्थिति बदली है। इन ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर निकोलस यंग और उनके सह-लेखकों का अनुमान है कि यह ग्लेशियर लगभग 2,000 साल पहले फिर से बढ़ना शुरू हुआ था, जो शायद एक नए हिमनद काल की शुरुआत का संकेत था। 1960 के दशक से आया बड़ा बदलाव हालांकि, 1960 के दशक की शुरुआत से इस आइस कैप ने ऐसा रुख अपनाया जो किसी अन्य हिमयुग के अनुरूप नहीं था, क्योंकि यह फिर से सिकुड़ने लगी। शोध टीम ने ऐतिहासिक हवाई तस्वीरों का अध्ययन करके यह देखा कि बर्फ ने अपनी दिशा बदल दी है और वह अपने नए किनारों से पीछे हट रही है। 1980 के दशक के बाद से बार्न्स आइस कैप के किनारे औसतन हर साल 4 मीटर पीछे खिसक चुके हैं। यह समय वही है जब दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन तेजी से बढ़ा, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर बर्फ पिघलने की रफ्तार तेज हो गई। इस बारे में निकोलस यंग का कहना है कि इस ग्लेशियर के आधुनिक दौर में पीछे हटने से पिछले 2,000 साल का शुद्ध विस्तार उलट गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य डार्टमाउथ की भूविज्ञान प्राध्यापक मेरेडिथ केली का मानना है कि इस अध्ययन में जुटाए गए आंकड़े बेहद शानदार हैं और यह स्पष्ट पैटर्न दिखाते हैं कि आइस कैप क्या कर रही थी। हालांकि, उनका सुझाव है कि मानवीय कारणों से होने वाली वार्मिंग का प्रभाव शुरू होने से पहले पृथ्वी किस प्रकार हिमनद काल में प्रवेश कर रही थी, इसे पूरी तरह समझने के लिए इन आंकड़ों की तुलना दुनिया के अन्य हिस्सों से की जानी चाहिए। निकोलस यंग का यह भी कहना है कि इस शोध से दशकों पुरानी उस परिकल्पना को बल मिलता है जिसका उपयोग जलवायु परिवर्तन को खारिज करने वाले लोग इसे एक दिखावा साबित करने के लिए करते रहे हैं। 1970 की शुरुआत में वैज्ञानिक ब्राउन यूनिवर्सिटी में यह चर्चा करने के लिए एकत्र हुए थे कि अगला हिमयुग कब आ सकता है, और उन्होंने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को चेतावनी पत्र भी भेजा था। निकोलस यंग का मानना है कि यह अध्ययन यह दिखाने में मदद करता है कि आने वाले हिमयुग को लेकर वैज्ञानिक वास्तव में सही आकलन कर रहे थे। इसका आप पर असर जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के पिघलने की यह प्रक्रिया दुनिया भर के मौसम चक्र और समुद्र के जलस्तर को सीधे प्रभावित करती है। • वैश्विक प्रभाव: आर्कटिक और ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के तेजी से पिघलने से आने वाले वर्षों में समुद्र के जलस्तर में वृद्धि हो सकती है, जिससे तटीय इलाकों में रहने वाली आबादी को बाढ़ और कटाव का सामना करना पड़ सकता है। • मौसम पैटर्न: वैश्विक तापमान बढ़ने से मानसून और मौसमी हवाओं के पैटर्न में लगातार बदलाव आ रहा है, जिसका असर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है। • नीतिगत बदलाव: इस तरह के वैज्ञानिक अध्ययन सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने और जलवायु नीतियों को सख्ती से लागू करने का दबाव बढ़ाते हैं। • स्थानीय निगरानी: पहाड़ी और ठंडे क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को मौसम की अनिश्चितता और आपदाओं के बढ़ते जोखिम के खिलाफ अपनी तैयारी मजबूत करनी होगी। ऐसा क्यों हुआ बार्न्स आइस कैप के सिकुड़ने और प्राकृतिक हिमयुग चक्र के रुकने के पीछे मुख्य कारण बड़े पैमाने पर होने वाला औद्योगिक प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है। • मानवीय गतिविधियां: 1960 के दशक से जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग और औद्योगिक विकास के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में भारी वृद्धि हुई। • वैश्विक तापमान: बढ़ते कार्बन उत्सर्जन ने ग्रीनहाउस प्रभाव को तीव्र किया, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ा और ध्रुवीय तथा ठंडे क्षेत्रों में जमी बर्फ पिघलने लगी। • ऐصतिहासिक संदर्भ: वैज्ञानिक दशकों से यह मानते रहे हैं कि प्राकृतिक मिलानोविच चक्र पृथ्वी को एक नए हिमयुग की ओर ले जा रहे थे, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को समय से पहले ही उलट दिया। • शोध के आधार: वैज्ञानिकों ने बेरिलियम-10 माप और प्राचीन मॉस तथा लाइकेन के अवशेषों का अध्ययन करके यह प्रमाणित किया कि पिछले दो हजार वर्षों का विस्तार अब तेजी से सिमट रहा है। सवाल-जवाब 1. बार्न्स आइस कैप कहाँ स्थित है? बार्न्स आइस कैप कनाडा के बफिन द्वीप पर स्थित है और यह डेलावेयर राज्य के आकार के बराबर क्षेत्र को कवर करती है। 2. बार्न्स आइस कैप का विस्तार कब शुरू हुआ था? वैज्ञानिकों के अनुसार यह आइस कैप लगभग 2,000 साल पहले फिर से बढ़ना शुरू हुई थी। 3. इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने किस तकनीक का इस्तेमाल किया? शोधकर्ताओं ने चट्टानों पर बेरिलियम-10 तत्व की माप और टुंड्रा क्षेत्र के मॉस तथा लाइकेन के अवशेषों का अध्ययन किया। 4. 1960 के दशक के बाद से इस आइस कैप में क्या बदलाव आया? 1960 के दशक से यह आइस कैप सिकुड़ने लगी है और 1980 के बाद से इसके किनारे प्रति वर्ष औसतन 4 मीटर पीछे हट रहे हैं। 5. इस शोध के मुख्य लेखक कौन हैं? कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लैमोंट-डोहर्टी अर्थ ऑब्जर्वेटरी के पेलोकलामेटोलॉजिस्ट निकोलस यंग इस नए शोध पत्र के प्रमुख लेखक हैं। https://trendkia.com/science/naya-himayuga-shuru-hone-se-pahale-hi-jivashma-indhanon-ke-istemala-se-badala-gai-prithvi-ki-sthiti-50855 TrendKia — Har trend, sabse pehle.