# प्रकृति से परे नए अणु गढ़ेगा कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नोबेल विजेता वैज्ञानिक डेविड बेकर ने समझाई नई जैविक क्रांति

> कंप्यूटेशनल प्रोटीन डिजाइन के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले वैज्ञानिक डेविड बेकर अब ऐसी जैविक संरचनाएं तैयार करने में जुटे हैं जो कुदरत में कभी नहीं बनीं। कैंसर की दवा से लेकर प्लास्टिक खत्म करने वाले एंजाइम तक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहारे जीव विज्ञान का नया युग शुरू हो रहा है।

**Type:** article · **Category:** विज्ञान · **Published:** 2026-09-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/science/prakriti-se-pare-nae-anu-garhega-ai-nobel-vijeta-vaijnanika-david-baker-ne-samajhai-nai-jaivika-kranti-33401 · **Language:** Hindi
**Tags:** डेविड बेकर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नोबेल पुरस्कार, प्रोटीन डिजाइन, जैव प्रौद्योगिकी, कैंसर का इलाज, सिंथेटिक डीएनए

धरती पर जीवन के अरबों साल लंबे विकासक्रम में प्रकृति ने कई तरह के जैविक समाधान रचे हैं, लेकिन भौतिकी और रसायन विज्ञान की संभावनाओं का एक बहुत बड़ा दायरा अब भी अछूता है। इसी अनदेखे जैविक संसार को आकार देने के लिए सिएटल स्थित गैर-लाभकारी बायोमेडिकल शोध संस्थान एलन इंस्टीट्यूट, वाशिंगटन विश्वविद्यालय और फ्रेड हचिंसन कैंसर सेंटर ने एक साझा पहल शुरू की है। इस विशेष वैज्ञानिक मुहिम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक कम्प्यूटेशनल तकनीकों के जरिए ऐसे डेटाबेस, मॉडल और डिजिटल टूल विकसित किए जा रहे हैं जो भविष्य की चिकित्सा और तकनीकी दुनिया की नई नींव साबित हो सकते हैं। इस पहल की कमान संभालने वाले प्रमुख वैज्ञानिकों में डेविड बेकर शामिल हैं, जिन्होंने कम्प्यूटेशनल प्रोटीन डिजाइन में उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 2024 का रसायन विज्ञान नोबेल पुरस्कार साझा किया था। इस नए वैज्ञानिक बदलाव की तुलना विशेषज्ञ औद्योगीकरण, विद्युतीकरण और डिजिटल क्रांति जैसे ऐतिहासिक मोड़ों से कर रहे हैं।

 

## कुदरत की सीमाओं से आगे नई आणविक संरचनाएं

जीव विज्ञान के पारंपरिक इतिहास में वैज्ञानिक हमेशा उन्हीं जैविक प्रक्रियाओं और संरचनाओं का अध्ययन करते रहे हैं जिन्हें प्रकृति ने अरबों वर्षों के क्रमिक विकास के दौरान तैयार किया। प्रकृति के बनाए दायरे से बाहर निकलकर बिल्कुल नए अणुओं और जैविक कार्यों की रचना करना एक पूरी तरह से क्रांतिकारी कदम है। एआई बायोडिजाइन के मुख्य वैज्ञानिक अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे डेविड बेकर का कहना है कि जीव विज्ञान की सबसे रोमांचक बात यह है कि कुदरत ने उन संभावनाओं का सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही तलाशा है जो भौतिक और रासायनिक तौर पर संभव हैं। इसी वजह से इंसानी जरूरतों के अनुकूल नए जैविक ढांचे तैयार करने के लिए संभावनाओं का एक असीम फलक खुल जाता है। इस परियोजना का प्रमुख मकसद कैंसर और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लिए अत्याधुनिक दवाएं तैयार करना और महासागरों में तैरते प्लास्टिक कचरे को नष्ट करने में सक्षम नए एंजाइम बनाना है।

 

## अज्ञात जैविक क्षेत्रों के जोखिम और उनसे बचाव की तैयारी

जब वैज्ञानिक ऐसी जैविक दुनिया में कदम रखते हैं जो प्रकृति में कभी मौजूद नहीं रही, तो स्वाभाविक रूप से कई जटिल सवाल और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां सामने आती हैं। किसी नई जैविक तकनीक की तरह इसमें भी जीवित प्रणालियों के साथ अनपेक्षित पारस्परिक प्रभाव, पर्यावरण पर अप्रत्याशित असर या तकनीक के गलत इस्तेमाल जैसी मुख्य आशंकाएं जुड़ी रहती हैं। डेविड बेकर के अनुसार, आज आधुनिक विज्ञान के पास सबसे बड़ी ताकत यह है कि कम्प्यूटेशनल डिजाइनिंग के जरिए किसी अणु का प्रयोगशाला में वास्तविक संश्लेषण करने से पहले ही उसके तमाम जोखिमों का आकलन किया जा सकता है। कंप्यूटर आधारित जांच के बाद इन मॉडलों को पूरी तरह सुरक्षित प्रयोगशाला परिवेश में परखा जाता है और किसी भी व्यावहारिक उपयोग से पहले कई चरणों में यथार्थवादी प्रयोगात्मक सत्यापन से गुजारा जाता है ताकि कोई भी जैविक ढांचा प्रयोगशाला से बाहर जाने से पहले पूरी तरह सुरक्षित साबित हो सके।

 

## दवाओं से लेकर जैविक कंप्यूटर तक भविष्य का दृष्टिकोण

प्रोटीन दरअसल कुदरत द्वारा विकसित ऐसी आणविक मशीनें हैं जो पृथ्वी पर मौजूद समस्त जैविक पदार्थों का आधार बनाती हैं। प्रोटीन की इस अपार क्षमता का पूरा लाभ उठाने के लिए नए इंजीनियरिंग सिद्धांतों को तय किया जा रहा है, जिससे अभी तक अकल्पनीय लग रहे प्रयोग भी सच साबित हो सकें। इस परियोजना की दीर्घकालिक सोच केवल दवाओं और प्लास्टिक अपघटक एंजाइमों तक सीमित नहीं है, बल्कि जैविक कंप्यूटर बनाने की दिशा में भी काम जारी है। डेविड बेकर और उनके शोध दल का स्पष्ट लक्ष्य है कि किसी नई बीमारी का इलाज खोजने में दशकों के बजाय कुछ ही हफ्तों का समय लगे। वे एक ऐसी व्यवस्था की कल्पना करते हैं जहां हवा, पानी और मिट्टी से प्रदूषकों को हटाकर पर्यावरण को स्वच्छ किया जा सके, फसलें उन कठोर परिस्थितियों में भी पनप सकें जो पहले उन्हें नष्ट कर देती थीं, और सूक्ष्म आणविक मशीनें कचरे से महत्वपूर्ण खनिज निकालकर बुनियादी ढांचे की मरम्मत कर सकें।

 

## मशीन लर्निंग की भूमिका और वैज्ञानिक समझ का संतुलन

जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता अधिक सक्षम हो रही है, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या एआई ऐसे जटिल अणुओं की रचना कर सकता है जिनकी सटीक कार्यप्रणाली को खुद वैज्ञानिक पूरी तरह न समझ सकें। विज्ञान का इतिहास हमेशा कई चरणों में आगे बढ़ा है और यही बात मशीन लर्निंग आधारित प्रोटीन डिजाइन पर भी लागू होती है। वैज्ञानिक खोजों में पहला कदम अक्सर यह देखना होता है कि कोई चीज व्यावहारिक रूप से काम कर रही है, और वह क्यों काम कर रही है, यह समझ आम तौर पर बाद में विकसित होती है। डेविड बेकर ने स्पष्ट किया कि मशीन लर्निंग पहले चरण में बेहद कारगर है क्योंकि इसने जैविक डिजाइन में काम आने वाले जटिल पैटर्न को पहचानने की मानवीय क्षमता को काफी बढ़ा दिया है। ठोस प्रयोगात्मक प्रमाण किसी परियोजना को आगे बढ़ाने का आधार बनते हैं, लेकिन सिस्टम कैसे और क्यों काम करता है, इसकी गहरी वैज्ञानिक समझ और प्रासंगिक डेटा तैयार करना इस शोध कार्यक्रम का मुख्य आधार बना हुआ है।

 

## जैविक सुरक्षा के कड़े नियम और सिंथेटिक डीएनए की निगरानी

शक्तिशाली तकनीकी साधनों के साथ यह तय करना बेहद जरूरी हो जाता है कि कौन से जैविक कार्य या अणु बिल्कुल भी नहीं बनाए जाने चाहिए। किसी भी तकनीक के विकास का निर्णय उसके संभावित लाभों और संभावित नुकसानों के संतुलन पर टिका होना चाहिए। जो अनुप्रयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय स्थिरता और मानवीय कल्याण की बड़ी चुनौतियों का समाधान करते हैं, उनके विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके विपरीत, जो डिजाइन सार्वजनिक सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा या पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर संकट पैदा करते हैं, उनकी सख्त जांच और कुछ मामलों में स्पष्ट प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए। डेविड बेकर ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जैव प्रौद्योगिकी में होने वाली प्रगति के साथ-साथ कड़े प्रशासनिक और कानूनी ढांचे का विकास होना चाहिए। इसके तहत निर्मित किए जाने वाले सभी सिंथेटिक डीएनए के अनुक्रम और उसे तैयार कराने वाले व्यक्ति या संस्थान का पूरा रिकॉर्ड रखने के लिए अनिवार्य निगरानी और लॉगिंग व्यवस्था लागू की जानी चाहिए, जिससे तकनीक के किसी भी दुर्भावनापूर्ण दुरुपयोग को प्रभावी रूप से रोका जा सके।

## इसका आप पर असर
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए नए प्रोटीन और अणुओं का निर्माण स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।

- **दवा निर्माण की गति:** नई महामारियों और असाध्य रोगों के इलाज विकसित करने में दशकों के बजाय कुछ हफ्तों का समय लगेगा। इससे गंभीर बीमारियों के मरीजों को जल्द और सटीक जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध हो सकेंगी।
- **कैंसर और न्यूरोलॉजिकल रोग:** कैंसर और तंत्रिका संबंधी बीमारियों के लिए विशेष लक्षित दवाएं तैयार की जा सकेंगी। इससे उपचार के दौरान स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना ट्यूमर को नष्ट करना संभव होगा।
- **पर्यावरण और कचरा प्रबंधन:** समुद्र और जमीन से प्लास्टिक कचरा साफ करने के लिए विशेष एंजाइम बनाए जा रहे हैं। यह तकनीक प्राकृतिक जलस्रोतों को साफ करने और प्रदूषण से मुक्ति दिलाने में मददगार साबित होगी।
- **खाद्य सुरक्षा और खेती:** विपरीत मौसम और सूखा झेलने वाली फसलें तैयार की जा सकेंगी। इससे जलवायु परिवर्तन के दौर में भी किसानों की उपज सुरक्षित रहेगी और खाद्यान्न संकट का खतरा कम होगा।
- **जैव सुरक्षा और निगरानी:** सिंथेटिक डीएनए के निर्माण का रिकॉर्ड दर्ज होने से जैविक हथियारों और तकनीक के दुरुपयोग पर रोक लगेगी। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम तय करेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह नई वैज्ञानिक पहल इसलिए संभव हुई है क्योंकि कम्प्यूटेशनल टूल्स और मशीन लर्निंग ने जटिल जैविक संरचनाओं को समझने और उन्हें नए सिरे से डिजाइन करने की क्षमता हासिल कर ली है।

- **पारंपरिक विकास की सीमाएं:** प्राकृतिक विकास ने जैविक संभावनाओं के केवल एक छोटे से हिस्से को छुआ है, जिससे असीमित संभावनाएं खाली रह गईं। वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि गंभीर बीमारियों और पर्यावरणीय संकटों से निपटने के लिए प्रकृति से आगे जाकर नए अणु बनाने की जरूरत है।
- **कम्प्यूटेशनल टूल्स की प्रगति:** डेविड बेकर द्वारा कम्प्यूटेशनल प्रोटीन डिजाइन में किए गए शोध, जिसके लिए उन्हें 2024 का नोबेल पुरस्कार मिला, ने इस तकनीक को व्यावहारिक धरातल पर उतारा। इसके जरिए किसी अणु को लैब में बनाने से पहले कंप्यूटर पर ही उसके व्यवहार और सुरक्षा की जांच संभव हो गई।
- **एआई और मशीन लर्निंग का उभार:** आधुनिक मशीन लर्निंग एल्गोरिदम जैविक डेटा के जटिल पैटर्न्स को इंसानों की तुलना में कहीं तेजी से पहचान सकते हैं। इसी क्षमता का लाभ उठाकर एलन इंस्टीट्यूट, वाशिंगटन विश्वविद्यालय और फ्रेड हचिंसन कैंसर सेंटर ने साझा मंच तैयार किया।
- **दुरुपयोग की आशंका और कड़े नियम:** शक्तिशाली जैविक तकनीकों के अनपेक्षित पर्यावरणीय असर और जैविक सुरक्षा के खतरों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने पहले से ही सुरक्षा मानकों और सिंथेटिक डीएनए ट्रैकिंग की वकालत शुरू कर दी है।

## सवाल-जवाब

### 1. एआई बायोडिजाइन परियोजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस परियोजना का उद्देश्य ऐसे नए अणु, प्रोटीन और जैविक उपकरण बनाना है जो प्रकृति में कभी मौजूद नहीं रहे, ताकि कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज और प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या हल हो सके।

### 2. डेविड बेकर को किस उपलब्धि के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था?
डेविड बेकर को वर्ष 2024 में कम्प्यूटेशनल प्रोटीन डिजाइन के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व काम के लिए रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार साझा रूप से दिया गया था।

### 3. इस शोध में कौन-कौन से प्रमुख संस्थान भागीदार हैं?
इस पहल का नेतृत्व सिएटल स्थित गैर-लाभकारी शोध संस्थान एलन इंस्टीट्यूट कर रहा है, जिसके साथ वाशिंगटन विश्वविद्यालय और फ्रेड हचिंसन कैंसर सेंटर भी शामिल हैं।

### 4. कृत्रिम अणुओं को बनाने में क्या मुख्य जोखिम हो सकते हैं?
मुख्य जोखिमों में जीवित प्रणालियों के साथ अनपेक्षित प्रतिक्रियाएं, पर्यावरण पर अप्रत्याशित प्रभाव और इन जैविक तकनीकों का संभावित दुरुपयोग शामिल हैं।

### 5. वैज्ञानिक इन जोखिमों को कम करने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं?
अणुओं को प्रयोगशाला में तैयार करने से पहले कंप्यूटर पर उनका गहन परीक्षण किया जाता है और फिर नियंत्रित प्रयोगशाला माहौल में सुरक्षा की पुष्टि की जाती है।

### 6. डेविड बेकर ने जैविक दुरुपयोग रोकने के लिए क्या सुझाव दिया है?
उन्होंने सुझाव दिया है कि व्यावसायिक रूप से बनने वाले सभी सिंथेटिक डीएनए के अनुक्रम और उसे बनवाने वाले व्यक्ति का अनिवार्य रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए।

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