# समुद्र का बढ़ता तापमान मूंगों के सांस लेने के सूक्ष्म तंत्र को कैसे बना रहा है जानलेवा

> गर्म होते महासागरों में ऑक्सीजन की भारी कमी से जूझते मूंगों के रोएं जैसी सूक्ष्म संरचनाएं यानी सीलिया खुद को बचाने की होड़ में हांफने लगते हैं, जिससे पॉलीप्स दम घुटने से मृत हो जाते हैं।

**Type:** article · **Category:** विज्ञान · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/science/samudra-ka-barhata-tapamana-mungon-ke-sansa-lene-ke-sukshma-tntra-ko-kaise-bana-raha-hai-janaleva-35240 · **Language:** Hindi
**Tags:** मूंगा चट्टान, सीलिया, डीऑक्सीजनेशन, कोरल ब्लीचिंग, समुद्री पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन, पोरिट्स ल्यूटिया

समुद्र की गहराइयों में चट्टान जैसी दिखने वाली मूंगा कॉलोनियां असल में बेहद संवेदनशील और सजीव प्राणियों का घर होती हैं, जिन्हें जिंदा रहने के लिए अन्य जीवों की तरह ही लगातार प्राणवायु की जरूरत होती है। मूंगे अपनी जगह से हिल-डुल नहीं सकते और न ही वे सांस लेने के लिए किसी दूसरी जगह तैरकर जा सकते हैं। दिन के उजाले में तो उनके ऊतकों में मौजूद सहजीवी शैवाल प्रकाश संश्लेषण के जरिए ऑक्सीजन की भरपूर आपूर्ति बनाए रखते हैं, लेकिन रात घिरते ही यह प्रक्रिया पूरी तरह रुक जाती है। अंधेरे में मूंगे पूरी तरह अपने आसपास मौजूद समुद्री पानी में घुली ऑक्सीजन पर निर्भर हो जाते हैं। ठीक इसी नाजुक समय में उनकी बाहरी सतह पर मौजूद सूक्ष्म बाल जैसी संरचनाएं, जिन्हें सीलिया कहा जाता है, जीवन बचाने की जद्दोजहद में जुट जाती हैं। वर्ष 2014 से पहले विज्ञान जगत इन गतिविधियों से पूरी तरह अनजान था, मगर नए अनुसंधानों ने यह साफ कर दिया है कि मूंगे अपनी नियति तय करने में कहीं अधिक सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

 मई 2026 में साइंस पत्रिका में साझा किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस बात पर नया प्रकाश डाला है कि बिना मस्तिष्क या हड्डियों और मांसपेशियों के ढांचे वाला यह जीव किस तरह पानी के सूक्ष्म प्रवाह को नियंत्रित करता है। समस्या तब विकराल रूप धारण करती है जब समुद्री पानी असामान्य रूप से गर्म होने लगता है। पानी गर्म होते ही उसमें प्राकृतिक रूप से ऑक्सीजन घुलने की क्षमता घटने लगती है। इस कमी की भरपाई करने के लिए मूंगे अपने सीलिया को और भी तेज गति से हिलाने लगते हैं, मानो वे सांस लेने के लिए छटपटा रहे हों। एक तय तापमान से ऊपर पहुंचते ही जीवन रक्षक व्यवस्था उल्टी दिशा में काम करने लगती है। सीलिया के लगातार और तीव्र फड़फड़ाने में इतनी ऊर्जा खर्च होती है कि वे खुद उतनी ऑक्सीजन सोखने लगते हैं जितनी मूंगे के ऊतक ग्रहण भी नहीं कर पाते। नतीजा यह होता है कि ऑक्सीजन की किल्लत से जूझते पानी में मूंगे के पॉलीप्स का दम घुटने लगता है।

 

## गतिहीन मानी जाने वाली सीमा परत और सीलिया का सूक्ष्म भंवर
 लंबे समय से समुद्री जीवविज्ञानी मूंगों के स्वास्थ्य का आकलन उनके सहजीवी शैवालों की स्थिति को देखकर करते रहे हैं। जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ कॉन्स्टेंस में मूंगा जीनोमिक्स और तनाव बायोमार्कर का अध्ययन करने वाली राचेल एल्डरडाइस के अनुसार, सीलिया स्वास्थ्य का ज्यादा सटीक और सीधा पैमाना साबित हो सकते हैं। उनका मानना है कि यह बारीक संरचनाएं उस पहेली को सुलझा सकती हैं कि चट्टान पर ठीक एक-दूसरे के बगल में स्थित दो मूंगों में से एक विरंजित क्यों हो जाता है और दूसरा सुरक्षित क्यों बच जाता है। प्रत्येक मूंगा कॉलोनी के चारों ओर पानी की एक बेहद पतली परत होती है जिसे बाउंड्री लेयर कहा जाता है। मूंगे की खुरदरी सतह से होने वाले घर्षण के कारण इस परत में पानी का बहाव धीमा पड़ जाता है। दशकों तक यह धारणा बनी रही कि मूंगे इस सुस्त परत के सामने निष्क्रिय रहते हैं और केवल प्राकृतिक प्रसार यानी डिफ्यूजन के जरिए ही पोषक तत्व और ऑक्सीजन हासिल करते हैं।

 यह पुरानी धारणा वर्ष 2014 में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और इज़राइल के वीज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की संयुक्त खोज से पूरी तरह टूट गई। उस शोध ने दिखाया कि मूंगे के सीलिया तेजी से चाबुक की तरह घूमकर बाउंड्री लेयर में पानी के तेज भंवर पैदा करते हैं, जिससे ताजा और ऑक्सीजन से लबरेज समुद्री पानी सतह तक पहुंचता रहता है। पहले माना जाता था कि ये सीलिया केवल बलगम को हटाने और मलबे को साफ करने वाली झाड़ू जैसे होते हैं, मगर उस अध्ययन ने पहली बार उनके बनाए भंवरों का सटीक मॉडल तैयार कर मूंगे के मेटाबॉलिज्म में उनकी केंद्रीय भूमिका उजागर की थी।

 मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पोस्टडॉक्टरल फेलो के रूप में 2014 के उस शुरुआती शोध का नेतृत्व करने वाले सूक्ष्मजीवविज्ञानी और पर्यावरण इंजीनियर ऑर शापिरो उस समय मूंगों को संक्रमित करने वाले रोगाणुओं की चाल समझ रहे थे। वे कीमोटैक्सिस प्रक्रिया की जांच कर रहे थे कि बैक्टीरिया किस तरह रसायनों के सांद्रण के आधार पर आगे बढ़ते हैं। सूक्ष्मदर्शी के नीचे उन्होंने देखा कि बाउंड्री लेयर में कण आपस में घूम और मिल रहे थे, जो शांत प्रसार के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत था। वर्तमान में इज़राइल के वोल्कानि इंस्टीट्यूट से जुड़े शापिरो ने स्पष्ट किया कि वह खोज पूरे विज्ञान जगत के लिए एक नई शुरुआत थी, क्योंकि उससे साबित हुआ कि बाउंड्री लेयर कोई स्थिर क्षेत्र नहीं बल्कि सीलिया द्वारा गढ़ी गई अशांत और गतिशील दुनिया है।

 

## प्रसार की सुस्त रफ्तार और ऑक्सीजन का संकट
 पानी के भीतर पोषक तत्वों का स्वाभाविक रूप से यात्रा करना बहुत ही धीमी प्रक्रिया है। केवल 1 मिलीमीटर की दूरी तय करने में ऑक्सीजन को करीब 4 मिनट का समय लग सकता है। चूंकि मूंगे की सतह के पास बहता पानी धीमा हो जाता है और मूंगे प्राकृतिक प्रसार की तुलना में ऑक्सीजन कहीं अधिक तेजी से खपाते हैं, इसलिए सीलिया द्वारा बनाए गए तेज बहाव के बिना उनका काम नहीं चल सकता। सामान्य परिस्थितियों में यह व्यवस्था पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध कराती है, भले ही सीलिया को घुमाने में ऊर्जा खर्च होती हो। असली संकट तब पैदा होता है जब तापमान चढ़ता है और पानी में ऑक्सीजन की मात्रा अचानक गिरने लगती है।

 अक्सर देखा गया है कि एक ही रीफ पर कुछ मूंगे भीषण गर्मी में विरंजित हो जाते हैं जबकि अन्य सामान्य दिखते हैं। कई बार अत्यधिक गर्मी के तनाव में मूंगे अपने शैवाल को निकाले बिना ही सीधे मर जाते हैं। इस रहस्य को समझने के लिए सूक्ष्मजीवविज्ञानियों, इंजीनियरों और शरीरक्रिया विज्ञानियों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने 24 घंटे के प्रयोग किए। यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन में तरल गतिकी का अध्ययन करने वाले सेसर पाचेरेस ने रेखांकित किया कि समुद्री हीटवेव अब तेजी से बढ़ रही हैं। वर्ष 2026 के उत्तरार्ध में पांचवें वैश्विक विरंजन चक्र को गति देने वाले अल नीनो के प्रभाव के चलते मूंगों को कुछ ही घंटों के भीतर कई डिग्री तापमान वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है।

 

## प्रयोगशाला में कृत्रिम अंधकार और ऑक्सीजन का घटता प्रवाह
 शोधकर्ताओं ने एक्वेरियम में उगाए गए पोरिट्स ल्यूटिया नामक पथरीले मूंगे को बढ़ते तापमान में रखा। तापमान को धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 39 डिग्री सेल्सियस यानी 102 डिग्री फ़ारेनहाइट से भी ऊपर ले जाया गया। यह एक चरम स्थिति थी, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी घटनाएं वास्तविक समुद्रों में भी संभव हो चुकी हैं। टैंकों में पूरी तरह अंधेरा रखा गया ताकि यह परखा जा सके कि शैवालों की अनुपस्थिति में सीलिया किस तरह ऑक्सीजन का परिवहन करते हैं। हर घंटे एक हाई-स्पीड कैमरे से सूक्ष्म सीलिया की रिकॉर्डिंग की गई ताकि तापमान बढ़ने के साथ उनके हिलने की आवृत्ति दर्ज की जा सके।

 इसके साथ ही सेंसपीआईवी नामक तकनीक का इस्तेमाल कर ऑक्सीजन के सटीक बहाव को ट्रैक किया गया। फ्लोरोसेंट और ऑक्सीजन के प्रति संवेदनशील नैनोकणों ने पानी के भंवरों को एक नक्शे की शक्ल दी, जिससे पता चला कि सीलिया की गति और ऑक्सीजन की मौजूदगी में क्या संबंध है। निष्कर्षों ने चौंकाने वाला सच सामने रखा कि गर्म पानी में मूंगों का मेटाबॉलिज्म तेज हो गया जिससे उनकी ऑक्सीजन की मांग बढ़ गई। इस मांग को पूरा करने के लिए सीलिया ने तेजी से नाचना शुरू किया। पानी में पहले से ही ऑक्सीजन कम थी, लिहाजा सीलिया की उन्मादी रफ्तार मूंगे की ओर ऐसा पानी धकेलने लगी जिसमें ऑक्सीजन का नितांत अभाव था। यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के सह-लेखक और समुद्री सूक्ष्मजीवविज्ञानी माइकल कुल ने बताया कि मूंगे की ऑक्सीजन की जरूरत पानी के भंवरों की तुलना में कहीं अधिक तेज रफ्तार से बढ़ी।

 जब पानी का तापमान मानव शरीर के सामान्य तापमान यानी 37 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचा, तो सीलिया की चाल धीमी पड़ने लगी। 39 डिग्री सेल्सियस का स्तर पार करते ही सीलिया ने हिलना पूरी तरह बंद कर दिया और मूंगे की मौत हो गई। शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इन तापमान सीमाओं को हर प्रजाति के लिए एक जैसा पैमाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रत्येक मूंगा प्रजाति अपने स्थानीय उतार-चढ़ाव के अनुकूल ढली होती है। फिर भी, फ्लोरिडा जैसे क्षेत्रों में समुद्र की सतह का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच रहा है, जो कई प्रजातियों को उनकी सहनशीलता की आखिरी सीमा पर धकेल चुका है।

 

## तंत्रिका जाल, षट्कोणीय ढांचा और स्क्रू जैसे भंवर
 तापमान बढ़ने पर सीलिया तेज क्यों चलने लगते हैं, यह सवाल वैज्ञानिकों के लिए अब भी पहेली बना हुआ है। ऑर शापिरो का अनुमान है कि गर्म होने पर समुद्री पानी का गाढ़ापन यानी विस्कोसिटी कम हो जाती है जिससे पानी पतला हो जाता है और सीलिया के लिए हिलना आसान हो जाता है। इसके अलावा मूंगों के पास भले ही दिमाग या रीढ़ की हड्डी न हो, लेकिन उनके पास तंत्रिका जाल यानी नर्व नेट मौजूद होता है जो संवेदी जानकारी को संसाधित करता है। यह भी संभव है कि मूंगा खुद गर्मी या ऑक्सीजन की कमी को भांप लेता हो और किसी अज्ञात जैविक प्रक्रिया से सीलिया को तेज गति से चलाने का निर्देश देता हो।

 मई 2026 में सेसर पाचेरेस और माइकल कुल द्वारा लिखे गए एक अन्य शोधपत्र में बताया गया कि सीलिया द्वारा बनाए गए भंवर कॉर्कस्क्रू की तरह पेचदार होते हैं। यह घुमावदार प्रवाह अवांछित कचरे को मूंगे की सतह से दूर धकेल देता है और साथ ही पोषक तत्वों को पॉलीप्स के मुख की ओर मोड़ देता है। प्रत्येक पॉलीप पर सीलिया षट्कोणीय इकाइयों में व्यवस्थित होते हैं जो उनकी गति को सुव्यवस्थित रखते हैं। इसी तालमेल की बदौलत सीलिया एक दिशा में समन्वित भंवर बना पाते हैं। पाचेरेस ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था साबित करती है कि मूंगे का कंकाल ढांचा और उसके जीवित ऊतक आपस में कार्यात्मक रूप से जुड़े हुए हैं, जिससे यह समझ आता है कि सीलिया की अनदेखी गति मूंगों को स्थिरता देने और पर्यावरण के बदलावों से बचाने में कितनी अहम ढाल बनती रही है।

 

## डीऑक्सीजनेशन की अनदेखी और भविष्य की चुनौतियां
 राचेल एल्डरडाइस का कहना है कि सीलिया और विरंजन के बीच का सीधा संबंध अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। बिना गर्मी के लाल रोशनी का इस्तेमाल करके, जो विरंजन का कारण बन सकती है, सीलिया का परीक्षण करने से सटीक उत्तर मिल सकते हैं। किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के समुद्री जीवविज्ञानी डेविड सुगेट का कहना है कि 2014 के काम के बाद वैज्ञानिक समझ गए थे कि पानी का बहाव धीमा होने पर सीलिया मूंगों को सांस लेने में मदद करते हैं, लेकिन ध्यान अब तक केवल आणविक और चयापचय तंत्र पर ही टिका रहा था। कोई यह नहीं समझ सका था कि मूंगों के पास इस तरह के व्यावहारिक और शारीरिक तंत्र भी मौजूद हैं।

 डेविड सुगेट के सहयोगी टेड ट्रुस्कॉट के नेतृत्व में चल रहे शोध में यह देखा गया है कि रीफ पर जहां पानी का प्रवाह कम होता है, वहां ऑक्सीजन कम पहुंचती है और उन्हीं हिस्सों में मूंगों का पैची विरंजन ज्यादा देखने को मिलता है। माइकल कुल और सेसर पाचेरेस की टीम अब सामान्य प्रकाश और अंधेरे के चक्रों में मूंगों का परीक्षण करने की योजना बना रही है ताकि यह समझा जा सके कि सीलिया की गति आणविक प्रक्रिया से चलती है या केवल गर्म पानी की भौतिकी से। सुगेट के मुताबिक सन 2000 के दशक में महासागरीय अम्लीकरण मुख्य चिंता का विषय था, लेकिन असल में डीऑक्सीजनेशन यानी ऑक्सीजन की कमी मूंगों के लिए उससे भी कहीं अधिक जानलेवा खतरा बनकर उभरी है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अब पुराने सिद्धांतों को दोबारा परखा जा रहा है क्योंकि ऑक्सीजन की यह अदृश्य कमी ही मूंगों के खात्मे की मुख्य वजह हो सकती है।

## इसका आप पर असर
समुद्र के बढ़ते तापमान और मूंगों के दम घुटने का असर पूरी दुनिया के तटीय इलाकों, मत्स्य उद्योग और समुद्री जैव विविधता पर सीधा पड़ता है।

- **मत्स्य पालन और आजीविका:** मूंगा चट्टानों के नष्ट होने से तटीय मछुआरों की दैनिक पकड़ और आमदनी पर सीधा संकट खड़ा होगा। समुद्री जीवन की एक चौथाई प्रजातियां इन्हीं रीफ्स पर आश्रित होती हैं, जिनके खत्म होने से सीफूड की कीमतें बढ़ेंगी।
- **तटीय सुरक्षा:** स्वस्थ मूंगा चट्टानें समुद्री लहरों और चक्रवातों की 97 प्रतिशत ऊर्जा सोखकर तटों को विनाश से बचाती हैं। इनके मरने से तटीय बस्तियों में तूफानी लहरों और कटाव का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
- **पर्यटन उद्योग:** स्कूबा डाइविंग और रीफ पर्यटन से जुड़े तटीय क्षेत्रों की स्थानीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा जाएगी। विरंजित और मृत चट्टानों के कारण पर्यटन से होने वाले करोड़ों डॉलर के राजस्व का भारी नुकसान होगा।
- **वैज्ञानिक संरक्षण नीतियां:** समुद्री वैज्ञानिकों को रीफ संरक्षण के लिए केवल छाया देने के बजाय पानी में ऑक्सीजन का प्रवाह बनाए रखने के नए उपाय खोजने होंगे। भविष्य में कृत्रिम जल प्रवाह और वेंटिलेशन तकनीकों पर आधारित संरक्षण परियोजनाएं शुरू की जा सकती हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह संकट इसलिए पैदा हुआ क्योंकि मूंगों को रात के समय जीवित रहने के लिए बाहरी पानी में घुली ऑक्सीजन पर निर्भर रहना पड़ता है। समुद्री तापमान में तीव्र वृद्धि और पानी में ऑक्सीजन की घटती घुलनशीलता ने मूंगों की प्राकृतिक श्वसन प्रणाली को ही उनके खिलाफ खड़ा कर दिया है।

- **पानी का घटता ऑक्सीजन स्तर:** भौतिकी के नियम के अनुसार गर्म पानी ठंडे पानी की तुलना में काफी कम ऑक्सीजन सोख पाता है। जैसे ही समुद्र का तापमान बढ़ता है, पानी में घुली ऑक्सीजन तेजी से कम हो जाती है।
- **मेटाबॉलिज्म और ऑक्सीजन की मांग:** उच्च तापमान के कारण मूंगों के शरीर का मेटाबॉलिज्म तेज हो जाता है, जिससे उन्हें जिंदा रहने के लिए अधिक ऑक्सीजन की दरकार होती है। अधिक ऑक्सीजन खींचने के चक्कर में वे सीलिया को बेतहाशा तेज गति से हिलाने लगते हैं।
- **ऊर्जा की अत्यधिक खपत:** सीलिया को लगातार तेजी से फड़फड़ाने में मूंगे के शरीर की संचित ऊर्जा तेजी से खर्च होती है। यह तेज हलचल उतनी ऑक्सीजन भी नहीं खींच पाती जितनी सीलिया को चलाने में जल जाती है।
- **तापीय सीमा और पक्षाघात:** जब पानी 37 डिग्री से 39 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है, तो सीलिया की शारीरिक क्षमता जवाब दे जाती है। अत्यधिक गर्मी में सीलिया का हिलना पूरी तरह बंद हो जाता है और मूंगे का दम घुटने से मौत हो जाती है।

## सवाल-जवाब

### 1. सीलिया क्या हैं और मूंगों के लिए ये क्यों जरूरी हैं?
सीलिया मूंगे की बाहरी सतह पर पाए जाने वाले बाल जैसे सूक्ष्म अंग हैं। ये तेजी से घूमकर पानी के भंवर बनाते हैं, जिससे रात के समय मूंगे के ऊतकों तक ताजी ऑक्सीजन पहुंचती है और सतह से कचरा साफ होता है।

### 2. गर्म पानी में सीलिया मूंगे के लिए जानलेवा क्यों बन जाते हैं?
गर्म पानी में ऑक्सीजन कम होती है और मूंगे की मांग बढ़ जाती है। सीलिया को तेजी से घुमाने में इतनी ऊर्जा खर्च होती है कि वे पानी से उतनी ऑक्सीजन नहीं निकाल पाते जितनी खुद नष्ट कर देते हैं, जिससे मूंगा घुटने लगता है।

### 3. प्रयोगशाला में मूंगों पर कितने तापमान तक परीक्षण किया गया?
वैज्ञानिकों ने पोरिट्स ल्यूटिया नामक मूंगे को 39 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर परखा। 37 डिग्री पर सीलिया धीमे पड़ गए और 39 डिग्री के पार जाते ही वे पूरी तरह बंद हो गए।

### 4. मूंगे के सीलिया किस संरचना में व्यवस्थित रहते हैं?
पॉलीप्स पर सीलिया षट्कोणीय इकाइयों में व्यवस्थित होते हैं। यह ढांचा उनके कॉर्कस्क्रू जैसे भंवरों को सुव्यवस्थित रखकर पोषक तत्वों को मुंह तक लाने और मलबे को दूर रखने में मदद करता है।

### 5. क्या विरंजन के अलावा ऑक्सीजन की कमी मूंगों की मौत का बड़ा कारण है?
हां, नए शोध से पता चला है कि समुद्री पानी का डीऑक्सीजनेशन यानी ऑक्सीजन की कमी मूंगों के लिए विरंजन और अम्लीकरण से भी ज्यादा तात्कालिक और घातक खतरा बन चुका है।

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