समुद्र के रहस्यमयी ट्वाइलाइट जोन में छिपे हैं अनदेखे जीव, दशक भर चले अध्ययन से सामने आए गहरे रीफ के राज पलाऊ और प्रशांत महासागर के गहरे रीफ में आठ साल पहले उतारे गए वैज्ञानिक ढांचों को वापस निकालकर शोधकर्ताओं ने ट्वाइलाइट जोन की जैव विविधता और जीवों के आपसी रिश्तों पर कई अहम जानकारियां जुटाई हैं। समुद्र की सतह से 30 मीटर से 150 मीटर नीचे एक ऐसा इलाका फैला है जहां न तो चिलचिलाती धूप पूरी तरह पहुंच पाती है और न ही गहरा स्याह अंधेरा होता है। इस धुंधले इलाके को वैज्ञानिक मेसोफोटिक कोरल इकोसिस्टम या गहरे रीफ कहते हैं। उथले मूंगा चट्टानों के मुकाबले यह ट्वाइलाइट जोन वैज्ञानिकों के लिए सदियों से एक अबूझ पहेली बना रहा है। कैलिफोर्निया एकेडमी ऑफ साइंसेज के प्राणी विज्ञानी और क्यूरेटर लुइज़ रोचा ने इस अनजानी दुनिया की गुत्थी सुलझाने के लिए वर्षों मेहनत की है। इस गहराई में मिलने वाले जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र की आधारभूत तस्वीर तैयार करने के लिए साल 2016 में पलाऊ के समुद्र में विशेष वैज्ञानिक ढांचे पानी के नीचे उतारे गए थे। लगभग एक दशक तक समुद्र की गहराइयों में पड़े रहने के बाद अब इन ढांचों को बाहर निकाला गया है, जिनसे समुद्री जीव विज्ञान के कई अनसुलझे रहस्य सामने आ रहे हैं। ट्वाइलाइट जोन की अनदेखी दुनिया और इसकी चुनौतियां मेसोफोटिक शब्द का मूल अर्थ ही मध्य और प्रकाश के संतुलन से जुड़ा है। यह वह क्षेत्र है जहां उथले पानी की तरह भरपूर रोशनी नहीं होती, लेकिन पूर्ण अंधकार भी नहीं छाता। नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के 2019 के एक दस्तावेज में भी यह स्वीकार किया गया था कि विज्ञान इन मेसोफोटिक कोरल इकोसिस्टम्स के बारे में बेहद सीमित जानकारी रखता है। उस दस्तावेज में कई संभावनाओं का जिक्र करते हुए कहा गया था कि ये गहरे रीफ आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मछलियों के लिए अनिवार्य आवास साबित हो सकते हैं। शोधकर्ताओं को इतना जरूर पता है कि यह इलाका माइक्रोनेशिया, कैरेबियन और मैक्सिको की खाड़ी जैसे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उथले रीफ के ठीक नीचे समानांतर रूप से मौजूद रहता है। उथले रीफ और गहरे रीफ की कार्यप्रणाली में बुनियादी अंतर प्रकाश और तापमान का होता है। उथले पानी में कठोर मूंगे प्रकाश संश्लेषण करने वाले शैवाल के साथ मिलकर जीवन चक्र चलाते हैं, जहां शैवाल पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं और मूंगे कैल्शियम कार्बोनेट का स्राव कर चट्टानी संरचना बनाते हैं। इसके विपरीत, जैसे ही गहराई 30 मीटर से पार होती है, प्रकाश तेजी से घटने लगता है और प्रकाश संश्लेषण की क्षमता लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच जाती है। पानी का तापमान भी तेजी से नीचे गिरता है। नतीजतन, यहां रहने वाले जीव ठंडे और मद्धम वातावरण में ढल चुके होते हैं। इस गहराई पर रहने वाली कई प्रजातियां केवल इन्हीं क्षेत्रों में पाई जाती हैं और हालिया शोध संकेत देते हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रति ये बेहद संवेदनशील हो सकती हैं। तकनीकी डाइविंग की सीमाएं और अनुसंधान की बाधाएं गहरे रीफ का अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिकों को 100 मीटर की गहराई तक उतरना पड़ता है, जो बेहद जोखिम भरी तकनीकी डाइविंग की मांग करता है। सामान्य गोताखोरी की तुलना में इतनी गहराई पर पानी का भारी दबाव शरीर के ऊतकों में गैसों को तेजी से धकेलता है। इसी शारीरिक सीमा के कारण वैज्ञानिकों के पास तलहटी में रुकने के लिए बेहद कम समय बचता है। लुइज़ रोचा बताते हैं कि पानी के नीचे वास्तविक काम करने के लिए उनके पास केवल पांच, छह या सात मिनट का वक्त होता है। इस बेहद संक्षिप्त समय में वैज्ञानिक कुछ तस्वीरें ले सकते हैं, सीमित माप दर्ज कर सकते हैं या गिने-चुने नमूने जमा कर सकते हैं। इसके बाद उन्हें सतह की ओर लौटना पड़ता है। डीकंप्रेशन सिकनेस या खतरनाक गैस विकारों से बचने के लिए ऊपर चढ़ने की प्रक्रिया में कई घंटे लग जाते हैं। पांच से सात मिनट के अंतराल में किसी विशाल पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन और धीमा साबित होता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स और सबमर्सिबल पनडुब्बियों का भी इस्तेमाल किया है, लेकिन यांत्रिक कैमरों से हर सूक्ष्म और छिपकर रहने वाले जीव की तस्वीरें लेना संभव नहीं हो पाता। इसी वजह से इन गहरे रीफ की वैज्ञानिक समझ में बहुत बड़े अंतर बने हुए थे। कृत्रिम होटलों के जरिए जीवन को आकर्षित करने की तकनीक गोताखोरी की समय सीमाओं से पार पाने के लिए रोचा ने ऑटोनॉमस रीफ मॉनिटरिंग स्ट्रक्चर्स यानी एआरएमएस तकनीक का सहारा लिया। ये संरचनाएं पीवीसी की कई समानांतर प्लेटों को मिलाकर बनाई जाती हैं, जो एक बुनियादी आधार प्लेट से जुड़ी होती हैं। देखने में ये भूरे रंग के छोटे और सपाट होटलों जैसी नजर आती हैं। वैज्ञानिक इन्हें उन समुद्री इलाकों में ले जाकर स्थिर कर देते हैं जिनका अध्ययन करना होता है, और फिर इन्हें कई वर्षों के लिए वहीं छोड़ दिया जाता है ताकि समुद्री जीवन इन पर अपना बसेरा बना सके। स्मिथसोनियन ग्लोबल एआरएमएस प्रोग्राम के निदेशक क्रिस मेयर इस तकनीक की तुलना पहले से तैयार आवासों से करते हैं। जब किसी रीफ पर यह साफ सुथरा ढांचा रखा जाता है, तो आसपास तैरने वाले लार्वा जैसे स्पंज, गोर्गोनियन और मूंगे तुरंत इन प्लेटों पर जमने लगते हैं। प्लेटों के बीच बने सुरक्षित कोनों में झींगे, मोलस्क और एस्किडियन छिपने लगते हैं। कुछ ही वर्षों में यह साधारण पीवीसी ढांचा एक स्थिर और बेहद घने मिनी रीफ में तब्दील हो जाता है। अगर वैज्ञानिक प्राकृतिक चट्टानों को तोड़कर लाते तो उनकी तुलना करना मुश्किल होता क्योंकि हर प्राकृतिक पत्थर की बनावट अलग होती है, जबकि एआरएमएस का मानकीकृत आकार हर जगह एक समान तुलना की सुविधा देता है। प्रशांत महासागर की गहराइयों से सैंपलों की वापसी साल 2016 से 2018 के दौरान निजी वित्तपोषण की मदद से रोचा और उनके सहयोगियों ने पलाऊ के अलावा गुआम, मार्शल आइलैंड्स और फ्रेंच पोलिनेशिया के गहरे रीफ में ये ढांचे स्थापित किए थे। तुलनात्मक अध्ययन के लिए कुछ ढांचे 10 मीटर की उथली गहराई पर, कुछ 50 मीटर पर और कुछ 100 मीटर की गहराई पर तैनात किए गए थे। चूंकि इन ढांचों को समुद्र से बाहर निकालने का खर्च उन्हें लगाने से कहीं अधिक होता है, इसलिए वैज्ञानिकों को जरूरी फंड जुटाने के लिए उम्मीद से थोड़ा लंबा इंतजार करना पड़ा। आखिरकार निजी दाताओं से आर्थिक मदद मिलने के बाद टीम पलाऊ लौटी और इन समय कैप्सूलों को गहरे पानी से बाहर खींचा गया। पानी से बाहर आते ही प्रयोगशाला में नमूनों को अलग करने का तेज गति से काम शुरू हुआ। प्लेटों को अलग करते हुए विस्तृत तस्वीरें उतारी गईं ताकि यह दर्ज हो सके कि कौन सा जीव कहां बसा था। प्रयोगशाला में मलबे की ट्रे से छोटे केकड़ों, कीड़ों और मोलस्क को छांटा गया तथा प्लेटों से खुरचकर नमूनों को ट्यूबों में सुरक्षित किया गया। इस दौरान वैज्ञानिकों ने सी स्क्वर्ट्स जमा किए, जिन्हें रीढ़विहीन जीवों में इंसानों का सबसे नजदीकी रिश्तेदार माना जाता है। इसके अलावा कई तरह के स्पंज मिले, जिनमें पानी के नीचे सूखे महसूस होने वाले सपाट स्पंज, इल्ली जैसे रोएंदार स्पंज और चांदी के धागों जैसे महीन स्पंज शामिल थे। साथ ही ऑक्टोकोरल कहे जाने वाले कोमल मूंगे और ब्रायोजोअन कॉलोनियां मिलीं जो मधुमक्खी के छत्ते जैसी जालीदार संरचना बनाती हैं। हजारों नमूनों का डीएनए विश्लेषण और प्रजातियों की पहचान स्मिथसोनियन की शोध जीवविज्ञानी सारा ट्वीड्ट के अनुसार, टीम हर अनूठी शारीरिक संरचना वाले जीव यानी मोर्फोस्पीशीज की पहचान कर रही है ताकि उनके ऊतकों से डीएनए सीक्वेंसिंग की जा सके और ज्ञात आनुवंशिक डेटाबेस से उनका मिलान किया जा सके। काम के पहले ही दिन कैलिफोर्निया एकेडमी के क्यूरेटर टेरी गोस्लिंगर ने कई संभावित नई प्रजातियों की पहचान कर ली। गोस्लिंगर समुद्री स्लग यानी न्यूडिब्रैंक के विशेषज्ञ हैं, जिनके चटक रंग और अनूठे पैटर्न उन्हें तुरंत पहचानने में मदद करते हैं। हालांकि अन्य हजारों नमूनों की पहचान इतनी आसान नहीं रही। लगभग 3,000 एकत्र नमूनों में से केवल एक छोटा हिस्सा ही प्रजाति स्तर पर पहचाना जा सका है। जुलाई के आंकड़ों के अनुसार, परियोजना से जुड़ी पोस्टडॉक शोधकर्ता सुज़ैन बाहर ने जानकारी दी कि केवल 3 प्रतिशत नमूनों की ही सटीक प्रजाति तय हो पाई थी, जबकि 20 प्रतिशत से कुछ कम नमूनों के जीनस का पता चला था। अधिकांश नमूनों को केवल व्यापक टैक्सोनोमिक स्तरों पर ही वर्गीकृत किया जा सका है। बाकी जीवों की पहचान प्रयोगशाला में डीएनए जांच, तस्वीरों और शारीरिक विवरणों के समन्वय से पूरी की जा रही है। समुद्री जीवों के सह-अस्तित्व और पारस्परिक रिश्ते इस पूरी वैज्ञानिक पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल नई प्रजातियों के नाम दर्ज करना नहीं, बल्कि जीवों के बीच के पारिस्थितिक संबंधों को समझना है। प्रयोगशाला में देर रात तक काम करते हुए वैज्ञानिकों ने कई चौंकाने वाले सहजीवी रिश्ते देखे। एक सूक्ष्म पोमपॉम केकड़ा माइक्रोस्कोप के नीचे देखा गया, जो अपने संशोधित पंजों में बैंगनी एनीमोन थामे हुए था। इसी तरह एक स्केलेटन श्रिंप देखा गया जो स्टिक इंसेक्ट की तरह दिखता था और हाइड्रॉइड नामक जीव के साथ पूरी तरह घुलमिल गया था। इसके अलावा चटक लाल समुद्री घोंघे और उनके रहने के ठिकाने बने लाल ऑक्टोकोरल का आपसी जुड़ाव भी दर्ज किया गया। सारा ट्वीड्ट के अनुसार, जीवों के ऐसे स्वाभाविक रिश्तों का अध्ययन ही एआरएमएस परियोजना की वास्तविक सफलता है, जो व्यक्तिगत सैंपलिंग में कभी मुमकिन नहीं हो पाता। सुज़ैन बाहर इस समय गुआम से प्राप्त डेटा के आधार पर यह विश्लेषण कर रही हैं कि विभिन्न गहराइयों पर रहने वाले जीवों में कितना ओवरलैप है। लुइज़ रोचा इस काम की तुलना 20वीं सदी के उस पर्वतीय पारिस्थितिकी अध्ययन से करते हैं जिसमें पहाड़ों की अलग-अलग ऊंचाई पर वनस्पतियों और जीवों के वितरण को समझा गया था। रोचा का मानना है कि भले ही वर्तमान पीढ़ी गहरे रीफ की पूरी पहेली को हल न कर पाए, लेकिन वे अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों के लिए मजबूत आधारशिला जरूर तैयार कर रहे हैं। इसका आप पर असर समुद्र के ट्वाइलाइट जोन में मौजूद गहरे रीफ की यह वैज्ञानिक खोज वैश्विक समुद्री संरक्षण और भविष्य की दवाओं के क्षेत्र पर सीधा असर डालती है। • वैश्विक पर्यावरण: गहरे रीफ पर शोध से समुद्री जैव विविधता के संरक्षण नियमों में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि क्या ये गहरे क्षेत्र जलवायु संकट के दौर में मछलियों और अन्य जीवों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन सकते हैं। • वैज्ञानिक अनुसंधान: करीब 3,000 एकत्र नमूनों की डीएनए सीक्वेंसिंग से सैकड़ों नई प्रजातियों के आनुवंशिक डेटाबेस सामने आएंगे। आने वाले वर्षों में इन अज्ञात समुद्री जीवों से नई औषधियों और बायो-मेडिकल यौगिकों की खोज के रास्ते खुल सकते हैं। • पर्यावरण नीतियां: गहरे समुद्र में खनन और अत्यधिक मछली पकड़ने पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को कड़ा किया जा सकता है। सरकारें इन संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों को बचाने के लिए नए समुद्री संरक्षित क्षेत्र घोषित कर सकती हैं। • जलवायु समझ: समुद्र के बढ़ते तापमान के प्रति इन जीवों की संवेदनशीलता की निगरानी से जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा। तटीय अर्थव्यवस्थाओं और समुद्री वैज्ञानिकों को इससे बेहतर सुरक्षा नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ उथले रीफ के नीचे 30 से 150 मीटर की गहराई पर मौजूद मेसोफोटिक रीफ तक पहुंचना तकनीकी रूप से बेहद जोखिम भरा और महंगा रहा है, जिसके कारण यह क्षेत्र अब तक अनजान बना रहा। • गोताखोरी की सीमाएं: 100 मीटर की गहराई पर पानी का भारी दबाव शरीर में गैसों को तेजी से घोलता है, जिससे गोताखोरों को तलहटी में केवल पांच से सात मिनट का समय मिल पाता था। इतने कम समय में किसी संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करना लगभग असंभव था। • निगरानी तकनीक की जरूरत: रोबोटिक कैमरों से छिपकर रहने वाले छोटे जीवों को पहचानना मुश्किल था, जिसके चलते पीवीसी प्लेटों वाले मानकीकृत एआरएमएस ढांचे तैयार किए गए। इन ढांचों को कई वर्षों तक समुद्र में छोड़ना जरूरी था ताकि वे प्राकृतिक जीवों से पूरी तरह आबाद हो सकें। • वित्तपोषण की चुनौतियां: गहरे समुद्र से इन संरचनाओं को सुरक्षित बाहर निकालना लगाने की तुलना में कहीं अधिक खर्चीला काम था। निजी फंड मिलने में समय लगने के कारण इन ढांचों को 2016 से लंबे समय तक पानी में छोड़ना पड़ा, जिससे आखिरकार एक संपूर्ण जैव विविधता कैप्सूल तैयार हो सका। सवाल-जवाब 1. मेसोफोटिक कोरल इकोसिस्टम या गहरे रीफ क्या हैं? यह समुद्र में 30 मीटर से 150 मीटर की गहराई पर मौजूद वह ट्वाइलाइट जोन है, जहां मद्धम रोशनी और ठंडा तापमान पाया जाता है। 2. वैज्ञानिकों ने गहरे रीफ के अध्ययन के लिए किन ढांचों का इस्तेमाल किया? वैज्ञानिकों ने एआरएमएस यानी ऑटोनॉमस रीफ मॉनिटरिंग स्ट्रक्चर्स का इस्तेमाल किया, जो पीवीसी प्लेटों से बने छोटे होटलों जैसे ढांचे होते हैं। 3. गोताखोर 100 मीटर की गहराई पर कितना समय बिता सकते हैं? गैस दबाव और सुरक्षा सीमाओं के कारण गोताखोर इस गहराई पर केवल पांच से सात मिनट ही रुक सकते हैं। 4. पलाऊ से निकाले गए सैंपलों में से अब तक कितने प्रतिशत की पहचान हो पाई है? जुलाई तक लगभग 3,000 नमूनों में से केवल 3 प्रतिशत की प्रजाति और 20 प्रतिशत से कुछ कम के जीनस की पहचान हो पाई थी। https://trendkia.com/science/samudra-ke-rahasyamayi-twilight-zone-men-chhipe-hain-anadekhe-jiva-dashaka-bhara-chale-adhyayana-se-samane-ae-gahare-reef-ke-raja-42358 TrendKia — Har trend, sabse pehle.