# ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने विशालकाय तिलचट्टे को बनाया रिमोट से नियंत्रित रेस्क्यू रोबोट ‘पैराबॉर्ग’

> ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने एक विशालकाय तिलचट्टे को ‘पैराबॉर्ग’ नाम का साइबोर्ग बना दिया है, जो आपदा में फंसे लोगों की तस्वीर ले सकता है और इंजेक्शन से दवा भी दे सकता है, और अगले पांच से दस साल में इसे असली आपदा स्थलों पर उतारने की योजना है।

**Type:** article · **Category:** विज्ञान · **Published:** 2026-09-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/science/streliyai-vaijnanikon-ne-vishalakaya-tilachatte-ko-banaya-rimota-se-niyntrita-reskyu-robota-paraborg-28685 · **Language:** Hindi
**Tags:** साइबोर्ग तिलचट्टा, पैराबॉर्ग, क्वींसलैंड विश्वविद्यालय, आपदा बचाव रोबोट, बायो-रोबोटिक्स, रेस्क्यू टेक्नोलॉजी

ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने एक विशालकाय तिलचट्टे को ऐसा साइबोर्ग रोबोट बना दिया है जो मलबे में फंसे लोगों की तस्वीर ले सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें इंजेक्शन के जरिए दवा भी दे सकता है। इसे भूकंप या किसी बड़ी आपदा के बाद बचाव अभियान की रफ्तार बढ़ाने के मकसद से तैयार किया गया है।

## क्वींसलैंड के बड़े तिलचट्टे को क्यों चुना गया
यह प्रोजेक्ट क्वींसलैंड विश्वविद्यालय और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की साझा टीम ने तैयार किया है। इसके लिए उत्तरी क्वींसलैंड में पाए जाने वाले विशालकाय बिल खोदने वाले तिलचट्टे का इस्तेमाल हुआ, जो लंबाई में 87 मिलीमीटर (3.5 इंच) तक और वजन में 40 ग्राम (1.4 औंस) तक हो सकता है। यही मजबूत कद-काठी इसे बाकी कीड़ों से अलग बनाती है, जिन्हें आमतौर पर ऐसे प्रयोगों में इस्तेमाल किया जाता है। क्वींसलैंड विश्वविद्यालय की बायो-रोबोटिक्स शोधकर्ता टैन वो डोन ने बताया कि पिछले करीब दो दशक से साइबोर्ग कीड़ों को सर्च और एक्सप्लोर मिशन के लिए तैयार किया जा रहा है, लेकिन उनकी टीम इससे एक कदम आगे बढ़कर पीड़ित को ढूंढने के साथ-साथ उसकी मदद भी करना चाहती थी। यह रिसर्च हाल ही में जर्नल एडवांस्ड साइंस में प्रकाशित हुई है।

## दो तरह के तैयार किए गए ‘पैराबॉर्ग’
टीम ने इस तिलचट्टे के दो अलग-अलग वर्जन तैयार किए, जिन्हें पैराबॉर्ग नाम दिया गया है। पहले वर्जन में एक छोटा कैमरा लगा है जो आपदा में फंसे व्यक्ति की हालत की तस्वीर ले सकता है, ताकि बचाव दल के पहुंचने से पहले ही चोट का अंदाजा लगाया जा सके। दूसरे वर्जन में एक ऑटोमेटिक इंजेक्शन सिस्टम लगा है जो कमांड मिलते ही दवा दे सकता है। यह तिलचट्टा अपने शरीर के वजन का करीब 1.5 गुना तक भार उठा सकता है, इसलिए इतना अतिरिक्त उपकरण लादने में उसे खास दिक्कत नहीं होती। इंजेक्शन वाले पैराबॉर्ग में उपकरण लगने से उसकी ऊंचाई करीब 15 मिलीमीटर और वजन करीब 17 ग्राम बढ़ गया, लेकिन अध्ययन में पाया गया कि इससे तिलचट्टे की सामान्य चाल पर कोई खास असर नहीं पड़ा। इन्हें तैयार करने के लिए इलेक्ट्रोड और माइक्रोचिप लगाते वक्त तिलचट्टों को बेहोश किया गया, और उपकरण हटाने के बाद वे फिर से सामान्य तिलचट्टों की तरह जीवन जीने लगे।

## एंटीना और सेर्काई से मिलती है दिशा और रफ्तार
इस तिलचट्टे को कंट्रोल करने के लिए इसके एंटीना और सेर्काई, यानी पेट के पिछले हिस्से में मौजूद संवेदी अंगों में इलेक्ट्रोड लगाए गए हैं। दोनों एंटीना को अलग-अलग इलेक्ट्रिक सिग्नल देकर शोधकर्ता तिलचट्टे की दिशा तय कर सकते हैं, जबकि दोनों सेर्काई को एक साथ उत्तेजित करने पर उसकी चलने की रफ्तार नियंत्रित होती है। टीम ने अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर टेस्ट किया और पाया कि 10 से 40 हर्ट्ज़ के बीच के सिग्नल असरदार रहते हैं, जबकि 50 हर्ट्ज़ से ज्यादा की फ्रीक्वेंसी कुछ समय बाद बेअसर होने लगती है।

## सिरका-बेकिंग सोडा वाली रिएक्शन से चलता है इंजेक्शन
इंजेक्शन देने वाला यह उपकरण एक छोटी स्प्रिंग की मदद से सिरिंज को चलाता है। जैसे ही यह ट्रिगर होता है, इसके अंदर मौजूद दो चैंबर के बीच की सील टूट जाती है, एक चैंबर में साइट्रिक एसिड और दूसरे में बेकिंग सोडा भरा होता है। दोनों पदार्थ आपस में रिएक्ट करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे बचपन में बेकिंग सोडा और सिरके से ज्वालामुखी वाला प्रयोग किया जाता था, और इससे बनने वाली कार्बन डाइऑक्साइड इतना दबाव बना देती है कि सिरिंज का प्लंजर दब जाता है और दवा शरीर में चली जाती है।

## टेस्ट में सफलता की दर कितनी रही
इस सिस्टम को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने एक तिलचट्टे को शुरुआती बिंदु से तीन चेकपॉइंट पार कराते हुए एक नकली लक्ष्य तक भेजा और वहां इंजेक्शन दिलवाया। जब तिलचट्टा लक्ष्य से 150 मिलीमीटर के दायरे में था, तब इंजेक्शन देने की सफलता दर करीब 95 प्रतिशत रही। लेकिन शुरुआत से लेकर इंजेक्शन पूरा होने तक के पूरे सफर को देखें तो कुल सफलता दर 72 प्रतिशत दर्ज की गई। एक अलग परीक्षण में टीम ने दो पैराबॉर्ग को साथ काम करते हुए भी दिखाया, जिसमें एक तिलचट्टे ने कैमरे से नकली लक्ष्य को ढूंढा और दूसरे ने वहां पहुंचकर इंजेक्शन दिया।

## पहले भी बने थे साइबोर्ग भृंग, आगे की योजना
इसी टीम ने पहले सीधी दीवारों पर चढ़ सकने वाले साइबोर्ग भृंग (बीटल) भी तैयार किए थे, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि बचाव और मेडिकल जैसे भारी उपकरण ढोने के लिए बड़े आकार के तिलचट्टे ज्यादा उपयुक्त हैं। हालांकि अभी तक हुए सारे परीक्षण नियंत्रित माहौल में हुए हैं और इनमें असली आपदा स्थल जैसा मलबा, ऊबड़-खाबड़ जमीन और लगातार बदलता भूभाग शामिल नहीं किया गया। टैन वो डोन को उम्मीद है कि अगर रिसर्च और फील्ड टेस्टिंग तेज करने के लिए पर्याप्त संसाधन मिल जाएं, तो अगले पांच से दस साल में साइबोर्ग कीड़ों की एक पूरी बचाव टीम असली आपदा स्थलों पर भेजी जा सकती है। उन्होंने कहा, "हर काम के लिए एक ही रोबोट बनाने की बजाय, हम अलग-अलग कीड़ों की प्राकृतिक ताकत का फायदा उठाकर उन्हें अलग-अलग मिशन के लिए तैयार कर सकते हैं।"

## इसका आप पर असर
यह रिसर्च फिलहाल किसी आम पाठक की जिंदगी में सीधे कोई बदलाव नहीं लाएगी, लेकिन यह भविष्य में बचाव अभियानों के तरीके को बदल सकती है।

- **बचाव दलों के लिए:** अगर यह टेक्नोलॉजी आगे कामयाब रहती है, तो मलबे में घुसकर तस्वीर लेने और दवा देने वाला यह साइबोर्ग तिलचट्टा किसी इंसानी बचावकर्मी के पहुंचने से पहले ही पीड़ित की हालत का पता लगा सकता है और शुरुआती मदद दे सकता है, जिससे कीमती समय बचेगा।
- **भूकंप या आपदा-प्रवण इलाकों में रहने वालों के लिए:** टैन वो डोन के मुताबिक असली तैनाती में अभी पांच से दस साल लग सकते हैं, इसलिए फिलहाल किसी मौजूदा आपदा में इससे मदद नहीं मिलेगी, लेकिन यह साफ संकेत है कि कीड़ों पर आधारित बचाव तकनीक प्रयोगशाला से मैदान की ओर बढ़ रही है।
- **रोबोटिक्स और बायोलॉजी के छात्रों के लिए:** पैराबॉर्ग यह दिखाता है कि किसी जीवित कीड़े को हार्डवेयर के साथ जोड़कर मानवीय मदद वाला काम कैसे लिया जा सकता है, जो बायो-रोबोटिक्स में करियर और रिसर्च फंडिंग के नए रास्ते खोल सकता है।
- **पशु अधिकारों को लेकर सजग पाठकों के लिए:** अध्ययन में बताया गया है कि उपकरण हटाने के बाद तिलचट्टे सामान्य जीवन जीने लगे, जो इस बात के लिए अहम है कि ऐसे प्रयोगों में जीवों के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. पैराबॉर्ग क्या है?
यह क्वींसलैंड विश्वविद्यालय और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया साइबोर्ग तिलचट्टा है, जो आपदा पीड़ितों की तस्वीर ले सकता है या उन्हें इंजेक्शन से दवा दे सकता है।

### 2. इसके लिए किस प्रजाति के तिलचट्टे का इस्तेमाल हुआ?
उत्तरी क्वींसलैंड में पाए जाने वाले विशालकाय बिल खोदने वाले तिलचट्टे का, जो 87 मिलीमीटर तक लंबा और 40 ग्राम तक भारी हो सकता है।

### 3. शोधकर्ता तिलचट्टे को कैसे नियंत्रित करते हैं?
उसके एंटीना (दिशा के लिए) और सेर्काई (रफ्तार के लिए) में लगे इलेक्ट्रोड के जरिए इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजकर।

### 4. इंजेक्शन सिस्टम कैसे काम करता है?
स्प्रिंग से चलने वाली सिरिंज साइट्रिक एसिड और बेकिंग सोडा के बीच की सील तोड़ती है, और इससे बनी कार्बन डाइऑक्साइड प्लंजर को दबाकर दवा देती है।

### 5. टेस्ट में इंजेक्शन देने की सफलता दर कितनी रही?
लक्ष्य से 150 मिलीमीटर के दायरे में सफलता दर करीब 95 प्रतिशत रही, जबकि पूरे टास्क की सफलता दर 72 प्रतिशत रही।

### 6. यह असली आपदाओं में कब इस्तेमाल हो सकेगा?
शोधकर्ता टैन वो डोन को उम्मीद है कि पर्याप्त संसाधन मिलने पर अगले पांच से दस साल में इसे असली आपदा स्थलों पर तैनात किया जा सकता है।

### 7. क्या इस उपकरण से तिलचट्टे को नुकसान होता है?
अध्ययन में पाया गया कि उपकरण लगने से तिलचट्टे की सामान्य चाल पर खास असर नहीं पड़ा, और उपकरण हटाने के बाद वे फिर सामान्य जीवन जीने लगे।

### 8. यह रिसर्च कहां प्रकाशित हुई?
जर्नल एडवांस्ड साइंस में प्रकाशित एक पेपर में।

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