शुक्र ग्रह ने खुद ही निगल लिया था अपना चंद्रमा, वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार किसी बाहरी टकराव के बजाय शुक्र के धीमे घूर्णन और गुरुत्वाकर्षण ने ही उसके संभावित उपग्रह को खींचकर नष्ट कर दिया था। सौरमंडल के सबसे चमकदार और गर्म ग्रह शुक्र के पास आज कोई चंद्रमा क्यों नहीं है, यह पहेली खगोलविदों को दशकों से परेशान करती रही है। पहले वैज्ञानिक मानते थे कि किसी विशालकाय खगोलीय पिंड की भीषण टक्कर की वजह से शुक्र का उपग्रह पूरी तरह नष्ट हो गया होगा। हालांकि, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, रिवरसाइड के खगोलविदों द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन ने इस रहस्य पर बिल्कुल नया दृष्टिकोण पेश किया है। इस शोध के मुताबिक, शुक्र के उपग्रह को खत्म करने के लिए किसी बाहरी तबाही की जरूरत ही नहीं पड़ी, बल्कि ग्रह के अत्यंत धीमे घूर्णन और उसके अपने गुरुत्वाकर्षण बल ने मिलकर चंद्रमा को धीरे-धीरे अपनी ओर खींच लिया, जिससे वह टूटकर ग्रह में ही समा गया। इस शोध पत्र के मुख्य लेखक और खगोल भौतिक विज्ञानी स्टीवन केन ने बताया कि आज जो शुक्र हम देखते हैं, वहां तक पहुंचने के लिए किसी प्रलयकारी घटना की आवश्यकता नहीं थी। ग्रह के गुरुत्वाकर्षण और उसकी अपनी धुरी पर घूमने की गति के स्वाभाविक तालमेल ने ही चंद्रमा को उसके ऊपर गिरने पर मजबूर कर दिया। घूर्णन गति और चंद्रमा की कक्षा का भौतिक विज्ञान किसी भी ग्रह की अपनी धुरी पर घूमने की गति यह तय करने में अहम भूमिका निभाती है कि वह अपने उपग्रह को दूर धकेलेगा या अपनी ओर खींचेगा। ग्रह का घूर्णन समय के साथ गुरुत्वाकर्षण खिंचाव और ज्वारीय बलों में भारी बदलाव लाता है। पृथ्वी और हमारे चंद्रमा के बीच का संबंध इस प्रक्रिया को बहुत स्पष्ट रूप से समझाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है, जो खगोलीय पैमाने पर काफी तेज माना जाता है। इसी तेज घूर्णन के कारण पृथ्वी अपने उपग्रह को दूर धकेल रही है और हमारा चंद्रमा हर साल लगभग 1.5 इंच की दर से पृथ्वी से दूर खिसक रहा है। इसके विपरीत शुक्र की स्थिति बिल्कुल उल्टी है। सौरमंडल में ग्रहों की चाल को देखा जाए तो शुक्र सबसे सुस्त रफ्तार से घूमने वाला ग्रह है। शुक्र को अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में पृथ्वी के 243 दिन लग जाते हैं। यह अवधि शुक्र के अपने एक पूरे वर्ष से भी अधिक लंबी है। इस सुस्त और असाधारण रूप से लंबे घूर्णन के साथ जब ग्रह का शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण मिलता है, तो वह किसी भी उपग्रह को बाहर की तरफ धकेलने के बजाय लगातार भीतर की ओर खींचने लगता है। कंप्यूटर सिमुलेशन से सामने आए हैरान करने वाले परिणाम इस गुरुत्वाकर्षण खिंचाव की पूरी प्रक्रिया को बारीकी से समझने के लिए स्टीवन केन और उनकी टीम ने खगोलीय पिंडों के बीच आपसी गुरुत्वाकर्षण प्रभाव का एक परिष्कृत कंप्यूटर मॉडल तैयार किया। मॉडल की विश्वसनीयता परखने के लिए वैज्ञानिकों ने पहले पृथ्वी और चंद्रमा के ऐतिहासिक विकासक्रम को उसी प्रणाली पर दोहराया, जिसमें सटीक नतीजे मिले। इसके बाद शोधकर्ताओं ने शुक्र और एक काल्पनिक उपग्रह के लिए कई अलग-अलग परिस्थितियों के सिमुलेशन चलाए। इन प्रयोगों में शुक्र के घूर्णन काल के साथ-साथ उपग्रह के द्रव्यमान में व्यापक बदलाव किए गए, जिसमें उपग्रह का आकार पृथ्वी के चंद्रमा की तुलना में 0.01 गुना से लेकर 10 गुना तक रखा गया। सिमुलेशन के नतीजों से साफ हुआ कि चंद्रमा का भविष्य तीन बातों पर टिका था, जिनमें शुक्र की घूर्णन गति, उपग्रह का द्रव्यमान और उसकी कक्षा का आकार शामिल था। लगभग सभी परीक्षणों में उपग्रह अंदर की तरफ सर्पिलाकार कक्षा में गिरता चला गया, गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से टुकड़ों में बंटा और अंततः ग्रह में विलीन हो गया। व्यापक परिस्थितियों की पड़ताल के बावजूद हर बार परिणाम एक ही दिशा में आने से शोधकर्ता भी हैरान रह गए। क्या किसी भी परिस्थिति में बच सकता था उपग्रह? शोधकर्ताओं ने परीक्षण के तौर पर कुछ अत्यंत असामान्य परिस्थितियां भी तैयार कीं। जब सिमुलेशन में शुक्र की घूर्णन गति को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर हर 10 से 12 घंटे में एक चक्कर कर दिया गया और चंद्रमा का द्रव्यमान पृथ्वी के उपग्रह जितना रखा गया, तब वह चंद्रमा लगभग 4.5 अरब वर्षों तक सुरक्षित टिक सका। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल मॉडल की सीमाओं को जांचने का एक काल्पनिक अभ्यास था। शुक्र की वास्तविक और बेहद धीमी घूर्णन गति को देखते हुए असलियत में ऐसा होना लगभग असंभव था। हालांकि यह अध्ययन पुख्ता तौर पर यह साबित नहीं करता कि प्राचीन काल में शुक्र के पास कोई चंद्रमा मौजूद ही था। इस बात के ठोस भौतिक सबूत जुटाना वैज्ञानिकों के लिए एक अत्यंत कठिन चुनौती है। शुक्र की सतह भूगर्भीय रूप से काफी युवा है, जिस पर मौजूद क्रेटरों की संख्या बताती है कि चट्टानों की ऊपरी परत महज कुछ सौ मिलियन वर्ष पुरानी है। ग्रह का निर्माण सौरमंडल के अन्य हिस्सों के साथ लगभग 4.6 अरब साल पहले हुआ था, लेकिन भीषण ज्वालामुखीय और विवर्तनिक गतिविधियों ने समय के साथ इसकी पूरी सतह को पूरी तरह नया रूप दे दिया है। गहरे गर्भ में दबे हो सकते हैं साक्ष्य और जीवन की संभावनाएं यदि शुक्र पर कभी चंद्रमा के गिरने का कोई भौतिक निशान रहा भी होगा, तो वह लावा और चट्टानों की नई परतों के नीचे गहरे गर्भ में दब चुका होगा। पृथ्वी पर भूकंपीय अध्ययनों के जरिए जमीन की गहराई में ऐसी असंगत संरचनाएं खोजी गई हैं, जो चंद्रमा के निर्माण के समय हुए विशाल टकराव की गवाही देती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि भविष्य में शुक्र के धरातल पर भी इसी तरह के गहरे भूकंपीय अध्ययन किए जा सकें, तो समा चुके चंद्रमा के प्राचीन अवशेष खोजे जा सकते हैं। चंद्रमा के समाने का यह घटनाक्रम शुक्र के सबसे बड़े रहस्य से भी पर्दा उठा सकता है कि क्या इस ग्रह पर कभी जीवन के अनुकूल वातावरण रहा था। एक समूचे उपग्रह को निगलने से ग्रह को अत्यधिक ऊर्जा और कोणीय संवेग मिला होगा, जिसने उसके घूर्णन, भूविज्ञान और जलवायु को नाटकीय रूप से बदल दिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा होने के कई लाभ हैं लेकिन जीवन पनपने के लिए यह अनिवार्य शर्त नहीं है। यह खोज अंतरिक्ष में सौरमंडल से बाहर रहने योग्य ग्रहों की तलाश कर रहे वैज्ञानिकों के लिए भी महत्वपूर्ण सबक देती है, जहां धीमी गति से घूमने वाले पृथ्वी जैसे ग्रह भी अपने उपग्रहों को निगल सकते हैं। इसका आप पर असर सौरमंडल और ग्रहों के विकास से जुड़ा यह शोध अंतरिक्ष विज्ञान और पृथ्वी से बाहर जीवन तलाशने के नजरिए को पूरी तरह बदलता है। • खगोल विज्ञान प्रेमियों के लिए: यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि हमारे सौरमंडल के पड़ोसी ग्रह शुक्र पर चंद्रमा क्यों नहीं दिखाई देता है। इससे ग्रहों की गति और उनके उपग्रहों के बनने और नष्ट होने के सिद्धांतों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। • एक्सोप्लैनेट खोजकर्ताओं के लिए: वैज्ञानिकों को सौरमंडल के बाहर पृथ्वी जैसे नए रहने योग्य ग्रहों की पहचान करने में नया पैमाना मिला है। अब शोधकर्ता केवल ग्रह के आकार पर नहीं, बल्कि उसकी घूर्णन गति पर भी गौर करेंगे ताकि उपग्रहों की स्थिति जांची जा सके। • पृथ्वी के भविष्य की समझ: यह शोध हमें यह समझने में मदद करता है कि पृथ्वी की तेज घूर्णन गति हमारे चंद्रमा को सुरक्षित बनाए रखने के लिए कितनी जरूरी है। चंद्रमा के लगातार 1.5 इंच प्रति वर्ष दूर जाने से पृथ्वी के समुद्र और मौसम के दीर्घकालिक बदलावों का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा। • अंतरिक्ष मिशनों की दिशा: भविष्य में शुक्र पर भेजे जाने वाले रोवर्स और सिस्मोग्राफिक मिशनों को जमीन के भीतर प्राचीन चंद्रमा के अवशेष ढूंढने का नया लक्ष्य मिलेगा। इससे आने वाले दशकों में ग्रहों के आंतरिक अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक बजट और मिशन प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है। ऐसा क्यों हुआ शुक्र ग्रह द्वारा अपने संभावित उपग्रह को नष्ट किए जाने का मुख्य कारण उसका असामान्य रूप से धीमा घूर्णन और ग्रह का शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण खिंचाव है। इन दोनों कारकों के आपसी तालमेल ने उपग्रह को स्थिर कक्षा में रहने देने के बजाय भीतर गिरने पर विवश किया। • सुस्त घूर्णन गति: शुक्र को अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में पृथ्वी के 243 दिन लगते हैं, जो सौरमंडल में सबसे धीमा है। इस सुस्त चाल के चलते बनने वाले ज्वारीय बल उपग्रह को बाहर की तरफ धकेलने में पूरी तरह असमर्थ रहे। • गुरुत्वाकर्षण खिंचाव का दबाव: ग्रह का अपना गुरुत्वाकर्षण बल उपग्रह की कक्षा को धीरे-धीरे छोटा करता गया। समय बीतने के साथ चंद्रमा बाहर खिसकने के बजाय एक संकुचित होती सर्पिलाकार कक्षा में ग्रह के अत्यधिक नजदीक आता चला गया। • ज्वारीय विखंडन और विलय: ग्रह के बहुत करीब पहुंचने पर गुरुत्वाकर्षण तनाव इतना तीव्र हो गया कि उपग्रह के टुकड़े-टुकड़े हो गए। अंततः यह सारा मलबा शुक्र के वायुमंडल और सतह पर गिरकर पूरी तरह उसी में समा गया। • सतह पर सबूतों का अभाव: शुक्र पर लगभग 4.6 अरब साल पहले से जारी भीषण ज्वालामुखीय और विवर्तनिक हलचलों ने सतह को पूरी तरह नया बना दिया है। यही कारण है कि इस प्राचीन घटना के कोई प्रत्यक्ष क्रेटर या अवशेष आज ऊपरी चट्टानों पर दिखाई नहीं देते। सवाल-जवाब 1. शुक्र ग्रह के पास आज अपना कोई चंद्रमा क्यों नहीं है? कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोध के अनुसार, शुक्र के अत्यंत धीमे घूर्णन और गुरुत्वाकर्षण ने उसके प्राचीन चंद्रमा को बाहर धकेलने के बजाय अपनी ओर खींचकर नष्ट कर दिया। 2. शुक्र को अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में कितना समय लगता है? शुक्र को अपनी धुरी पर एक बार घूमने में पृथ्वी के 243 दिन लगते हैं, जो उसके अपने एक वर्ष से भी अधिक लंबा समय है। 3. क्या पृथ्वी का चंद्रमा भी कभी पृथ्वी पर गिर सकता है? नहीं, पृथ्वी 24 घंटे में तेजी से घूमती है जिसके कारण हमारा चंद्रमा हर साल लगभग 1.5 इंच की दर से पृथ्वी से दूर खिसक रहा है। 4. क्या शुक्र की सतह पर इस नष्ट हुए चंद्रमा के सबूत मौजूद हैं? फिलहाल सतह पर कोई सबूत नहीं मिला है, क्योंकि भीषण ज्वालामुखीय गतिविधियों ने कुछ सौ मिलियन वर्ष पहले शुक्र की पूरी ऊपरी सतह को नया रूप दे दिया था। 5. क्या किसी ग्रह पर जीवन के अस्तित्व के लिए चंद्रमा का होना अनिवार्य है? शोधकर्ता स्टीवन केन के अनुसार चंद्रमा होने के कई लाभ जरूर हैं, लेकिन किसी भी ग्रह पर जीवन पनपने के लिए इसका होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। https://trendkia.com/science/venus-ne-khuda-hi-nigala-liya-tha-apana-chndrama-vaijnanikon-ki-nai-risarcha-men-chaunkane-vala-khulasa-37935 TrendKia — Har trend, sabse pehle.