# अमेरिकी नागरिकों पर निगरानी से जुड़ा गुप्त अदालती फैसला दबाने पर बाइडेन प्रशासन के बाद ट्रंप सरकार भी घिरी

> विदेशी खुफिया निगरानी अदालत द्वारा अमेरिकी नागरिकों के संदेशों की अवैध छानबीन पर जताई गई आपत्ति से जुड़े गुप्त फैसले को सार्वजनिक न करने पर सांसदों ने प्रशासन को 6 नवंबर तक जवाब देने का अल्टीमेटम दिया है।

**Type:** article · **Category:** साइबर सुरक्षा · **Published:** 2026-10-26 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/security/ameriki-nagarikon-para-nigarani-se-jura-gupta-adalati-phaisala-dabane-para-biden-prashasana-ke-bada-trump-sarakara-bhi-ghiri-51972 · **Language:** Hindi
**Tags:** अमेरिका, निगरानी कानून, FISA धारा 702, सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी, न्याय विभाग, FBI, नागरिक अधिकार

अमेरिकी नागरिकों के निजी संदेशों और डेटा की जांच पड़ताल को लेकर फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विलांस कोर्ट (FISC) द्वारा दिए गए एक बेहद संवेदनशील फैसले को सार्वजनिक करने से रोके जाने पर विवाद गहरा गया है। करीब सात महीने पहले दिए गए इस गुप्त आदेश में अदालत ने खुफिया विश्लेषकों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सर्च फिल्टर्स पर गंभीर सवाल उठाए थे। इन तकनीकी टूल्स के जरिए विश्लेषक कानूनी अनुमति, लिखित औचित्य या जरूरी आधिकारिक रिकॉर्ड के बिना ही इंटरसेप्ट किए गए विशाल डेटाबेस से अमेरिकी नागरिकों के निजी संदेश निकाल रहे थे। इसके बावजूद निगरानी अदालत ने कार्यक्रम को एक और साल के लिए चलाने की मंजूरी दे दी थी। अब ओरेगॉन के सीनेटर रॉन वाइडेन और कैलिफोर्निया के सीनेटर एडम शिफ ने कड़ा ऐतराज जताते हुए साफ किया है कि इस फैसले को गैर-गोपनीय बनाकर जारी करने की सरकारी समय सीमा सितंबर में ही समाप्त हो चुकी है।

## कानूनी मियाद खत्म होने के बाद भी गुप्त रखा गया आदेश
विवाद के केंद्र में फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विलांस एक्ट (FISA) की धारा 702 है। अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस द्वारा नवीनीकरण न किए जाने के बाद यह निगरानी कार्यक्रम जून में औपचारिक रूप से समाप्त हो गया था, हालांकि अदालत द्वारा मार्च में दी गई मंजूरी के आधार पर डेटा संग्रह का काम बदस्तूर जारी है। अमेरिकी प्रशासन के अपने आधिकारिक सार्वजनिक दस्तावेजों के मुताबिक, इस तरह के अदालती आदेशों को जारी होने के 180 दिनों के भीतर जनता के सामने लाने के लिए समीक्षा की जानी अनिवार्य होती है। यह तय समय सीमा 13 सितंबर को ही खत्म हो चुकी है। इसके बावजूद खुफिया विभाग के आला अधिकारी सांसदों पर दबाव बना रहे हैं कि साल के अंत तक इस पूरे कार्यक्रम को दोबारा अधिकृत कर दिया जाए।

सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले सदस्य रॉन वाइडेन और हाउस इंटेलिजेंस कमेटी के पूर्व प्रमुख एडम शिफ ने अब सख्त रुख अख्तियार किया है। दोनों सांसदों ने नेशनल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर जे क्लेटन और अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच को एक कड़ा मांग पत्र भेजा है। इस पत्र में उन्होंने प्रशासन से इस बात का स्पष्टीकरण मांगा है कि फैसले को दबाने के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं और इसके पीछे क्या वजह रही है। इसके लिए सरकार को 6 नवंबर तक की औपचारिक समय सीमा दी गई है। सांसदों का सीधा कहना है कि यदि प्रशासन इस सीधी वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं कर सकता, तो संसद या देश की जनता धारा 702 की अन्य कानूनी सीमाओं के पालन को लेकर सरकार पर कैसे भरोसा कर सकती है।

## नागरिक अधिकार संगठनों का कड़ा विरोध और पुराने वादे
संसद के बाहर भी इस मुद्दे पर व्यापक असंतोष देखने को मिल रहा है। डिमांड प्रोग्रेस समेत 23 नागरिक स्वतंत्रता और सरकारी जवाबदेही संगठनों ने संसद के शीर्ष नेताओं से अपील की है कि वे धारा 702 का नवीनीकरण करने से साफ इनकार कर दें। इन संगठनों का तर्क है कि जब तक सरकार इस निगरानी कार्यक्रम के संचालन से जुड़ी कानूनी रूप से अनिवार्य जानकारी को जानबूझकर छिपा रही है, तब तक इसे आगे बढ़ाने की मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। इस मांग का समर्थन करने वालों में अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन से लेकर कंजर्वेटिव समर्थित प्रोजेक्ट फॉर प्राइवेसी एंड सर्विलांस अकाउंटेबिलिटी तक शामिल हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि यह चिंता किसी एक राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है।

ट्रंप प्रशासन पर इस फैसले को सार्वजनिक करने का दबाव काफी समय से है और पहले भी इसके वादे किए गए थे। अप्रैल में इंटेलिजेंस कमेटी के रिपब्लिकन अध्यक्ष टॉम कॉटन और डेमोक्रेटिक उपाध्यक्ष मार्क वार्नर ने सीनेट में होने वाली बहस से पहले 15 दिनों के भीतर इस आदेश को सार्वजनिक करने की मांग की थी। इसके बाद जुलाई में अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच से जब लिखित में पूछा गया था कि क्या वे 180 दिनों की समय सीमा के भीतर इसे अवर्गीकृत करने की प्रतिबद्धता जताते हैं, तो उनका जवाब हां में था। मार्क वार्नर के संचार निदेशक राचेल कोहेन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि पूर्व नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड और कुछ समय के लिए कार्यवाहक निदेशक रहे बिल पुल्ते ने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया था, लेकिन सीनेटर वार्नर को उम्मीद है कि वर्तमान डायरेक्टर जे क्लेटन कानून के अनुसार इस राय को सार्वजनिक करेंगे।

## खुफिया विभाग की चुप्पी और निगरानी टूल्स की असलियत
इस पूरे मामले में जब सवाल उठाए गए तो टॉम कॉटन के कार्यालय ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके अलावा व्हाइट हाउस, ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस और अमेरिकी न्याय विभाग ने भी इस देरी पर कोई औपचारिक उत्तर नहीं दिया है। कानूनन इस गोपनीय आदेश को सार्वजनिक करने के लिए जिम्मेदार नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर जे क्लेटन ने अपनी नियुक्ति से पहले कोई ठोस वादा नहीं किया था। जुलाई में अपनी पुष्टि से पहले उन्होंने केवल इतना लिखा था कि सरकार इसे तेजी से अवर्गीकृत करने के लिए कड़ा प्रयास कर रही है और सांसदों को यह आदेश पहले ही देखने के लिए उपलब्ध करा दिया गया है।

अदालत के निष्कर्षों के कुछ हिस्से पहले भी सामने आ चुके हैं। पिछले साल सार्वजनिक की गई निगरानी अदालत की एक राय में फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) के एक ऐसे ही तकनीकी टूल का जिक्र था, जिसे पार्टिसिपेंट्स फिल्टर कहा जाता है। यह टूल जांच अधिकारियों को निगरानी के दायरे में आए लोगों के संपर्क में मौजूद अन्य व्यक्तियों को चुनने और उनके निजी संदेशों को पढ़ने की सुविधा देता था। फरवरी 2025 में न्याय विभाग के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभाग ने अदालत को जानकारी दी थी कि यह सिस्टम ऐसी सर्च चला रहा था जिनकी कोई गिनती ही नहीं रखी गई थी। इसके बाद FBI ने मार्च में इसे बंद कर दिया, लेकिन बाद में न्याय विभाग से एक नए स्वरूप की मंजूरी मिलने के बाद उसी साल इसे फिर से चालू कर दिया गया।

## सर्च के दायरे पर कानूनी पेच और दावों में विरोधाभास
इस वर्ष का अदालती फैसला पिछले मामलों से कहीं अधिक गंभीर है। अदालत ने पाया कि विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इंटरसेप्ट किए गए डेटा में से किसी अमेरिकी नागरिक के संदेशों को अलग छांटने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले टूल्स वास्तव में अमेरिकी नागरिकों की सीधी तलाशी के बराबर हैं। इसलिए इन पर भी वे सभी कानूनी सीमाएं लागू होती हैं जो सामान्य सर्च पर लागू होती हैं। अदालत ने इन टूल्स को नए सिरे से तैयार करने का आदेश दिया। इसी बीच सीनेटर एलेक्स पाडिला ने न्याय विभाग से जुड़े सवालों में यह उजागर किया कि सरकार अदालत के उस हिस्से के खिलाफ अपील कर रही है, जिसमें इस तरह के फिल्टरिंग टूल्स के इस्तेमाल को सीमित करने की बात कही गई है।

एक तरफ जहां इस महत्वपूर्ण अदालती फैसले को गोपनीय रखा गया, वहीं मार्च 2026 में जारी खुफिया एजेंसियों की सात फैक्ट शीट्स में एक अलग ही तस्वीर पेश की गई। फैसले वाले दिन जारी एक दस्तावेज में दावा किया गया कि अमेरिकी नागरिकों से जुड़ी FBI की सर्च 98.9 प्रतिशत कानूनी नियमों के अनुकूल पाई गईं। साथ ही धारा 702 का श्रेय विएना में टेलर स्विफ्ट के संगीत कार्यक्रम पर होने वाले आतंकी हमले की साजिश को नाकाम करने के लिए दिया गया। हालांकि इनमें से किसी भी दस्तावेज में अदालत की कड़ी टिप्पणियों का कोई जिक्र नहीं था। इसके विपरीत, न्याय विभाग के महानिरीक्षक द्वारा अक्टूबर 2025 में की गई समीक्षा में अनुपालन दर 98.6 प्रतिशत बताई गई थी और कहा गया था कि यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि FBI की सर्च से जुड़ी खामियां पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं।

## आंतरिक ऑडिटिंग का खात्मा और सांसदों की गंभीर चेतावनी
सरकारी फैक्ट शीट्स में दावा किया गया था कि आंतरिक लेखा परीक्षक ऐसी हर तलाशी की नियमित समीक्षा करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि FBI के निदेशक काश पटेल ने पिछले मई में ब्यूरो के ऑफिस ऑफ इंटरनल ऑडिटिंग को पूरी तरह बंद कर दिया था और इसके ऑडिटरों को किसी अन्य प्रभाग में स्थानांतरित कर दिया था। इसके अलावा 2025 से पहले की तलाशी के आंकड़ों में पार्टिसिपेंट्स फिल्टर के जरिए की गई सर्च को शामिल ही नहीं किया गया है। सरकार के अपने निजता निगरानी तंत्र का मानना है कि इन गुप्त सर्च का रिकॉर्ड रखना या इन्हें ट्रैक करना व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है।

फैसले को पढ़ चुके सांसदों का कहना है कि इसमें दर्ज बातें बेहद चौंकाने वाली हैं। सीनेट की न्यायपालिका समिति के शीर्ष डेमोक्रेट सदस्य डिक डर्बिन ने जून में सीनेट में अपने सहयोगियों से सुरक्षित कमरे में जाकर इसे पढ़ने का आह्वान किया था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इसे देखने के बाद FISA की भूमिका और आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर किसी का भी नजरिया बदल जाएगा। वहीं सीनेटर रॉन वाइडेन ने चेतावनी दी है कि धारा 702 की एक ऐसी गुप्त व्याख्या का सहारा कई सरकारें लेती रही हैं, जिसे सार्वजनिक करने से लगातार इनकार किया गया है। उन्होंने कहा कि जब यह व्याख्या अंततः सामने आएगी, तो लोग यह देखकर दंग रह जाएंगे कि संसद इतने लंबे समय तक अधूरी जानकारी के आधार पर इस कानून पर बहस करती रही। अदालत द्वारा दी गई वर्तमान अंतरिम मंजूरी मार्च में समाप्त हो रही है, जबकि सरकार के पास सांसदों को जवाब देने के लिए 6 नवंबर तक का समय है। निगरानी सुधार समर्थकों को अंदेशा है कि सरकार सालाना रक्षा विधेयक में इस प्रावधान को चुपचाप जोड़कर इस विवाद से बचने की कोशिश कर सकती है, जैसा 2023 में चार महीने के विस्तार के लिए किया गया था।

## इसका आप पर असर
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा डिजिटल निगरानी के नियमों के उल्लंघन और अदालती आदेश को छिपाए जाने से आम नागरिकों की डिजिटल प्राइवेसी और सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है।

- **नागरिकों की निजी बातचीत:** आम लोगों के ईमेल और चैट बिना किसी ठोस वारंट या कानूनी औचित्य के खुफिया विश्लेषकों की पहुंच में आ सकते हैं। इससे डिजिटल संचार का इस्तेमाल करने वाले सामान्य नागरिकों की प्राइवेसी को बड़ा खतरा बना रहता है।
- **पारदर्शिता और कानूनी जवाबदेही:** जब सुरक्षा एजेंसियां अपने खिलाफ आए अदालती आदेशों को तय मियाद के भीतर सार्वजनिक नहीं करतीं, तो सरकारी कामकाज की निष्पक्षता सवालों के घेरे में आ जाती है। संसद में कानून बनाते समय जनता और जन प्रतिनिधियों के पास वास्तविक आंकड़े नहीं पहुंच पाते हैं।
- **आंतरिक ऑडिटिंग में बदलाव:** एफबीआई के आंतरिक ऑडिट कार्यालय को बंद करने और कर्मचारियों के तबादले से स्वतंत्र जांच कमजोर हो सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि नियमों के उल्लंघन की घटनाओं को पकड़ना पहले से ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।
- **संसद में आगामी फैसला:** इस कार्यक्रम की अदालती मंजूरी मार्च में खत्म हो रही है, जिससे पहले सांसदों को इसके भविष्य पर मतदान करना होगा। यदि यह कानून बिना कड़े सुरक्षा मानकों के फिर से लागू होता है, तो डिजिटल निगरानी का दायरा और बढ़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह विवाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा तकनीकी टूल्स के जरिए बिना वारंट नागरिकों का डेटा निकालने और फिर अदालत की प्रतिकूल टिप्पणियों को छिपाने के कारण खड़ा हुआ है।

- **सर्च फिल्टर्स का मनमाना उपयोग:** खुफिया विश्लेषकों ने ऐसे डिजिटल फिल्टर्स का इस्तेमाल किया जो विदेशी लक्ष्यों के संपर्क में आए सामान्य नागरिकों के संदेशों को बिना लिखित मंजूरी के छांट लेते थे। अदालत ने माना कि यह प्रक्रिया नागरिकों की सीधी तलाशी के बराबर है जिसके लिए कड़े नियम आवश्यक हैं।
- **समय सीमा का उल्लंघन:** अमेरिकी नियमों के अनुसार इस तरह के महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों की 180 दिनों के भीतर समीक्षा कर उन्हें सार्वजनिक करना जरूरी था। यह समय सीमा 13 सितंबर को खत्म हो गई और प्रशासन द्वारा आदेश को सार्वजनिक न करने पर सांसदों ने विरोध दर्ज कराया।
- **संसदीय नवीनीकरण का दबाव:** धारा 702 की कानूनी अवधि जून में समाप्त हो चुकी है और खुफिया तंत्र इसे दोबारा लागू कराने की कोशिश में जुटा है। खुफिया विभाग पर आरोप है कि वह कार्यक्रम की छवि बनाए रखने के लिए प्रतिकूल अदालती निष्कर्षों को संसद से छिपा रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. विदेशी खुफिया निगरानी अदालत ने अपने गुप्त फैसले में क्या आपत्ति जताई थी?
अदालत ने उन सर्च फिल्टर्स पर आपत्ति जताई थी जिनके जरिए खुफिया विश्लेषक कानूनी अनुमति या लिखित औचित्य के बिना ही इंटरसेप्ट किए गए डेटा से अमेरिकी नागरिकों के संदेश निकाल रहे थे।

### 2. सीनेटरों ने सरकार को जवाब देने के लिए क्या समय सीमा तय की है?
सीनेटर रॉन वाइडेन और एडम शिफ ने प्रशासन को 6 नवंबर तक यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि इस फैसले को जारी करने में देरी क्यों हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

### 3. निगरानी अदालत के फैसले को सार्वजनिक करने की कानूनी मियाद कब समाप्त हुई?
सरकारी नियमों के अनुसार ऐसे फैसलों की 180 दिनों के भीतर समीक्षा होनी चाहिए और यह निर्धारित समय सीमा 13 सितंबर को समाप्त हो गई थी।

### 4. वर्तमान में धारा 702 कार्यक्रम किस आधार पर संचालित हो रहा है?
संसद में नवीनीकरण न होने से कार्यक्रम जून में समाप्त हो गया था, लेकिन यह अदालत द्वारा मार्च में दी गई मंजूरी के आधार पर जारी है जो अगले मार्च तक मान्य है।

### 5. पार्टिसिपेंट्स फिल्टर क्या था और इसे क्यों बंद किया गया था?
यह एफबीआई का एक टूल था जो निगरानी में आए व्यक्तियों के संपर्कों के संदेश देखने की सुविधा देता था, जिसे बिना गिनती वाली सर्च चलाने के कारण बंद कर फिर से बनाया गया था।

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