ब्लैक हैट सम्मेलन में साइबर शोधकर्ता केटल का खुलासा, इंसानी तालमेल से ही सामने आ रहे हैं गंभीर साइबर खतरे लास वेगास में आयोजित ब्लैक हैट सुरक्षा सम्मेलन में साइबर शोधकर्ता केटल ने बताया कि पूर्ण स्वायत्त एआई के बजाय इंसानी मार्गदर्शन के साथ काम करने वाले एआई मॉडल वेब इंफ्रास्ट्रक्चर की जटिल कमियां खोजने में अधिक सक्षम हैं। बुधवार को लास वेगास में आयोजित प्रतिष्ठित ब्लैक हैट सुरक्षा सम्मेलन में साइबर सुरक्षा शोधकर्ता केटल ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की हैकिंग क्षमताओं और इसकी व्यावहारिक सीमाओं से जुड़े महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किए। यह व्यापक शोध वर्तमान समय में एआई द्वारा उत्पन्न साइबर खतरों और सुरक्षा तैयारियों की एक यथार्थवादी और व्यावहारिक तस्वीर पेश करता है। निष्कर्षों के अनुसार, पूर्ण स्वायत्त रूप से कार्य करने वाले एआई सिस्टम अपने स्तर पर नए हमले के तरीके खोजने में बेहद सीमित हैं। हालांकि, जब किसी अनुभवी इंसानी शोधकर्ता का मार्गदर्शन और तकनीकी समझ एआई को मुख्य मौकों पर मिलती है, तो यह प्रणाली साइबर हमले की रणनीतियां बनाने और जटिल कमियां उजागर करने में बेहद शक्तिशाली साझेदार साबित होती है। वेब इंफ्रास्ट्रक्चर में शेयर्ड पार्सर कन्फ्यूज़न की नई खोज वेब सुरक्षा के क्षेत्र में वर्षों के गहन अध्ययन और शोध के बाद, केटल ने सम्भावित कमियों के एक पूरी तरह से नए क्षेत्र का खुलासा किया है, जिसे शेयर्ड पार्सर कन्फ्यूज़न नाम दिया गया है। यह सुरक्षा कमी वेब सर्वर के उस तकनीकी ढांचे से पैदा होती है, जहां सर्वर पर आने वाली रिक्वेस्ट और वहां से बाहर जाने वाले रिस्पॉन्स दोनों को प्रोसेस करने के लिए एक ही साझा कोड का इस्तेमाल किया जाता है। इंटरनेट नेटवर्क और वेब प्रणालियों में, उपयोगकर्ता की ओर से आने वाली रिक्वेस्ट को पूरी तरह से अविश्वसनीय माना जाता है, क्योंकि उसमें कोई भी हानिकारक डेटा हो सकता है। इसके विपरीत, सर्वर से निकलने वाले रिस्पॉन्स को सुरक्षित और विश्वसनीय माना जाता है। ऐसे में दोनों प्रकार के डेटा को प्रोसेस करने के लिए एक ही पार्सर कोड का उपयोग करने से सुरक्षा की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं। यह स्थिति एक बहुत बड़ा हमला क्षेत्र पैदा करती है, जो कई अलग-अलग प्रकार के साइबर हमलों का कारण बन सकती है और विभिन्न वेब अनुप्रयोगों को प्रभावित कर सकती है। एआई की भ्रामक जानकारियों पर इंसानी नियंत्रण यह शोध प्रयोग सितंबर 2025 में शुरू हुआ था, जिसमें एंथ्रोपिक और ओपनएआई के उस समय के सबसे आधुनिक मॉडलों का उपयोग किया गया था। शुरुआती परीक्षणों का मुख्य उद्देश्य यह जांचना था कि क्या एआई मॉडल सैद्धांतिक सुरक्षा अनुसंधान कर सकते हैं। हालांकि, शुरुआत में एक बड़ी व्यावहारिक समस्या सामने आई जब एआई मॉडल पुराने शोध को ही नया बताकर पेश करने लगे और बहुत जटिल विषयों पर ऐसी जानकारी देने लगे जिसकी जांच करना अत्यंत कठिन था। इस समस्या से निपटने के लिए, केटल ने प्रयोग के दायरे को अपनी वेब सुरक्षा विशेषज्ञता तक सीमित कर दिया। इस कदम से उन्हें विषय सामग्री पर पूरा नियंत्रण मिला और एआई मॉडल उन्हें भ्रमित नहीं कर सके। इसके अलावा, अपने स्वयं के शोध तरीकों को व्यवस्थित करके और मॉडलों को उस पर प्रशिक्षित करके, वह यह जांचने में सक्षम हुए कि एआई प्रणालियां अपने स्तर पर किस सीमा तक नए तार्किक निष्कर्ष निकाल सकती हैं। तेज अनुसंधान चक्र और डेटा प्रबंधन की चुनौती जैसे-जैसे प्रयोग के तरीकों को सुधारा गया और समय के साथ अधिक शक्तिशाली मॉडल सामने आए, प्रणाली ने इंसानी क्षमता से कहीं अधिक तेजी से नए निष्कर्ष देने शुरू कर दिए। बिना किसी इंसानी हस्तक्षेप के हर दो दिन में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आने लगा। इस स्थिति ने शोधकर्ता के सामने एक अनोखी चुनौती खड़ी कर दी, क्योंकि शोध के इतने सारे नए रास्ते खुल रहे थे कि उन सभी का मैनुअल विश्लेषण करना असंभव था और यह डर बना रहता था कि कहीं कोई महत्वपूर्ण सुराग छूट न जाए। नतीजतन, शोधकर्ता को विश्लेषण प्रक्रिया को और अधिक स्वचालित करने के लिए नए उपकरण विकसित करने पड़े। इस संयुक्त प्रयास के माध्यम से कुछ ही महीनों में सुरक्षा की इतनी सत्यापित कमियां खोजी गईं, जिन्हें खोजने में एक अकेला इंसानी शोधकर्ता कई वर्षों का समय लेता। साइबर सुरक्षा में मानव और एआई के तालमेल का महत्व यद्यपि एआई प्रणाली ने कमियों की एक पूरी तरह से नई श्रेणी की परिकल्पना तैयार की, लेकिन वह अपने आप इसे पूरी तरह साबित नहीं कर सकी। शेयर्ड पार्सर कन्फ्यूज़न की खोज इस बात का एक आदर्श उदाहरण है कि एआई और इंसान मिलकर किस प्रकार रक्षात्मक और आक्रामक साइबर सुरक्षा अनुसंधान को नई दिशा दे सकते हैं। एआई मॉडलों ने वास्तविक आंकड़ों का विश्लेषण करके परिकल्पना तैयार की, जबकि इंसानी विशेषज्ञता ने उस परिकल्पना का मूल्यांकन करके उसकी तकनीकी सत्यता की पुष्टि की। केटल ने बताया, "यह अकेले यह काम नहीं कर सकता था, लेकिन मैं भी इसे अकेले कभी नहीं खोज पाता।" वर्तमान में साइबर सुरक्षा उद्योग में एआई की सीमाओं पर बहुत कम चर्चा होती है, क्योंकि व्यावसायिक कारणों से हर कंपनी अपनी प्रणालियों को पूरी तरह से एआई संचालित दिखाना चाहती है। हालांकि, यह प्रयोग साबित करता है कि भविष्य की साइबर रक्षा और हमला रणनीतियों में इंसान और तकनीक का यह तालमेल ही सबसे प्रभावी भूमिका निभाएगा। इसका आप पर असर भारत में: वेब इंफ्रास्ट्रक्चर में शेयर्ड कोड की कमियों को समझने से भारतीय आईटी कंपनियों और डिजिटल सेवाओं की डेटा सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलेगी। आम उपयोगकर्ताओं के लिए: यह शोध बताता है कि भविष्य में एआई संचालित साइबर हमलों से बचाव के लिए तकनीकी प्रणालियों में मानव निरीक्षण और सुरक्षा ऑडिट बेहद जरूरी हैं। सवाल-जवाब 1. ब्लैक हैट सम्मेलन में किस नई साइबर सुरक्षा कमी का खुलासा हुआ? शोधकर्ता केटल ने शेयर्ड पार्सर कन्फ्यूज़न नामक एक नई भेद्यता का खुलासा किया, जो वेब सर्वर द्वारा रिक्वेस्ट और रिस्पॉन्स दोनों को प्रोसेस करने के लिए एक ही कोड का उपयोग करने से उत्पन्न होती है। 2. क्या एआई पूरी तरह से अपने आप नई हैकिंग तकनीकें खोज सकता है? नहीं, शोध के अनुसार पूर्ण स्वायत्त रूप से एआई की नए हमले के रास्ते खोजने की क्षमता बेहद सीमित है, लेकिन इंसानी मार्गदर्शन मिलने पर यह काफी प्रभावी हो जाता है। 3. इस शोध प्रयोग में किन एआई मॉडलों का उपयोग किया गया था? यह प्रयोग सितंबर 2025 में शुरू हुआ था, जिसमें एंथ्रोपिक और ओपनएआई के आधुनिक मॉडलों का परीक्षण किया गया था। 4. वेब सर्वर में रिक्वेस्ट और रिस्पॉन्स कोड के साझा होने से क्या जोखिम है? वेबसाइट पर आने वाली रिक्वेस्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता, जबकि सर्वर से निकलने वाले रिस्पॉन्स पर भरोसा किया जाता है। इनके बीच का अंतर समाप्त होने से बड़ा साइबर हमला हो सकता है। https://trendkia.com/security/black-hat-sammelana-men-saibara-shodhakarta-kettle-ka-khulasa-insani-talamela-se-hi-samane-a-rahe-hain-gnbhira-saibara-khatare-14115 TrendKia — Har trend, sabse pehle.