क्या एआई और प्राइवेसी एक साथ चल सकते हैं? प्रो-टन के सीईओ एंडी येन का बड़ा बयान प्रो-टन के संस्थापक और सीईओ एंडी येन ने एक इंटरव्यू में एआई, प्राइवेसी, कॉरपोरेट निगरानी और यूरोपीय संघ के चैट कंट्रोल नियमों पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी कंपनी प्राइवेसी को प्राथमिकता देते हुए एआई और अन्य टूल्स का विकास कर रही है। एंडी येन उन तकनीकी हस्तियों में गिने जाते हैं जो एआई को सीधे तौर पर प्राइवेसी में दखलअंदाजी मानते हैं। वे दुनिया की सबसे लोकप्रिय एन्क्रिप्शन-आधारित कंपनियों में से एक Proton के संस्थापक और सीईओ हैं। उनका कहना है कि हर कंज्यूमर टेक प्रोडक्ट में एआई को शामिल करने की होड़ ने लोगों को तेजी से प्रो-टन की तरफ धकेल दिया है। प्रो-टन की सेवाएं जीमेल से लेकर गूगल डॉक्स, शीट्स, कैलेंडर और मीट जैसी गूगल सेवाओं के एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड विकल्प हैं। एआई को लेकर प्रो-टन का रुख हालांकि, एंडी येन यह स्पष्ट करते हैं कि वे एआई के विरोधी नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे वे इंटरनेट के विरोधी नहीं हैं। जून के आखिर में, प्रो-टन ने अपना खुद का एआई चैटबॉट Lumo लॉन्च किया। यह इस बात का प्रमाण है कि कंपनी अपने टूल्स में एआई को तेजी से शामिल कर रही है, लेकिन इस तरह से जो पारंपरिक तकनीकी दिग्गजों की तुलना में अधिक स्वैच्छिक है और यूजर की प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखता है। सर्न की लेबोरेटरी से प्रो-टन की शुरुआत एंडी येन ने अपने सफर के बारे में बात करते हुए बताया कि वे मूल रूप से कोई टेक पर्सन या उद्यमी नहीं हैं। वे सर्न की न्यूक्लियर रिसर्च फैसिलिटी में लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर पर काम करने वाले पार्टिकल फिजिस्ट थे। 2013 में एडवर्ड स्नोडेन के खुलासों के बाद उन्हें प्रो-टन बनाने की प्रेरणा मिली। जब पार्टिकल एक्सेलेरेटर अपग्रेड के लिए बंद था, तब स्विस वैज्ञानिकों ने कैफे में बैठकर सरकारी निगरानी के साथ-साथ कॉरपोरेट निगरानी के बड़े खतरे पर चर्चा की, जिससे प्रो-टन की नींव पड़ी। 2014 में प्रो-टन मेल की शुरुआत हुई थी। यूजर्स की संख्या में भारी इजाफा शुरुआत में कुछ सौ हजार यूजर्स से शुरू हुई यह कंपनी आज एक करोड़ से ज्यादा यूजर्स तक पहुंच चुकी है। कंपनी ने ईमेल के बाद कैलेंडर, फाइल स्टोरेज और डॉक्यूमेंट्स जैसे टूल्स जोड़े, जिससे एक तरह से पूरी गूगल वर्कस्पेस का प्राइवेसी-फर्स्ट विकल्प तैयार हो गया। यह एक फ्रीमीयम बिजनेस मॉडल पर काम करती है, जहां अधिकांश लोग इसका मुफ्त इस्तेमाल करते हैं और सामान्य 1 से 3 प्रतिशत लोग इसके पेड ग्राहक बनते हैं। एआई और डेटा सुरक्षा की चुनौतियां एंडी येन का मानना है कि एआई भी एक तरह की निगरानी है और इंटरनेट भी निगरानी पर आधारित है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में मुख्य सवाल यह है कि इस नई तकनीक के भविष्य के नियंत्रक कौन होंगे। यदि प्राइवेसी समर्थक कंपनियां आगे आकर प्राइवेसी-फर्स्ट एआई नहीं बनाएंगी, तो भविष्य पूरी तरह उन तकनीकी दिग्गजों के हाथ में चला जाएगा जो यूजर्स के डेटा की सुरक्षा नहीं करते। Lumo की सुरक्षा को लेकर उन्होंने बताया कि फिलहाल यह पूरी तरह एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड चैट नहीं है, क्योंकि एलएलएम के लिए वह तकनीक अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है, लेकिन कंपनी भविष्य में एनवीडिया की तकनीक की मदद से इसे और सुरक्षित बनाने पर काम कर रही है। राजनीतिक माहौल और चैट कंट्रोल पर चिंता अमेरिका और यूरोप में राजनीतिक बदलावों और निगरानी को लेकर एंडी येन ने चेतावनी दी है कि सरकारें जो नए नियम और सर्विलांस कानून बना रही हैं, उनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। यूरोपीय संघ के चैट कंट्रोल प्रस्ताव पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन को कमजोर करना है। उन्होंने यूरोप के लिए चेतावनी दी कि अमरीका या चीन से मुकाबले में यूरोप के पास एकमात्र पूंजी उसकी वैल्यूज, लोकतंत्र, प्राइवेसी और सुरक्षा है, और चैट कंट्रोल जैसे कानून इस भरोसे को नष्ट कर देंगे। प्रो-टन की अनूठी कॉरपोरेट संरचना प्रो-टन की संरचना के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि कंपनी का सबसे बड़ा शेयरधारक एक नॉन-प्रॉफिट फाउंडेशन है, जबकि कंपनी एक लाभकारी इकाई के रूप में काम करती है। इससे कंपनी शेयरधारकों के मुनाफे के दबाव में काम नहीं करती, बल्कि अपनी लोकतांत्रिक और प्राइवेसी से जुड़ी प्राथमिकताओं पर टिकी रहती है। भविष्य में स्लैक या डिस्कॉर्ड जैसे वर्कप्लेस कम्युनिकेशन टूल्स के एन्क्रिप्शन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि कंपनी प्रो-टन मीट के जरिए इस दिशा में आगे बढ़ रही है और आने वाले समय में इस पर भी काम किया जाएगा। इसका आप पर असर यह खबर सीधे तौर पर उन सभी आम इंटरनेट यूजर्स को प्रभावित करती है जो गूगल, जीमेल और अन्य टेक कंपनियों की सेवाओं का उपयोग करते हैं और अपने पर्सनल डेटा तथा प्राइवेसी को लेकर चिंतित रहते हैं। • भारत में: भारतीय यूजर्स के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि रोजमर्रा के डिजिटल टूल्स में डेटा सुरक्षा और वैकल्पिक प्राइवेसी-फर्स्ट सेवाओं का चयन किस प्रकार उनकी व्यक्तिगत जानकारी को सुरक्षित रख सकता है। सवाल-जवाब 1. प्रो-टन कंपनी की स्थापना कब और कैसे हुई थी? प्रो-टन की शुरुआत 2013 में सर्न (CERN) में काम करने वाले वैज्ञानिकों द्वारा एडवर्ड स्नोडेन के खुलासों के बाद और बड़े पैमाने पर हो रही कॉर्पोरेट व सरकारी निगरानी के जवाब में की गई थी। 2. प्रो-टन के वर्तमान में कितने यूजर्स हैं? प्रो-टन के पास वर्तमान में दुनिया भर में एक करोड़ से अधिक यूजर्स हैं जो इसकी प्राइवेसी-फर्स्ट सेवाओं का उपयोग करते हैं। 3. प्रो-टन का एआई चैटबॉट कौन सा है? प्रो-टन ने Lumo नामक अपना एआई चैटबॉट लॉन्च किया है, जिसे प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। 4. क्या प्रो-टन का एलएलएम चैट पूरी तरह एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड है? फिलहाल Lumo चैट में गणितीय रूप से एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन नहीं है, बल्कि यह प्रो-टन का एक वादा है कि वे यूजर के चैटिंग लॉग्स को नहीं देखेंगे। https://trendkia.com/security/can-ai-coexist-with-privacy-proton-ke-ceo-andy-yen-ka-bara-bayana-18062 TrendKia — Har trend, sabse pehle.