# अखंड हरि नाम संकीर्तन का दिव्य केंद्र बनी गोरखपुर की गीता वाटिका, 52 वर्षों से जारी है भक्ति का अनवरत प्रवाह

> गोरखपुर के असुरन-पिपराइच मार्ग पर स्थित ऐतिहासिक गीता वाटिका में पिछले 52 सालों से लगातार हरि नाम संकीर्तन गूंज रहा है। जानिए 1934 में खरीदे गए इस निजी बगीचे के एक भव्य आध्यात्मिक स्थल बनने की पूरी कहानी।

**Type:** article · **Category:** अध्यात्म · **Published:** 2026-09-11 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/spirituality/akhnda-hari-nama-snkirtana-ka-divya-kendra-bani-gorakhpur-ki-gita-vatika-52-varshon-se-jari-hai-bhakti-ka-anavarata-pravaha-31133 · **Language:** Hindi
**Tags:** गीता वाटिका, गोरखपुर, हनुमान प्रसाद पोद्दार, हरि नाम संकीर्तन, अखंड संकीर्तन, राधा कृष्ण मंदिर, गोरखपुर मंदिर

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में असुरन-पिपराइच मार्ग पर बढ़ते ही गाड़ियों के हॉर्न और शहरी शोरगुल की जगह एक अलौकिक शांति ले लेती है। इस मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध गीता वाटिका में कदम रखते ही कानों में अनवरत गूंजती हुई मधुर धुन सुनाई देती है। यहाँ पिछले 52 वर्षों से 'अखंड हरि नाम संकीर्तन' बिना किसी बाधा के दिन-रात लगातार चल रहा है। आज यह स्थान न केवल स्थानीय निवासियों के लिए बल्कि दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अगाध श्रद्धा और आत्मिक शांति का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।

## निजी बगीचे से विशाल आध्यात्मिक धाम तक का सफर
आज जिस गीता वाटिका में हजारों भक्त नतमस्तक होते हैं, उसकी शुरुआत बेहद साधारण तरीके से हुई थी। मूल रूप से यह जगह कोलकाता के उद्योगपति सेठ ताराचंद घनश्याम दास का एक निजी बगीचा हुआ करती थी। स्थानीय लोग उस ज़माने में इसे 'गोयंदका गार्डन' कहकर पुकारते थे। भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के निकट सहयोगी और साधक हरि कृष्ण दुजारी के अनुसार, इस भूमि को 30 मई 1934 को संत भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के निवास के लिए खरीदा गया था। अगले ही वर्ष यानी 1935 में यहाँ उनके लिए एक सादा आवास निर्मित किया गया। इसके बाद वर्ष 1945 में भाईजी ने अपने आवास के निचले हिस्से में राधारानी, कीर्तिदा मैया और ललिताजी की पवित्र प्रतिमाओं की स्थापना की, जिसके साथ ही यहाँ राधा-कृष्ण भक्ति की अविरल धारा बहने लगी।

## अखंड संकीर्तन का संकल्प और संकल्प की निरंतरता
गीता वाटिका के गौरवशाली इतिहास में वर्ष 1968 का विशेष महत्व है। इससे पूर्व वर्ष 1965 में यहाँ गिरिराज जी की परिक्रमा का शुभारंभ किया गया था। तत्पश्चात 1968 में राधाष्टमी के पावन पर्व पर भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने इस परिसर में 'अखंड हरि नाम संकीर्तन' शुरू करने का पावन संकल्प लिया। तब से लेकर आज तक समय, परिस्थितियाँ और लोग बदलते रहे, लेकिन यह संकीर्तन कभी नहीं रुका। जब वर्ष 1971 में भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार का निधन हुआ, तो एक बार इस बात की आशंका उठी कि यह परंपरा कैसे आगे बढ़ेगी। परंतु उनकी धर्मपत्नी रामदेई पोद्दार ने पूरी निष्ठा के साथ इस जिम्मेदारी को संभाला। उन्होंने वर्ष 1975 में श्री राधाकृष्ण साधना मंदिर की आधारशिला रखी और लगभग एक दशक के कड़े परिश्रम के पश्चात जून 1985 में यह भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ।

## 16 गर्भगृह और 35 शिखरों का भव्य स्थापत्य
यह मंदिर केवल अपनी आध्यात्मिक चेतना के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अद्भुत स्थापत्य कला के लिए भी जाना जाता है। मंदिर परिसर का मुख्य शिखर लगभग 85 फीट ऊँचा है, जिसके साथ 35 छोटे और बड़े अन्य शिखर बनाए गए हैं। विशाल मंदिर परिसर के भीतर 16 अलग-अलग गर्भगृह स्थित हैं, जहाँ विभिन्न देवी-देवता विराजमान हैं। श्रद्धालु यहाँ श्री राधा-कृष्ण के अलावा भगवान शिव-पार्वती, सीताराम, माँ दुर्गा, श्री गणेश, हनुमान जी और सूर्य देव के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर की विशाल दीवारों पर प्राचीन वेद, उपनिषद, रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता के मुख्य प्रसंगों को सुंदर कलाकृतियों के रूप में उकेरा गया है।

## देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं श्रद्धालु
जन्माष्टमी और राधाष्टमी जैसे बड़े धार्मिक पर्वों पर गीता वाटिका का माहौल देखते ही बनता है। इन अवसरों पर भारत के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि विदेशी धरती से भी श्रद्धालु यहाँ खींचे चले आते हैं और इस पवित्र ऊर्जा का अनुभव करते हैं। आज के इस आधुनिक और भागदौड़ भरे युग में, गोरखपुर के बीचोंबीच स्थित यह पावन धाम लोगों को भक्ति, मन की शांति और ईश्वर से जुड़ने का अनूठा अवसर प्रदान कर रहा है।

## इसका आप पर असर
यह समाचार गोरखपुर और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए गीता वाटिका के ऐतिहासिक महत्व और आध्यात्मिक व्यवस्था की जानकारी देता है।

- **भारत में:** देश भर से आने वाले तीर्थयात्री बिना किसी समय सीमा के किसी भी दिन यहाँ पहुँचकर 24 घंटे चलने वाले अखंड हरि नाम संकीर्तन में भाग ले सकते हैं।
- **गोरखपुर में:** असुरन-पिपराइच रोड पर जाने वाले स्थानीय नागरिक और यात्री इस परिसर का उपयोग मानसिक शांति और आध्यात्मिक साधना के लिए एक नि:शुल्क विश्राम स्थल के रूप में कर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
गीता वाटिका में 52 वर्षों से लगातार चल रहे अखंड हरि नाम संकीर्तन की शुरुआत एक पावन संकल्प से हुई थी, जिसे कई दशकों से निष्ठापूर्वक निभाया जा रहा है।

- **मुख्य कारण:** संत भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने वर्ष 1968 में राधाष्टमी के अवसर पर परिसर में अनवरत हरि नाम संकीर्तन चलाने का धार्मिक संकल्प लिया था।
- **परंपरा की निरंतरता:** 1971 में भाईजी के निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी रामदेई पोद्दार ने इस परंपरा की बागडोर संभाली और मंदिर परिसर का निर्माण करवाकर संकीर्तन को निर्बाध जारी रखा।
- **स्थापत्य का विकास:** 1934 में खरीदे गए निजी बगीचे को 1985 तक 16 गर्भगृहों और 35 शिखरों वाले एक विशाल आध्यात्मिक केंद्र में बदल दिया गया ताकि श्रद्धालुओं को एक बड़ा साधना स्थल मिल सके।

## सवाल-जवाब

### 1. गीता वाटिका में कितने सालों से संकीर्तन चल रहा है?
यहाँ पिछले 52 वर्षों से बिना रुके लगातार अखंड हरि नाम संकीर्तन जारी है।

### 2. गीता वाटिका की जमीन कब और किसके लिए खरीदी गई थी?
यह जमीन 30 मई 1934 को संत भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के लिए कोलकाता के सेठ ताराचंद घनश्याम दास से खरीदी गई थी।

### 3. गीता वाटिका मंदिर में कितने गर्भगृह और शिखर हैं?
मंदिर परिसर में 16 गर्भगृह और 35 छोटे-बड़े शिखर हैं, जिनका मुख्य शिखर 85 फीट ऊँचा है।

### 4. भाईजी के निधन के बाद संकीर्तन की परंपरा को किसने आगे बढ़ाया?
1971 में भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी रामदेई पोद्दार ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और मंदिर का निर्माण कराया।

## प्रेरणा और सबक
गीता वाटिका की कहानी यह दर्शाती है कि संकल्प और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी महान कार्य को पीढ़ियों तक जीवित रखा जा सकता है।

- **संकल्प के प्रति निष्ठा:** भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा 1968 में लिया गया संकल्प 52 वर्षों बाद भी निर्बाध रूप से जारी है।
- **विपरीत परिस्थितियों में निरंतरता:** 1971 में संस्थापक के निधन के बाद भी रामदेई पोद्दार ने हार नहीं मानी और परंपरा को आगे बढ़ाया।
- **सामूहिक समर्पण:** एक साधारण बगीचे से शुरू हुआ प्रयास आज एक विशाल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है।

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