विजयादशमी पर रावण दहन और शस्त्र पूजन के शुभ मुहूर्त तय, पंचांग के अनुसार तिथियों का पूरा विवरण दशहरे के पावन अवसर पर रावण दहन, अपराजिता पूजा और शस्त्र पूजन के शुभ समय का निर्धारण हो गया है। पंचांग के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में 20 और 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाने का विधान सामने आया है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के साथ विजयादशमी का पावन उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। सनातन परंपरा में यह दिन अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की शाश्वत विजय का प्रतीक माना जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण पर प्राप्त की गई विजय की स्मृति में हर वर्ष इस अवसर पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, इस पावन तिथि पर मां दुर्गा के विविध स्वरूपों की अर्चना, अपराजिता देवी का पूजन, आयुध पूजा और विशेष अनुष्ठानों का विधान सदियों से चला आ रहा है। दशमी तिथि और नक्षत्र का विस्तृत समय चक्र पंचांग गणना के अनुसार दशमी तिथि का आरंभ 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर हुआ है, जिसका समापन 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर होगा। वहीं श्रवण नक्षत्र का संचरण 19 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 38 मिनट से प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर की शाम 6 बजकर 2 मिनट तक बना रहेगा। इन विशिष्ट ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों में विजयादशमी का मुख्य पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। तिथि विस्तार 21 अक्टूबर की दोपहर तक होने के कारण कुछ विशेष धार्मिक परंपराओं और पंचांग मतों के अनुसार यह उत्सव 21 अक्टूबर, दिन बुधवार को भी संपन्न होगा। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की पारंपरिक मान्यताओं के तहत 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इस दिन बंगाली समुदाय में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाओं के विसर्जन की प्रक्रिया पूर्ण की जाती है और सुहागिन महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर पारंपरिक 'सिंदूर खेला' की रस्म बड़े उल्लास के साथ निभाती हैं। पूजा अर्चना के प्रमुख और फलदायी मुहूर्त धार्मिक मान्यताओं में विजयादशमी के दिन किए जाने वाले कर्मकांडों के लिए विजय मुहूर्त को सर्वाधिक फलदायी और सिद्धिदायक माना गया है। पंचांग के मुताबिक विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से लेकर दोपहर 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि में किए गए अनुष्ठान, नवीन संकल्प और शुभ कार्य मनोवांछित सफलता प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त अपराह्न पूजा का निर्धारित समय दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से दोपहर 3 बजकर 37 मिनट तक रहेगा। वहीं अपराजिता देवी के विशेष पूजन के लिए शुभ मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से दोपहर 3 बजकर 30 मिनट तक का समय निर्धारित किया गया है। इस पुण्य अवसर पर श्रद्धालु अपने कुल और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार भगवान श्रीराम, मां भगवती और अपने पारंपरिक शस्त्रों की विधिवत आराधना करते हैं। अनेक व्यापारिक प्रतिष्ठानों और कार्यस्थलों पर वाहनों, मशीनों, तकनीकी औजारों तथा आजीविका से जुड़े उपकरणों की पूजा कर समृद्धि की कामना की जाती है। रावण दहन और प्रदोष काल की समय सारणी विजयादशमी उत्सव का प्रमुख जनआकर्षण शाम के समय आयोजित होने वाला रावण दहन कार्यक्रम होता है। उत्तर भारत के विभिन्न नगरों, कस्बों और मैदानों में 20 अक्टूबर की शाम को रामलीला मंचन के समापन के उपरांत रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों को अग्नि दी जाएगी। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने आतातायी रावण का संहार कर माता सीता को लंका के बंधन से मुक्त कराया था। पुतला दहन के लिए सबसे उत्तम समय 20 अक्टूबर की शाम 5 बजकर 47 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 12 मिनट तक का निर्धारित किया गया है। वहीं प्रदोष काल की कालावधि 20 अक्टूबर को शाम 5 बजकर 47 मिनट से रात्रि 8 बजकर 17 मिनट तक प्रभावी रहेगी। इसी प्रदोष व्यापिनी वेला में बुराई के प्रतीकों के दहन का धार्मिक महत्व माना जाता है। शस्त्र पूजन और अपराजिता आराधना का आध्यात्मिक महत्व विजयादशमी का मूल संदेश नकारात्मक शक्तियों पर सकारात्मक शक्तियों की विजय स्थापित करना है। पौराणिक आख्यानों में भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के साथ-साथ इसी पावन दिन मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के संहार का प्रसंग भी अत्यंत श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। इन्हीं विजय गाथाओं के कारण इस दिन शस्त्र पूजन और अपराजिता देवी की साधना की प्राचीन परंपरा अक्षुण्ण है। गृहस्थ और व्यवसायी वर्ग अपने औजारों, अध्ययन सामग्री, धार्मिक पुस्तकों, वाहनों तथा कार्यक्षेत्र के उपकरणों का पूजन करते हैं। कई अंचलों में सामाजिक सद्भाव और समृद्धि के प्रतीक स्वरूप शमी अथवा आपटा के पत्तों का परस्पर आदान-प्रदान कर बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। इसके साथ ही कई परिवार इस श्रेष्ठ दिन को बच्चों के विद्यारंभ, अक्षर ज्ञान, संगीत साधना अथवा किसी भी नवीन उद्यम के शुभारंभ के लिए परम कल्याणकारी मानकर नई शुरुआत करते हैं। इसका आप पर असर दशहरे के अलग-अलग शुभ मुहूर्त और तिथियों का सीधा प्रभाव श्रद्धालुओं के पूजन समय और सार्वजनिक आयोजनों पर पड़ेगा। • पूजन समय का चयन: जो श्रद्धालु शस्त्र या अपराजita देवी की पूजा की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें दोपहर 1:14 बजे से 3:37 बजे के मध्य अपने अनुष्ठान पूरे करने होंगे। इस निश्चित समय चक्र का पालन करने से धार्मिक नियमों का सम्यक निर्वाह हो सकेगा। • रावण दहन देखने की योजना: उत्तर भारत के सार्वजनिक मैदानों में पुतला दहन देखने जाने वाले परिवारों को शाम 5:47 बजे से 6:12 बजे के बीच कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित रहना होगा। मुख्य दहन कार्यक्रम इसी निर्धारित अवधि के भीतर संपन्न कराया जाएगा। • क्षेत्रीय अवकाश और अनुष्ठान: उत्तर भारत में मुख्य उत्सव 20 अक्टूबर को केंद्रित है, जबकि पश्चिम बंगाल और अन्य पूर्वी क्षेत्रों में प्रतिमा विसर्जन तथा सिंदूर खेला 21 अक्टूबर को होगा। यात्रा या स्थानीय कार्यक्रमों की योजना बनाते समय इन क्षेत्रीय तिथियों का ध्यान रखना आवश्यक है। • नए कार्यों का शुभारंभ: व्यापारिक औजारों, मशीनों के पूजन अथवा बच्चों की नई पढ़ाई की शुरुआत के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 1:59 बजे से 2:45 बजे तक का समय सबसे उपयुक्त है। इस अवधि में नए अनुबंध या बहीखातों की शुरुआत भी की जा सकती है। ऐसा क्यों हुआ दशहरा उत्सव दो अलग-अलग तिथियों में बंटने और विशिष्ट मुहूर्तों में आयोजित होने के पीछे पंचांग गणना और सांस्कृतिक परंपराएं मुख्य कारक हैं। • तिथि विस्तार: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 बजे से शुरू होकर 21 अक्टूबर दोपहर 2:11 बजे तक विद्यमान रहेगी। इस तरह तिथि का फैलाव दो दिनों के मध्य होने से अलग-अलग परंपराओं में पूजन का दिन भिन्न हो गया। • अपराह्न और प्रदोष काल की प्रधानता: दशहरे में विजय मुहूर्त, अपराह्न काल और शाम के प्रदोष काल की उपस्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 20 अक्टूबर की शाम को प्रदोष काल और श्रवण नक्षत्र उपलब्ध होने के कारण उत्तर भारत में रावण दहन का निर्णय इसी दिन के लिए तय हुआ। • क्षेत्रीय परंपराओं का अंतर: पश्चिम बंगाल में उदया तिथि और दुर्गा पूजा की शास्त्रीय विसर्जन विधियों को प्राथमिकता दी जाती है। दशमी तिथि 21 अक्टूबर की दोपहर तक प्रभावी रहने के कारण वहां विसर्जन और सिंदूर खेला की रस्म 21 अक्टूबर को निर्धारित की गई। सवाल-जवाब 1. दशमी तिथि कब शुरू और समाप्त हो रही है? दशमी तिथि की शुरुआत 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से होगी और इसका समापन 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर होगा। 2. रावण दहन के लिए सबसे शुभ समय क्या है? रावण दहन का सर्वोत्तम समय 20 अक्टूबर को शाम 5 बजकर 47 मिनट से लेकर 6 बजकर 12 मिनट तक निर्धारित है। 3. विजयादशमी पर विजय मुहूर्त का समय क्या है? विजयादशमी की पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से दोपहर 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। 4. अपराजिता देवी की पूजा किस समय की जानी चाहिए? अपराजिता देवी के पूजन का शुभ मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से दोपहर 3 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। 5. पश्चिम बंगाल में विजयादशमी 21 अक्टूबर को क्यों मनाई जा रही है? दशमी तिथि 21 अक्टूबर की दोपहर तक रहने के कारण वहां दुर्गा पूजा की परंपराओं के तहत मूर्ति विसर्जन और सिंदूर खेला 21 अक्टूबर को मनाया जाएगा। 6. विजयादशमी के दिन किन-किन वस्तुओं की पूजा की जाती है? इस दिन भगवान श्रीराम और मां दुर्गा की पूजा के अलावा शस्त्रों, औजारों, कार्यस्थल की मशीनों, वाहनों और पुस्तकों की पूजा की जाती है। https://trendkia.com/spirituality/dussehra-para-ravana-dahana-aura-shastra-pujana-ke-shubha-muhurta-taya-pnchanga-ke-anusara-tithiyon-ka-pura-vivarana-49856 TrendKia — Har trend, sabse pehle.