# गयाजी में प्रेतशिला पर पिंडदान के बाद क्यों बजाते हैं ताली और उड़ाते हैं सत्तू, जानिए अकाल मृत्यु से जुड़ी मोक्ष की मान्यता

> बिहार के गयाजी में पितृपक्ष के दौरान प्रेतशिला वेदी पर अकाल मृत्यु का शिकार हुए पूर्वजों की मुक्ति के लिए तर्पण किया जाता है, जहां पिंडदान के उपरांत तीन बार ताली बजाने, ठहाके लगाने और सत्तू उड़ाने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है।

**Type:** article · **Category:** अध्यात्म · **Published:** 2026-10-11 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/spirituality/gaya-ji-men-pretshila-para-pindadana-ke-bada-kyon-bajate-hain-tali-aura-urate-hain-sattu-janie-akala-mrityu-se-juri-moksha-ki-many-46589 · **Language:** Hindi
**Tags:** गयाजी, पितृपक्ष, पिंडदान, प्रेतशिला, अकाल मृत्यु, श्राद्ध, ब्रह्म कुंड, धार्मिक परंपरा

बिहार के धार्मिक तीर्थ स्थल गयाजी में पितृपक्ष महासंगम का आयोजन 6 सितंबर से 21 सितंबर तक निर्धारित है, जहां देश और दुनिया भर से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए जुटते हैं। इस वार्षिक पखवाड़े के तीसरे दिन, यानी आश्विन कृष्ण प्रतिपदा को 8 सितंबर 2025 के दिन, खास तौर पर प्रेतशिला, ब्रह्म कुंड, राम कुंड, रामशिला तथा कागबली वेदियों पर श्राद्ध कर्म और पिंडदान संपन्न करने की धार्मिक परंपरा है। इनमें प्रेतशिला का स्थान बेहद विशिष्ट माना जाता है, जिसे लोकभाषा में भूतों का पहाड़ भी पुकारा जाता है। ऐसी मान्यता है कि जिन लोगों की असमय अथवा अप्राकृतिक मृत्यु हो जाती है, उनकी आत्माएं गयाजी की प्रमुख वेदियों में गिनी जाने वाली प्रेतशिला पिंडवेदी के आसपास निवास करती हैं। यहां किए जाने वाले विधि-विधान से उन भटकती आत्माओं को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है, जिसके उपरांत वे अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीष देकर विदा होती हैं।

## प्रेतशिला की चट्टानों और गरुड़ पुराण में वर्णित परलोक का संबंध
धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के मुताबिक, प्रेतशिला वेदी पर विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करने से पितरों को तत्काल सांसारिक बंधनों और भटकन से मुक्ति मिल जाती है। इस पर्वत के शिखर पर एक विशालकाय चट्टान स्थित है, जिसका संबंध सीधे परलोक से जुड़ा बताया गया है। गरुड़ पुराण के संदर्भों के अनुसार, इस शिला पर मौजूद प्राकृतिक दरारों और छिद्रों के माध्यम से परलोक से पितर इस लोक में आगमन करते हैं। जब उनके परिजन यहां पिंडदान करते हैं, तो वे इन दरारों से पिंड और जल ग्रहण करते हैं और तृप्त होकर पुनः अपने लोक की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। पर्वत की चोटी पर स्थित इस वेदी पर अनुष्ठान संपन्न करने से प्रेत योनि में फंसी व्यथित आत्माओं को भी सहजता से सद्गति मिल जाती है।

## पिंडदान के बाद तीन बार ताली और ठहाके लगाने का रहस्य
प्रेतशिला पर पिंडदान और तर्पण के बाद परिजनों द्वारा जोरदार ताली बजाने और ठहाका लगाकर हंसने का रिवाज देशभर के अन्य श्राद्ध स्थलों से एकदम अलग है। सामान्यतः जब किसी व्यक्ति की असमय या अकाल मृत्यु होती है, तो परिवार में विलाप, शोक और आंसुओं का वातावरण रहता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के इस पावन अवसर पर पितरों के परलोक के द्वार पूरी तरह खुल जाते हैं और प्रेतशिला पर पिंडदान होते ही पूर्वजों को भटकन से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त हो जाता है। यही कारण है कि उनके परिजन तीन बार ताली बजाकर और खुलकर ठहाका लगाते हैं, जिससे वे इस बात का सार्वजनिक इजहार करते हैं कि उनके पूर्वज अब शोक और कष्ट से मुक्त होकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो चुके हैं।

## सूतक काल की समाप्ति और पहाड़ पर सत्तू उड़ाने का रिवाज
अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों को प्रेत बाधा से छुड़ाने के लिए प्रेतशिला पर्वत पर सत्तू उड़ाने की भी बेहद रोचक और प्राचीन रीत चली आ रही है। सड़क दुर्घटना, आग में जलने, आत्महत्या अथवा हत्या जैसी त्रासदियों में जान गंवाने वालों की मृत्यु को धर्मशास्त्रों में अकाल मृत्यु का दर्जा दिया गया है। ऐसे मामलों में लंबे समय तक सूतक काल का प्रभाव बना रहता है, जिसके दौरान सामान्य नियमों के तहत सत्तू का भोजन करना पूरी तरह वर्जित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, गयाजी पहुंचकर प्रेतशिला पर विधिवत पिंडदान करने के बाद ही यह सूतक समाप्त होता है और सत्तू का सेवन ग्राह्य होता है। इसी परंपरा के तहत तीर्थयात्री पर्वत पर सत्तू उड़ाते हैं, जिससे प्रसन्न होकर अकाल मृत्यु का शिकार हुए पितर तृप्त होते हैं, अपने कुल को आशीर्वाद देते हैं और स्वर्गलोक की यात्रा तय करते हैं।

## ब्रह्म कुंड से 676 सीढ़ियों की चढ़ाई और मोक्ष का द्वार
पितृपक्ष के तीसरे दिन प्रेतशिला के साथ-साथ ब्रह्म कुंड, राम कुंड, रामशिला और काकबली जैसी अन्य वेदियों पर भी पिंडदान का विशेष विधान तय है। प्रेतशिला पर्वत की तलहटी में पवित्र ब्रह्म कुंड स्थित है, जहां श्रद्धालु स्नान और तर्पण करते हैं। इसके बाद श्रद्धालु ब्रह्म कुंड से लगभग 676 सीढ़ियां चढ़कर प्रेत पर्वत के शिखर तक पहुंचते हैं। चट्टानों में स्थित विशेष छिद्रों के सामने बैठकर देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु अपने दिवंगतों के निमित्त पिंडदान अर्पण करते हैं। मान्यता है कि इन छेदों में वास करने वाली आत्माएं पिंड ग्रहण करके मोक्ष प्राप्त कर लेती हैं और उनके परिवार को पितृदोष से छुटकारा मिल जाता है।

## इसका आप पर असर
अकाल मृत्यु का सामना कर चुके परिवारों के लिए गयाजी में प्रेतशिला वेदी पर पिंडदान करने से जुड़ी धार्मिक परंपराएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

- **तीर्थयात्रियों के लिए:** जो श्रद्धालु अपने पूर्वजों का पिंडदान करने गयाजी जा रहे हैं, उन्हें तीसरे दिन प्रेतशिला वेदी पर श्राद्ध संपन्न करने के लिए शारीरिक रूप से तैयार रहना होगा। ब्रह्म कुंड से प्रेत पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए लगभग 676 सीढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है।
- **अकाल मृत्यु के मामलों में:** यदि परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु सड़क दुर्घटना, जलने, आत्महत्या अथवा हत्या से हुई हो, तो उनके निमित्त प्रेतशिला पर विशेष विधान किया जाता है। इस अनुष्ठान के बाद ही अकाल मृत्यु से जुड़े सूतक के नियमों का समापन माना जाता है।
- **परंपरा और रीति:** अनुष्ठान के पश्चात श्रद्धालुओं को तीन बार ताली बजाने, ठहाके लगाने और सत्तू उड़ाने की अनोखी रीत निभानी होती है। यह परंपरा शोक के निवारण और पूर्वजों की मुक्ति के उल्लास का प्रतीक मानी जाती है।
- **तिथियों का पालन:** पितृपक्ष के 16 दिनों के दौरान आश्विन कृष्ण प्रतिपदा का दिन प्रेतशिला, राम कुंड, रामशिला, ब्रह्म कुंड और कागबली वेदियों के लिए तय रहता है। श्रद्धालु इन वेदियों पर निर्धारित क्रम में ही तर्पण कार्य संपन्न करते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
प्रेतशिला पर अकाल मृत्यु से जुड़े पूर्वजों के पिंडदान और वहां निभाई जाने वाली अनूठी प्रथाओं के पीछे गरुड़ पुराण और लोक मान्यताओं में निहित विशिष्ट कारण मौजूद हैं।

- **अकाल मृत्यु और प्रेत योनि:** धार्मिक मान्यता के अनुसार सड़क दुर्घटना, जलने, हत्या या आत्महत्या जैसे कारणों से असमय प्राण त्यागने वाली आत्माएं मोह और तृष्णा के कारण प्रेत योनि में भटकती रहती हैं। गयाजी की प्रेतशिला पिंडवेदी को इन व्यथित आत्माओं के मोक्ष का एकमात्र सुनिश्चित द्वार माना जाता है।
- **दरारों से पिंड ग्रहण:** प्रेत पर्वत की चट्टानों में प्राकृतिक छिद्र और दरारें मौजूद हैं, जिनका संबंध परलोक से माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार पूर्वज इन्हीं दरारों के रास्ते उपस्थित होकर परिजनों द्वारा अर्पित जल और पिंड ग्रहण करते हैं।
- **ताली और हंसी का कारण:** सामान्यतः अकाल मृत्यु पर परिवार में रुदन और आंसुओं का वास होता है, किंतु प्रेतशिला पर पिंडदान से पूर्वज को तत्काल मुक्ति मिल जाती है। उनके मोक्ष प्राप्ति के हर्ष में परिजन तीन बार ताली बजाकर और ठहाका लगाकर अपनी खुशी प्रकट करते हैं।
- **सूतक काल और सत्तू का संबंध:** अकाल मृत्यु के उपरांत परिवार पर सूतक की छाया रहती है, जिसके कारण सत्तू का भोजन वर्जित माना जाता है। प्रेतशिला पर श्राद्ध कर्म पूर्ण होने के साथ ही यह प्रतिबंध समाप्त हो जाता है, जिसके प्रतीक स्वरूप पहाड़ पर सत्तू उड़ाया जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. गयाजी में पितृपक्ष मेले का आयोजन कब से कब तक हो रहा है?
गयाजी में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला 6 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक आयोजित किया जाता है।

### 2. प्रेतशिला वेदी पर पिंडदान किस तिथि को करने का विधान है?
पितृपक्ष मेले के तीसरे दिन यानी आश्विन कृष्ण प्रतिपदा को 8 सितंबर 2025 के दिन प्रेतशिला पर पिंडदान किया जाता है।

### 3. प्रेतशिला पर किन लोगों के निमित्त श्राद्ध करने का विशेष महत्व है?
सड़क दुर्घटना, आग, आत्महत्या या हत्या जैसी अकाल मृत्यु का शिकार होने वाले पूर्वजों की मुक्ति के लिए यहां श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है।

### 4. पिंडदान के बाद परिजन ताली बजाकर ठहाका क्यों लगाते हैं?
अकाल मृत्यु के शोक को समाप्त कर पूर्वजों के मोक्ष द्वार खुलने और उनकी आत्मा को शांति मिलने की खुशी जाहिर करने के लिए तीन बार ताली और ठहाका लगाया जाता है।

### 5. पहाड़ पर सत्तू क्यों उड़ाया जाता है?
अकाल मृत्यु के कारण लगे सूतक में सत्तू खाना वर्जित होता है, जो पिंडदान के बाद समाप्त होता है; इसी उपलक्ष्य में पूर्वजों की तृप्ति के लिए सत्तू उड़ाया जाता है।

### 6. प्रेतशिला पर्वत पर पहुंचने के लिए कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं?
प्रेतशिला पर्वत की तलहटी में स्थित ब्रह्म कुंड से शिखर तक पहुंचने के लिए तीर्थयात्रियों को लगभग 676 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं।

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