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  "title": "गोंडा के भैरवनाथ मंदिर में इमली के पेड़ में कील ठोकने से दूर होता है दांत का दर्द, हर धर्म के लोग पहुंचते हैं कर्नलगंज",
  "summary": "उत्तर प्रदेश के गोंडा स्थित भैरवनाथ मंदिर परिसर में मौजूद सैकड़ों साल पुराने इमली के पेड़ में कील गाड़कर दांत दर्द से राहत पाने की अनोखी परंपरा आज भी जारी है। मंगलवार और रविवार को यहां विभिन्न जिलों और अन्य राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के कर्नलगंज क्षेत्र में एक अनोखी आस्था देखने को मिलती है, जहां लोग दांत के गंभीर दर्द से निजात पाने के लिए किसी क्लिनिक के बजाय एक प्राचीन इमली के पेड़ के पास पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस पेड़ की लकड़ी में लोहे की कील ठोक देने से दांतों की तकलीफ पूरी तरह गायब हो जाती है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के चलते दूर-दराज के इलाकों से लोग इस स्थान की ओर खिंचे चले आते हैं।\n\nब्रिटिश कालीन इमली का वृक्ष और भैरवनाथ मंदिर की मान्यता\nयह अनोखा पेड़ कर्नलगंज में स्थित प्रसिद्ध भैरवनाथ मंदिर के परिसर में मौजूद है। मंदिर के महंत रमाशंकर गिरी के अनुसार, यह इमली का पेड़ कई पीढ़ियों पुराना है और इसका इतिहास ब्रिटिश शासन काल से जुड़ा हुआ है। अब तक सैकड़ों लोग इस पेड़ के तने में कीलें गाड़ चुके हैं। मंदिर आने वाले कई पीड़ितों का दावा है कि इस साधारण से दिखने वाले पारंपरिक उपाय को अपनाने के तुरंत बाद उनके दांतों की असहनीय पीड़ा शांत हो गई।\n\nव्यक्तिगत उपस्थिति और कील ठोकने का विशेष नियम\nइस अनुष्ठान को लेकर एक कड़ा नियम यह है कि पीड़ित व्यक्ति को स्वयं मंदिर परिसर में उपस्थित होना अनिवार्य होता है। महंत रमाशंकर गिरी स्पष्ट करते हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के नाम पर कील भेजकर राहत नहीं पा सकता है। जिस व्यक्ति को दांत में दर्द की समस्या है, उसे खुद कर्नलगंज आना पड़ता है। वहां आने पर पीड़ित अपने दांत से लोहे की कील को स्पर्श कराता है और फिर बाबा बटुक भैरव का ध्यान करते हुए अपने ही हाथों से उस कील को इमली के तने में ठोक देता है।\n\nमंगलवार और रविवार को जुटती है भारी भीड़\nइस अनुष्ठान के लिए सप्ताह के दो दिन विशेष रूप से तय हैं। दांत दर्द से ग्रसित लोग मंगलवार और रविवार के दिन मंदिर पहुंचते हैं। महंत द्वारा झाड़-फूंक की प्रक्रिया पूरी कराने के बाद पीड़ित से पेड़ में कील गड़वाई जाती है। इस उपाय के लिए केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि अयोध्या, बनारस, प्रयागराज, बस्ती, श्रावस्ती, गोरखपुर, बलरामपुर, बहराइच समेत कई अन्य पड़ोसी जिलों और अन्य राज्यों से भी लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।\n\nगंगा-जमुनी तहजीब और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक\nकर्नलगंज का यह भैरवनाथ मंदिर सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का भी अद्भुत उदाहरण पेश करता है। महंत रमाशंकर गिरी बताते हैं कि इस इमली के पेड़ पर केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग भी गहरी आस्था रखते हैं। दांतों की बीमारी से पीड़ित मुस्लिम और सिख श्रद्धालु भी मंदिर पहुंचते हैं और पूरे विश्वास के साथ बाबा बटुक भैरव का स्मरण करते हुए कील ठोकने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह परंपरा स्थानीय मान्यताओं और पारंपरिक उपचार के प्रति लोगों के गहरे विश्वास को दर्शाती है।\n\n• उत्तर प्रदेश में: गोंडा के कर्नलगंज में स्थित यह स्थल पूर्वांचल और अवध क्षेत्र के जिलों के लिए एक प्रमुख आस्था केंद्र बना हुआ है। मंगलवार और रविवार को मंदिर जाने वाले श्रद्धालु भीड़ को ध्यान में रखकर अपनी यात्रा की योजना बना सकते हैं।\n• भारत में: देश के विभिन्न हिस्सों से लोग इस पारंपरिक आस्था को देखने और आजमाने पहुंचते हैं। हालांकि गंभीर दंत संक्रमण या जटिल बीमारियों के लिए चिकित्सकीय परामर्श लेना भी आवश्यक माना जाता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह अनोखी परंपरा सदियों पुरानी लोक मान्यताओं और स्थानीय धार्मिक आस्था के संयोजन से संचालित होती है। स्थानीय लोग लंबे समय से इसे चमत्कारिक राहत का माध्यम मानते रहे हैं।\n\n• धार्मिक और पारंपरिक विश्वास: मंदिर के परिसर में स्थित ब्रिटिश कालीन इमली के वृक्ष को दैवीय शक्तियों से युक्त माना जाता है। मान्यता है कि बाबा बटुक भैरव के स्मरण और कील गाड़ने से नकारात्मक दर्द शरीर से निकलकर पेड़ में समा जाता है।\n• पीढ़ियों से जारी प्रथा: सैकड़ों वर्षों से स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे के अनुभवों को सुनकर इस पर विश्वास बनाए रखा है। ब्रिटिश काल से चले आ रहे इस सिलसिले के चलते यह आज भी कर्नलगंज की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दांत के दर्द के लिए इमली का यह पेड़ किस स्थान पर स्थित है?\nयह पेड़ उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के कर्नलगंज स्थित भैरवनाथ मंदिर परिसर में मौजूद है।\n\n2. इस इमली के पेड़ में कील ठोकने का अनुष्ठान किन दिनों किया जाता है?\nयह अनुष्ठान मुख्य रूप से सप्ताह में दो दिन, मंगलवार और रविवार को आयोजित होता है।\n\n3. क्या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से कील भिजवाई जा सकती है?\nनहीं, नियम के अनुसार जिस व्यक्ति को दांत में दर्द है, उसे स्वयं आकर अपने हाथों से कील ठोकनी पड़ती है।\n\n4. यह परंपरा कितनी पुरानी बताई जाती है?\nमंदिर के महंत रमाशंकर गिरी के अनुसार यह पेड़ ब्रिटिश शासन काल से जुड़ा हुआ है और यह प्रथा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।",
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  "category": "अध्यात्म",
  "publishedAt": "2026-09-30",
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