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  "title": "जीवित्पुत्रिका व्रत 2026: संतान की दीर्घायु का निर्जला संकल्प, जानें नवमी पर पारण का मुहूर्त और पूजा विधान",
  "summary": "आश्विन कृष्ण नवमी को संपन्न होने वाले जीवित्पुत्रिका व्रत के पारण समय, भगवान जीमूतवाहन की आराधना और पारंपरिक सात्विक भोजन के नियमों की पूरी जानकारी।",
  "content": "हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण संपन्न होता है। इस पावन अवसर पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, निरोगी काया और पारिवारिक समृद्धि की कामना से पूरे समर्पण के साथ निर्जला उपवास रखती हैं। धार्मिक परंपराओं में इस साधना को जिउतिया या जीवित पुत्र व्रत के नाम से भी पुकारा जाता है। कठिन तप और संयम के बाद अगले दिन विधिवत पूजा और दान-पुण्य करके व्रत का समापन किया जाता है, जिसे पारण कहा जाता है। नवमी तिथि के निर्धारित शुभ समय में नियमों का पालन करते हुए पारण करना शास्त्र सम्मत और अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।\n\nपारण का समय और पंचांगीय गणना\nपंचांग के विवरण के अनुसार जितिया व्रत का पारण आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि यानी 4 अक्टूबर दिन रविवार को किया जाएगा। समय की गणना के संदर्भ में पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद निर्धारित है, जबकि एक अन्य समयावधि के तहत 4 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 28 मिनट के बाद पारण करने का विधान बताया गया है। इस दिन मातृ नवमी का श्राद्ध भी पितृपक्ष के अंतर्गत संपन्न किया जाएगा। व्रत रखने वाली माताओं के लिए यह आवश्यक माना जाता है कि वे पंचांगीय समय सीमा का सम्मान करते हुए शुभ मुहूर्त के पश्चात ही अपना निर्जला उपवास समाप्त करें।\n\nप्रातःकाल की पूजा और पारंपरिक विधि-विधान\nपारण के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यकर्म और स्नान ध्यान करने का विशेष महत्व है। शुद्ध वस्त्र धारण करने के पश्चात सर्वप्रथम घर के पूजा स्थल की संपूर्ण स्वच्छता सुनिश्चित करनी चाहिए। इसके उपरांत भगवान जीमूतवाहन का ध्यान करते हुए उनके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित किया जाता है। भक्तिभाव से विधिवत पूजा-अर्चना आरंभ करते हुए कुल परंपरा के अनुसार देव प्रतिमा को ताजे फल, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। पूजन संपन्न होने के बाद सबसे पहले परिवार के सभी सदस्यों को जीवित्पुत्रिका व्रत का प्रसाद बांटा जाता है, जिसके बाद ही व्रती महिलाएं आगे की प्रक्रिया पूरी करती हैं।\n\nपारंपरिक भोजन और सात्विक आहार के नियम\nधार्मिक मान्यताओं के अनुसार पारण की शुरुआत सबसे पहले पवित्र जल ग्रहण करके की जाती है। जल पीने के बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करने की परंपरा निभाई जाती है। कई परिवारों में पारण के विशेष भोजन के रूप में नोनी का साग और तोरी की सब्जी पकाने का प्राचीन रिवाज है। इसके अतिरिक्त कई स्थानों पर ताजे मौसमी फल, दूध और सुपाच्य सात्विक भोजन से व्रत खोलने का प्रचलन देखा जाता है। पूरे दिन के कड़े निर्जला उपवास के पश्चात शरीर के संतुलन को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक तला-भुना या गरिष्ठ भोजन खाने से परहेज करने की सलाह दी जाती है, जिससे स्वास्थ्य उत्तम बना रहे।\n\nदान-पुण्य और बड़ों का शुभाशीष\nभोजन ग्रहण करने से पूर्व परोपकार और दान का विधान पूरा करना अनिवार्य माना गया है। व्रती महिलाएं पारण से पहले किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार शुद्ध अन्न, वस्त्र, अनाज और दक्षिणा भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसके साथ ही भगवान जीमूतवाहन और अपने कुल के इष्टदेव का स्मरण किया जाता है। भोजन की थाली स्वीकार करने से पहले घर के वरिष्ठ सदस्यों और बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका शुभाशीष लिया जाता है। यह परंपरा आदर, कृतज्ञता और पारिवारिक सद्भाव को सुदृढ़ करती है।\n\nभौगोलिक विस्तार और आध्यात्मिक मान्यता\nजीवित्पुत्रिका व्रत का उत्सव विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक आस्था के अनुसार भगवान जीमूतवाहन की कृपा से बच्चों पर मंडराने वाले संकट टल जाते हैं और संतान का जीवन सुरक्षित रहता है। यह पर्व मातृत्व के असीम प्रेम, त्याग और समर्पण की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है, जहां माताएं अपनी संतानों के कल्याण हेतु स्वयं कठिन शारीरिक तप करती हैं।\n\nइसका आप पर असर\nजितिया व्रत के पारण समय और नियमों की जानकारी से व्रती महिलाओं को समय पर उपवास संपन्न करने में सहायता मिलती है।\n\n• पारण का सटीक समय: उपवास का समापन 4 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 32 मिनट अथवा 7 बजकर 28 मिनट के बाद ही करें। समय से पहले पारण करने से व्रत का पूर्ण फल बाधित होने की मान्यता है।\n• आहार का चयन: निर्जला उपवास के बाद सबसे पहले जल ग्रहण करें और फिर हल्का सात्विक भोजन लें। गरिष्ठ और तला-भुना खाना तुरंत खाने से पेट और पाचन पर बुरा असर पड़ सकता है।\n• पारंपरिक सब्जियों की उपलब्धता: पारण में प्रयुक्त होने वाले नोनी साग और तोरी की व्यवस्था पहले से कर लें। कई क्षेत्रों में यह पारंपरिक प्रसाद पारण के लिए अनिवार्य माना जाता है।\n• दान और दक्षिणा: भोजन ग्रहण करने से पूर्व ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को अनाज, वस्त्र और दक्षिणा अर्पित करें। इससे परिवार में शुभता और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।\n• पारिवारिक परंपरा: अपने कुल और क्षेत्र के रिवाजों का पालन करते हुए बड़ों के चरण स्पर्श करें। यह नियम नई पीढ़ी को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़े रखता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nजितिया व्रत का पारण आश्विन कृष्ण नवमी तिथि के आगमन पर निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाता है। निर्जला तप की समाप्ति के लिए शास्त्रों में शुभ मुहूर्त और विधि-विधान तय किए गए हैं।\n\n• पंचांगीय नवमी तिथि: अष्टमी के निर्जला व्रत के बाद पारण नवमी तिथि लगने पर ही शास्त्र सम्मत माना जाता है। तिथि का सही चक्र पूरा होने पर 4 अक्टूबर को सुबह यह समय प्राप्त हो रहा है।\n• धार्मिक विधान और मान्यता: भगवान जीमूतवाहन की विधिवत आराधना और नैवेद्य समर्पण के बाद ही उपवास खोलने का नियम है। पूजन और संकल्प पूरा किए बिना भोजन ग्रहण करना वर्जित माना गया है।\n• पितृपक्ष और मातृ नवमी: इसी दिन मातृ नवमी का श्राद्ध भी पड़ता है, जिससे पितरों और कुलदेवताओं के तर्पण व दान का विशेष महत्व जुड़ जाता है। इस कारण पारण से पूर्व दान देना आवश्यक हो जाता है।\n• शरीर की शुद्धि और परंपरा: 24 घंटे से अधिक के निर्जला उपवास के बाद जल, नोनी साग और सात्विक आहार द्वारा शरीर को पुनः ऊर्जावान बनाने की प्राचीन स्वास्थ्य परंपरा रही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जितिया व्रत का पारण किस तारीख को किया जाएगा?\nजितिया व्रत का पारण आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि यानी 4 अक्टूबर दिन रविवार को किया जाएगा।\n\n2. जितिया व्रत के पारण का शुभ समय क्या है?\nपारण का शुभ समय 4 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद है, जबकि एक अन्य उल्लेख के अनुसार यह सुबह 7 बजकर 28 मिनट के बाद किया जाएगा।\n\n3. इस व्रत में किस देवता की पूजा की जाती है?\nजीवित्पुत्रिका व्रत के दौरान माताएं अपनी संतान की रक्षा और मंगल के लिए भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करती हैं।\n\n4. पारण के दिन भोजन में कौन सी पारंपरिक चीजें शामिल की जाती हैं?\nपारण के दिन सबसे पहले जल ग्रहण किया जाता है और कई घरों में नोनी साग, तोरी की सब्जी, फल, दूध और सात्विक आहार खाने की परंपरा है।\n\n5. जितिया व्रत मुख्य रूप से किन क्षेत्रों में मनाया जाता है?\nयह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में पारंपरिक आस्था के साथ मनाया जाता है।\n\n6. पारण करने से पहले क्या दान करना चाहिए?\nपारण से पूर्व ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी श्रद्धानुसार भोजन, वस्त्र, अनाज और दक्षिणा देकर आशीर्वाद लेना चाहिए।",
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  "category": "अध्यात्म",
  "publishedAt": "2026-10-04",
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    "जीवित्पुत्रिका व्रत",
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