# पूर्वजों के स्वागत में घर की देहरी पर जलाएं गूंथे आटे का दीपक, जानिए पितरों की तृप्ति से जुड़ी परंपरा

> पितृपक्ष के 16 दिनों में मुख्य द्वार पर आटे का दीपक प्रज्वलित करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख, समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

**Type:** article · **Category:** अध्यात्म · **Published:** 2026-10-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/spirituality/purvajon-ke-svagata-men-ghara-ki-dehari-para-jalaen-gunthe-ate-ka-dipaka-janie-pitaron-ki-tripti-se-juri-parnpara-45615 · **Language:** Hindi
**Tags:** पितृपक्ष, आटे का दीपक, श्राद्ध कर्म, पितर तर्पण, हिंदू परंपरा, मुख्य द्वार

हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दिनों को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इन 16 दिनों की अवधि में श्राद्ध कर्म, दान और विशेष अनुष्ठानों का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों में किया गया एक छोटा सा धार्मिक कार्य भी परिवार के जीवन में बड़ी खुशहाली ला सकता है। इन्हीं परंपराओं में से एक प्रमुख परंपरा घर की चौखट पर आटे का दीपक जलाने की है, जिसे पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति और घर में सकारात्मक ऊर्जा के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

## पंचभौतिक शरीर के बाद सूक्ष्म शरीर की तृप्ति का आधार
धार्मिक मान्यताओं की व्याख्या करते हुए महंत स्वामी कामेश्वरानंद वेदांताचार्य ने बताया कि मनुष्य के देहावसान के उपरांत उसका पंचभौतिक शरीर, जो मांस और हड्डियों से निर्मित होता है, अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है। इस अंतिम संस्कार के बाद आत्मा का एक सूक्ष्म शरीर शेष रहता है, जिसे शास्त्रों में प्रेत शरीर भी कहा गया है। इस सूक्ष्म शरीर की भूख और प्यास को शांत करने तथा उसे पूर्ण तृप्ति प्रदान करने के लिए आटे से बने पिंड अर्पित करने की विशेष प्रक्रिया की जाती है। यही कारण है कि इस पूरी अवधि में आटे से तैयार किए गए दीपक को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि आटा सीधे तौर पर पिंड स्वरूप से जुड़ा हुआ है।

## मिट्टी के दीये से अधिक क्यों भाता है आटे का दीपक
अक्सर पूजा-पाठ में मिट्टी के दीयों का उपयोग किया जाता है, परंतु पितृपक्ष के दौरान आटे का दीपक जलाना विशेष फलदायी माना गया है। महंत स्वामी कामेश्वरानंद के अनुसार, मिट्टी के दीपक की तुलना में पूर्वज आटे के दीपक से अधिक संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि गूंधे हुए नरम आटे को पिंडदान के स्वरूप के रूप में देखा जाता है, जो पितरों के सूक्ष्म स्वरूप को अत्यधिक प्रिय होता है। जब वंशज प्रेम और श्रद्धा के साथ आटे का पात्र बनाकर उसमें ज्योति प्रज्वलित करते हैं, तो पूर्वज इसे अपने सम्मान और सत्कार के रूप में स्वीकार करते हैं।

## दीपक प्रज्वलित करने का सही समय, दिशा और स्थान
दीपक जलाने की विधि और नियमों के संदर्भ में महंत स्वामी कामेश्वरानंद का कहना है कि यह दीप संध्याकाल के समय जलाना सबसे उत्तम रहता है। स्थान के चयन की बात करें तो इसे सदैव घर के मुख्य द्वार पर ही रखा जाना चाहिए। यदि दिशा की बात की जाए, तो दीपक की लौ का मुख पूरब या उत्तर दिशा की ओर रखना सबसे अधिक शुभ माना गया है। हालांकि, यदि किसी मकान के मुख्य प्रवेश द्वार की बनावट अथवा स्थिति किसी अन्य दिशा में है, तो बिना किसी संशय के द्वार के पास उपलब्ध स्थान पर ही दीपक प्रज्वलित किया जा सकता है।

## पारिवारिक शांति और वंश वृद्धि से जुड़ी मान्यताएं
मान्यताओं के अनुसार, भादो पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक पितर अपने वंशजों से मिलने धरती पर उनके घर-आंगन तक आते हैं। ऐसे में मुख्य द्वार पर जलाया गया दीपक उनके मार्ग को आलोकित करता है और उनका स्वागत करता है। इस दीपक की लौ न केवल अंधकार को मिटाती है, बल्कि घर से कलह और नकारात्मकता को समाप्त कर सकारात्मक वातावरण बनाती है। इसके प्रभाव से दांपत्य जीवन में मिठास आती है, परिवार में सुख-शांति का वास होता है और वंश वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। यही वजह है कि आज भी श्रद्धालु पूरी निष्ठा के साथ इस परंपरा का निर्वहन करते हैं।

## इसका आप पर असर
घर के मुख्य द्वार पर आटे का दीपक जलाने की परंपरा से परिवार के आध्यात्मिक माहौल और दैनिक शांति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

- **मानसिक और पारिवारिक शांति:** संध्या समय दीपक प्रज्वलित करने से घर से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। इससे परिजनों के आपसी मतभेद दूर होते हैं और दांपत्य जीवन में मधुरता बढ़ती है।
- **आध्यात्मिक संतुष्टि:** पितृपक्ष में पूर्वजों के निमित्त यह अनुष्ठान करने से मन को शांति मिलती है। यह सरल उपाय महंगे कर्मकांडों के बिना भी पितरों के प्रति आदर प्रकट करने का सहज अवसर देता है।
- **परंपरा का पालन:** परिवार में इस अनुष्ठान को नियमित करने से सांस्कृतिक मूल्यों का संवहन होता है। नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की इस रीति को सरलता से समझ पाती है।
- **दिशा और समय का ध्यान:** शाम के वक्त घर के मुख्य द्वार पर पूरब या उत्तर मुखी दीपक रखना चाहिए। यदि द्वार किसी अन्य दिशा में है, तो बिना संकोच देहरी पर ही इसे स्थापित करना पर्याप्त है।

## ऐसा क्यों हुआ
पितृपक्ष के दौरान आटे का दीपक जलाने की परंपरा के पीछे गरुड़ पुराण और हिंदू मान्यताओं से जुड़े गहरे दार्शनिक कारण विद्यमान हैं।

- **सूक्ष्म शरीर की आवश्यकता:** दाह संस्कार के बाद व्यक्ति का भौतिक शरीर समाप्त हो जाता है और केवल सूक्ष्म शरीर रह जाता है। इस सूक्ष्म शरीर की तृप्ति के लिए अन्न और विशेषकर आटे के पिंड की आवश्यकता मानी गई है।
- **पिंड स्वरूप का प्रतीक:** मिट्टी की तुलना में आटे को सीधे तौर पर पिंड का रूप स्वीकार किया गया है। इसलिए गूंथे हुए आटे का पात्र बनाकर उसमें ज्योति जलाना पूर्वजों के सूक्ष्म रूप को अधिक तृप्त करता है।
- **धरती पर पूर्वजों का आगमन:** भादो पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक पूर्वज अपने वंशजों के द्वार तक आते हैं। उनके स्वागत और मार्ग को आलोकित करने के लिए देहरी पर दीप प्रज्वलित करने की रीत आरंभ हुई।

## सवाल-जवाब

### 1. पितृपक्ष में आटे का दीपक क्यों जलाया जाता है?
मृत्यु के बाद आत्मा के सूक्ष्म शरीर की तृप्ति के लिए आटे के पिंड की आवश्यकता होती है, इसलिए आटे का दीपक पूर्वजों को अधिक प्रिय माना गया है।

### 2. दीपक किस स्थान पर रखना सबसे शुभ माना जाता है?
दीपक को हमेशा घर के मुख्य द्वार पर रखना चाहिए, जिससे पूर्वजों का स्वागत हो सके।

### 3. दीपक जलाने के लिए कौन सा समय सबसे उत्तम है?
महंत स्वामी कामेश्वरानंद के अनुसार, यह दीपक शाम के समय यानी गोधूलि बेला में जलाना सबसे उत्तम रहता है।

### 4. दीपक की लौ का मुख किस दिशा में होना चाहिए?
दीपक का मुख पूरब या उत्तर दिशा की ओर रखना सबसे शुभ माना जाता है, हालांकि मुख्य द्वार की दिशा के अनुसार भी इसे रखा जा सकता है।

### 5. मिट्टी के दीये की तुलना में आटे का दीया क्यों बेहतर माना गया है?
आटे को पिंड का स्वरूप माना जाता है, इसलिए नरम आटे से बना दीपक पूर्वजों के सूक्ष्म शरीर को अधिक तृप्त करता है।

### 6. पितृपक्ष की अवधि कब से कब तक मानी जाती है?
भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक के कुल 16 दिनों की अवधि को पितृपक्ष कहा जाता है।

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