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  "title": "साध्य, शुभ और रवि तीन योगों के दुर्लभ संयोग में आज मनाया जा रहा शनि का प्रदोष व्रत, यहां जानें पूरी पूजा विधि",
  "summary": "आज शनिवार को शनि प्रदोष व्रत साध्य योग, शुभ योग और रवि योग के दुर्लभ त्रिसंयोग में मनाया जा रहा है। शाम 7 बजकर 4 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक के शुभ मुहूर्त में शिव-पार्वती की विधिपूर्वक पूजा से शनि दोष के कष्टों से मुक्ति और जीवन में सुख-शांति मिलती है।",
  "content": "हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का अपना विशेष स्थान है, और जब यह व्रत शनिवार को पड़ता है तो उसे शनि प्रदोष कहते हैं। इस बार शनि प्रदोष व्रत साध्य योग, शुभ योग और रवि योग के दुर्लभ त्रिसंयोग में मनाया जा रहा है। ये तीनों शुभ योग एक साथ पड़ने से आज के दिन का धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ गया है। श्रद्धालु आज प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना कर अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति और शनिदेव की अनुकंपा पाने की कामना कर रहे हैं।\n\nशनि प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व\nधार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल यानी संध्याकाल भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस बेला में की गई आराधना का फल बाकी समय की तुलना में कहीं अधिक फलदायी मानी जाती है। शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत शनि ग्रह से जुड़े दुष्प्रभावों को शांत करने में विशेष रूप से सहायक माना जाता है। जो लोग साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि दोष के दौर से गुजर रहे हैं, उनके लिए इस दिन भगवान शिव का अभिषेक, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप करना मानसिक बल और आत्मिक शांति देने वाला होता है।\n\nमान्यता है कि इस दिन की पूजा से जीवन में आने वाली बाधाएं टलती हैं, रोग-शोक से राहत मिलती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इसके पीछे एक गहरी आस्था यह भी है कि शनिदेव स्वयं भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं। इसीलिए शिव की कृपा से शनिदेव भी प्रसन्न होते हैं। यही वजह है कि शनि प्रदोष पर शिव पूजा के साथ-साथ शनिदेव की भी आराधना का विशेष महत्व बताया गया है।\n\nत्रयोदशी तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त\nइस वर्ष त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 27 जून को प्रातः 10 बजकर 22 मिनट पर हो रहा है। इसका समापन 28 जून की रात 12 बजकर 43 मिनट पर होगा। प्रदोष काल को ध्यान में रखते हुए शनि प्रदोष व्रत आज किया जा रहा है।\n\nआज पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 4 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक रहेगा। इसी अवधि में भगवान शिव की आराधना करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।\n\nशनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि\nइस व्रत पर प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन सात्विक भोजन का पालन करें अथवा अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुसार उपवास रखें।\n\nप्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और नंदी महाराज की पूजा करें। शिवलिंग का अभिषेक गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शुद्ध जल से करें। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, सफेद चंदन, भस्म और मौसमी फल अर्पित करें।\n\nपूजा के दौरान ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते रहें। शिव चालीसा, रुद्राष्टकम या शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना भी इस दिन विशेष शुभ फल देता है। पूजा के अंत में घी का दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य एवं मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें। शनिवार होने के कारण शनिदेव के समक्ष तिल के तेल का दीपक जलाना भी इस दिन विशेष लाभकारी रहता है।\n\nशनि प्रदोष व्रत के मंत्र\nइस व्रत पर निम्नलिखित मंत्रों का जाप करना शुभ फल देने वाला है:\n\n• ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः सोमाय नमः\n• ऊँ ऐं ह्रीं शिव-गौरीमय-ह्रीं ऐं ऊँ\n• ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥\n• शिवाय नमस्तुभ्यं प्रदोषं पूजितं मया। क्षमस्व अपराधं मे करुणासागर प्रभो॥\n\nशिव आरती\nपूजा के समापन पर भगवान शिव की आरती करना अनिवार्य माना जाता है। यहां प्रस्तुत है संपूर्ण शिव आरती:\n\nॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nहंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\nदो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nत्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\nश्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nकर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nपर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nजटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nकाशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nत्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ॐ जय शिव ओंकारा॥\n\nइसका आप पर असर\n• श्रद्धालुओं के लिए: आज शाम 7 बजकर 4 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक का समय शिव पूजन के लिए सबसे शुभ है। इस अवधि में अभिषेक और मंत्र जाप करने से अधिकतम आध्यात्मिक लाभ मिल सकता है।\n• शनि दोष और साढ़ेसाती से पीड़ितों के लिए: तीन शुभ योगों के एकसाथ बनने से यह प्रदोष व्रत शनि ग्रह के कष्टों से राहत पाने का दुर्लभ अवसर है, इसलिए आज की पूजा विशेष रूप से लाभकारी रहेगी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. शनि प्रदोष व्रत 2026 कब है?\nशनि प्रदोष व्रत आज मनाया जा रहा है। त्रयोदशी तिथि 27 जून को सुबह 10 बजकर 22 मिनट पर शुरू होकर 28 जून की रात 12 बजकर 43 मिनट पर समाप्त होगी।\n\n2. शनि प्रदोष व्रत पर पूजा का सही समय क्या है?\nपूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 4 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक है। इसी समय के भीतर शिव पूजन करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।\n\n3. इस बार शनि प्रदोष पर कौन से शुभ योग बन रहे हैं?\nइस बार साध्य योग, शुभ योग और रवि योग का दुर्लभ त्रिसंयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ गया है।\n\n4. शिवलिंग का अभिषेक किन सामग्रियों से करना चाहिए?\nशिवलिंग का अभिषेक गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शुद्ध जल से करना चाहिए। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, सफेद चंदन, भस्म और मौसमी फल अर्पित करें।\n\n5. शनि प्रदोष व्रत क्यों रखा जाता है?\nयह व्रत भगवान शिव की कृपा और शनिदेव का आशीर्वाद पाने के लिए रखा जाता है। इससे शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या के दुष्प्रभाव कम होते हैं और जीवन में बाधाएं दूर होती हैं।\n\n6. शनि प्रदोष पर शनिदेव की पूजा क्यों जरूरी है?\nशनिदेव स्वयं भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं, इसलिए शिव की पूजा से शनिदेव भी प्रसन्न होते हैं। शनिवार होने के कारण तिल के तेल का दीपक जलाना विशेष शुभ माना जाता है।\n\n7. शनि प्रदोष व्रत पर कौन से मंत्रों का जाप करें?\n'ॐ नमः शिवाय', महामृत्युंजय मंत्र 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...' और 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः सोमाय नमः' मंत्रों का जाप इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है।",
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  "category": "अध्यात्म",
  "publishedAt": "2026-06-27",
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