समुद्र मंथन के विषपान से जुड़ा है सावन का रहस्य, जानिए क्यों इस माह होती है शिवजी की विशेष आराधना सावन के पावन महीने में भगवान शिव की विशेष पूजा और जलाभिषेक की परंपरा सदियों पुरानी पौराणिक कथाओं और समुद्र मंथन के विषपान प्रसंग से गहराई से जुड़ी हुई है। हिंदू पंचांग में यूं तो साल के सभी बारह महीनों का अपना धार्मिक महत्व होता है, लेकिन सावन के महीने को देवाधिदेव महादेव की भक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस पूरे महीने में देश भर के शिवालयों में भक्तों का भारी तांता लगा रहता है, जहां लोग शिवलिंग पर गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित करके अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। कई श्रद्धालुओं के मन में अक्सर यह जिज्ञासा उठती है कि केवल सावन के महीने में ही भगवान शंकर की इतनी सघन और विशिष्ट पूजा अर्चना का विधान क्यों तय किया गया है। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक आख्यानों में इस परंपरा के पीछे गहरा आध्यात्मिक और तार्किक कारण छिपा हुआ मिलता है। कालकूट विष और नीलकंठ बनने की पौराणिक कथा धार्मिक परंपराओं के अनुसार सावन में महादेव की पूजा का सीधा संबंध समुद्र मंथन की घटना से जुड़ा हुआ है। अयोध्या के पुरोहित पंडित कल्कि राम इस संदर्भ में बताते हैं कि जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर में मंथन चल रहा था, तब अमृत से पहले अत्यंत तीव्र और संहारक कालकूट विष बाहर निकला था। इस विष की भयंकर ज्वाला और विषैले प्रभाव से समस्त ब्रह्मांड में त्राहि-त्राहि मच गई थी तथा तीनों लोकों के प्राणी व्याकुल होने लगे थे। उस समय सृष्टि के किसी भी देवी-देवता के पास उस विनाशकारी विष के प्रभाव को समाप्त करने का कोई उपाय नहीं था। सृष्टि पर आए इस विकट संकट को देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि भगवान शंकर की शरण में पहुंचे और उनसे लोकरक्षा की प्रार्थना की। लोककल्याण के संकल्प को दोहराते हुए भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के उस पूरे कालकूट विष को अपनी हथेली पर रखकर पी लिया। विष की दाहक शक्ति को अपनी देह के भीतर जाने से रोकने के लिए भोलेनाथ ने उसे अपने कंठ में ही स्थिर कर लिया। इस तीव्र विष के प्रभाव से भगवान शंकर का गला पूरी तरह से नीला पड़ गया, जिसके बाद से संपूर्ण जगत में उन्हें नीलकंठ के नाम से पुकारा जाने लगा। इंद्र देव की वर्षा और शीतल औषधियों का अर्पण पंडित कल्कि राम के अनुसार विष को गले में धारण करने के बाद भगवान शिव उसके अत्यंत तीव्र ताप से असहज होने लगे थे। महादेव की उस व्याकुलता को देखकर देवराज इंद्र ने बादलों को आदेश देकर मूसलाधार जलवर्षा शुरू करवाई ताकि उनके शरीर को शीतलता मिल सके। इसके साथ ही उपस्थित शिवगणों और देवताओं ने विष के दाहक प्रभाव को कम करने के लिए शीतल तासीर वाली वनस्पतियां जैसे भांग, धतूरा, बेलपत्र और विशेष पुष्प उन्हें अर्पित करना आरंभ कर दिया। इन ठंडी औषधियों और निरंतर जलवर्षा के संयुक्त प्रभाव से धीरे-धीरे भोलेनाथ के शरीर का ताप शांत हुआ। यह सारा दिव्य घटनाक्रम सावन मास के प्रारंभ में घटित हुआ था। इसी कारण सभी देवताओं ने पूरे एक महीने तक लगातार भगवान शिव का जलाभिषेक किया और उन्हें शांति पहुंचाने के लिए भांग, धतूरा और बेलपत्र चढ़ाते रहे। देवताओं द्वारा की गई इस निस्वार्थ सेवा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें वरदान दिया कि जो भी भक्त सावन के पावन दिनों में उन्हें श्रद्धापूर्वक यह पूजन सामग्री अर्पित करेगा, उसे जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलेगी और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होगी। तभी से सावन मास में भगवान शिव की आराधना और रुद्राभिषेक की यह अखंड परंपरा निरंतर चली आ रही है। इसका आप पर असर सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना की परंपरा करोड़ों श्रद्धालुओं के दैनिक जीवन, धार्मिक अनुष्ठानों और खान-पान के नियमों को सीधे प्रभावित करती है। • दैनिक पूजा पद्धति: इस महीने भक्त सुबह जल्दी स्नान करके शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन नियमों का पालन करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। • सात्विक जीवनशैली: सावन के दौरान अधिकांश श्रद्धालु मांसाहार और तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग करते हैं। कई लोग पूरे महीने अथवा प्रत्येक सोमवार को उपवास रखकर सात्विक फलाहार पर निर्भर रहते हैं। • तीर्थयात्रा और कांवड़ यात्रा: लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हुए ज्योतिर्लिंगों और स्थानीय शिवालयों तक पहुंचते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर परिवहन, सुरक्षा व्यवस्था और धार्मिक बाजारों में भारी चहल-पहल बढ़ जाती है। • पारिवारिक सुख-शांति: श्रद्धालु अपने घरों में रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का अनुष्ठान करवाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और पारिवारिक जीवन में सुख समृद्धि आती है। ऐसा क्यों हुआ सावन के महीने में शिव पूजन का विशेष विधान समुद्र मंथन की पौराणिक कथा और भगवान शिव द्वारा किए गए विषपान से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण आरंभ हुआ। • कालकूट विष का निष्कासन: समुद्र मंथन के दौरान जब अत्यंत संहारक कालकूट विष निकला तो समस्त संसार उसके ताप से जलने लगा था। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस पूरे विष को पीकर अपने कंठ में रोक लिया था। • दाहक ताप को शांत करने की आवश्यकता: विष के प्रभाव से महादेव का गला नीला पड़ गया और उनका शरीर तीव्र जलन से तपने लगा। इस भयंकर ताप से राहत दिलाने के लिए देवराज इंद्र ने वर्षा की और देवताओं ने शीतल औषधियां अर्पित कीं। • महादेव का मंगलकारी वरदान: लगातार एक महीने तक चले इस शीतलन उपचार से शांत होकर शिवजी ने सावन में यह पूजन सामग्री चढ़ाने वालों को शिवलोक देने का वरदान दिया। इसी कारण सावन का पूरा महीना भगवान भोलेनाथ की विशेष साधना के लिए समर्पित हो गया। सवाल-जवाब 1. सावन के महीने में भगवान शिव की विशेष पूजा क्यों की जाती है? पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय भगवान शिव ने कालकूट विष पिया था और देवताओं ने सावन भर उन पर जल और शीतल औषधियां चढ़ाकर उनके शरीर का ताप शांत किया था। 2. भगवान शिव को नीलकंठ क्यों कहा जाता है? कालकूट विष को शरीर के अंदर जाने से रोकने के लिए भोलेनाथ ने उसे अपने कंठ में ही रोक लिया था, जिसके तीव्र प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था। 3. सावन में शिवलिंग पर भांग, धतूरा और बेलपत्र क्यों चढ़ाया जाता है? इन सभी वनस्पतियों की तासीर ठंडी मानी जाती है, जिन्हें देवताओं ने विष के दाहक ताप को शांत करने के लिए भगवान शिव को अर्पित किया था। 4. भगवान शिव ने सावन में पूजा करने वाले भक्तों को क्या वरदान दिया था? महादेव ने देवताओं को वरदान दिया था कि सावन मास में जो भी भक्त उन्हें पुष्प, भांग, धतूरा और बेलपत्र अर्पित करेगा, उसे शिवलोक की प्राप्ति होगी। https://trendkia.com/spirituality/samudra-mnthana-ke-vishapana-se-jura-hai-sawan-ka-rahasya-janie-kyon-isa-maha-hoti-hai-shivji-ki-vishesha-aradhana-50333 TrendKia — Har trend, sabse pehle.