शारदीय नवरात्रि में तिथियों के फेर से दूर करें उलझन, जानें महासप्तमी से दशहरा तक की सटीक तारीखें और पूजा मुहूर्त नवरात्रि में सप्तमी तिथि दो दिन पड़ने के कारण महाअष्टमी, महानवमी और विजयादशमी की तिथियों को लेकर पंचांग गणना स्पष्ट हो गई है। जानिए कन्या पूजन, संधि पूजा और शस्त्र पूजन का सटीक समय। नवरात्रि के नौ पावन दिनों में देवी दुर्गा के नौ अलग स्वरूपों की विधिवत आराधना की जाती है और भक्त उपवास रखकर शक्ति स्वरूपा माता का आशीष प्राप्त करते हैं। इन दिनों में चारों तरफ भक्ति का माहौल रहता है, देवी के पंडाल सजते हैं और अनेक स्थानों पर रामलीला का मंचन भी संपन्न होता है। हालांकि इस बार के शारदीय नवरात्र में तिथियों के चक्र को लेकर श्रद्धालुओं के मन में काफी संशय देखा जा रहा है। इसका मुख्य कारण सप्तमी तिथि का विस्तार दो दिनों तक होना है, जिसके चलते महाअष्टमी और महानवमी की तिथियों के निर्धारण पर चर्चा छिड़ गई है। पंचांग के स्पष्ट गणित के अनुसार, विजयादशमी यानी दशहरा का पावन पर्व 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को मनाया जाना पूरी तरह तय है, लेकिन उससे पूर्व सप्तमी, अष्टमी और नवमी के पूजन का समय अत्यंत ध्यान देने योग्य है। दो दिन रहेगी महासप्तमी, पंडालों में खुलेगी देवी की आंखें आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का आरंभ 17 अक्टूबर को तड़के 5 बजकर 54 मिनट पर होगा। यह तिथि अगले दिन यानी 18 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 28 मिनट तक प्रभावी रहेगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि का विशेष महत्व होता है, और इस बार 17 अक्टूबर तथा 18 अक्टूबर दोनों ही दिनों में सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि मौजूद रहेगी। सूर्योदय कालीन संयोग के कारण ही नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा दोनों दिन की जा सकेगी। नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के अत्यंत उग्र और कल्याणकारी स्वरूप मां कालरात्रि की आराधना की जाती है। शक्ति उपासना के साथ-साथ यह दिन दुर्गा पूजा उत्सव के लिए भी बहुत खास माना जाता है। इसी पावन तिथि पर दुर्गा पंडालों में स्थापित प्रतिमाओं से आंखों की पट्टी हटाने की रस्म पूरी की जाती है, जिसे प्रतीकात्मक रूप से माता की आंखें खोलना कहा जाता है। महाअष्टमी का व्रत, कन्या पूजन और निशा पूजा का विधान आश्विन मास की अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह 8 बजकर 28 मिनट पर प्रारंभ हो जाएगी और इसका समापन 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर होगा। उदया तिथि के शास्त्रीय नियम के अनुसार, महाअष्टमी का मुख्य व्रत और पूजन 19 अक्टूबर दिन सोमवार को संपन्न किया जाएगा। नवरात्रि के आठवें दिन माता के महागौरी स्वरूप की स्तुति की जाती है और इस अवसर पर घरों में कन्या पूजन करने का विशेष विधान है। वहीं दूसरी ओर, तांत्रिक साधना, तंत्र-मंत्र और कुलदेवी की आराधना करने वाले साधकों के लिए रात्रि कालीन तिथि का महत्व होता है। जो परिवार अष्टमी के दिन अपनी कुलदेवी की विशेष पूजा करते हैं या जो साधक निशा काल में साधना करते हैं, वे 18 अक्टूबर की रात को ही अष्टमी तिथि के अंतर्गत अपनी समस्त तांत्रिक और वैदिक विधियां पूर्ण करेंगे। 48 मिनट का संधि काल और मां चामुंडा की उपासना महाअष्टमी और महानवमी के मिलन काल को संधि काल कहा जाता है, जिसका नवरात्रि में सर्वोच्च आध्यात्मिक महत्व है। 19 अक्टूबर को संधि पूजा का शुभ समय सुबह 10 बजकर 27 मिनट से लेकर सुबह 11 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। इस प्रकार संधि पूजन संपन्न करने के लिए कुल 48 मिनट की अवधि प्राप्त होगी। शास्त्रों के अनुसार, जब अष्टमी तिथि के समाप्त होने में अंतिम 24 मिनट यानी 1 घटी शेष रहती है और नवमी तिथि के प्रारंभ के पहले 24 मिनट यानी 1 घटी का संयोग बनता है, तो उस 48 मिनट के संधिकाल में मां दुर्गा के चामुंडा स्वरूप का आह्वान किया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी विशेष कालखंड में मां भगवती ने चंड और मुंड नाम के महाबलशाली दैत्यों का संहार किया था, इसलिए इस अवधि में किया गया जप और पूजन अत्यंत फलदायी माना जाता है। महानवमी और विजयादशमी का दुर्लभ संयोग आश्विन मास की नवमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर अगले दिन 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। जो भक्त नवमी की दोपहर कालीन पूजा या रात्रि कालीन अनुष्ठान करना चाहते हैं, वे 19 अक्टूबर की सुबह 10 बजकर 51 मिनट के बाद अपनी साधना आरंभ कर सकते हैं। वहीं उदया तिथि को प्रधानता देने वाले श्रद्धालु 20 अक्टूबर की सुबह महानवमी का पूजन करेंगे। 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक नवमी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए इस समय सीमा से पूर्व नवमी का हवन, अनुष्ठान और कन्या पूजन संपन्न कर लेना आवश्यक है। जैसे ही दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर नवमी तिथि समाप्त होगी, दशमी तिथि का प्रारंभ हो जाएगा। इसके उपरांत विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा और परंपरा के अनुसार शस्त्र पूजन के साथ दशहरे के अन्य उत्सव संपन्न किए जाएंगे। इसका आप पर असर नवरात्रि की तिथियों के इस फेरबदल से व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं और आयोजकों को अपने दैनिक अनुष्ठान सही समय पर करने में मदद मिलेगी। • व्रत और पारण: उदया तिथि के अनुसार अष्टमी व्रत 19 अक्टूबर को रखा जाएगा। जो लोग नवमी का व्रत रखते हैं, वे 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से पहले अपने अनुष्ठान पूरे कर सकते हैं। • कन्या पूजन का समय: कन्या पूजन 19 अक्टूबर को या 20 अक्टूबर की दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से पहले तक किया जा सकता है। दोपहर के बाद दशमी तिथि लगने के कारण उससे पहले कन्या भोज संपन्न करा लें। • संधि पूजा की तैयारी: 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 27 मिनट से 11 बजकर 15 मिनट तक केवल 48 मिनट का समय मिलेगा। देवी के चामुंडा स्वरूप की आराधना के लिए पूजन सामग्री पहले से जुटाकर रखें। • दशहरा और शस्त्र पूजन: विजयादशमी का त्योहार 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट के बाद मनाया जाएगा। इसी दिन शस्त्र पूजन और रावण दहन के आयोजन संपन्न होंगे। ऐसा क्यों हुआ यह भ्रम इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि आश्विन मास की सप्तमी तिथि का विस्तार दो दिन के सूर्योदय को छू रहा है, जिससे आगे की तिथियों के प्रारंभ और समाप्ति के समय में बदलाव आया है। • उदया तिथि का दोहराव: सप्तमी तिथि 17 अक्टूबर की सुबह 5 बजकर 54 मिनट से 18 अक्टूबर की सुबह 8 बजकर 28 मिनट तक रहेगी। दोनों दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि उपस्थित होने के कारण सातवें दिन का पूजन दो दिन माना गया। • तिथियों का दोपहर में प्रवेश: अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह से शुरू होकर 19 अक्टूबर की सुबह 10 बजकर 51 मिनट तक चलेगी, जिसके कारण उदया तिथि आधारित अष्टमी 19 अक्टूबर को पड़ रही है। इसी तरह नवमी तिथि 19 अक्टूबर दोपहर से शुरू होकर 20 अक्टूबर दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक खिंच गई है। • संधि काल की खगोलीय स्थिति: अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के प्रारंभिक 24 मिनट के संगम को संधि काल कहते हैं। तिथियों के सुबह के समय बदलने के कारण यह 48 मिनट का कालखंड 19 अक्टूबर की सुबह 10 बजकर 27 मिनट पर निर्मित हो रहा है। सवाल-जवाब 1. सप्तमी तिथि की पूजा दो दिन क्यों की जाएगी? 17 अक्टूबर और 18 अक्टूबर दोनों दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए उदया तिथि के आधार पर सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा दोनों दिन होगी। 2. महाअष्टमी का व्रत और मुख्य पूजा किस दिन होगी? उदया तिथि के आधार पर महाअष्टमी की पूजा और व्रत 19 अक्टूबर दिन सोमवार को किया जाएगा। 3. संधि पूजा का समय क्या है और यह कितने मिनट की होती है? संधि पूजा 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 27 मिनट से 11 बजकर 15 मिनट तक होगी, जिसके लिए कुल 48 मिनट का समय मिलेगा। 4. कन्या पूजन किस दिन और कब तक किया जा सकता है? कन्या पूजन 19 अक्टूबर को या फिर 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से पहले किया जा सकता है। 5. विजयादशमी यानी दशहरा किस दिन मनाया जाएगा? विजयादशमी का पर्व 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर दशमी तिथि लगने के बाद मनाया जाएगा। https://trendkia.com/spirituality/sharadiya-navratri-men-tithiyon-ke-phera-se-dura-karen-ulajhana-janen-mahasaptami-se-dussehra-taka-ki-satika-tarikhen-aura-puja-mu-48005 TrendKia — Har trend, sabse pehle.