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  "type": "article",
  "title": "शारदीय नवरात्रि 2026 के पहले दिन करें मां शैलपुत्री की आराधना, जानिए कलश स्थापना का शुभ समय और संपूर्ण विधि",
  "summary": "शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन देवी शैलपुत्री की पूजा और घटस्थापना के शुभ मुहूर्त सामने आ चुके हैं, जिसमें सुबह और दोपहर में पूजन के विशेष योग बन रहे हैं।",
  "content": "शारदीय नवरात्रि 2026 के पावन अवसर पर देवी दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों की उपासना का महापर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हो गया है। इस उत्सव के प्रथम दिन आदिशक्ति के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री का विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में शैल का तात्पर्य पर्वत से होता है, और पर्वतराज हिमालय के आंगन में पुत्री बनकर अवतरित होने के कारण भगवती पार्वती को शैलपुत्री नाम से पूजा जाता है। देवी का यह रूप शांत, पावन और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इस पावन अवसर पर कई श्रद्धालु पूरे नौ दिनों तक निराहार या फलाहार रहकर उपवास का पालन करते हैं, जबकि कुछ लोग प्रतिपदा और अष्टमी तिथि पर व्रत रखकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। मान्यता है कि नियम और निष्ठा के साथ मां शैलपुत्री की अर्चना करने पर जीवन में आंतरिक साहस, मानसिक शांति और संपन्नता की प्राप्ति होती है।\n\nघटस्थापना के शुभ मुहूर्त और दिन के प्रमुख योग\nनवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना अथवा कलश स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान होता है। पंचांग के अनुसार पहले दिन पूजा और कलश स्थापना के लिए विशेष समयावधि तय की गई है। भक्त प्रात:काल से लेकर दोपहर तक अनुकूल समय में कलश स्थापित कर सकते हैं। इस दिन सुबह का कलश स्थापना मुहूर्त प्रात: 06:19 बजे से शुरू होकर 10:12 बजे तक बना रहेगा। यदि कोई श्रद्धालु सुबह इस निर्धारित अवधि में पूजन संपन्न न कर सके, तो उसके लिए दोपहर में अभिजित मुहूर्त का विकल्प मौजूद रहता है। दोपहर के समय कलश स्थापना का शुभ काल 11:44 बजे से 12:31 बजे तक रहेगा।\n\nप्रतिपदा के इस पवित्र दिवस पर कई अन्य शुभ घड़ियां भी बन रही हैं। दिन की शुरुआत में ब्रह्म मुहूर्त प्रात: 04:40 बजे से 05:30 बजे तक रहेगा, जो आत्मचिंतन और ईश्वर आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इसके अलावा दोपहर 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक अभिजित मुहूर्त प्रभावी रहेगा। रात्रि के समय 09:30 बजे से लेकर 10:32 बजे तक द्विपुष्कर योग की उपस्थिति रहेगी। पूरे दिन के खगोलीय योगों की बात करें तो वैधृति योग प्रात:काल से आरंभ होकर रात 09:05 बजे तक रहेगा, जबकि चित्रा नक्षत्र प्रात:काल से लेकर रात 10:32 बजे तक प्रभावी रहेगा।\n\nकलश स्थापना की चरणबद्ध विधि\nघटस्थापना करते समय साधक को शुचिता और नियमों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। इसके लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया निर्धारित है\n\n• स्थान की तैयारी: प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर दैनिक नित्यकर्म और स्नान से निवृत्त हों, फिर शुद्ध एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात घर के पूजा स्थल को अच्छी तरह स्वच्छ करें और देवी दुर्गा तथा शैलपुत्री स्वरूप का चित्र या विग्रह स्थापित करें।\n• जौ का रोपण: एक मिट्टी का उथला पात्र लेकर उसमें शुद्ध मिट्टी भरें। इसके बाद उसमें जौ के बीज समान रूप से बिखेरें और ऊपर से हल्का जल छिड़क दें, ताकि नौ दिनों में वे अच्छी तरह अंकुरित हो सकें।\n• कलश सज्जा: एक पावन कलश लेकर उसमें शुद्ध जल अथवा गंगाजल भरें। पारंपरिक नियमों के अनुसार कलश के जल में एक सुपारी, अक्षत के दाने और एक सिक्का डालें। कलश के ऊपरी किनारे पर आम अथवा अशोक के सुंदर पत्ते चारों ओर व्यवस्थित करें।\n• श्रीफल स्थापना: एक सूखा नारियल लेकर उसे लाल वस्त्र या चुनरी में लपेटें। इस नारियल को कलश के मुख पर पत्तों के बीच स्थिर करें और तैयार कलश को जौ वाले मिट्टी के पात्र के पास विधिपूर्वक स्थापित करें।\n• भगवती की पूजा: स्थापित देवी और कलश को कुमकुम, अक्षत, पुष्प, धूप तथा दीप समर्पित करें। देवी दुर्गा के ध्यान में लीन होकर मंत्रों का पाठ करें और अंत में श्रद्धापूर्वक आरती उतारें।\n\nमां शैलपुत्री का प्रिय भोग और पूजन सामग्री\nपरंपरागत मान्यताओं के अनुसार शैलराज की पुत्री को श्वेत रंग अत्यंत प्रिय है। इसी कारण उनकी उपासना में सफेद वस्तुओं का उपयोग विशेष फलदायी माना गया है। पूजा में श्वेत पुष्प, कच्चा दूध, दुग्ध निर्मित मिष्ठान्न और विशुद्ध गाय के घी का अर्पण किया जाता है। कई श्रद्धालु माता को प्रसन्न करने के लिए घर में बनी चावल और दूध की खीर या सफेद पेड़े का भोग भी लगाते हैं। नैवेद्य अर्पित करने के उपरांत इस पावन प्रसाद को परिवारजनों और उपस्थित भक्तों में वितरित करने का विधान है।\n\nदेवी की स्तुति और ध्यान मंत्र\nमां शैलपुत्री के पूजन के दौरान साधक उनके सौम्य और शक्ति संपन्न स्वरूप का ध्यान करते हैं। शास्त्रों में वर्णित ध्यान मंत्र के माध्यम से माता के वृषभ वाहन, त्रिशूल और चंद्र मुकुट का स्मरण किया जाता है\n\n वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥\nइसके साथ ही सर्वकल्याण की भावना से देवी के इस स्वरूप को बारंबार नमन किया जाता है। दुर्गा सप्तशती का यह श्लोक अत्यंत पावन माना गया है\n\n या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।\nपूजन के समापन पर घी का दीपक प्रज्वलित कर माता की पारंपरिक आरती की जाती है। आरती में शिवप्रिया भवानी के दिव्य गुणों, उनके दयालु स्वभाव और भक्तों के संकट हरने की क्षमता का गुणगान किया जाता है। श्रद्धालु सच्ची निष्ठा से शीश झुकाकर जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nनवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना और पूजा के नियमों का पालन करने से दैनिक जीवन और पूजा अनुष्ठानों में व्यवस्था बनी रहती है।\n\n• समय का चयन: प्रात: 06:19 से 10:12 या दोपहर 11:44 से 12:31 के बीच ही कलश स्थापना करें। इन निर्धारित अवधियों में अनुष्ठान पूरा करने से पूजा बिना किसी संशय के संपन्न होती है।\n• पूजन सामग्री: दूध से बने सफेद मिष्ठान्न, गाय का घी और सफेद पुष्प पहले से जुटा लें। माता शैलपुत्री को श्वेत वस्तुएं प्रिय होने के कारण सही भोग की व्यवस्था समय पर कर पाना आसान रहेगा।\n• व्रत की योजना: अपनी सुविधा के अनुसार नौ दिन के अखंड व्रत अथवा प्रतिपदा और अष्टमी व्रत का चयन करें। शारीरिक क्षमता के अनुसार फलाहार या सात्विक आहार का नियम तय करें ताकि स्वास्थ्य ठीक रहे।\n• दैनिक आचरण: घर के वातावरण को स्वच्छ और पवित्र बनाए रखें। मन में शांति और श्रद्धा का भाव रखने से पारिवारिक वातावरण सुखद और सकारात्मक बनता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनवरात्रि का आरंभ देवी दुर्गा के प्रथम रूप मां शैलपुत्री की पूजा और घटस्थापना के साथ ही सदियों से किया जाता रहा है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं, प्रकृति से जुड़ाव और पौराणिक कथाएं मुख्य कारण हैं।\n\n• पर्वतराज की पुत्री: सती के आत्मदाह के पश्चात देवी ने हिमालय राज के घर जन्म लिया, जिसके कारण उन्हें शैलपुत्री कहा गया। नवदुर्गा चक्र में वह आदि स्वरूप हैं, इसलिए उनकी पूजा से पर्व का आरंभ होता है।\n• सृष्टि और जीवन का प्रतीक: घट अथवा कलश में जल, सिक्के और पत्तों के साथ जौ बोना नई सृष्टि और जीवन की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है। अंकुरित होते जौ परिवार में समृद्धि और हरियाली के सूचक माने गए हैं।\n• मुहूर्त का विधान: धार्मिक कार्यों को अशुभ काल से बचाकर शुभ फलदायी बनाने के लिए पंचांग अनुसार मुहूर्त तय किए जाते हैं। अनुकूल ग्रहों और नक्षत्रों के प्रभाव में अनुष्ठान करने से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नवरात्रि के पहले दिन किस देवी की पूजा की जाती है?\nनवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है।\n\n2. कलश स्थापना का सुबह का शुभ मुहूर्त क्या है?\nसुबह के समय कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त प्रात: 06:19 बजे से लेकर 10:12 बजे तक रहेगा।\n\n3. यदि सुबह कलश न रख पाएं तो दोपहर में क्या समय है?\nदोपहर में कलश स्थापना के लिए अभिजित मुहूर्त 11:44 बजे से 12:31 बजे तक उपलब्ध रहेगा।\n\n4. मां शैलपुत्री को किस रंग का भोग अर्पित करना चाहिए?\nमां शैलपुत्री को सफेद रंग प्रिय है, इसलिए उन्हें गाय के घी, दूध, खीर और सफेद मिठाइयों का भोग लगाया जाता है।\n\n5. देवी शैलपुत्री को यह नाम क्यों मिला?\nपर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती पार्वती को शैलपुत्री नाम दिया गया।\n\n6. प्रथम दिन के अन्य प्रमुख योग कौन से हैं?\nपहले दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:40 से 05:30 बजे तक, द्विपुष्कर योग रात 09:30 से 10:32 बजे तक और वैधृति योग रात 09:05 बजे तक रहेगा।",
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  "category": "अध्यात्म",
  "publishedAt": "2026-10-17",
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