शारदीय नवरात्रि में अष्टमी और नवमी पर कुमारी पूजन का सही विधान, जानें विधि और तिथियां नवरात्रि में कन्याओं को मां जगदंबा का साक्षात स्वरूप मानकर पूजने की प्राचीन परंपरा है। 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार पूजन करने के नियम सामने आए हैं। नवरात्रि के पावन दिनों में मां दुर्गा की आराधना तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक कि कुंवारी कन्याओं का सत्कार न किया जाए। सनातन परंपरा में छोटी बालिकाओं को मां जगदंबा का प्रत्यक्ष स्वरूप मानकर उनकी सेवा और अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधिपूर्वक किए गए इस अनुष्ठान से साधक को देवी की विशेष अनुकंपा और अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं। अक्सर देखा जाता है कि वर्तमान समय की व्यस्त जीवनशैली में लोग पूजन के पारंपारिक और शास्त्रीय तौर-तरीकों पर ध्यान नहीं दे पाते, जिससे अनुष्ठान में आवश्यक शुद्धता का अभाव रह जाता है। कुमारी पूजन का आध्यात्मिक संदर्भ और मुख्य तिथियां धार्मिक ग्रंथों में कुंवारी कन्याओं के पूजन को मां दुर्गा के बाल रूप की अर्चना के रूप में रेखांकित किया गया है। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर ज्योतिष विभाग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर कुणाल कुमार झा ने इस अनुष्ठान के आध्यात्मिक पक्ष को स्पष्ट किया है। डॉक्टर कुणाल कुमार झा के अनुसार, "नवरात्रि में कुमारी पूजन का विशेष महत्व है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूजा का मूल अर्थ देवी के साक्षात कुमारी स्वरूप की वंदना करना है। पंचांगीय गणना के आधार पर इस बार 30 सितंबर को अष्टमी और 1 अक्टूबर को नवमी तिथि पर इस पवित्र अनुष्ठान को संपन्न करने का विधान बेहद फलदायी माना गया है। पूजन स्थल की तैयारी और बैठने का पारंपरिक नियम शास्त्रों के अनुसार, कन्या पूजन का आरंभ हमेशा दृढ़ संकल्प के साथ किया जाना चाहिए। संकल्प के पश्चात पूजन स्थल को गाय के ताजे गोबर से पवित्र करके लीपने की परंपरा बताई गई है। इसके उपरांत, पूजा के लिए बैठने वाली दिशा का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। कन्याओं का आसन पूर्व दिशा की ओर स्थापित किया जाना चाहिए। बालिकाओं को आदरपूर्वक आसन पर बैठाकर उनका मुख पूर्व दिशा की तरफ रखा जाए। इसके बाद उन्हें नवीन वस्त्र, सुंदर आभूषण और विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ अर्पित कर श्रद्धापूर्वक पूजा की जाए। प्रसाद के रूप में गुड़ से तैयार की गई विशेष खीर खिलाना अत्यंत शुभकारी माना गया है। भोजन उपरांत क्षमा प्रार्थना और विदाई की रीत कन्याओं के भोजन ग्रहण करने के बाद की प्रक्रिया का भी शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। भोजन समाप्त होने पर सबसे पहले बालिकाओं के हाथ शुद्ध जल से धुलवाए जाने चाहिए। इसके पश्चात उनके हाथों में अक्षत यानी साबुत चावल के दाने दिए जाएं और उनसे अनुष्ठान में रह गई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगी जाए। साधक को इस भाव के साथ प्रार्थना करनी चाहिए कि यदि सेवा सत्कार अथवा विधि-विधान में कोई त्रुटि हुई हो, तो देवी स्वरूप कन्याएं उसे क्षमा प्रदान करें। तत्पश्चात, कन्याओं के हाथों से उसी अक्षत को लेकर साधक अपने मस्तक पर धारण करें और उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए विदा करें। पवित्रता, मुहूर्त और शास्त्रीय मर्यादा का पालन अष्टमी और नवमी के पावन अवसर पर पूजन कार्य शुरू करने से पूर्व स्थानीय पंचांग के माध्यम से शुभ मुहूर्त का चयन कर लेना चाहिए। पूरे अनुष्ठान के दौरान शारीरिक और मानसिक शुचिता बनाए रखना अनिवार्य है। कन्याओं के प्रति मन में पूर्ण निष्ठा, सत्कार और वात्सल्य भाव होना चाहिए। जब श्रद्धालु शास्त्रीय नियमों और स्थानीय परंपराओं का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए कन्या पूजन करते हैं, तो उन्हें मां भगवती के असीम आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। इसका आप पर असर इस पारंपरिक विधि से कन्या पूजन करने पर साधकों को नियमों और शुभ समय का सही मार्गदर्शन मिलता है। • तिथियों की जानकारी: कुमारी पूजन के लिए 30 सितंबर को अष्टमी और 1 अक्टूबर को नवमी का दिन निर्धारित है। श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार स्थानीय पंचांग देखकर उपयुक्त समय चुन सकते हैं। • आसन की दिशा: कन्याओं को पूर्व दिशा की ओर मुख करके बिठाने का नियम बताया गया है। इससे पूजन स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा और शास्त्रीय मर्यादा बनी रहती है। • विशेष प्रसाद: भोजन में गुड़ से बनी खीर परोसने को अनिवार्य बताया गया है। घर पर इस सात्विक व्यंजन को तैयार करके ही भोग लगाना चाहिए। • भूल-चूक की क्षमा: भोजन के बाद अक्षत देकर क्षमा मांगना और उसे मस्तक पर लगाना आवश्यक है। इस प्रक्रिया से अनुष्ठान की संपूर्णता और आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है। ऐसा क्यों हुआ कन्या पूजन की यह विशिष्ट विधि शास्त्रों और पंचांगीय गणनाओं के आधार पर तय की गई है। इसके पीछे धार्मिक परंपरा और तिथियों का स्पष्ट समन्वय है। • शास्त्रीय आधार: मां दुर्गा के बाल रूप की अर्चना के लिए कुमारी पूजन का विधान ग्रंथों में वर्णित है। इसी परंपरा के संरक्षण के लिए सही विधि-विधान का पालन करने पर बल दिया गया है। • तिथियों का संयोग: पंचांग के अनुसार 30 सितंबर को अष्टमी और 1 अक्टूबर को नवमी तिथि पड़ रही है। इन दोनों ही तिथियों को इस अनुष्ठान के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है। • पवित्रता का महत्व: आधुनिकता के प्रभाव में कई प्राचीन विधियां छूट जाती हैं। गाय के गोबर से लीपने और पूर्व दिशा में बैठाने जैसी व्यवस्थाएं आध्यात्मिक शुचिता बनाए रखने के लिए आवश्यक बताई गई हैं। सवाल-जवाब 1. इस नवरात्रि में कुमारी पूजन किन तिथियों को करना चाहिए? इस बार कुमारी पूजन के लिए 30 सितंबर (अष्टमी) और 1 अक्टूबर (नवमी) का दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है। 2. कन्या पूजन के दौरान कन्याओं को किस दिशा में बिठाना चाहिए? कन्याओं का आसन पूर्व दिशा की ओर लगाकर उन्हें पूर्व मुख करके बिठाने का विधान है। 3. कन्याओं को भोग में कौन सा विशेष पकवान खिलाना चाहिए? पूजन के दौरान कन्याओं को विशेष रूप से गुड़ से बनी खीर खिलाने का नियम बताया गया है। 4. भोजन के बाद अक्षत का क्या उपयोग किया जाता है? कन्याओं के हाथ में अक्षत देकर क्षमा याचना की जाती है और फिर वही अक्षत अपने मस्तक पर धारण कर उन्हें विदा किया जाता है। https://trendkia.com/spirituality/shardiya-navratri-men-ashtami-aura-navami-para-kumari-pujan-ka-sahi-vidhana-janen-vidhi-aura-tithiyan-43573 TrendKia — Har trend, sabse pehle.