वैदिक विवाह में फेरों की वास्तविक संख्या और सप्तपदी का शास्त्रसम्मत महत्व शास्त्रों में विवाह के दौरान चार फेरों का मुख्य उल्लेख मिलता है, जबकि लोकप्रिय धारणा में सात फेरों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। सनातन परंपरा में वैवाहिक संस्कार को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर जीवन पर्यंत साथ चलने का एक गहरा धार्मिक अनुबंध स्वीकार किया गया है। विवाह की मुख्य रस्मों में मंडप में अग्नि की परिक्रमा करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, हालांकि आधुनिक समय में फेरों की वास्तविक संख्या और उनके गूढ़ अर्थ को लेकर आम लोगों में कई प्रकार की भ्रांतियां प्रचलित हो चुकी हैं। शास्त्रों में चार फेरों का विशेष उल्लेख धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार मूल वैदिक विधान में केवल चार फेरे लेने की व्यवस्था दर्ज है। फरीदाबाद के ज्योतिषाचार्य पंडित उमा चंद्र मिश्रा बताते हैं कि ये चारों परिक्रमाएं मानव जीवन के प्रमुख चार पुरुषार्थों पर आधारित हैं। इनमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष शामिल हैं, जो गृहस्थ जीवन को सुव्यवस्थित और संतुलित बनाए रखने की मजबूत आधारशिला तैयार करते हैं। परिक्रमा का क्रम और दंपती की साझा जिम्मेदारियां पंडित मिश्रा के अनुसार परिक्रमा के दौरान वर और वधू दोनों के नेतृत्व की भूमिका शास्त्रसम्मत तरीके से तय की गई है। शुरुआती तीन फेरों में कन्या आगे चलती है, जबकि अंतिम और चौथे फेरे में वर आगे रहता है। यह क्रम स्पष्ट करता है कि पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने में पति और पत्नी की बराबर की सहभागिता होती है। इन चारों फेरों में दैनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएं समाहित हैं, जिनमें पर्याप्त भोजन, शारीरिक और मानसिक शक्ति, धन का उपार्जन, सुख-समृद्धि, पशुधन, ऋतुओं के अनुसार संयमित जीवन, पूरे कुल की सुरक्षा तथा आपसी रिश्तों में अटूट निष्ठा बनाए रखने का गहरा संकल्प शामिल है। सप्तपदी और फेरों के बीच का सूक्ष्म अंतर पारंपरिक विवाह में सप्तपदी का नियम अत्यंत आवश्यक माना गया है, जिसमें सात कदम साथ चलने और सात अलग-अलग वचन निभाने की प्रतिज्ञा की जाती है। यह व्यवस्था जीवन भर की जिम्मेदारियों को दर्शाती है। हालांकि, कई लोग अनजाने में सात कदमों को ही सात फेरे समझ लेते हैं, जबकि वास्तविकता में ये दोनों अनुष्ठान बिल्कुल भिन्न हैं। पंडित उमा चंद्र मिश्रा के अनुसार जनमानस में सात फेरों की धारणा फिल्मों और सिनेमाई दृश्यों के व्यापक प्रभाव की वजह से लोकप्रिय हुई, जिसे लोगों ने मूल प्रथा मान लिया, जबकि प्राचीन ग्रंथों में सात फेरों का सीधा समर्थन नहीं मिलता। साढ़े तीन फेरों की दार्शनिक व्याख्या कुछ पारंपरिक विद्वान फेरों की एक अन्य व्याख्या भी प्रस्तुत करते हैं, जिसके अनुसार कुल फेरे साढ़े तीन माने जाते हैं। इस मान्यता के तहत साढ़े तीन फेरे वधू के हिस्से आते हैं और साढ़े तीन फेरे वर पूरे करता है। दोनों पक्षों की इस आध्यात्मिक साझेदारी को जब एक साथ देखा जाता है, तो यह योग सात की संख्या के बराबर प्रतीत होता है। अंततः फेरों की संख्या से भी अधिक महत्वपूर्ण उनके अंतर्निहित भाव को समझना है, जिसका मुख्य ध्येय हर सुख-दुख में एक-दूसरे का संबल बनकर वैवाहिक जीवन को सफल बनाना है। इसका आप पर असर यह जानकारी विवाह की पारंपरिक पद्धतियों और शास्त्रों के वास्तविक नियमों को समझने में मदद करती है। • धार्मिक समझ: विवाह के दौरान फेरों और सप्तपदी के शास्त्रीय अंतर को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। इससे वैवाहिक रस्मों में होने वाले आम भ्रम दूर होते हैं। • वैदिक विधान: जीवन के चार पुरुषार्थों पर आधारित रीतियों का महत्व स्पष्ट होता है। लोग सामाजिक मान्यताओं के बजाय ग्रंथों में दर्ज मूल परंपराओं को अपना सकते हैं। • सांस्कृतिक जागरूकता: सिनेमाई चित्रण और वास्तविक पारंपरिक नियमों का भेद उजागर होता है। इससे विवाह संस्कारों की वास्तविक गंभीरता बनी रहती है। • दंपती का दायित्व: वर और वधू की समान जिम्मेदारियों का बोध होता है। यह पारिवारिक जीवन को संतुलित और सुदृढ़ बनाने में सहायता करता है। ऐसा क्यों हुआ विवाह में सात फेरों की आम धारणा और शास्त्रों में दर्ज चार फेरों के बीच का अंतर मुख्य रूप से आधुनिक प्रचार और सांस्कृतिक बदलावों के कारण पैदा हुआ। • सिनेमाई प्रभाव: फिल्मों और नाटकों में सात फेरों को अत्यधिक नाटकीय रूप से प्रस्तुत किया गया। इसके परिणामस्वरूप आम जनमानस ने इसे ही प्राचीनतम प्रथा मान लिया। • सप्तपदी से भ्रम: विवाह संस्कार में सात कदम चलने की सप्तपदी रस्म बहुत प्रमुख रही है। सात कदमों और सात वचनों को कई लोगों ने गलत समझकर सात फेरों के रूप में जोड़ लिया। • दार्शनिक विभाजन: कई विद्वानों द्वारा वर और वधू के साढ़े तीन-साढ़े तीन फेरों को जोड़कर सात बताने की व्याख्या भी इस संख्यात्मक भ्रम को बढ़ावा देती रही। सवाल-जवाब 1. शास्त्रों के अनुसार विवाह में कितने फेरे लेने का विधान है? धार्मिक ग्रंथों और पुरानी पुस्तकों में मुख्य रूप से चार फेरे लेने का ही उल्लेख मिलता है। 2. चार फेरे जीवन के किन उद्देश्यों को दर्शाते हैं? ये चारों फेरे मानव जीवन के चार पुरुषार्थों यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। 3. फेरों के दौरान आगे चलने का क्या क्रम होता है? पहले तीन फेरों में वधू आगे चलती है और चौथे फेरे में वर आगे चलता है। 4. सात फेरों की धारणा समाज में कैसे फैली? सात फेरों की लोकप्रियता मुख्य रूप से फिल्मों और बॉलीवुड द्वारा दिखाए जाने के बाद जनमानस में फैली। 5. साढ़े तीन फेरों की क्या मान्यता बताई जाती है? कुछ विद्वानों के अनुसार साढ़े तीन फेरे वधू के और साढ़े तीन फेरे वर के होते हैं, जो मिलकर कुल सात बनते हैं। https://trendkia.com/spirituality/vedic-wedding-traditions-clarify-difference-between-marriage-rounds-and-seven-vows-40692 TrendKia — Har trend, sabse pehle.