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  "type": "article",
  "title": "पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का भव्य उल्लास: जानिए चक्षु दान की अनोखी रस्म और लाल पाड़ साड़ी की सांस्कृतिक परंपरा",
  "summary": "पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की शुरुआत पर मूर्तिकला, पंडाल और परिधानों से जुड़ी अनूठी परंपराएं जीवंत हो उठती हैं। महालया के दिन होने वाले चक्षु दान से लेकर सिंदूर खेला और लाल पाड़ साड़ी के सांस्कृतिक महत्व को विस्तार से समझें।",
  "content": "पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कला, रोशनी और सामुदायिक जीवन का एक विशाल सामाजिक उत्सव है। विशेष रूप से कोलकाता की गलियां, मुख्य चौराहे और रिहायशी इलाके इस दौरान एक जीवंत रंगमंच में तब्दील हो जाते हैं। अस्थायी कलात्मक पंडाल, मंत्रमुग्ध कर देने वाली रोशनी और पारंपरिक रीति-रिवाज हर आने-जाने वाले का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर से हो रही है, जिसका समापन 19 अक्टूबर को होगा। वहीं दुर्गा पूजा का मुख्य सार्वजनिक आयोजन षष्ठी तिथि से लेकर दशमी तिथि तक बड़े स्तर पर मनाया जाता है। भले ही ये दोनों पर्व एक ही समय अवधि में पड़ते हैं, लेकिन इनकी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक पहचान का स्वरूप काफी अलग और विशिष्ट होता है।\n\nथीम आधारित पंडाल और रोशनी से सजता शहर\nदुर्गा पूजा के दिनों में विभिन्न रिहायशी बस्तियों और सार्वजनिक मैदानों में भव्य अस्थायी पंडाल बनाए जाते हैं। इन पंडालों का निर्माण और आंतरिक सज्जा किसी सामान्य सजावट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इन्हें ऐतिहासिक इमारतों, प्राचीन मंदिरों अथवा समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक विचारों के आधार पर तैयार किया जाता है। कारीगर पारंपरिक बंगाली लोक कला से लेकर विविध कलात्मक विधाओं को इन संरचनाओं में बड़ी बारीकी से शामिल करते हैं।\n\nपंडाल परिसरों के साथ-साथ उनके इर्द-गिर्द के पूरे क्षेत्र को भव्य रोशनी से रोशन किया जाता है। लंबी गलियों, चौराहों और प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर आधुनिक तकनीक से संचालित रंग-बिरंगी लाइटें और आकर्षक झांकियां लगाई जाती हैं। रात के समय नए कपड़े पहनकर परिवार और दोस्तों के साथ पंडालों की परिक्रमा करने की परंपरा इस सार्वजनिक उत्सव का सबसे आकर्षक हिस्सा बन चुकी है।\n\nमहालया और मूर्तियों में चक्षु दान का पवित्र अनुष्ठान\nदुर्गा पूजा के पूरे उत्सव चक्र में महालया यानी सर्वपितृ अमावस्या का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी पावन तिथि के साथ देवी दुर्गा के स्वागत की अंतिम तैयारियां जोर पकड़ती हैं। इस अवसर से जुड़ी सबसे प्रमुख पारंपरिक रस्म को 'चक्षु दान' के नाम से जाना जाता है। इस विधि के तहत मूर्तिकार देवी दुर्गा की तैयार प्रतिमा की आंखों को अंतिम रूप से चित्रित करते हैं। इसे मूर्ति में दिव्यता के संचार का प्रतीकात्मक क्षण माना जाता है।\n\nदेवी दुर्गा और उनके परिजनों की प्रतिमाओं के निर्माण में विशुद्ध प्राकृतिक और पारंपरिक सामग्रियों का सहारा लिया जाता है। गंगा की मिट्टी के साथ बांस के ढांचे, पुआल और सूती कपड़ों की परतों का इस्तेमाल करके इन भव्य आकृतियों को गढ़ा जाता है। चक्षु दान संपन्न होने के बाद मूर्तियां पंडालों में स्थापित होने के लिए पूरी तरह तैयार मानी जाती हैं।\n\nधनुची नृत्य की ऊर्जा और सिंदूर खेला का उल्लास\nदुर्गा पूजा के पूजा अनुष्ठानों के दौरान शाम की आरती का समय अत्यधिक ऊर्जावान होता है। इस अवसर पर मिट्टी के बने विशेष पात्र यानी धुनुची में नारियल की जटाएं, धूप और कपूर जलाकर 'धुनुची नृत्य' किया जाता है। ढाक की तेज गूंजती थाप पर यह पारंपरिक नृत्य पूरे वातावरण को भक्ति और उल्लास से भर देता है।\n\nउत्सव के अंतिम दिन यानी विजयादशमी के अवसर पर एक और अत्यंत भावुक और जीवंत परंपरा देखने को मिलती है, जिसे 'सिंदूर खेला' कहा जाता है। मां दुर्गा की विदाई और प्रतिमा विसर्जन से ठीक पहले महिलाएं एकत्र होकर देवी को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर परस्पर एक-दूसरे के माथे व गालों पर सिंदूर लगाकर सुहाग तथा सौभाग्य की कामना करती हैं। इसके पश्चात गाजे-बाजे के साथ प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है और इसके साथ ही वार्षिक दुर्गा पूजा समारोह का औपचारिक समापन होता है।\n\nलाल-पाड़ साड़ी का सांस्कृतिक महत्व और पारंपरिक परिधान\nदुर्गा पूजा के माहौल में बंगाली महिलाओं का पारंपरिक पहनावा भी खास आकर्षण का केंद्र बनता है। इस दौरान सफेद रंग की वह साड़ी विशेष रूप से दिखाई देती है जिसका किनारा चटख लाल होता है। स्थानीय भाषा में इसे आम तौर पर 'लाल-पाड़ साड़ी' कहा जाता है। यह पोशाक पारंपरिक बंगाली संस्कृति और नारीत्व की एक शाश्वत पहचान बन चुकी है।\n\nयह पारंपरिक साड़ी मुख्य रूप से सूती यानी कॉटन और रेशम यानी सिल्क के धागों से तैयार की जाती है। बंगाल के पारंपरिक हथकरघा उद्योग में तांत की साड़ियों की अपनी एक प्रतिष्ठित पहचान है, जिनका उपयोग इस मौसम में व्यापक रूप से होता है। हालांकि, यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि इस तरह की साड़ी पहनना सभी बंगाली महिलाओं के लिए कोई अनिवार्य नियम नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत रुचि और सांस्कृतिक जुड़ाव का एक सहज माध्यम है।\n\nरंगों का दर्शन और पारंपरिक बंगाली ड्रेपिंग शैली\nलाल-पाड़ साड़ी में प्रयुक्त दोनों रंगों के पीछे गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक भाव छिपा हुआ है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, लाल रंग शक्ति, पराक्रम और असीम ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जो सीधे तौर पर मां दुर्गा की शक्ति स्वरूपा छवि को दर्शाता है। वहीं साड़ी का सफेद हिस्सा शुचिता, शांति और आध्यात्मिक पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि पूजा अनुष्ठानों के दौरान इन दोनों रंगों का संयोजन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।\n\nइस परिधान की खूबसूरती इसकी विशिष्ट ड्रेपिंग शैली से और बढ़ जाती है। पारंपरिक बंगाली तरीके से साड़ी पहनते समय इसके पल्लू और चौड़े लाल बॉर्डर को इस ढंग से व्यवस्थित किया जाता है कि लाल किनारा चारों तरफ से स्पष्ट रूप से नजर आए। इस पारंपरिक रूप को पूरा करने के लिए आभूषणों का भी बड़ा योगदान होता है। महिलाएं सोने के खूबसूरत हार, पारंपरिक झुमके, चूड़ियां और प्राचीन शिल्प से प्रेरित गहने पहनती हैं, जो पूरे उत्सव में बंगाली सांस्कृतिक गरिमा को एक अनूठा रूप प्रदान करते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nदुर्गा पूजा के इस उत्सव से जुड़े सांस्कृतिक और कैलेंडर विवरण आम लोगों के लिए यात्रा, खरीद और त्योहार की योजना बनाने में सीधे मदद करते हैं।\n\n• भारत में: शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर 2026 तक मनाई जाएगी। देश भर के श्रद्धालु इस नौ दिवसीय अवधि के अनुसार अपनी पूजा, उपवास और अवकाश की योजनाएं तय कर सकते हैं।\n• पश्चिम बंगाल में: षष्ठी से दशमी तक कोलकाता समेत पूरे राज्य में पंडाल परिक्रमा, विशेष रोशनी और सांस्कृतिक आयोजनों का चरम रहेगा। उत्सव में शामिल होने वाले लोगों और पर्यटकों को रात के समय आवाजाही तथा स्थानीय परिवहन के अनुसार अपना शेड्यूल बनाना होगा।\n• पारंपरिक वस्त्र खरीदार: लाल-पाड़ और तांत की साड़ियों की मांग पूजा के दौरान चरम पर रहती है। यदि आप पारंपरिक सूती या रेशमी साड़ी खरीदना चाहते हैं, तो स्थानीय बुनकरों और बाजारों से समय रहते खरीदारी करना बेहतर होगा।\n• श्रद्धालु और पर्यटक: महालया के दिन चक्षु दान देखने और विजयादशमी को सिंदूर खेला में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग समय तय हैं। इन अनुष्ठानों में शामिल होने के लिए पंडालों और गंगा घाटों के नियमों का पालन करना आवश्यक है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nदुर्गा पूजा की यह पूरी तैयारी और इसकी विशिष्ट रस्में सदियों से चली आ रही धार्मिक तिथियों, लोक परंपराओं और कलात्मक नियमों पर आधारित हैं।\n\n• तिथियों का धार्मिक चक्र: महालया यानी सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष के समापन और देवी पक्ष के आगमन का प्रतीक है। यही कारण है कि इसी दिन मूर्तियों की आंखें बनाने की अंतिम रस्म यानी चक्षु दान को संपन्न किया जाता है।\n• कला और शिल्पकला की परंपरा: बंगाल में सदियों से गंगा की पवित्र मिट्टी, पुआल और बांस से प्रतिमाएं बनाने की लोक शैली विकसित हुई है। मूर्तिकार पीढ़ियों से चली आ रही इस शिल्प कला को जीवित रखने के लिए इन पारंपरिक सामग्रियों का ही उपयोग करते हैं।\n• रंगों का प्रतीकात्मक दर्शन: लाल और सफेद रंगों का चयन यादृच्छिक नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा में शक्ति और पवित्रता के गहरे सामंजस्य का प्रतिनिधित्व करता है। शक्ति की देवी के स्वागत में यही दार्शनिक भाव महिलाओं के परिधानों और सिंदूर खेला जैसे आयोजनों में झलकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि कब से कब तक है?\nसाल 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक चलेगी।\n\n2. दुर्गा पूजा का मुख्य आयोजन किन तिथियों के बीच होता है?\nदुर्गा पूजा का मुख्य सार्वजनिक और धार्मिक उत्सव षष्ठी तिथि से लेकर दशमी तिथि तक मनाया जाता है।\n\n3. चक्षु दान की रस्म क्या है और यह कब होती है?\nचक्षु दान महालया यानी सर्वपितृ अमावस्या के दिन होने वाली रस्म है, जिसमें मूर्तिकार देवी दुर्गा की प्रतिमा की आंखें बनाते हैं।\n\n4. दुर्गा प्रतिमाएं बनाने में किन पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?\nप्रतिमाओं के निर्माण में मुख्य रूप से मिट्टी, बांस और कपड़े जैसी पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है।\n\n5. लाल-पाड़ साड़ी में लाल और सफेद रंगों का क्या महत्व है?\nइस साड़ी में लाल रंग शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जबकि सफेद रंग पवित्रता और शुचिता का प्रतिनिधित्व करता है।\n\n6. सिंदूर खेला की रस्म कब और क्यों मनाई जाती है?\nविजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई और प्रतिमा विसर्जन से पहले महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला की परंपरा निभाती हैं।",
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  "category": "अध्यात्म",
  "publishedAt": "2026-10-08",
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