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  "title": "भिवानी की साक्षी चौधरी ने मुक्केबाजी में इतिहास रच दिया, भारत की झोली में डाला तीसरा गोल्ड मेडल",
  "summary": "भिवानी की मुक्केबाज साक्षी चौधरी ने महिलाओं की 51 किग्रा कैटेगरी के फाइनल में इंग्लैंड की रुबी को 5-0 से हराकर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता, जो बॉक्सिंग में भारत का तीसरा स्वर्ण है.",
  "content": "कॉमनवेल्थ गेम्स के बॉक्सिंग रिंग में भारत की झोली में एक और स्वर्ण पदक आ गया. भिवानी की मुक्केबाज साक्षी चौधरी ने महिलाओं की 51 किग्रा कैटेगरी के फाइनल में इंग्लैंड की रुबी को 5-0 से हराकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया. ग्लासगो में हुए इस मुकाबले में साक्षी का दबदबा शुरू से आखिर तक कायम रहा और जजों ने एकतरफा फैसला उनके पक्ष में सुनाया.\n\nपदक तालिका पर क्या असर पड़ा\nसाक्षी की यह जीत सिर्फ एक और तमगा भर नहीं है. यह ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में बॉक्सिंग में भारत का चौथा पदक है और इसमें से तीसरा गोल्ड है. यानी बॉक्सिंग रिंग में अब तक भारतीय मुक्केबाज तीन गोल्ड और एक सिल्वर मेडल जीत चुके हैं. साक्षी के गोल्ड ने कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की कुल पदक संख्या को भी 31 तक पहुंचा दिया है, जिनमें से 9 गोल्ड मेडल हैं.\n\nगुस्सैल बचपन से बॉक्सिंग रिंग तक का सफर\nभारतीय मुक्केबाजी का गढ़ मानी जाने वाली भिवानी की रहने वाली साक्षी चौधरी बचपन में स्वभाव से काफी झगड़ालू थीं और अक्सर आसपास के लोगों से उलझ जाया करती थीं. उनके माता-पिता ने उनकी इसी ऊर्जा को सही दिशा देने के लिए 2012 में उन्हें बॉक्सिंग से जोड़ने का फैसला किया. साक्षी के पिता पेशे से किसान हैं जबकि उनकी मां घर संभालती हैं.\n\nविजेंदर सिंह से प्रेरणा, जगदीश सिंह की देखरेख में तराशी प्रतिभा\nसाक्षी को 2008 के बीजिंग ओलंपिक में विजेंदर सिंह के कांस्य पदक जीतने के प्रदर्शन ने गहरे तक प्रभावित किया, और यही उनके लिए बॉक्सिंग में उतरने की बड़ी वजह बनी. 2012 में उन्होंने विजेंदर सिंह के ही कोच रहे मशहूर प्रशिक्षक जगदीश सिंह के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग शुरू की. इसके बाद के वर्षों में साक्षी लगातार निखरती गईं और खुद को भारतीय मुक्केबाजी की सबसे उम्दा उभरती प्रतिभाओं में शुमार कर लिया. 24 साल की साक्षी राष्ट्रीय खेल संस्थान (NIS), पटियाला के राष्ट्रीय शिविर का हिस्सा रह चुकी हैं और फिलहाल भारतीय सेना में हवलदार के पद पर अपनी सेवाएं दे रही हैं.\n\nजूनियर वर्ल्ड चैंपियन से कॉमनवेल्थ गोल्ड तक\nसाक्षी का खेल करियर उपलब्धियों से भरा रहा है. साल 2015 में ताइपे में हुई एआईबीए जूनियर महिला विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में उन्होंने अमेरिका की राष्ट्रीय चैंपियन यारिसेल रामिरेज को हराकर जूनियर वर्ल्ड चैंपियन का खिताब जीता था. इसके अलावा साक्षी दो बार यूथ वर्ल्ड चैंपियन भी रह चुकी हैं. पिछले साल अस्ताना में हुए वर्ल्ड बॉक्सिंग कप के 54 किग्रा वर्ग में भी उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया था. कॉमनवेल्थ गेम्स की टीम में जगह बनाने से पहले साक्षी ने कई बार की वर्ल्ड चैंपियन निहत ज़रीन और पूर्व नेशनल चैंपियन मीनाक्षी हुड्डा जैसी दिग्गज मुक्केबाजों को हराकर अपनी काबिलियत साबित की थी, तभी जाकर उन्हें टीम में जगह मिली.\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: साक्षी की जीत से कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की पदक तालिका मजबूत हुई है और मुक्केबाजी में देश को लगातार तीसरा गोल्ड मिला है, जिससे देशभर के युवा मुक्केबाजों का हौसला बढ़ेगा.\n• भिवानी में: मुक्केबाजी के गढ़ माने जाने वाले भिवानी के लिए यह जीत बड़ा गौरव है और इससे इलाके में बॉक्सिंग सीखने वाले बच्चों व उनके परिवारों को नई प्रेरणा मिलेगी.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. साक्षी चौधरी ने किस कैटेगरी में गोल्ड जीता?\nउन्होंने महिलाओं की 51 किग्रा कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता.\n\n2. फाइनल में साक्षी का मुकाबला किससे हुआ और स्कोर क्या रहा?\nफाइनल में उनका मुकाबला इंग्लैंड की रुबी से हुआ और साक्षी ने 5-0 से जीत दर्ज की.\n\n3. यह भारत का बॉक्सिंग में कौन सा पदक है?\nयह ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में बॉक्सिंग में भारत का चौथा पदक है और तीसरा गोल्ड है.\n\n4. कॉमनवेल्थ गेम्स में अब तक भारत के कुल कितने पदक हैं?\nसाक्षी के गोल्ड के साथ भारत के कुल पदक 31 हो गए हैं, जिनमें 9 गोल्ड शामिल हैं.\n\n5. साक्षी चौधरी कहां की रहने वाली हैं?\nवह भारतीय मुक्केबाजी के गढ़ माने जाने वाले भिवानी की रहने वाली हैं.\n\n6. साक्षी के कोच कौन हैं?\nउनके कोच जगदीश सिंह हैं, जो विजेंदर सिंह के भी कोच रह चुके हैं.\n\n7. साक्षी फिलहाल क्या करती हैं?\nवह फिलहाल भारतीय सेना में हवलदार के तौर पर सेवाएं दे रही हैं.\n\n8. कॉमनवेल्थ टीम में जगह बनाने से पहले साक्षी ने किसे हराया था?\nउन्होंने कई बार की वर्ल्ड चैंपियन निहत ज़रीन और पूर्व नेशनल चैंपियन मीनाक्षी हुड्डा को हराया था.\n\nप्रेरणा और सबक\n• ऊर्जा को सही दिशा दें: बचपन का झगड़ालू स्वभाव भी अगर सही खेल और सही मार्गदर्शन मिले तो बड़ी उपलब्धि में बदल सकता है.\n• सही कोच का साथ जरूरी: विजेंदर सिंह के कोच जगदीश सिंह जैसे अनुभवी प्रशिक्षक की देखरेख ने साक्षी की प्रतिभा को निखारने में बड़ी भूमिका निभाई.\n• सीमित संसाधनों से भी बड़ा सपना संभव: किसान पिता और गृहिणी मां की बेटी होने के बावजूद साक्षी ने मेहनत के दम पर कॉमनवेल्थ गोल्ड तक का सफर तय किया.\n• निरंतरता का फल: जूनियर वर्ल्ड चैंपियन से लेकर कॉमनवेल्थ गोल्ड तक, साक्षी ने कई सालों की मेहनत और लगातार बेहतर प्रदर्शन से यह मुकाम हासिल किया.\n• बड़े नामों से मुकाबला करने का साहस: निहत ज़रीन और मीनाक्षी हुड्डा जैसी दिग्गज मुक्केबाजों को हराकर टीम में जगह बनाने का हौसला दिखाया.",
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  "category": "खेल",
  "publishedAt": "2026-08-01",
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