# बंदूक की नली से देश को नई पहचान देने वाले जसपाल राणा: एक युग का अंत

> उत्तरकाशी में जन्मे और बेहद कम उम्र में देश के पहले निशानेबाजी सितारे बने जसपाल राणा का निधन हो गया। उनका पार्थिव शरीर देहरादून स्थित आवास पर लाया गया।

**Category:** खेल · **Published:** 2026-06-12 · **Source:** TrendKia
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ऐसे दौर में जब भारत की पूरी खेल चेतना सिर्फ क्रिकेट के इर्द-गिर्द घूमती थी, एक नौजवान ने बंदूक की नली के सहारे देश को एक ऐसा खेल पहचनवाया जिससे लोग लगभग अनजान थे। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मे जसपाल राणा सिर्फ एक चैंपियन निशानेबाज नहीं, बल्कि एक पूरे खेल आंदोलन का चेहरा थे। उनके निधन के साथ भारतीय निशानेबाजी के एक स्वर्णिम अध्याय पर विराम लग गया है। उनका पार्थिव शरीर देहरादून स्थित उनके आवास पर लाया गया।

## क्रिकेट के दीवाने देश में एक अलग हीरो
भारत के दुनिया में निशानेबाजी की एक ताकत बनकर उभरने से बहुत पहले, किशोर राणा ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने प्रदर्शन से एक पूरी पीढ़ी के मन में जोश भर दिया था। जिस खेल को आम भारतीय जानता तक नहीं था, उसके वे पहले सितारों में से एक बन गए। निशाने पर असाधारण पकड़, मैदान के बाहर बेबाक और साफगोई भरा अंदाज और आगे चलकर युवा प्रतिभाओं को परखने वाली पारखी नजर — यही उनकी पहचान थी। शायद वे पहले ऐसे निशानेबाज थे जिन्होंने इस खेल में देश के मजबूत होने से पहले ही करोड़ों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उनका आगे आना भारतीय निशानेबाजी के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ।

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## कंधों पर उठे बेटे की वह अमर तस्वीर
भारतीय खेल जगत की यादों में एक दृश्य हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है। साल 1994 के राष्ट्रमंडल खेल, स्थान विक्टोरिया — शानदार प्रदर्शन के बाद किशोर राणा को उनके पिता ने अपने कंधों पर उठा लिया था। जिस खेल से देश लगभग अपरिचित था, उसे अपना एक नायक मिल चुका था। यह सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं थी, बल्कि उस खिलाड़ी का उदय था जो आगे चलकर एक चैंपियन और एक कोच, दोनों रूपों में भारतीय निशानेबाजी की किस्मत की दिशा बदलने वाला था। इस कामयाबी ने राणा परिवार की तकदीर तो बदली ही, इससे भी बड़ी बात यह रही कि इसने पूरे देश को बता दिया कि निशानेबाजी पदक दिलाने वाला खेल बन सकती है।

## 12 साल की उम्र से दो दशक का सफर
राणा ने महज 12 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर अपने इरादे जता दिए थे। इसके बाद उनका करियर करीब दो दशकों तक फैला, जिसमें उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में कई पदक अपने नाम किए। वे ओलंपियन भी रहे और 1996 के अटलांटा ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया, हालांकि वहां पदक उनके हाथ नहीं लगा।

## जिस नींव पर खड़े हुए ओलंपिक पदक
बाद के वर्षों में राजवर्धन सिंह राठौड़ ने 2004 के एथेंस ओलंपिक में रजत और अभिनव बिंद्रा ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा, लेकिन इस इमारत की नींव एक तरह से राणा ने ही रखी थी। उनके जज्बे की मिसाल दोहा में हुए 2006 के एशियाई खेलों में भी देखने को मिली, जब उन्होंने तेज बुखार और मतली से जूझते हुए भी तीन स्वर्ण पदक जीते।

## बीमारी को मात देने वाला जुझारूपन
उनकी इसी जिद और जुझारूपन की झलक 1995 में दिल्ली में हुई राष्ट्रमंडल निशानेबाजी चैंपियनशिप में भी दिखी थी। उस समय वे 'फूड प्वाइजनिंग' से पीड़ित थे, फिर भी मैदान में उतरे। राष्ट्रीय कोच सनी थॉमस इस बात को लेकर परेशान थे कि उनका स्टार निशानेबाज अभ्यास के लिए पहुंच भी पाएगा या नहीं, लेकिन राणा ने अपनी बीमारी को किनारे रखकर आधा दर्जन से ज्यादा पदक जीते। यही दृढ़ता आगे चलकर उनके जुझारू व्यक्तित्व की पहचान बन गई।

## निशानेबाजी से सियासत तक
राणा के पिता नारायण सिंह राणा एक पूर्व सैनिक रहे हैं। पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने राजनीति में भी किस्मत आजमाई और अलग-अलग समय पर भाजपा तथा कांग्रेस, दोनों दलों से जुड़ी रही। हालांकि चुनावी मैदान में उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी। खेल के मैदान पर मिली शोहरत के बावजूद सियासत उनके हक में नहीं रही।

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