दंगल में पसीना और थाली में देसी घी: अलवर के साहिल खान ने 600 दिग्गजों को पछाड़ जीता राजस्थान केसरी का ताज अलवर के पहलवान साहिल खान ने कोटा राष्ट्रीय दशहरा मेले में 600 से अधिक पहलवानों को मात देकर दूसरी बार राजस्थान केसरी का खिताब जीता। रोजाना सात घंटे अभ्यास और पारंपरिक डाइट के दम पर अब वे सीनियर नेशनल में पदक पर नजरें गड़ाए हैं। कोटा में आयोजित राष्ट्रीय दशहरा मेले के दंगल में अलवर के पहलवान साहिल खान ने अपनी फुर्ती और दांव-पेच से सबको हैरान कर दिया। इस महामुकाबले में हिस्सा लेने आए 600 से अधिक पहलवानों को एक के बाद एक धूल चटाते हुए उन्होंने दूसरी बार प्रतिष्ठित राजस्थान केसरी का खिताब अपने नाम कर लिया। साल 2018 में अखाड़े की मिट्टी थामने वाले इस युवा पहलवान की यह कामयाबी रातों-रात नहीं आई, बल्कि इसके पीछे आठ वर्षों की अनवरत तपस्या, कड़ा अनुशासन और पारंपरिक पहलवानों वाली जीवनशैली रही है। भोर की किरण से पहले अखाड़े की मिट्टी में दस्तक साहिल खान की दिनचर्या आम नौजवानों से काफी अलग और बेहद सख्त है। जब शहर गहरी नींद में सोया रहता है, तब ठीक सुबह 4 बजे उनकी आंखें खुल जाती हैं। बिस्तर छोड़ते ही वे सबसे पहले सूखे मेवे लेते हैं ताकि शरीर को अभ्यास के लिए शुरुआती ऊर्जा मिल सके। सुबह के 5 बजते ही वे अखाड़े में पहुंच जाते हैं और वहां 8 बजे तक लगातार तीन घंटे कड़ा पसीना बहाते हैं। इस सत्र में कुश्ती की बारीकियों, दांव-पेच और अपनी शारीरिक सहनशक्ति पर पूरा जोर रहता है। सुबह की कड़ी मेहनत के बाद उनका समय पोषक आहार लेने और शरीर को आराम देने में बीतता है। इसके बाद दोपहर ढलते ही शाम 4 बजे वे फिर से अभ्यास स्थल पर हाजिर हो जाते हैं। शाम का यह अभ्यास सत्र ठीक 7 बजे तक चलता है। यानी प्रतिदिन कुल मिलाकर छह से सात घंटे वे सिर्फ मैट और मिट्टी पर खुद को तराशने में लगाते हैं। तकनीक के साथ-साथ अपनी ताकत और रफ्तार को बनाए रखना उनकी इस दोहरी ट्रेनिंग का सबसे बड़ा मकसद होता है। पारंपरिक खुराक: 250 ग्राम बादाम और उतना ही देसी घी घंटों की थका देने वाली ट्रेनिंग के बाद शरीर को दोबारा उसी ऊर्जा के साथ तैयार करने के लिए साहिल पूरी तरह से कुदरती और पारंपरिक खानपान पर निर्भर रहते हैं। आधुनिक सप्लीमेंट्स के दौर में भी वे पुरानी देसी खुराक पर भरोसा जताते हैं। उनकी रोज की थाली में लगभग 250 ग्राम बादाम और 250 ग्राम शुद्ध देसी घी अनिवार्य रूप से शामिल रहता है। इसके अलावा ताजे फल, दूध और दही का पर्याप्त सेवन उनकी मांसपेशियां मजबूत रखने में मदद करता है। साहिल का स्पष्ट मानना है कि मैट पर मुकाबला जीतने के लिए शरीर की बुनियाद का मजबूत होना जरूरी है, जो केवल संतुलित और कुदरती खानपान से ही संभव हो सकता है। खानपान में यह शुद्धता ही उन्हें छह से सात घंटे के थकाऊ अभ्यास के बाद भी ऊर्जावान बनाए रखती है। उदयपुर से कोटा तक का सफर और अंतरराष्ट्रीय मंच की कसक वर्ष 2018 में जब साहिल ने कुश्ती जगत में पहला कदम रखा था, तब उनका सपना राज्य और देश स्तर पर अपनी अलग साख बनाना था। अपनी लगन के बूते उन्होंने राज्य स्तर पर चार पदक अपने नाम किए, जिनमें राजस्थान स्टेट चैंपियनशिप के कई स्वर्ण पदक भी शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने उदयपुर में आयोजित राजस्थान-मध्य प्रदेश केसरी दंगल जीतकर भी अपनी ताकत का लोहा मनवाया था। हालांकि, उनके खेल जीवन में एक बेहद भावुक मोड़ भी आया। साहिल खान ने अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप के चयन ट्रायल में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। दुर्भाग्यवश, वहां वे केवल एक अंक के मामूली फासले से बाउट हार गए और विश्व स्तर के उस बड़े मंच तक पहुंचने से चूक गए। उस हार ने उन्हें निराश करने के बजाय और ज्यादा मजबूत बनाया, जिसका परिणाम कोटा के विशाल दंगल में देखने को मिला। संघ का प्रोत्साहन और सीनियर नेशनल का नया लक्ष्य जीत के बाद अपनी बात रखते हुए साहिल खान ने कहा, "अखाड़े में जीत सिर्फ मुकाबले के कुछ मिनटों में नहीं मिलती, बल्कि उसके पीछे सालों का अनुशासन, मेहनत और समर्पण होता है।" पहलवानों को बेहतर माहौल देने के लिए राजस्थान राज्य कुश्ती संघ के अध्यक्ष राजीव दत्ता की तरफ से ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। संघ की ओर से खिलाड़ियों को देसी घी उपलब्ध कराने के अलावा विशेष किट, मैट शूज, मैच सूट और ट्रैक सूट जैसी जरूरी खेल सामग्री दी जा रही है। दूसरी बार राजस्थान केसरी का सम्मान हासिल करने के बाद अब साहिल खान का पूरा ध्यान सीनियर नेशनल कुश्ती प्रतियोगिता पर टिका है। वे राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्य की झोली में पदक डालना चाहते हैं और देश के शीर्ष पहलवानों की कतार में अपनी जगह पक्की करने में जुटे हैं। इसका आप पर असर पारंपरिक खेलों में उभरते खिलाड़ियों की यह सफलता ग्रासरूट खेल संस्कृति और पोषण जागरूकता को नई दिशा देती है। • राजस्थान में खेल का माहौल: राज्य के कस्बों और गांवों में अखाड़ा संस्कृति से जुड़े युवाओं को कुश्ती में करियर बनाने की नई प्रेरणा मिलेगी। इससे स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाले दंगलों और प्रतियोगिताओं में भागीदारी बढ़ेगी। • पारंपरिक पोषण का महत्व: कृत्रिम सप्लीमेंट्स पर निर्भरता के बजाय देसी घी, बादाम और दूध जैसे पारंपरिक खानपान की उपयोगिता आम फिटनेस प्रेमियों के सामने स्पष्ट होती है। नियमित व्यायाम करने वाले लोग संतुलित प्राकृतिक आहार को प्राथमिकता दे सकते हैं। • सरकारी व संघ स्तरीय सहयोग: खेल संघों द्वारा किट, जूते और पौष्टिक खुराक मुहैया कराने से आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभावान खिलाड़ियों को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। इससे राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व और पदक संख्या मजबूत होगी। • युवा एथलीटों के लिए सीख: वर्ल्ड चैंपियनशिप ट्रायल में एक अंक से मिली हार के बाद दोबारा खड़ा होना सिखाता है कि खेल में असफलता अंतिम नहीं होती। लक्ष्य पर अडिग रहकर खिलाड़ी बड़े मंचों पर दोबारा शानदार वापसी कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ साहिल खान की यह बड़ी जीत आठ साल की अनुशासित दिनचर्या, वैज्ञानिक विभाजन वाली ट्रेनिंग और संतुलित पारंपरिक पोषण के तालमेल से संभव हुई है। • कड़ा अभ्यास और अनुशासित दिनचर्या: साहिल प्रतिदिन सुबह और शाम मिलाकर छह से सात घंटे अखाड़े में कड़ा अभ्यास करते हैं। भोर में 4 बजे उठकर नियमित ट्रेनिंग करने से उनका स्टेमिना और दांव-पेच अन्य प्रतिद्वंद्वियों से कहीं बेहतर साबित हुए। • पारंपरिक उच्च कैलोरी आहार: रोजाना 250 ग्राम बादाम और 250 ग्राम शुद्ध देसी घी के साथ दूध-दही का सेवन उनके शरीर को जरूरी ताकत देता है। यह प्राकृतिक पोषण भारी अभ्यास के बाद मांसपेशियों की तीव्र रिकवरी सुनिश्चित करता है। • असफलता से मिली सीख: अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप ट्रायल में महज एक अंक से हारने के बाद उन्होंने अपनी गलतियों को सुधारा। उस झटके ने उन्हें मानसिक रूप से और मजबूत बनाया, जिसका लाभ कोटा के दंगल में मिला। • संघ की ओर से बुनियादी सुविधाएं: राजस्थान राज्य कुश्ती संघ के अध्यक्ष राजीव दत्ता द्वारा खिलाड़ियों को ट्रैक सूट, जूते और पौष्टिक खुराक उपलब्ध कराई जा रही है। इस प्रकार के प्रशासनिक सहयोग ने खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाया है। सवाल-जवाब 1. साहिल खान ने कोटा में कौन सा प्रतिष्ठित खिताब जीता है? साहिल खान ने कोटा के राष्ट्रीय दशहरा मेले में 600 से अधिक पहलवानों को मात देकर दूसरी बार राजस्थान केसरी का खिताब जीता है। 2. साहिल खान मूल रूप से कहां के निवासी हैं और उन्होंने कुश्ती कब शुरू की? साहिल खान राजस्थान के अलवर जिले के रहने वाले हैं और उन्होंने साल 2018 में कुश्ती की शुरुआत की थी। 3. साहिल की रोजाना की खुराक में कौन से मुख्य खाद्य पदार्थ शामिल हैं? उनकी रोजाना की डाइट में 250 ग्राम बादाम और 250 ग्राम शुद्ध देसी घी के साथ दूध, दही, सूखे मेवे और फल शामिल हैं। 4. साहिल खान प्रतिदिन कितने घंटे अखाड़े में अभ्यास करते हैं? वे रोजाना सुबह 5 से 8 बजे तक और शाम को 4 से 7 बजे तक कुल 6 से 7 घंटे अखाड़े में कड़ा अभ्यास करते हैं। 5. साहिल खान अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में जाने से कैसे चूक गए थे? वे अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप के चयन ट्रायल में कड़े मुकाबले के दौरान महज एक अंक के अंतर से हारकर बाहर हो गए थे। 6. राजस्थान केसरी बनने के बाद साहिल खान का अगला खेल लक्ष्य क्या है? उनका अगला बड़ा लक्ष्य सीनियर नेशनल कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेकर राजस्थान के लिए पदक जीतना है। प्रेरणा और सबक आठ वर्षों की अनवरत मेहनत और निराशा को मात देकर शिखर छूने वाले साहिल खान की यात्रा से हर युवा को सीख मिलती है। • अनुशासन ही सफलता की असली चाबी है: सुबह 4 बजे उठकर हर रोज छह से सात घंटे अभ्यास करना यह सिखाता है कि प्रतिभा तभी चमकती है जब उसे कठोर अनुशासन का साथ मिले। • हार को अगले मुकाम की सीढ़ी बनाएं: अंडर-23 विश्व चैंपियनशिप के ट्रायल में सिर्फ एक अंक से हारने के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि दुगने संकल्प के साथ कोटा में 600 पहलवानों को मात दी। • बुनियादी और कुदरती आदतों पर भरोसा रखें: आधुनिक दिखावे से दूर रहकर पारंपरिक देसी खानपान और मिट्टी के अखाड़े के दांव-पेचों पर भरोसा बनाए रखना उनकी असली ताकत साबित हुआ। https://trendkia.com/sports/dngala-men-pasina-aura-thali-men-desi-ghi-alwar-ke-sahil-khan-ne-600-diggajon-ko-pachhara-jita-rajasthan-kesari-ka-taja-56927 TrendKia — Har trend, sabse pehle.