# द्रोणाचार्य अवॉर्डी सागरमल धायल से मिली कड़ी ट्रेनिंग के दम पर मुक्केबाज सनी धयाल ने हासिल की खास पहचान

> द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित बॉक्सिंग कोच सागरमल धायल ने अपने बेटे सनी धयाल को मुक्केबाजी की बारीकियों के साथ जीवन में संघर्ष का पाठ पढ़ाया। सनी अपनी सफलता और पदकों को पिता के मार्गदर्शन की देन मानते हैं।

**Type:** article · **Category:** खेल · **Published:** 2026-07-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/sports/dronacharya-avordi-sagar-mal-dhayal-se-mili-kari-treninga-ke-dama-para-mukkebaja-sunny-dhayal-ne-hasila-ki-khasa-pahachana-11805 · **Language:** Hindi
**Tags:** सागरमल धायल, सनी धयाल, द्रोणाचार्य पुरस्कार, भारतीय रेलवे, मुक्केबाजी, गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा का अवसर हमेशा उन गुरुओं को याद करने का दिन होता है जिन्होंने अपने शिष्यों को जीवन की सही राह दिखाई है। खेल जगत में कई ऐसी कहानियां देखने को मिलती हैं जहां सही मार्गदर्शन ने किसी खिलाड़ी की पूरी जिंदगी बदल दी। ऐसी ही एक अनूठी और प्रेरणादायक कहानी मुक्केबाजी की दुनिया से सामने आती है, जहां एक पिता ने अपने पुत्र को पेशेवर मुक्केबाज बनाने के लिए पिता के साथ-साथ एक कठोर गुरु की भूमिका भी निभाई। भारतीय रेलवे की पुरुष मुक्केबाजी टीम के मुख्य कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित सागरमल धायल ने देश को कई नामचीन मुक्केबाज दिए हैं। उन्होंने अपने बेटे सनी धयाल को भी उसी समर्पण, कठिन मेहनत और अनुशासन के साथ तैयार किया, जो एक चैंपियन खिलाड़ी बनाने के लिए जरूरी होता है। सनी धयाल आज अपनी हर सफलता का श्रेय अपने पिता और गुरु की सीख को ही देते हैं।

## रिंग में पिता नहीं, बल्कि गुरु का कठोर अनुशासन
सनी धयाल के अनुसार, मुक्केबाजी की औपचारिक और शुरुआती ट्रेनिंग वर्ष 2009 में उनके पिता सागरमल धायल के मार्गदर्शन में शुरू हुई थी। शुरुआती दिनों से ही रिंग के भीतर का माहौल घर से बिल्कुल अलग रहता था। सनी स्पष्ट रूप से मानते हैं कि यदि उनके पिता ने रिंग के अंदर एक अभिभावक जैसा कोमल व्यवहार किया होता, तो वह शायद कभी एक सफल मुक्केबाज नहीं बन पाते। जब भी सनी रिंग में उतरते थे, उनके पिता उन्हें केवल एक शिष्य के रूप में देखते थे और उनसे कड़ी मेहनत तथा कड़े अनुशासन की अपेक्षा करते थे। अभ्यास के दौरान न तो कोई रियायत दी जाती थी और न ही किसी गलती को नजरअंदाज किया जाता था। इसी पेशेवर रवैये ने सनी के अंदर खेल के प्रति गंभीरता और निष्ठा की मजबूत नींव रखी।

## हार से सीखने और संघर्ष करने का मूलमंत्र
मुक्केबाजी के इस लंबे सफर में सनी धयाल को कई बार मुकाबलों में हार का भी सामना करना पड़ा। लेकिन हर असफलता के बाद उनके पिता ने उन्हें टूटने के बजाय नए सिरे से खड़े होना सिखाया। सनी बताते हैं कि उनके पिता की दी हुई सबसे महत्वपूर्ण सीख यह थी कि **"जीतने के बाद तो सब साथ होते हैं, हारने के बाद कोई नहीं होता।"** इस विचार ने सनी की मानसिक दृढ़ता को बहुत मजबूत बनाया। जब भी वे रिंग में निराश महसूस करते थे, पिता का मार्गदर्शन उन्हें दोबारा खड़े होकर मुकाबला करने की प्रेरणा देता था। इसी सीख ने उन्हें हर परिस्थिति में संयम बनाए रखने और असफलता से सबक लेकर आगे बढ़ने का हौसला दिया, जो आज भी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है।

## उपलब्धियां, दोहरी जिम्मेदारी और सर्वोच्च गुरुदक्षिणा
कठिन प्रशिक्षण और आत्मसंयम के बल पर सनी धयाल ने मुक्केबाजी प्रतियोगिता में कई पदक और महत्वपूर्ण सम्मान हासिल किए हैं। वर्तमान में वह भारतीय रेलवे में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और अपने कार्यस्थल की जिम्मेदारियों को खेल के साथ कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। रिंग में प्रवेश करने से पहले आत्मविश्वास, धैर्य और मुकाबले की रणनीति का जो पाठ उन्होंने सीखा था, वह आज जीवन के हर मोर्चे पर काम आ रहा है। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सनी अत्यंत भावुक होकर बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें केवल बॉक्सिंग की तकनीक ही नहीं सिखाई, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव में डटे रहना भी सिखाया। उनके लिए अपनी हर उपलब्धि, प्रत्येक पदक और सफलता को अपने पिता और गुरु के चरणों में समर्पित करना ही सबसे बड़ी गुरुदक्षिणा है।

## इसका आप पर असर
यह कहानी खेल और व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन के महत्व को रेखांकित करती है:

- **भारत में:** युवा एथलीटों और उनके अभिभावकों के लिए यह कहानी संदेश देती है कि समर्पण और निष्पक्ष प्रशिक्षण से ही राष्ट्रीय स्तर पर खेल में सफलता अर्जित की जा सकती है।
- **खेल प्रेमियों के लिए:** हार के बाद फिर से खड़े होने का यह संदेश किसी भी करियर या क्षेत्र में प्रयासरत युवाओं के लिए प्रेरणादायी है।

## सवाल-जवाब

### 1. सागरमल धायल कौन हैं?
सागरमल धायल द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित मुक्केबाजी कोच हैं और वर्तमान में भारतीय रेलवे की पुरुष मुक्केबाजी टीम के मुख्य कोच हैं।

### 2. सनी धयाल ने अपने पिता से मुक्केबाजी की ट्रेनिंग कब शुरू की?
सनी धयाल ने वर्ष 2009 में अपने पिता सागरमल धायल के मार्गदर्शन में मुक्केबाजी की औपचारिक ट्रेनिंग शुरू की थी।

### 3. सनी धयाल के अनुसार रिंग के भीतर उनके पिता का व्यवहार कैसा रहता था?
रिंग के अंदर उनके पिता एक सख्त कोच की तरह व्यवहार करते थे और बिना किसी पारिवारिक रियायत के कड़ा अनुशासन बनाए रखते थे।

### 4. हार का सामना करने को लेकर पिता की सबसे बड़ी सीख क्या थी?
पिता की सबसे बड़ी सीख यह थी कि जीतने के बाद तो सब साथ होते हैं लेकिन हारने के बाद कोई नहीं होता, इसलिए गिरकर दोबारा खड़े होना ही असली ताकत है।

### 5. वर्तमान में सनी धयाल कहां कार्यरत हैं?
सनी धयाल वर्तमान में भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं और अपनी नौकरी की जिम्मेदारियों के साथ खेल में भी सक्रिय हैं।

## प्रेरणा और सबक
सागरमल धायल और सनी धयाल की इस यात्रा से मिलने वाले मुख्य संदेश:

- **अनुशासन और पेशेवर रवैया:** व्यक्तिगत रिश्तों को काम के आड़े न आने देना और लक्ष्य के प्रति पूरी निष्ठा रखना ही सफलता की पहली शर्त है।
- **हार से सीखने की कला:** असफलता से घबराने के बजाय अपनी गलतियों को पहचानकर दोबारा प्रयास करना खिलाड़ी की असली ताकत होती है।
- **कृतज्ञता का भाव:** सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी अपने मार्गदर्शकों के योगदान को याद रखना और सम्मान देना।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._