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  "type": "article",
  "title": "ग्लासगो CWG 2026 में मीराबाई चानू और शर्मिला धनखड़ समेत 5 भारतीय महिला एथलीटों ने गाड़े सफलता के झंडे",
  "summary": "ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की महिला खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पदकों की बारिश की है। मीराबाई चानू, शर्मिला धनखड़, ज्ञानेश्वरी यादव, हरजिंदर कौर और बिंदियारानी देवी ने अभावों और सामाजिक दुश्वारियों को पछाड़कर पोडियम पर तिरंगा फहराया।",
  "content": "स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के मंच पर भारत की महिला खिलाड़ियों ने अपनी उत्कृष्ट खेल प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। भारोत्तोलन और पैरा एथलेटिक्स जैसी बेहद चुनौतीपूर्ण प्रतियोगिताओं में भारतीय महिला दल ने अपनी धाक जमाते हुए कई पदक अपने नाम किए। जहां एक ओर स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और पैरा एथलीट शर्मिला धनखड़ ने अपने-अपने इवेंट्स में स्वर्णिम सफलता हासिल करते हुए देश की झोली में गोल्ड मेडल डाले, वहीं ज्ञानेश्वरी यादव, हरजिंदर कौर और बिंदियारानी देवी ने अपनी ताकत और कौशल के दम पर सिल्वर मेडल जीतकर तिरंगे की शान बढ़ाई। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय खेल जगत के शीर्ष पोडियम पर चमकते इन चमचमाते पदकों के पीछे अत्यधिक गरीबी, गंभीर शारीरिक चुनौतियों, पारिवारिक दुश्वारियों, चोटों और बुनियादी संसाधनों के भारी अभाव की एक ऐसी मार्मिक दास्तान छिपी है जो किसी की भी आंखों को नम कर सकती है। यह उपलब्धि सिर्फ खेल के मैदान पर मिली कोई साधारण जीत नहीं है, बल्कि जीवन की तमाम विषम परिस्थितियों के विरुद्ध इन पांच साहसी बेटियों के अटूट संकल्प और कभी न हार मानने वाले जज्बे का जीवंत प्रमाण है।\n\nमीराबाई चानू: इंफाल की पहाड़ियों से लेकर ग्लासगो के पोडियम तक की स्वर्णिम दास्तान\n\nग्लासगो में जारी राष्ट्रमंडल खेलों की 48 किलोग्राम भारवर्ग वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में मीराबाई चानू ने एक बार फिर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। जब पदक वितरण समारोह के दौरान पोडियम पर खड़े होकर मीराबाई चानू के गले में स्वर्ण पदक पहनाया गया और राष्ट्रगान की गूंज के साथ भारतीय तिरंगा ऊपर लहराने लगा, तब उनकी आंखों से बहते आंसुओं ने हर खेल प्रेमी के दिल को छू लिया। वे आंसू महज खुशी के नहीं थे, बल्कि उस लंबे और कठिन सफर का गवाह थे जो उन्होंने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए तय किया है। मणिपुर के इंफाल पूर्व जिले में स्थित बेहद साधारण गांव नोंगपोक काकचिंग की रहने वाली मीराबाई का बचपन से ही संघर्षों से गहरा नाता रहा है। एक बेहद गरीब और साधारण परिवार में पली-बढ़ीं मीरा बचपन में अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए आसपास की पहाड़ियों से लकड़ी के भारी-भरकम गट्ठर उठाकर लाया करती थीं। उसी दौरान गांव वालों और परिवार ने उनकी अद्भुत शारीरिक क्षमता और ताकत को पहचाना था।\n\nराष्ट्रीय स्तर पर अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर मीराबाई चानू ने 2016 के रियो ओलंपिक में भारतीय दल का प्रतिनिधित्व किया था। हालांकि, रियो ओलंपिक उनके लिए किसी बुरे सपने जैसा साबित हुआ, जहां वे अपने तीनों प्रयासों में असफल रहीं और उन्हें बिना कोई वैध स्कोर बनाए खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। इस असफलता के बाद दुनिया ने उन्हें खारिज करना शुरू कर दिया था। इसके साथ ही पीठ के गंभीर दर्द और मांसपेशियों की चोटों ने उनके करियर पर बड़ा अनिश्चितता का बादल खड़ा कर दिया था। इसके बावजूद मीराबाई ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी चोटों का गहन इलाज कराया, कठिन रिहैबिलिटेशन प्रक्रिया से गुजरीं और जबरदस्त वापसी करते हुए टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर अपने आलोचकों को करारा जवाब दिया। टोक्यो में मिली इस ऐतिहासिक सफलता के बाद अब उन्होंने ग्लासगो में लगातार दूसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड मेडल जीतकर यह साबित कर दिया है कि सच्ची लगन, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे कोई भी शारीरिक या मानसिक बाधा नहीं टिक सकती।\n\nशर्मिला धनखड़: पोलियो और पारिवारिक हिंसा को पछाड़कर शॉट पुट में रचा इतिहास\n\nपैरा एथलेटिक्स के मैदान पर हरियाणा की बेटी शर्मिला धनखड़ ने वह कारनामा कर दिखाया है जो आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। शर्मिला ने शॉट पुट की F57 कैटेगरी में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए 9.81 मीटर का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और देश के लिए गोल्ड मेडल अपने नाम किया। शर्मिला के लिए अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक का यह सफर कांटों से भरा हुआ था। हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव की रहने वाली शर्मिला जब महज दो साल की मासूम बच्ची थीं, तभी वे पोलियो की चपेट में आ गई थीं। उनकी शारीरिक अक्षमता के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद दयनीय थी। उनके पिता एक बेहद गरीब किसान थे और उनकी मां आंखों की रोशनी न होने के कारण देखने में पूरी तरह असमर्थ थीं। ऐसे अभावग्रस्त माहौल में पली-बढ़ी शर्मिला की जब शादी हुई, तो उनकी जिंदगी में मुश्किलों का नया पहाड़ टूट पड़ा। शादी के बाद उनके पहले पति ने उनके साथ गंभीर रूप से मारपीट और घरेलू हिंसा करना शुरू कर दिया।\n\nपति के इस अमानवीय व्यवहार और निरंतर प्रताड़ना से तंग आकर शर्मिला ने अंततः अपनी दो नन्हीं बेटियों के साथ उस घर को हमेशा के लिए छोड़ देने का साहसिक फैसला लिया। अपनी बेटियों के भविष्य की रक्षा के लिए वे वापस अपने पिता के घर लौट आईं। कुछ समय के बाद उनके पिता ने शर्मिला की दूसरी शादी करा दी, और यही फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। शर्मिला के दूसरे पति बेहद संवेदनशील और सहयोगी सोच के इंसान निकले। उन्होंने शर्मिला की क्षमताओं पर विश्वास जताया और उन्हें पैरा एथलेटिक्स में अपना करियर बनाने के लिए लगातार प्रेरित किया। 34 साल की उम्र में, जब ज्यादातर खिलाड़ी अपने संन्यास के बारे में सोचने लगते हैं, शर्मिला ने कोच टेकचंद और देवेंद्र के कुशल मार्गदर्शन में शॉट पुट का पेशेवर प्रशिक्षण लेना शुरू किया। सालों तक दिन-रात बहाए गए पसीने और अटूट मेहनत का ही परिणाम है कि आज शर्मिला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर भारत का मान दुनिया भर में बढ़ाया है।\n\nज्ञानेश्वरी यादव: इलेक्ट्रिशियन पिता का त्याग और सीमित साधनों में गढ़ी गई रजत गाथा\n\nछत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की रहने वाली ज्ञानेश्वरी यादव ने भी ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। ज्ञानेश्वरी ने महिलाओं की 53 किलोग्राम भारवर्ग वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के लिए सिल्वर मेडल हासिल किया। ज्ञानेश्वरी एक बेहद साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पिता दीपक यादव अपने समय के एक नामचीन और उच्च स्तरीय पहलवान रहे थे। खेल के प्रति गहरा लगाव होने के बावजूद परिवार का पेट पालने और घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें खेल छोड़कर एक साधारण इलेक्ट्रिशियन का काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। जब ज्ञानेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग में अपना करियर बनाने का सपना देखा, तो शुरुआत में उनके परिवार के पास उनके लिए महंगे प्रोटीन डाइट, न्यूट्रिशन और आधुनिक ट्रेनिंग किट खरीदने तक के पैसे मौजूद नहीं थे।\n\nआर्थिक तंगी के इस भारी दबाव के बावजूद ज्ञानेश्वरी के परिवार ने उनके सपनों को कभी टूटने नहीं दिया। पिता दीपक यादव ने अपनी अधूरी खेल आकांक्षाओं को बेटी के जरिए पूरा करने का संकल्प लिया। ज्ञानेश्वरी ने बिना किसी बड़ी हाई-टेक अकादमी या अंतरराष्ट्रीय सुविधाओं के, केवल स्थानीय कोचों के मार्गदर्शन में साधारण जिमों और खुले मैदानों में घंटों पसीना बहाया। उनकी लगन का ही नतीजा था कि उन्होंने जूनियर स्तर पर आयोजित विश्व कप प्रतियोगिता में पदक जीतकर बहुत पहले ही अपनी अंतरराष्ट्रीय क्षमता का परिचय दे दिया था। ग्लासगो में जीता गया यह सिल्वर मेडल इस बात की गवाही देता है कि यदि इरादे मजबूत हों तो साधनों की कमी कभी सफलता के रास्ते की रुकावट नहीं बन सकती।\n\nहरजिंदर कौर: खेतों की कड़कड़ाती धूप और चारा काटने वाले हाथों की ताकतवर वापसी\n\nपंजाब के पटियाला जिले की रहने वाली हरजिंदर कौर की कहानी भी भारतीय खेल इतिहास की सबसे प्रेरणादायक दास्तानों में से एक है। हरजिंदर ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 69 किलोग्राम भारवर्ग वेटलिफ्टिंग में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए सिल्वर मेडल अपने नाम किया है। हरजिंदर की पारिवारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से खेती-किसानी पर आधारित रही है। उनके पिता छोटे पैमाने पर खेती और मवेशी पालन करके अपने परिवार का जीवन यापन करते थे। एक किसान की बेटी होने के नाते हरजिंदर ने कभी भी कड़ी मेहनत से जी नहीं चुराया। बचपन से ही वे अपने पिता के साथ खेतों के कठिन कामों में हाथ बंटाया करती थीं और घर पर मवेशियों के लिए भारी चारा काटने का काम करती थीं। चारा काटने और खेतों में काम करने की इसी शारीरिक गतिविधि ने अनजाने में उनकी शारीरिक ताकत को काफी मजबूत बना दिया था।\n\nशुरुआती दिनों में हरजिंदर ने कबड्डी और रस्साकशी जैसे पारंपरिक खेलों में अपनी किस्मत आजमाई थी। लेकिन जब उनके स्थानीय कोचों ने उनकी असाधारण शारीरिक क्षमता, ग्रिप और ताकत को देखा, तो उन्होंने हरजिंदर को वेटलिफ्टिंग की तरफ कदम बढ़ाने का सुझाव दिया। हालांकि, वेटलिफ्टिंग का खेल काफी खर्चीला था और सही खुराक तथा ट्रेनिंग उपकरण जुटाना उनके परिवार के लिए बेहद कठिन था। एक समय ऐसा भी आया जब परिवार पर भारी कर्ज चढ़ गया था और हरजिंदर के खेल को जारी रखने पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। इसके बावजूद हरजिंदर ने अपने ध्यान को लक्ष्य से भटकने नहीं दिया। अपनी अथक मेहनत और अटूट एकाग्रता के बल पर उन्होंने तमाम वित्तीय बाधाओं को चीरते हुए आज विश्व स्तर पर रजत पदक जीतकर अपने देश और परिवार का नाम रोशन किया है।\n\nबिंदियारानी देवी: किराना दुकान की तंगी और मणिपुर की नाकेबंदी को चीरकर बनीं 'मीराबाई चानू 2.0'\n\nमणिपुर की होनहार एथलीट बिंदियारानी देवी ने ग्लासगो में 58 किलोग्राम भारवर्ग वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में दमदार प्रदर्शन करते हुए सिल्वर मेडल भारत के नाम किया। बिंदियारानी भी उसी राज्य और उसी ट्रेनिंग सेंटर से आती हैं जहां से स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने अपने शुरुआती खेल के गुण सीखे थे। यही वजह है कि खेल प्रेमियों और विश्लेषकों के बीच उन्हें अक्सर 'मीराबाई चानू 2.0' के नाम से जाना जाता है। बिंदियारानी का बचपन भी घोर आर्थिक अभावों के बीच बीता है। उनके पिता एक छोटी सी परचून यानी किराने की दुकान चलाते थे, जिससे होने वाली मामूली आय से परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो पाता था। अपने खेल सफर की शुरुआत बिंदियारानी ने मार्शल आर्ट्स यानी ताइक्वांडो से की थी। लेकिन कोचों ने जब उनकी कम लंबाई और शरीर के बेहतरीन संतुलन को देखा, तो उन्हें वेटलिफ्टिंग में आने की सलाह दी गई।\n\nमणिपुर में बार-बार होने वाली राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक नाकेबंदी, बिजली की कटौती और बुनियादी खेल सुविधाओं के भारी अभाव के बावजूद बिंदियारानी ने कभी अपना अभ्यास नहीं रोका। ट्रेनिंग के दौरान कई बार उन्हें पीठ और घुटनों की गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा, लेकिन हर बार उन्होंने दोगुनी ऊर्जा के साथ वापसी की। उनकी क्लीन एंड जर्क तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे बेहतरीन तकनीकों में से एक माना जाता है। इसी बेहतरीन तकनीक और मानसिक मजबूती के दम पर उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर यह साबित कर दिया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, सच्ची मेहनत हमेशा रंग लाती है।\n\nभारतीय खेल परिदृश्य के लिए महिला खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन क्यों है ऐतिहासिक\n\nग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की इन पांच महिला खिलाड़ियों मीराबाई चानू, शर्मिला धनखड़, ज्ञानेश्वरी यादव, हरजिंदर कौर और बिंदियारानी देवी का प्रदर्शन केवल पदकों की संख्या तक सीमित नहीं है। यह सफलता भारतीय समाज के उन ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरी है जहां आज भी बेटियों के लिए खेल को करियर बनाना एक कठिन चुनौती माना जाता है। इन खिलाड़ियों ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या महंगी अकादमियों की मोहताज नहीं होती। लकड़ी के गट्ठर ढोने से लेकर खेतों में चारा काटने और गंभीर शारीरिक अक्षमताओं से जूझने तक का इनका सफर देश के करोड़ों युवाओं को जीवन की हर कठिनाई से टकराने की प्रेरणा देता है। भारत सरकार और राज्य सरकारों को भी इन कहानियों से सीख लेते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में खेल के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसी और भी बेटियां वैश्विक मंच पर भारत का परचम लहरा सकें।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: यह ऐतिहासिक उपलब्धि देश भर की युवा महिला खिलाड़ियों को बुनियादी संसाधनों और सामाजिक दबावों के बावजूद खेलों को करियर के रूप में अपनाने की मजबूत प्रेरणा देती है।\n\nमणिपुर, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और पंजाब में: इन राज्यों की बेटियों की सफलता से ग्रामीण क्षेत्रों में खेल बुनियादी ढांचे के विकास और महिला एथलीटों के लिए बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं के निर्माण को नई गति मिलेगी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मीराबाई चानू ने कौन सा पदक जीता है?\nमीराबाई चानू ने 48 किलोग्राम भारवर्ग वेटलिफ्टिंग में गोल्ड मेडल जीता है। यह कॉमनवेल्थ गेम्स में उनका लगातार दूसरा स्वर्ण पदक है।\n\n2. पैरा एथलीट शर्मिला धनखड़ का प्रदर्शन कैसा रहा और उन्होंने किस स्पर्धा में पदक जीता?\nशर्मिला धनखड़ ने शॉट पुट की F57 कैटेगरी में 9.81 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए भारत के लिए गोल्ड मेडल हासिल किया।\n\n3. ज्ञानेश्वरी यादव की पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है और उन्होंने क्या हासिल किया?\nज्ञानेश्वरी यादव छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की रहने वाली हैं। उनके पिता दीपक यादव एक पहलवान थे जो इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं। ज्ञानेश्वरी ने 53 किलोग्राम भारवर्ग वेटलिफ्टिंग में सिल्वर मेडल जीता है।\n\n4. हरजिंदर कौर ने वेटलिफ्टिंग में आने से पहले कौन से खेल खेले थे?\nपंजाब के पटियाला की हरजिंदर कौर ने शुरुआत में कबड्डी और रस्साकशी खेला था। बाद में कोचों की सलाह पर वे वेटलिफ्टिंग में आईं, जहां उन्होंने 69 किलोग्राम भारवर्ग में सिल्वर मेडल जीता।\n\n5. बिंदियारानी देवी को 'मीराबाई चानू 2.0' क्यों कहा जाता है?\nबिंदियारानी देवी भी मणिपुर से आती हैं और उन्होंने उसी ट्रेनिंग सेंटर से वेटलिफ्टिंग सीखी है जहां से मीराबाई चानू ने शुरुआत की थी। उन्होंने 58 किलोग्राम भारवर्ग में सिल्वर मेडल जीता है।\n\n6. शर्मिला धनखड़ ने किस उम्र में शॉट पुट का अभ्यास शुरू किया था?\nशर्मिला धनखड़ ने 34 साल की उम्र में कोच टेकचंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में शॉट पुट का अभ्यास शुरू किया था।\n\nप्रेरणा और सबक\nदृढ़ संकल्प और निरंतरता: 2016 रियो ओलंपिक में तीनों प्रयास विफल होने और गंभीर चोटों के बावजूद मीराबाई चानू ने हार नहीं मानी और लगातार दो कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता।\n\nघरेलू हिंसा और शारीरिक चुनौती पर विजय: पोलियो, अत्यधिक गरीबी और पहले पति की शारीरिक हिंसा का सामना करने के बावजूद शर्मिला धनखड़ ने 34 वर्ष की उम्र में शॉट पुट शुरू किया और देश के लिए गोल्ड मेडल हासिल किया।\n\nसीमित संसाधनों में श्रेष्ठता: ज्ञानेश्वरी यादव, हरजिंदर कौर और बिंदियारानी देवी ने खेतों में काम करने, मवेशियों का चारा काटने और क्षेत्रीय नाकेबंदी जैसी विषम परिस्थितियों के बीच अभ्यास जारी रखकर अंतरराष्ट्रीय पोडियम हासिल किया।",
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  "publishedAt": "2026-07-29",
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