# ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों की 70kg मुक्केबाजी में अरुंधति चौधरी ने इंग्लैंड की चैंटल रीड को हराकर हासिल किया स्वर्ण पदक

> ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाज अरुंधति चौधरी ने 70kg स्पर्धा के फाइनल में सर्वसम्मति से जीत दर्ज कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया, जिससे भारत 34 पदकों के साथ तालिका में चौथे स्थान पर पहुंच गया है।

**Type:** article · **Category:** खेल · **Published:** 2026-08-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/sports/glasgow-rashtramndala-khelon-ki-70kg-mukkebaji-men-arundhati-choudhary-ne-england-ki-chantal-reid-ko-harakara-hasila-kiya-svarna-p-12926 · **Language:** Hindi
**Tags:** अरुंधति चौधरी, ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल, बॉक्सिंग, स्वर्ण पदक, चैंटल रीड, कोटा, भारतीय मुक्केबाजी

ग्लासगो में आयोजित हो रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाज़ों का शानदार प्रदर्शन लगातार जारी है। इसी क्रम में भारत की उभरती हुई महिला मुक्केबाज़ अरुंधति चौधरी ने रिंग में अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए महिलाओं की 70 किलोग्राम भारवर्ग स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर एक नया इतिहास रच दिया है। फाइनल मुकाबले में एकतरफा खेल दिखाते हुए उन्होंने भारतीय दल को स्वर्णिम सफलता दिलाई। अरुंधति की इस यादगार जीत की बदौलत प्रतियोगिता की कुल पदक तालिका में भारत की स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई है। भारतीय दल अब कुल 34 पदकों के साथ अंक तालिका में चौथे स्थान पर काबिज हो गया है, जिसमें 11 स्वर्ण, 15 रजत और 8 कांस्य पदक शामिल हैं।

## फाइनल मुकाबले में 5-0 से एकतरफा जीत
70 किलोग्राम वर्ग के इस खिताबी मुकाबले में अरुंधति चौधरी का सामना इंग्लैंड की अनुभवी और मजबूत मुक्केबाज़ चैंटल रीड से था। रिंग में उतरते ही अरुंधति ने शुरुआत से ही अपनी आक्रामक शैली और सटीक रणनीति का परिचय दिया। उन्होंने रिंग में अपनी बेहतरीन फुटवर्क तकनीक, घातक पंचों और शानदार रक्षात्मक खेल से इंग्लैंड की मुक्केबाज़ को संभलने का कोई अवसर नहीं दिया। पूरे मैच के दौरान अरुंधति का दबदबा बना रहा और उनकी सटीक रणनीति के सामने विरोधी खिलाड़ी पूरी तरह असहाय नज़र आई। अंतिम और तीसरे दौर के निर्णय में जजों ने 5-0 के अंतर से सर्वसम्मति से अरुंधति के पक्ष में फैसला सुनाया। इस तरह सर्वसम्मत फैसले के साथ अरुंधति ने शानदार खिताबी जीत दर्ज की और भारत के खाते में एक और चमचमाता स्वर्ण पदक जोड़ दिया।

## मुक्केबाजी में भारतीय दल का दबदबा और शाम का सत्र
प्रतियोगिता के शाम के सत्र में भारतीय खिलाड़ियों ने अपने तीनों मुकाबलों में जीत हासिल कर रिंग में पूरी तरह अपना वर्चस्व कायम रखा। मुक्केबाजी स्पर्धा के शुरुआती छह फाइनल मुकाबलों में से भारतीय खिलाड़ियों ने कुल पांच स्वर्ण पदक और एक रजत पदक अपने नाम करते हुए इस खेल में अपना एकछत्र राज स्थापित कर दिया। किसान परिवार से आने वाली अरुंधति चौधरी की यह सफलता इस प्रतियोगिता में मुक्केबाजी के क्षेत्र में भारत के लिए तीसरा स्वर्ण पदक साबित हुई। इस स्वर्णिम सफलता ने राष्ट्रमंडल खेलों की पदक तालिका में भारत को शीर्ष चार देशों में शामिल रखने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

## बास्केटबॉल कप्तानी से मुक्केबाजी रिंग तक का सफर
अरुंधति की इस विश्वस्तरीय सफलता के पीछे उनकी अपार कड़ी मेहनत, अटूट लगन और परिवार के सही मार्गदर्शन की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी छिपी है। उनके पिता सुरेश ने उनकी शुरुआती जीवन यात्रा को साझा करते हुए बताया कि अरुंधति बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बेहद होशियार थीं और साथ ही खेलकूद की गतिविधियों में भी उनकी गहरी रुचि थी। जब अरुंधति राजस्थान के कोटा स्थित स्प्रिंग डेल स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ाई कर रही थीं, तब वे अपनी स्कूल की बास्केटबॉल टीम की कप्तान थीं। उनकी कुशल कप्तानी के नेतृत्व में स्कूल की टीम ने जिला और राज्य स्तरीय स्कूली खेल प्रतियोगिताओं में बहुत ही उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और कई प्रमुख टूर्नामेंटों में भाग लेकर अपनी पहचान बनाई।

## कोटा में सीमित सुविधाओं के बावजूद मुक्केबाजी का चुनाव
बास्केटबॉल जैसे टीम खेल में सफलता और सराहना पाने के बावजूद अरुंधति के मन में एक व्यक्तिगत खेल में अपनी किस्मत आजमाने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई। उन्होंने अपने पिता से व्यक्तिगत स्पर्धा वाले खेल को चुनने की अपनी मंशा जताई और पिता के परामर्श पर मुक्केबाजी को अपने मुख्य करियर के रूप में अपनाया। जब अरुंधति ने मुक्केबाजी के क्षेत्र में कदम रखने का निर्णय लिया, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके अपने शहर कोटा की परिस्थितियां थीं। उस समय कोटा शहर में मुक्केबाजी का कोई खास खेल माहौल नहीं था और न ही खिलाड़ियों के लिए कोई स्थापित कोचिंग या प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध थी।

## दृढ़ संकल्प और परिवार के सहयोग से रचा इतिहास
इन शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद अरुंधति ने अपने पिता से कहा था, **"पापा, मुझे बस बॉक्सिंग का एक अच्छा कोच ला दो।"** उनके इस मजबूत इरादे और परिवार के अटूट समर्थन ने शहर में सुविधाओं की कमी को उनके सपनों के आड़े नहीं आने दिया। शुरुआती तमाम बाधाओं को दरकिनार करते हुए अरुंधति ने दिन-रात कड़ी मेहनत की और रिंग में पसीना बहाया। आज ग्लासगो के अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी रिंग में अरुंधति चौधरी का लहराता हुआ तिरंगा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि इरादे बुलंद हों और मेहनत में ईमानदारी हो, तो शून्य से शुरुआत करके भी विश्व स्तर पर स्वर्णिम इतिहास रचा जा सकता है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** अरुंधति चौधरी की यह स्वर्णिम सफलता राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की पदक तालिका को 34 पदकों (11 स्वर्ण, 15 रजत, 8 कांस्य) के साथ चौथे स्थान पर मजबूत करती है और देश में महिला मुक्केबाजी को नया प्रोत्साहन देती है।

**राजस्थान (कोटा) में:** सीमित सुविधाओं के बावजूद विश्व पटल पर अरुंधति की यह ऐतिहासिक जीत कोटा और राजस्थान के युवा एथलीटों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

## सवाल-जवाब

### 1. अरुंधति चौधरी ने राष्ट्रमंडल खेलों में कौन सा पदक जीता?
अरुंधति चौधरी ने महिलाओं की 70 किलोग्राम मुक्केबाजी स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता।

### 2. अरुंधति चौधरी ने फाइनल मुकाबले में किसे हराया?
उन्होंने फाइनल मुकाबले में इंग्लैंड की मुक्केबाज चैंटल रीड को 5-0 के सर्वसम्मत फैसले से हराया।

### 3. ग्लासगो खेलों की पदक तालिका में भारत किस स्थान पर है?
भारत 11 स्वर्ण, 15 रजत और 8 कांस्य सहित कुल 34 पदकों के साथ चौथे स्थान पर काबिज है।

### 4. अरुंधति चौधरी ने मुक्केबाजी शुरू करने से पहले कौन सा खेल खेला था?
मुक्केबाजी में कदम रखने से पहले अरुंधति कोटा के स्प्रिंग डेल स्कूल में अपनी बास्केटबॉल टीम की कप्तान थीं।

### 5. मुक्केबाजी स्पर्धा के पहले छह फाइनल मुकाबलों में भारत का प्रदर्शन कैसा रहा?
भारत ने पहले छह मुक्केबाजी फाइनल मुकाबलों में से 5 स्वर्ण और 1 रजत पदक जीतकर अपना दबदबा कायम किया।

## प्रेरणा और सबक
**प्रेरणा और सीख:**

- **सीमित संसाधनों में अवसर ढूंढना:** कोटा में बॉक्सिंग सुविधाओं की कमी के बावजूद अरुंधति ने अपनी लगन से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।
- **दृढ़ इच्छाशक्ति:** बास्केटबॉल की सफल कप्तान होने के बाद भी अपनी रुचि के अनुसार व्यक्तिगत खेल में कदम उठाने का साहस दिखाया।
- **पारिवारिक समर्थन की ताकत:** पिता और परिवार के भरोसे ने शुरुआती बाधाओं को पार करने में अहम भूमिका निभाई।
- **कड़ा परिश्रम और अनुशासन:** रिंग में लगातार अभ्यास और सही रणनीति के दम पर 5-0 से एकतरफा जीत हासिल की।

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