# इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन टूर्नामेंट के दौरान बंदरों से निपटने के लिए तैनात किए गए मंकी व्हिस्परर

> नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में आयोजित बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान सुरक्षा परिसरों के बाहर लंगूरों की आवाज की सटीक नकल करने वाले युवाओं की मुस्तैदी से बंदरों को खदेड़ा जा रहा है।

**Type:** article · **Category:** खेल · **Published:** 2026-08-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/sports/indira-gandhi-indoor-stadium-men-antararashtriya-baidamintana-turnamenta-ke-daurana-bndaron-se-nipatane-ke-lie-tainata-kie-gae-mnk-19895 · **Language:** Hindi
**Tags:** मंकी व्हिस्परर, इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप, पीवी सिंधु, खान ब्रदर्स, दिल्ली बंदर समस्या

नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में जब बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन वर्ल्ड चैंपियनशिप जैसा बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन चलता है, तो खेल प्रेमियों की नजरें तेज तर्रार कोर्ट एक्शन और हवा में लहराती शटलकॉक पर टिकी होती हैं। लेकिन इस विशाल स्टेडियम के मुख्य परिसरों और सुरक्षा घेरों के बाहर एक अलग ही तरह की इंसानी जंग चलती है। यह मुकाबला आधुनिक सुरक्षा तकनीकों और इंसानी आवाज की मदद से बंदरों को नियंत्रित करने की अनोखी कला के बीच है। इस पूरे अभियान की कमान उन युवाओं के हाथों में है, जिन्हें आम तौर पर मंकी व्हिस्परर या लंगूर की आवाज की सटीक नकल करने वाले हुनरमंद कहा जाता है।

## स्टेडियम के प्रवेश द्वारों पर मुस्तैद युवाओं की टीम
इंदिरा गांधी स्टेडियम के गेट नंबर 16 और आसपास के संवेदनशील रास्तों पर इरफान और अब्बास जैसे युवा दिन भर चौकस होकर गश्त लगाते हैं। इनके हाथों में न तो कोई सुरक्षा लाठी होती है और न ही कोई आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण। इनका एकमात्र और सबसे अचूक हथियार उनके गले से निकलने वाली विशेष ध्वनियां हैं। ये युवा अपने गले से ईक-ईक-ईक और हूप-हूप जैसी तेज और तीखी आवाजें निकालते हैं। यह कोई आम इंसानी चिल्लाहट नहीं है, बल्कि इलाके पर कब्जा जमाने वाले खूंखार ग्रे लंगूर की चेतावनी भरी आवाज की बिल्कुल सटीक नकल होती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो रीसस मैकाक यानी लाल मुंह वाले सामान्य बंदर स्वभाव से ग्रे लंगूरों के आक्रामक और हमलावर रुख से बेहद डरते हैं। जैसे ही बंदरों का कोई दल स्टेडियम के ऊंचे बिजली के खंभों, दर्शक दीर्घा की छतों या आसपास के पेड़ों की शाखाओं पर मंडराने की कोशिश करता है, इन युवाओं की बुलंद चेतावनी गूंज उठती है। इस डरावनी आवाज को सुनते ही बंदरों का पूरा झुंड अपना रास्ता बदलकर स्टेडियम परिसर से दूर भाग खड़ा होता है।

## प्रशासनिक उलझनें और संविदा पर तैनाती
अंतरराष्ट्रीय स्तर के इतने बड़े खेल आयोजनों में बंदरों को खदेड़ने के लिए अपनाए जाने वाले इस पारंपरिक देसी तरीके पर प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। एक तरफ जहां खेल प्राधिकरण और दिल्ली नगर निगम जैसी संस्थाएं आधिकारिक कागजातों में ऐसे मंकी व्हिस्परर्स को सीधे रोजगार देने से दूरी बनाती हैं, वहीं दूसरी तरफ ठेकेदारों और निजी एजेंसियों के माध्यम से इन कर्मियों की सेवाएं ली जाती हैं। ये कर्मचारी सुबह 9 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक स्टेडियम की बाहरी सीमाओं पर लगातार मुस्तैदी से पहरा देते हैं ताकि खेल में कोई खलल न पड़े।

## पीवी सिंधु का समर्थन और विंबलडन की मिसाल
जब इस पारंपरिक व्यवस्था पर बहस छिड़ी, तो देश की दिग्गज बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने सोशल मीडिया पर इस अनोखी पहल का खुलकर समर्थन किया। पीवी सिंधु ने दुनिया के मशहूर टेनिस टूर्नामेंट विंबलडन का उदाहरण देते हुए समझाया कि बड़े खेल आयोजनों में स्थानीय चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसे उपाय आम हैं। उन्होंने याद दिलाया कि विंबलडन के दौरान टेनिस कोर्ट पर कबूतरों के उपद्रव को रोकने के लिए रूफस नाम के एक प्रशिक्षित बाज की सेवाएं सालों से ली जाती रही हैं। सिंधु का मानना है कि हर वैश्विक प्रतियोगिता का अपना स्थानीय माहौल होता है और दिल्ली के लिए बंदरों का उत्पात एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती है, जिससे निपटने के लिए यह तरीका बेहद कारगर है।

## चार दशकों पुराना पारिवारिक पेशा और बदलाव का सफर
दिल्ली के सरकारी भवनों और स्टेडियमों से बंदर भगाने का यह सिलसिला हाल-फिलहाल शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे करीब चार दशकों का लंबा पारिवारिक इतिहास जुड़ा हुआ है। इस पेशे से जुड़े शाहरुख खान और वसीम खान बताते हैं कि उनके पिता नजर अली लगभग 40 साल पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से चार जिंदा लंगूर लेकर दिल्ली आए थे। शुरुआती दौर में नजर अली लुटियंस दिल्ली के इलाकों में बच्चों और पर्यटकों के मनोरंजन के लिए लंगूरों के करतब दिखाया करते थे। बाद में सरकारी अफसरों की सलाह पर उन्होंने लंगूरों की मदद से दफ्तरों के आसपास उपद्रव मचाने वाले बंदरों को भगाने का पेशेवर काम शुरू किया।

## 2012 का कानूनी प्रतिबंध और हुनर में बदलाव
साल 2012 इस पूरे समुदाय और पेशे के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। केंद्र सरकार ने वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत जंगली जानवरों के व्यावसायिक और बंधक इस्तेमाल पर पूरी तरह से कड़ा प्रतिबंध लगा दिया। कानून लागू होने के बाद इन परिवारों को अपने पाले हुए प्यारे लंगूरों को जंगलों और खुले प्राकृतिक आवासों में छोड़ना पड़ा। इस फैसले से उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया। हालांकि, इन युवाओं ने हार नहीं मानी और लंगूरों के साथ बिताए दशकों के अनुभव को अपनी आवाज में ढाल लिया। लंगूर भले ही जंगलों में चले गए, लेकिन उनकी आक्रामक आवाजें इन युवाओं के कंठ में हमेशा के लिए जिंदा रह गईं।

## जोखिम भरा जीवन, मामूली दिहाड़ी और अनिश्चित भविष्य
राजधानी के संसद मार्ग, शास्त्री भवन, कृषि भवन से लेकर प्रमुख खेल परिसरों में व्यवस्था बनाए रखने वाले इन मंकी व्हिस्परर्स का दैनिक जीवन काफी जोखिम भरा होता है। इन्हें प्रतिदिन करीब 800 रुपये की दिहाड़ी पर 8 घंटे तक भीषण धूप, गर्मी और धूल के बीच मुस्तैद रहना पड़ता है। गश्त के दौरान इन्हें कई बार बंदरों के आक्रामक अल्फा नर की आंखों में आंखें डालकर उसे ललकारना पड़ता है। बंदरों के जानलेवा काटने और हमले का खतरा हर पल बना रहता है। कई बार बंदरों के हमले में हाथ-पांव पर गहरे जख्म हो जाते हैं, जिन पर ये लोग देसी चूना और हल्दी लगाकर दोबारा काम पर डटे रहते हैं।

पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका एक तात्कालिक राहत मात्र है और बंदरों की समस्या का स्थायी समाधान जाल लगाने और प्राकृतिक संतुलन बनाने में निहित है। इसके बावजूद, प्रशासनिक तंत्र के लिए आपात स्थिति में यह सबसे तेज और असरदार जरिया बना हुआ है। शाहरुख खान और वसीम खान जैसे अनुभवी कारीगर अब यह कतई नहीं चाहते कि उनकी आने वाली पीढ़ी इस खतरनाक और अनिश्चित पेशे में कदम रखे। वे अपनी संतानों को अच्छी शिक्षा दिलाकर एक सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य देना चाहते हैं। लेकिन जब तक दिल्ली की सड़कों और वैश्विक खेल परिसरों में बंदरों की आवाजाही बनी रहेगी, तब तक इन इंसानी लंगूरों की गूंजती आवाजें व्यवस्था का एक अनदेखा मगर बेहद जरूरी हिस्सा बनी रहेंगी।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों और प्रशासनिक परिसरों में जीव-जंतु प्रबंधन के पारंपरिक व मानव-संचालित तरीकों का महत्व रेखांकित होता है।

**दिल्ली में:** इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, संसद मार्ग व वीआईपी क्षेत्रों में बंदरों के खतरे से बचाव के लिए स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूती मिलती है।

## सवाल-जवाब

### 1. इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में मंकी व्हिस्परर क्या काम कर रहे हैं?
वे बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान स्टेडियम परिसरों से रीसस मैकाक (लाल मुंह वाले बंदरों) को खदेड़ने के लिए ग्रे लंगूरों की चेतावनी भरी आवाजों की नकल कर रहे हैं।

### 2. लंगूर की आवाज की नकल करने से बंदर क्यों भाग जाते हैं?
रीसस मैकाक बंदर स्वभाव से ग्रे लंगूरों के आक्रामक स्वभाव से डरते हैं। लंगूर की तीखी और चेतावनी भरी आवाजें सुनते ही बंदर खतरा महसूस कर वहां से तुरंत भाग निकलते हैं।

### 3. बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने इस तरीके का समर्थन क्यों किया?
पीवी सिंधु ने सोशल मीडिया पर विंबलडन का उदाहरण दिया जहां कबूतरों को भगाने के लिए 'रूफस' नाम के बाज का इस्तेमाल किया जाता है, और कहा कि बड़े आयोजनों में स्थानीय समस्याओं के लिए ऐसे उपाय कारगर होते हैं।

### 4. मंकी व्हिस्परर्स ने जिंदा लंगूरों की जगह अपनी आवाज का इस्तेमाल कब शुरू किया?
साल 2012 में केंद्र सरकार द्वारा जंगली जानवरों के बंधक और व्यावसायिक इस्तेमाल पर कड़ा प्रतिबंध लगाने के बाद, इन परिवारों ने जिंदा लंगूरों को छोड़कर अपनी आवाज में लंगूर की मिमिक्री की कला विकसित की।

### 5. इन मंकी व्हिस्परर्स को कितना वेतन मिलता है और इनके सामने क्या खतरे हैं?
इन्हें करीब 800 रुपये की दिहाड़ी पर 8 घंटे की कठिन ड्यूटी करनी पड़ती है, जिसमें भीषण गर्मी और आक्रामक अल्फा बंदरों के हमले व जानलेवा काटने का जोखिम हमेशा बना रहता है।

## प्रेरणा और सबक
**सफलता के मुख्य पाठ:**

- **आपदा में अवसर की तलाश:** 2012 में लंगूरों पर कानूनी प्रतिबंध लगने के बाद भी खान परिवार ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी आवाज को ही अपना हुनर बना लिया।
- **पारंपरिक अनुभव का उपयोग:** वर्षों के व्यावहारिक अनुभव और अवलोकन को आधुनिक समय की समस्याओं के समाधान में बदला।
- **कठिन परिस्थितियों में भी निरंतरता:** कम दिहाड़ी और शारीरिक खतरों के बावजूद अपने काम के प्रति ईमानदारी और मुस्तैदी बनाए रखी।
- **भावी पीढ़ी के लिए बेहतर सोच:** जोखिम भरे पेशे के बावजूद अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षित बनाकर बेहतर भविष्य देने का संकल्प लिया।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._