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  "title": "जापान में 59.03 मीटर दूर भाला फेंककर महेंद्र गुर्जर ने रचा इतिहास, दूदू के लाल ने जीता रजत पदक",
  "summary": "आइची-नागोया में आयोजित एशियन पैरा गेम्स में जयपुर के पैरा एथलीट महेंद्र गुर्जर ने 59.03 मीटर के नए गेम्स रिकॉर्ड के साथ भाला फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीता है.",
  "content": "जापान के शहर आइची-नागोया में चल रहे एशियन पैरा गेम्स के मंच पर भारत के पैरा एथलीटों का दबदबा देखने को मिला है. राजस्थान के जयपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले युवा खिलाड़ी महेंद्र गुर्जर ने पुरुषों की संयुक्त एफ42 भाला फेंक प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश के लिए रजत पदक अपने नाम किया. महेंद्र ने इस अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में 59.03 मीटर की दूरी तक भाला फेंककर एक नया गेम्स रिकॉर्ड भी स्थापित किया. खेत-खलिहानों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिरंगा लहराने की इस उपलब्धि ने समूचे राजस्थान और खेल जगत को गौरवान्वित किया है.\n\nनॉटविल में विश्व रिकॉर्ड बनाकर बटोरी थीं सुर्खियां\nमहेंद्र गुर्जर का नाम अंतरराष्ट्रीय भाला फेंक जगत में किसी पहचान का मोहताज नहीं है. इससे पहले भी वह वैश्विक स्तर पर ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं. पिछले साल स्विट्जरलैंड के नॉटविल मैदान पर आयोजित वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री के दौरान महेंद्र ने पुरुषों के एफ42 वर्ग में 61.17 मीटर का विशाल थ्रो फेंककर नया विश्व रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कराया था.\n\nउस अंतरराष्ट्रीय मुकाबले की सबसे खास बात यह रही कि महेंद्र ने लगातार दो थ्रो में अपने ही प्रदर्शन को बेहतर किया. ऐसा करते हुए उन्होंने ब्राजील के मशहूर पैरा एथलीट रॉबर्टो फ्लोरियानी एडेनिलसन के 59.19 मीटर के पुराने विश्व रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया था. इस असाधारण उपलब्धि ने पूरी दुनिया के खेल विशेषज्ञों का ध्यान उनकी प्रतिभा की ओर खींचा था.\n\nपोलियो की मार को बनाया अपनी सबसे बड़ी ताकत\nमहेंद्र की जिंदगी का यह सुनहरा मुकाम आसान रास्तों से होकर नहीं गुजरा है. उनका जन्म 12 अप्रैल 1998 को राजस्थान में जयपुर के समीप दूदू क्षेत्र में स्थित सखून गांव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था. उनके माता-पिता अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह खेती-किसानी पर निर्भर रहे हैं. बचपन के शुरुआती दौर में ही पोलियो की बीमारी के कारण उनका एक पैर गंभीर रूप से प्रभावित हो गया था.\n\nशारीरिक बाधा और ग्रामीण परिवेश में सीमित सुविधाओं के बावजूद महेंद्र ने कभी निराशा को खुद पर हावी नहीं होने दिया. उन्होंने सखून गांव तथा आसपास के स्थानीय सरकारी स्कूलों से अपनी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी की. उन्होंने अपनी 12वीं कक्षा की पढ़ाई काफी अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की और इसके बाद उच्च शिक्षा हासिल करने के उद्देश्य से कॉलेज में दाखिला लिया. खेल के प्रति उनके समर्पण ने इसी दौर में आकार लेना शुरू किया.\n\nकॉलेज के मैदान से पेशेवर भाला फेंक तक का सफर\nकॉलेज के दिनों में पढ़ाई के साथ-साथ महेंद्र ने विभिन्न खेल गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी शुरू की. इसी दौरान उनका झुकाव भाला फेंक यानी जेवलिन थ्रो की तरफ हुआ. उनके बड़े भाई अजयपाल ने महेंद्र के भीतर छिपी नैसर्गिक खेल प्रतिभा को समय रहते पहचाना. भाई के खेल भविष्य को संवारने के लिए अजयपाल ने उन्हें व्यवस्थित प्रशिक्षण दिलाने का फैसला किया और कोच समरजीत सिंह मल्ली के मार्गदर्शन में भेजा.\n\nकोच समरजीत सिंह मल्ली की देखरेख में महेंद्र ने जेवलिन थ्रो की आधुनिक तकनीक, शारीरिक संतुलन और ताकत बढ़ाने का कड़ा अभ्यास शुरू किया. गांव की कच्ची पगडंडियों और साधारण संसाधनों से जूझते हुए भी उन्होंने अभ्यास सत्रों में कभी नागा नहीं किया. धीरे-धीरे जिला और राज्य स्तरीय मुकाबलों में उनकी मेहनत रंग लाने लगी, जहां उन्होंने लगातार कई पदक जीतकर अपने आगामी करियर की मजबूत नींव रखी.\n\nसाल 2023 में राष्ट्रीय पटल पर स्वर्ण पदक जीतकर बनाई जगह\nमहेंद्र गुर्जर के करियर का निर्णायक मोड़ वर्ष 2023 में आया, जब उन्होंने नियमित अभ्यास को शानदार नतीजों में तब्दील किया. इस साल आयोजित राजस्थान राज्य पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उन्होंने एफ42 वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया. इसके तुरंत बाद नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी उन्होंने अपने लाजवाब प्रदर्शन को दोहराते हुए एक और स्वर्ण पदक देश के शीर्ष स्तर पर जीता.\n\nराष्ट्रीय स्तर पर मिली इन दोहरी कामयाबियों ने भारतीय चयनकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया और उन्हें राष्ट्रीय टीम में शामिल कर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिरंगे का प्रतिनिधित्व करने का सुअवसर मिला. इस भरोसे पर पूरी तरह खरा उतरते हुए महेंद्र ने पहले स्विट्जरलैंड और अब जापान के मैदान पर भारत की धाक जमाई है.\n\nलॉस एंजिलिस 2028 पैरा ओलंपिक पर टिकी हैं निगाहें\nएशियन पैरा गेम्स में शानदार प्रदर्शन करने के बाद महेंद्र गुर्जर अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपने बड़े भाई अजयपाल और अपने कोच समरजीत सिंह मल्ली को समर्पित करते हैं. खेल के कठिन कार्यक्रमों और लंबी यात्राओं से जब भी उन्हें फुर्सत मिलती है, वह अपने गांव सखून लौटकर माता-पिता के साथ समय बिताना पसंद करते हैं. उनकी सादगी, शांत स्वभाव और विनम्रता के चलते सोशल मीडिया पर भी बड़ी संख्या में खेल प्रेमी उन्हें सराहते हैं.\n\nरजत पदक जीतने के बाद अब महेंद्र का पूरा ध्यान अपने सबसे बड़े सपने पर केंद्रित है. उनका अगला मुख्य लक्ष्य वर्ष 2028 में अमेरिका के लॉस एंजिलिस में आयोजित होने वाले पैरा ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करना है. इस महाकुंभ का आधिकारिक कोटा हासिल करने के लिए वह आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की तैयारियों में जुट गए हैं.\n\nइसका आप पर असर\nमहेंद्र गुर्जर की इस उपलब्धि से भारतीय पैरा एथलीटों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए अवसर और प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त हुआ है.\n\n• भारत में: देश के उभरते पैरा एथलीटों को विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने और पदक जीतने का नया हौसला मिलेगा. इससे खेल संघों द्वारा पैरा खेलों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा और वित्तीय सहयोग देने की गति तेज हो सकती है.\n• राजस्थान में: दूदू और जयपुर समेत राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं में खेलों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा. स्थानीय प्रशासन और खेल अकादमियां ग्रामीण प्रतिभाओं को खोजने और तराशने पर विशेष ध्यान देंगी.\n• खिलाड़ियों के करियर पर: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पदकों से खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरियों और प्रायोजन के अवसर बढ़ जाते हैं. पैरा एथलीटों को पेशेवर प्रशिक्षण के लिए बेहतर सुविधाएं प्राप्त हो सकेंगी.\n• प्रशंसकों और दर्शकों के लिए: पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं के प्रति आम जनता का रुझान और समर्थन बढ़ेगा. इससे घरेलू स्तर पर आयोजित होने वाले पैरा टूर्नामेंटों को भी अधिक पहचान मिलेगी.\n\nऐसा क्यों हुआ\nमहेंद्र गुर्जर की यह जीत वर्षों की अनुशासित ट्रेनिंग, परिवार के समर्थन और मानसिक दृढ़ता का परिणाम है.\n\n• कड़ा और वैज्ञानिक प्रशिक्षण: कोच समरजीत सिंह मल्ली के मार्गदर्शन में महेंद्र ने भाला फेंकने की तकनीक और शारीरिक संतुलन पर लगातार काम किया. इसी तकनीकी सुधार ने उन्हें 59.03 मीटर का गेम्स रिकॉर्ड थ्रो हासिल करने में सक्षम बनाया.\n• पारिवारिक त्याग और मार्गदर्शन: बड़े भाई अजयपाल ने महेंद्र की क्षमता को पहचानकर उन्हें गांव से बाहर पेशेवर कोचिंग के लिए भेजा. परिवार के निरंतर नैतिक और आर्थिक सहयोग ने उन्हें बाधाओं के बीच भी मैदान में डटे रहने का संबल दिया.\n• चोट और बीमारी से ऊपर उठने का जज्बा: बचपन में पोलियो की वजह से एक पैर प्रभावित होने के बावजूद उन्होंने इसे कमजोरी नहीं माना. उन्होंने इस शारीरिक चुनौती को ही अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा में बदलकर मैदान पर पसीना बहाया.\n• घरेलू स्पर्धाओं में निरंतर सफलता: वर्ष 2023 में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने से महेंद्र का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा. उस अनुभव ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के दबाव को आसानी से संभालने में अहम भूमिका निभाई.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. महेंद्र गुर्जर ने एशियन पैरा गेम्स में कौन सा पदक जीता?\nमहेंद्र गुर्जर ने जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन पैरा गेम्स में पुरुषों की एफ42 भाला फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीता.\n\n2. एशियन पैरा गेम्स में महेंद्र गुर्जर का थ्रो कितना लंबा था?\nउन्होंने 59.03 मीटर दूर भाला फेंककर नया गेम्स रिकॉर्ड बनाते हुए यह पदक हासिल किया.\n\n3. महेंद्र गुर्जर का विश्व रिकॉर्ड क्या है?\nमहेंद्र ने स्विट्जरलैंड के नॉटविल में वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री में 61.17 मीटर भाला फेंककर विश्व रिकॉर्ड बनाया था.\n\n4. महेंद्र गुर्जर किस राज्य और जिले के रहने वाले हैं?\nवह राजस्थान में जयपुर जिले के दूदू क्षेत्र अंतर्गत सखून गांव के रहने वाले हैं.\n\n5. महेंद्र गुर्जर के कोच का नाम क्या है?\nमहेंद्र गुर्जर कोच समरजीत सिंह मल्ली के मार्गदर्शन में भाला फेंक का नियमित प्रशिक्षण लेते हैं.\n\n6. महेंद्र गुर्जर का अगला बड़ा खेल लक्ष्य क्या है?\nउनका मुख्य लक्ष्य वर्ष 2028 में लॉस एंजिलिस में आयोजित होने वाले पैरा ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करना है.\n\nप्रेरणा और सबक\nमहेंद्र गुर्जर का सफर दिखाता है कि शारीरिक सीमाओं और अभावों के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है.\n\n• चुनौती को ताकत बनाएं: बचपन में पोलियो जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद महेंद्र ने कभी हार नहीं मानी. जीवन की किसी भी शारीरिक या आर्थिक बाधा को अपनी कमजोरी बनने देने के बजाय उसे लक्ष्य हासिल करने का जरिया बनाएं.\n• अपनों के विश्वास का सम्मान करें: महेंद्र के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा पहचानी और उन्हें आगे बढ़ाया. सही मार्गदर्शक और परिवार के विश्वास पर खरा उतरने के लिए ईमानदारी से मेहनत करना सबसे महत्वपूर्ण है.\n• छोटे स्तर से शुरुआत कर निरंतर आगे बढ़ें: गांव के स्कूल और कॉलेज से शुरू होकर उन्होंने जिला, राज्य, राष्ट्रीय और फिर वैश्विक मंच तक का सफर तय किया. बड़ी सफलता एकदम नहीं मिलती, वह हर दिन के छोटे-छोटे सुधारों का परिणाम होती है.\n• सफलता में भी सादगी बनाए रखें: विश्व रिकॉर्ड और अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने के बाद भी महेंद्र अपने माता-पिता और गांव से जुड़े हुए हैं. विनम्रता और शांत स्वभाव इंसान को लंबे समय तक सफल बनाए रखता है.",
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  "category": "खेल",
  "publishedAt": "2026-10-28",
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