जापान में आशिमा अहलावत ने साधा सटीक निशाना, एशियाई खेलों में भारत की झोली में डाला रजत पदक दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की छात्रा आशिमा अहलावत ने जापान में चल रहे एशियन गेम्स 2026 के ट्रैप टीम शूटिंग इवेंट में रजत पदक जीता है। 12वीं में 98.6 फीसदी अंक लाकर शूटिंग शुरू करने वाली आशिमा ने रोहतक से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर तय किया। जापान की सरजमीं पर चल रहे एशियन गेम्स 2026 में भारतीय निशानेबाजों ने अपनी अचूक सटीकता से देश को गौरवान्वित किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही निशानेबाज आशिमा अहलावत ने महिलाओं की ट्रैप टीम स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के नाम रजत पदक दर्ज कराया। आशिमा ने यह पदक अपनी साथी निशानेबाजों मनीषा कीर और नीरू ढांडा के साथ मिलकर जीता। तीनों एथलीटों के संतुलित प्रदर्शन की बदौलत भारतीय दल पोडियम तक पहुंचने में सफल रहा। विश्वविद्यालय परिसर में उत्सव और कुलपति की सराहना आशिमा वर्तमान में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में एमए कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी इस बड़ी कामयाबी की खबर पहुंचते ही दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रांगण में उत्सव का माहौल बन गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आशिमा को औपचारिक बधाई दी। प्रो. योगेश सिंह के अनुसार, ऐसी गौरवशाली उपलब्धियां न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाती हैं, बल्कि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा में भी चार चांद लगाती हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आशिमा की यह सफलता अन्य विद्यार्थियों और उभरते हुए युवा खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरक मिसाल बनेगी। विश्वविद्यालय स्तर पर पहले भी लहरा चुकी हैं परचम जापान में चमकी आशिमा का घरेलू प्रतियोगिताओं में भी दबदबा रहा है। इससे पहले अप्रैल 2026 के दौरान अमृतसर स्थित जीएनडीयू परिसर में ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी शूटिंग (महिला) टूर्नामेंट का आयोजन किया गया था। इस राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रतियोगिता के ट्रैप इवेंट में आशिमा दिल्ली विश्वविद्यालय की उस महिला टीम का हिस्सा थीं जिसने स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। केवल टीम ही नहीं, बल्कि इसी चैंपियनशिप की व्यक्तिगत ट्रैप स्पर्धा में भी उन्होंने अपनी असाधारण लय दिखाते हुए सिल्वर मेडल जीता था। खरकड़ा गांव से अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक की कहानी हरियाणा के रोहतक जिले में स्थित खरकड़ा गांव की रहने वाली आशिमा का जन्म 27 सितंबर 2003 को हुआ था। उनके भीतर निशानेबाजी का जुनून वर्ष 2018 के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान जागा। उस समय भारतीय निशानेबाजों, विशेषकर मनु भाकर और हीना सिद्धू के शानदार प्रदर्शन ने इस युवा खिलाड़ी को बेहद आकर्षित किया। उसी समय आशिमा ने एक पेशेवर निशानेबाज बनने की ठान ली थी। पढ़ाई की अनोखी शर्त और मां का संघर्ष आशिमा की मां सुमित्रा अहलावत हमेशा इस बात को लेकर सतर्क थीं कि खेल की व्यस्तताओं के चलते बेटी की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े। उन्होंने निशानेबाजी में आगे बढ़ने के लिए बेटी के सामने एक कड़ी शर्त रखी थी कि बारहवीं बोर्ड परीक्षा में कम से कम 98 फीसदी अंक लाने होंगे। आशिमा ने इस चुनौती को स्वीकार किया और 98.6 प्रतिशत अंक हासिल करके न सिर्फ शर्त पूरी की, बल्कि लेडी श्रीराम कॉलेज में दाखिला भी सुनिश्चित किया। शुरुआत में आशिमा 10 मीटर एयर पिस्टल से अभ्यास करती थीं। इसके बाद पूर्व भारतीय निशानेबाज रंजन सोढ़ी के परामर्श पर उन्होंने शॉटगन ट्रैप शूटिंग की तरफ रुख किया। बेटी की खेल यात्रा को पंख देने के लिए मां सुमित्रा को रोहतक से दिल्ली में बसना पड़ा। करियर के शुरुआती दिनों में संसाधनों की भारी किल्लत रही और पहली शॉटगन तथा पर्याप्त गोलियों का प्रबंध करने में ही परिवार को लगभग आठ महीने लग गए थे। इसका आप पर असर आशिमा अहलावत की यह उपलब्धि भारत में युवा एथलीटों के लिए खेल और उच्च शिक्षा के बीच संतुलन बनाने का व्यावहारिक खाका प्रस्तुत करती है। • विद्यार्थी एथलीटों के लिए: यह साबित करता है कि उच्चस्तरीय शिक्षा और पेशेवर खेल एक साथ जारी रखे जा सकते हैं। बोर्ड परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ छात्र शीर्ष कॉलेजों में दाखिला लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग संभाल सकते हैं। • खेल अकादमियों और अभिभावकों के लिए: शुरुआती स्तर पर सही खेल विधा चुनना और विशेषज्ञ सलाह लेना करियर की दिशा बदल सकता है। 10 मीटर एयर पिस्टल से शॉटगन ट्रैप जैसे तकनीकी खेल में बदलाव उचित मार्गदर्शन से ही संभव हुआ। • हरियाणा और दिल्ली के उभरते शूटर्स के लिए: कॉलेज स्तर की इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिताओं में निरंतर पदक जीतना बड़े अंतरराष्ट्रीय चयन का मजबूत आधार बनता है। स्थानीय टूर्नामेंटों में गंभीरता से भाग लेना सीधे राष्ट्रीय टीम का रास्ता तैयार करता है। • खेल परिवारों के लिए: खेल उपकरणों और गोला-बारूद के इंतजाम में समय और धैर्य की आवश्यकता होती है। शुरुआती आठ महीनों का संघर्ष यह दिखाता है कि वित्तीय और ढांचागत चुनौतियों के बावजूद निरंतरता से सफलता मिलती है। ऐसा क्यों हुआ आशिमा अहलावत की सफलता वर्षों के अनुशासन, उचित खेल मार्गदर्शन और टीम तालमेल का सीधा परिणाम है। • टीम स्पर्धा में सामूहिक सटीकता: एशियन गेम्स के ट्रैप टीम इवेंट में मनीषा कीर और नीरू ढांडा के साथ मजबूत तालमेल ने पदक पक्का किया। तीनों निशानेबाजों के संयुक्त स्कोर ने भारतीय टीम को पदक तालिका में दूसरे स्थान पर बनाए रखा। • सही विधा का चुनाव: पूर्व भारतीय निशानेबाज रंजन सोढ़ी के सुझाव पर एयर पिस्टल छोड़कर शॉटगन ट्रैप शूटिंग अपनाने से उनकी प्रतिभा निखरकर सामने आई। इस तकनीकी बदलाव ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की बड़ी स्पर्धाओं के अनुकूल बनाया। • घरेलू स्तर का अनुभव: अमृतसर में ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी शूटिंग टूर्नामेंट में गोल्ड और सिल्वर जीतने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। उस हालिया सफलता ने दबाव भरे पलों में सटीक निशाने साधने की क्षमता दी। • पारिवारिक समर्थन और अनुशासन: 12वीं में 98.6 फीसदी अंक हासिल करने की कड़ी शर्त पूरी करने के बाद परिवार ने रोहतक से दिल्ली शिफ्ट होकर पूर्ण सहयोग दिया। इस समर्पित माहौल ने उनकी ट्रेनिंग को गति प्रदान की। सवाल-जवाब 1. आशिमा अहलावत ने एशियन गेम्स 2026 में कौन सा पदक जीता है? आशिमा अहलावत ने महिलाओं की ट्रैप टीम शूटिंग इवेंट में रजत पदक (सिल्वर मेडल) जीता है। 2. ट्रैप टीम इवेंट में आशिमा के साथ भारतीय टीम में कौन शामिल था? इस स्पर्धा में आशिमा की साथी निशानेबाज मनीषा कीर और नीरू ढांडा थीं। 3. आशिमा अहलावत किस कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रही हैं? आशिमा दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से एमए की पढ़ाई कर रही हैं। 4. आशिमा अहलावत कहां की मूल निवासी हैं? वह हरियाणा के रोहतक जिले में स्थित खरकड़ा गांव की निवासी हैं और उनका जन्म 27 सितंबर 2003 को हुआ था। 5. शूटिंग शुरू करने के लिए उनकी मां ने क्या शर्त रखी थी? उनकी मां सुमित्रा अहलावत ने शर्त रखी थी कि बारहवीं कक्षा में कम से कम 98 फीसदी अंक लाने पर ही शूटिंग की अनुमति मिलेगी। 6. आशिमा ने 12वीं में कितने अंक हासिल किए और कहां दाखिला लिया? आशिमा ने 98.6 प्रतिशत अंक हासिल करके यह शर्त पूरी की और लेडी श्रीराम कॉलेज में दाखिला लिया। 7. आशिमा को शॉटगन ट्रैप शूटिंग अपनाने की सलाह किसने दी थी? पूर्व भारतीय निशानेबाज रंजन सोढ़ी के परामर्श पर उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल छोड़कर शॉटगन ट्रैप शूटिंग को अपनाया। प्रेरणा और सबक आशिमा अहलावत का सफर दर्शाता है कि पढ़ाई और खेल दोनों में एक साथ असाधारण ऊंचाई हासिल की जा सकती है। • लक्ष्य के प्रति समर्पण: अगर किसी खेल या सपने को लेकर लगन सच्ची हो, तो किसी भी कठिन शर्त को पूरा किया जा सकता है। आशिमा ने 12वीं में 98.6 प्रतिशत अंक लाकर साबित किया कि पढ़ाई और खेल एक दूसरे की रुकावट नहीं बनते। • विशेषज्ञों की सही सलाह का सम्मान: अपनी दिशा बदलने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। रंजन सोढ़ी के सुझाव पर 10 मीटर एयर पिस्टल छोड़कर शॉटगन ट्रैप को अपनाना उनकी यात्रा का सबसे अहम मोड़ साबित हुआ। • संसाधनों के अभाव में धैर्य: शुरुआत में पहली बंदूक और कारतूस जुटाने में आठ महीने लगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। धैर्य और सतत अभ्यास अंततः बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाता है। • पारिवारिक प्रतिबद्धता: मां का रोहतक से दिल्ली शिफ्ट होना यह सिखाता है कि बच्चों के सपनों को साकार करने में माता-पिता का मूक त्याग कितनी बड़ी भूमिका निभाता है। https://trendkia.com/sports/japana-men-aashima-ahlawat-ne-sadha-satika-nishana-eshiyai-khelon-men-bharata-ki-jholi-men-dala-rajata-padaka-40561 TrendKia — Har trend, sabse pehle.