# झुंझुनूं के मंडावा में शतरंज की बिसात पर उभरी नई पौध, राज्य स्तर पर चुने गए नौ खिलाड़ी

> भव्य हवेलियों के लिए मशहूर मंडावा अब शतरंज की दुनिया में नई इबारत लिख रहा है, जहां एक स्थानीय क्लब से निकले नौ होनहार खिलाड़ी पहली बार राज्य स्तरीय टूर्नामेंट में अपना दम दिखाएंगे।

**Type:** article · **Category:** खेल · **Published:** 2026-11-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/sports/jhunjhunu-ke-mandawa-men-shatarnja-ki-bisata-para-ubhari-nai-paudha-rajya-stara-para-chune-gae-nau-khilari-55034 · **Language:** Hindi
**Tags:** झुंझुनूं, मंडावा, शतरंज, राजस्थान खेल, मंडावा चेस क्लब, राज्य स्तरीय प्रतियोगिता

झुंझुनूं जिले का ऐतिहासिक कस्बा मंडावा हमेशा से अपनी खूबसूरत हवेलियों और सैलानियों की चहल-पहल के लिए मशहूर रहा है, लेकिन इन दिनों यहां के युवाओं में एक अलग ही बौद्धिक खेल का जुनून देखने को मिल रहा है। कस्बे में राजाओं और बुजुर्गों की पुरानी चौपालों तक सीमित रहने वाले शतरंज के खेल को अब नई पीढ़ी ने अपने भविष्य की दिशा बना लिया है। स्थानीय स्तर पर छह साल पहले केवल तीन शौकिया सदस्यों के साथ रखी गई एक छोटी सी पहल आज लगभग 300 सक्रिय शतरंज खिलाड़ियों के बड़े केंद्र में तब्दील हो चुकी है। इस निरंतर अभ्यास और लगन का सबसे सुखद परिणाम यह सामने आया है कि पहली दफा इस कस्बे के नौ होनहार खिलाड़ी राज्य स्तर की आधिकारिक शतरंज प्रतियोगिता में उतरने जा रहे हैं।

## चौपालों की पुरानी परंपरा से निकली खेल की चिंगारी
मंडावा के इतिहास में चौसठ खानों की इस बिसात का लगाव कोई हालिया बात नहीं है। दशकों पहले यहां के प्रतिष्ठित बुजुर्ग फुर्सत के पलों में इस बौद्धिक खेल की गहरी चालों में घंटों डूबे रहते थे। उस दौर में पूर्व चेयरमैन पंडित लादूराम मिश्रा, रतनलाल मिश्रा, कस्तूरी लाल मिश्रा और ओमप्रकाश सोनी जैसे दिग्गजों की चौसर पर जमी बैठकों को कस्बे के लोग बड़ी उत्सुकता से घेरे रहते थे। इसी कड़ी में रामेश्वर चौहान, शिवचंद्र पीपलवा, पुरुषोत्तम पीपलवा और चिरंजीलाल तोलासरिया जैसे नाम भी शामिल रहे, जिन्होंने कस्बे में इस खेल की जीवंत संस्कृति को कभी थमने नहीं दिया। इन्हीं बुजुर्ग खिलाड़ियों की बौद्धिक समझ और जटिल चालों ने आने वाली पीढ़ियों के मन में खेल के प्रति उत्सुकता का मजबूत बीज बोया था।

## कोलकाता से वापसी और क्लब की आधिकारिक शुरुआत
इस अनौपचारिक शौक को संस्थागत रूप देने की मुहिम तब शुरू हुई जब मंडावा के निवासी केशरदेव टेलर कोलकाता से अपनी सेवानिवृत्ति पूरी कर वापस अपनी मिट्टी में लौटे। उन्होंने कस्बे में बच्चों को स्क्रीन और खाली समय से हटाकर शतरंज के अनुशासन में ढालने का मन बनाया। उनके इस विचार को गोपाल सिंह चौहान की प्रेरणा और कस्बे के कई अन्य खेल प्रेमियों का सक्रिय साथ मिला। नतीजतन 2 फरवरी 2020 को मंडावा चेस क्लब की नींव रखी गई। शुरुआत में इस मंच से केवल तीन उत्साही बच्चे जुड़े थे, लेकिन देखते ही देखते यह दायरा फैलता चला गया। आज इसी क्लब में करीब 300 खिलाड़ी नियमित तौर पर जुटते हैं, जहां कस्बे के वरिष्ठ खिलाड़ी बच्चों को खेल की बारीकियों, ओपनिंग थ्योरी और एंडगेम की रणनीति सिखाते हैं।

## रतनलाल मिश्रा की राज्य स्तरीय सफलताओं से मिली प्रेरणा
कस्बे में खेल की इस मजबूत नींव के पीछे एक और बड़ा प्रेरणादायक नाम पूर्व सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी तथा पूर्व डिप्टी डायरेक्टर रतनलाल मिश्रा का रहा है। वे अपने समय में राजस्थान के सबसे अव्वल दर्जे के शतरंज खिलाड़ियों में गिने जाते थे। उन्होंने वर्ष 1972 में जयपुर और वर्ष 1973 में जोधपुर में आयोजित बड़े टूर्नामेंटों में पूरे राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया था। इन दोनों ही आयोजनों में वे प्रदेश स्तर पर पहले पायदान पर रहे थे। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने कस्बे के लोगों को यह भरोसा दिलाया था कि मंडावा जैसे छोटे कस्बे से निकलकर भी शतरंज के बड़े फलक पर शीर्ष स्थान हासिल किया जा सकता है।

## सालाना प्रतियोगिताएं और पंद्रह सदस्यों की संचालन समिति
वर्तमान में क्लब की पूरी व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए 15 सदस्यीय समर्पित कमेटी जिम्मेदारी संभाल रही है। इसमें संस्था प्रधान बाबूलाल कुमावत, सचिव ज्ञानप्रकाश गोयनका और संरक्षक के रूप में केशरदेव टेलर खुद मौजूद रहकर प्रशिक्षण का माहौल तैयार करते हैं। कस्बे के तोलासरिया परिवार की सहायता से सेठ चिरंजीलाल तोलासरिया की स्मृति में प्रतिवर्ष एक भव्य राज्य स्तरीय टूर्नामेंट आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में अंडर-14 तथा अंडर-19 वर्ग के प्रतिभाशाली बच्चे भाग लेते हैं, जिन्हें प्रोत्साहन के रूप में स्मृति चिह्न, नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं।

## विभिन्न जिलों में पांच ट्रॉफियां जीतकर गाड़े झंडे
मंडावा के ये युवा खिलाड़ी अब तक चूरू, जयपुर, कोटा और उदयपुर जैसे कई शहरों में जाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। अलग-अलग शहरों में आयोजित कठिन मुकाबलों के दौरान क्लब के खिलाड़ियों ने पांच बार विजेता ट्रॉफी पर कब्जा जमाकर कस्बे का गौरव बढ़ाया है। विभिन्न जिलों में मिली इन लगातार सफलताओं के बाद अब नौ खिलाड़ियों का एक साथ राज्य स्तरीय स्तर पर चुना जाना कस्बे के खेल इतिहास का सबसे सुनहरा अध्याय बन गया है।

## इसका आप पर असर
मंडावा के बच्चों की यह उपलब्धि दर्शाती है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सही मार्गदर्शन मिलने पर बौद्धिक खेलों में भी राज्य स्तरीय अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

- **झुंझुनूं में:** स्थानीय अभिभावक अपने बच्चों को केवल पारंपरिक खेलों तक सीमित रखने के बजाय अब शतरंज जैसे माइंड स्पोर्ट्स के लिए प्रेरित कर सकते हैं। कस्बे के इस क्लब से जुड़कर बच्चे नि:शुल्क और नियमित कोचिंग का लाभ ले सकते हैं।
- **भारत में:** छोटे शहरों के सेवानिवृत्त नागरिक अपने पेशेवर अनुभव का उपयोग स्थानीय युवाओं को संगठित प्रशिक्षण देने में कर सकते हैं। सामुदायिक सहयोग और खेल क्लब मॉडल अन्य कस्बों में भी प्रतिभाओं को निखारने का जरिया बन सकता है।
- **खिलाड़ियों के लिए:** राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से युवाओं को खेल कोटे और उच्च स्तरीय छात्रवृत्तियों के नए दरवाजे खुलते हैं। इससे अंडर-14 और अंडर-19 के बच्चों को बड़े टूर्नामेंटों में खेलने का सीधा मंच मिलता है।
- **अभिभावकों के लिए:** मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल भटकाव से दूर रखकर बच्चों में एकाग्रता और तार्किक क्षमता बढ़ाने का यह व्यावहारिक विकल्प है। इससे बच्चों के बौद्धिक विकास और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है।

## ऐसा क्यों हुआ
मंडावा में शतरंज का यह उल्लेखनीय उभार दशकों पुराने व्यक्तिगत शौक, सेवानिवृत्त बुजुर्गों के समर्पण और संगठित सामुदायिक सहयोग के सटीक तालमेल के कारण संभव हुआ है।

- **सामुदायिक विरासत:** कस्बे के पुराने संभ्रांत बुजुर्ग दशकों से चौपालों और बैठकों में नियमित रूप से शतरंज खेलकर इस खेल की समझ को जिंदा रखे हुए थे। इसी माहौल ने युवाओं के मन में खेल के प्रति शुरुआती आकर्षण पैदा किया।
- **समर्पित मार्गदर्शन:** कोलकाता से लौटने के बाद केशरदेव टेलर ने बच्चों को एकत्र कर कोचिंग देने की व्यक्तिगत पहल शुरू की। उनके इस निस्वार्थ प्रयास को स्थानीय खेल प्रेमियों का तत्काल साथ मिला।
- **संस्थागत मंच:** 2 फरवरी 2020 को मंडावा चेस क्लब की विधिवत स्थापना हुई, जिसने बिखरे हुए प्रयासों को एक व्यवस्थित अकादमिक रूप प्रदान किया। इसके बाद 15 सदस्यीय समिति ने नियमित अभ्यास सत्र आयोजित किए।
- **प्रतियोगिता का माहौल:** तोलासरिया परिवार द्वारा हर वर्ष आयोजित होने वाली राज्य स्तरीय स्मृति प्रतियोगिता ने नए खिलाड़ियों को नियमित मैच खेलने और अपनी तैयारी आंकने का ठोस मंच दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. मंडावा से कितने खिलाड़ियों का चयन राज्य स्तरीय शतरंज प्रतियोगिता के लिए हुआ है?
मंडावा चेस क्लब के नौ खिलाड़ियों का चयन पहली बार राज्य स्तरीय शतरंज प्रतियोगिता में खेलने के लिए हुआ है।

### 2. मंडावा चेस क्लब की स्थापना कब और कितने खिलाड़ियों के साथ हुई थी?
क्लब की स्थापना 2 फरवरी 2020 को केवल तीन खिलाड़ियों के साथ हुई थी, जिसमें आज करीब 300 खिलाड़ी जुड़े हैं।

### 3. क्लब की स्थापना में किस सेवानिवृत्त नागरिक की मुख्य भूमिका रही?
कोलकाता से सेवानिवृत्त होकर मंडावा लौटे केशरदेव टेलर ने गोपाल सिंह चौहान की प्रेरणा से इस क्लब की शुरुआत की थी।

### 4. रतनलाल मिश्रा ने राजस्थान में शतरंज में क्या मुकाम हासिल किया था?
वे 1972 में जयपुर और 1973 में जोधपुर की प्रतियोगिताओं में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर प्रदेश के नंबर वन खिलाड़ी बने थे।

### 5. मंडावा में हर साल किसकी स्मृति में शतरंज प्रतियोगिता होती है?
तोलासरिया परिवार के सहयोग से सेठ चिरंजीलाल तोलासरिया की स्मृति में हर साल राज्य स्तरीय शतरंज प्रतियोगिता आयोजित होती है।

### 6. मंडावा चेस क्लब अब तक कितनी ट्रॉफियां जीत चुका है?
क्लब के खिलाड़ी कोटा, उदयपुर, जयपुर और चूरू जैसे जिलों की प्रतियोगिताओं में पांच बार विजेता ट्रॉफी जीत चुके हैं।

## प्रेरणा और सबक
मंडावा चेस क्लब की यह यात्रा साबित करती है कि संसाधनों की कमी के बावजूद यदि लगन और सामुदायिक इच्छाशक्ति हो, तो छोटे से कस्बे से भी चैंपियन तैयार किए जा सकते हैं।

- **शुरुआत छोटी हो तो भी फर्क नहीं पड़ता:** महज तीन खिलाड़ियों से शुरू हुआ यह क्लब आज 300 सदस्यों तक पहुंच चुका है। लगातार किया गया प्रयास किसी भी छोटे विचार को विशाल अभियान में बदल देता है।
- **अनुभव का समाज के लिए उपयोग:** सेवानिवृत्ति के बाद घर बैठने के बजाय केशरदेव टेलर ने अपनी ऊर्जा बच्चों को हुनर सिखाने में लगाई। अपना समय समाज की नई पीढ़ी को संवारने में लगाना सबसे बड़ा योगदान है।
- **सामुदायिक एकजुटता की ताकत:** जब तोलासरिया परिवार, बुजुर्ग खिलाड़ी और स्थानीय लोग एक साथ आए, तब राज्य स्तरीय मंच तैयार हो सका। बड़े बदलाव व्यक्तिगत प्रयासों के बजाय सामूहिक सहयोग से टिकते हैं।

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