मथुरा के अंतरराष्ट्रीय कराटे खिलाड़ी हरिओम शुक्ला आर्थिक तंगी के कारण अपने मेडल बेचने को हुए विवश देश और विदेश में दर्जनों पदक जीतने वाले ब्लैक बेल्ट कराटे खिलाड़ी हरिओम शुक्ला अब परिवार का पेट पालने के लिए चाय बेचने और अपने मेडल नीलाम करने पर मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के ब्लैक बेल्ट कराटे खिलाड़ी हरिओम शुक्ला इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। हालात इतने विकट हो चुके हैं कि परिवार का गुजारा चलाने के लिए चाय की दुकान चलाने के बावजूद जब दो वक्त की रोटी का प्रबंध मुश्किल हो गया, तब उन्होंने अपने घर के बाहर जीते हुए मेडलों को बेचने का नोटिस चस्पा कर दिया। देश के लिए दर्जनों पदक जीतने वाले इस खिलाड़ी की यह बेबसी खेल जगत और प्रशासनिक तंत्र की उपेक्षा को दर्शाती है। कोसी खुर्द से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर मथुरा जनपद के मूल निवासी हरिओम शुक्ला कोसी खुर्द गांव से ताल्लुक रखते हैं। पिछले कई वर्षों से वह यमुनापार इलाके में ईसापुर पानी की टंकी के पास रहकर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। हरिओम शुक्ला एक कुशल ब्लैक बेल्ट कराटे चैंपियन हैं, जिन्होंने भारत के साथ-साथ कई विदेशी धरती पर भी तिरंगा लहराया। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रतियोगिताओं में गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज सहित करीब 60 मेडल अपने नाम किए हैं। हालांकि, उचित प्रोत्साहन और सरकारी मदद के अभाव में उनकी यह खेल प्रतिभा धीरे-धीरे दबकर रह गई। घर के बाहर लगाया मेडल बिक्री का नोटिस लगातार गहराते आर्थिक संकट और बढ़ती महंगाई के बीच परिवार का पालन पोषण करना जब असंभव होने लगा, तो हरिओम शुक्ला ने एक कड़ा और भावुक फैसला लिया। उन्होंने अपने घर के मुख्य दरवाजे पर एक नोटिस लगा दिया। इस नोटिस में साफ लिखा गया है कि घर की माली हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है, इसलिए वह अपने जीते हुए सभी पदकों को बेचने के लिए मजबूर हैं। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि उनके पास स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक उपलब्ध हैं और जो भी व्यक्ति इन्हें खरीदने में रुचि रखता हो, वह सीधे उनसे संपर्क कर सकता है। पदक बेचकर परिवार को दो वक्त की रोटी देने की मजबूरी हरिओम शुक्ला ने अपनी इस लाचारी के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में चाय की दुकान से होने वाली आमदनी से घर का खर्च नहीं चल पा रहा है। बच्चों और परिजनों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए उनके पास अब कोई अन्य जरिया नहीं बचा है। उन्होंने बताया कि अगर कोई ऐसा कराटे खिलाड़ी है जो किसी कारणवश प्रतियोगिता में पदक नहीं जीत पाया हो, तो वह उनके पास आकर ये मेडल खरीद सकता है। खरीदार अपनी पसंद का पदक हासिल करके मेडल विजेता होने का अनुभव ले सकता है और इससे मिलने वाले पैसों से उनके परिवार को दो वक्त का भोजन मिल सकेगा। पिता का छलका दर्द, प्रशासनिक उपेक्षा पर उठाए सवाल हरिओम शुक्ला के पिता दीनदयाल शुक्ला ने भी परिवार की इस दयनीय स्थिति पर गहरा दुख प्रकट किया। उन्होंने कहा कि उनके बेटे ने विदेशी मंचों पर शानदार प्रदर्शन करके देश का मान बढ़ाया, लेकिन उन ऐतिहासिक जीतों का परिवार को कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल सका। दीनदयाल शुक्ला ने आरोप लगाया कि शासन और प्रशासन की तरफ से ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ी की आजीविका के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। उन्होंने निराशा जताते हुए कहा कि जब अन्य खिलाड़ियों को करोड़ों रुपये के पुरस्कार और सुविधाएं मिलती हैं, तब हरिओम जैसे खिलाड़ी को अनदेखा कर दिया गया। इसी उपेक्षा के कारण अब खिलाड़ी के भीतर का हुनर पूरी तरह टूट चुका है और मेडल बेचकर गुजारा करना ही एकमात्र विकल्प बचा है। साल 2006 से शुरू हुआ था हरिओम का खेल करियर अपने खेल सफर की शुरुआत को याद करते हुए हरिओम शुक्ला ने बताया कि उन्होंने साल 2006 में मथुरा से कराटे का औपचारिक अभ्यास और मुकाबले शुरू किए थे। उनकी प्रतिभा और लगन को देखते हुए साल 2008 में मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर मिला, जहां उन्होंने 2008 में अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में भी हिस्सा लिया। इसके बाद साल 2010 में काठमांडू में आयोजित ओपन चैंपियनशिप में उन्होंने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता। थाईलैंड, अमेरिका और श्रीलंका में लहराया था परचम हरिओम शुक्ला की उपलब्धियों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। साल 2013 में उन्हें थाईलैंड के पटाया में खेलने का मौका मिला, जहां उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। उसी साल 2013 में उन्होंने थाईलैंड में ही सीनियर वर्ग का सिल्वर मेडल भी अपने नाम किया। इसके बाद साल 2015 में संयुक्त राज्य अमेरिका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में उन्होंने दूसरा सिल्वर मेडल हासिल किया। वहीं श्रीलंका में आयोजित प्रतियोगिता के दौरान उन्होंने पहला सीनियर गोल्ड और दूसरा ओपन सिल्वर मेडल जीतकर अपने जिले और देश का गौरव बढ़ाया था। अपने पूरे करियर में 60 पदक जीतने वाला यह एथलीट आज अपनी पहचान और उपलब्धियों को चंद रुपयों के बदले बेचने के मोड़ पर खड़ा है। इसका आप पर असर यह घटना भारतीय खेल जगत में गैर-पारंपरिक खेलों के जमीनी एथलीटों की वास्तविक आर्थिक चुनौतियों और सरकारी सहयोग की कमी को दर्शाती है। • भारत में: गैर-क्रिकेट और गैर-ओलंपिक खेलों के एथलीटों के लिए आजीविका की अनिश्चितता एक बड़ा सवाल बनी हुई है। इससे आने वाली पीढ़ी के उभरते खिलाड़ियों के मनोबल और खेल को पूर्णकालिक करियर बनाने के फैसले पर गहरा असर पड़ता है। • उत्तर प्रदेश में: स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ियों के पुनर्वास और खेल पेंशन योजनाओं की जमीनी पहुंच की समीक्षा की मांग बढ़ सकती है। मथुरा और आसपास के जिलों के खेल संघों पर स्थानीय प्रतिभाओं को आजीविका से जोड़ने का दबाव बनेगा। • आर्थिक सुरक्षा: केवल पदक जीतना किसी खिलाड़ी के भविष्य की गारंटी नहीं बन पाता जब तक कि उसे सरकारी नौकरी या वित्तीय सहायता न मिले। खिलाड़ी परिवारों को खेल के साथ-साथ वैकल्पिक आजीविका कौशल पर भी निर्भर रहना पड़ रहा है। • प्रशासनिक नीतियां: खेल पुरस्कारों और छात्रवृत्तियों के दायरे को जमीनी स्तर तक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता फिर से रेखांकित हुई है। नीति निर्माताओं को उपेक्षित खेलों के राष्ट्रीय पदकों की मान्यता और सहायता प्रक्रिया सरल करनी होगी। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति किसी भी अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ी के लिए सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र के अभाव के कारण उत्पन्न हुई है। • सीमित सरकारी सहायता: कराटे जैसे खेलों को कई बार प्रमुख सरकारी विभागों में सीधी नौकरी या नियमित वित्तीय वजीफे का लाभ नहीं मिल पाता है। पर्याप्त आर्थिक आधार न होने से खिलाड़ियों को व्यक्तिगत खर्चों पर प्रतियोगिताओं में भाग लेना पड़ता है। • महंगाई और चाय की दुकान से कम आय: खेल से संन्यास या प्रतियोगिताओं में कमी के बाद आजीविका के लिए खोली गई चाय की दुकान बढ़ती घरेलू महंगाई के मुकाबले नाकाफी साबित हुई। इस कारण परिवार के सामने भुखमरी जैसे हालात खड़े हो गए। • प्रशासनिक उदासीनता: खिलाड़ी और उनके परिवार के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सफलता के बावजूद उन्हें स्थानीय स्तर पर वह पुरस्कार राशि या सम्मान नहीं मिला जो अन्य खेलों के विजेताओं को मिलता है। सवाल-जवाब 1. हरिओम शुक्ला कौन हैं और वह क्यों चर्चा में हैं? हरिओम शुक्ला मथुरा के एक अंतरराष्ट्रीय ब्लैक बेल्ट कराटे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने घोर आर्थिक तंगी के चलते अपने 60 मेडल बेचने का नोटिस अपने घर के बाहर लगाया है। 2. हरिओम शुक्ला ने अपने खेल करियर में कौन-कौन से प्रमुख पदक जीते हैं? उन्होंने 2010 में काठमांडू में स्वर्ण, 2013 में थाईलैंड में स्वर्ण और रजत, 2015 में अमेरिका में रजत तथा श्रीलंका में स्वर्ण और रजत सहित करीब 60 पदक जीते हैं। 3. हरिओम शुक्ला का परिवार वर्तमान में कहां रहता है? वह मूल रूप से मथुरा के कोसी खुर्द गांव के निवासी हैं और वर्तमान में यमुनापार इलाके में ईसापुर पानी की टंकी के पास रहते हैं। 4. हरिओम शुक्ला के पिता का क्या कहना है? उनके पिता दीनदयाल शुक्ला का कहना है कि विदेशों में मेडल जीतने के बावजूद सरकार और प्रशासन की अनदेखी के कारण परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया है। https://trendkia.com/sports/mathura-ke-antararashtriya-karate-khilari-hariom-shukla-arthika-tngi-ke-karana-apane-medala-bechane-ko-hue-vivasha-39797 TrendKia — Har trend, sabse pehle.