नहर में उतरी ड्रैगन बोट, सहारनपुर के थरौली गांव में ग्रामीण बच्चों को मिल रही वॉटर स्पोर्ट्स की मुफ्त ट्रेनिंग सहारनपुर के थरौली निवासी संदीप चौधरी ने लाखों रुपये खर्च कर ड्रैगन बोट मंगवाई है, जिसके जरिए ग्रामीण बच्चों को नहर में वॉटर स्पोर्ट्स की मुफ्त ट्रेनिंग दी जा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में पारंपरिक खेलों से हटकर एक अनूठी खेल क्रांति आकार ले रही है। जिले के छोटे से गांव थरौली के निवासी संदीप चौधरी ग्रामीण बच्चों की खेल प्रतिभा को तराशने के लिए एक खास पहल चला रहे हैं। संदीप चौधरी स्वयं खेलों की दुनिया में आगे नहीं बढ़ सके थे, लेकिन अब उन्होंने यह संकल्प लिया है कि उनके इलाके का कोई भी बच्चा केवल आर्थिक तंगी या संसाधनों के अभाव में अपनी प्रतिभा खोने पर मजबूर न हो। इसी सोच के साथ उन्होंने गांव और आसपास के क्षेत्रों के बच्चों को बोटिंग और वॉटर स्पोर्ट्स सिखाने की शुरुआत की है। इसके लिए उन्होंने अपनी जेब से कई लाख रुपये खर्च किए और सहारनपुर में एक ड्रैगन बोट मंगवाई, जिसके जरिए अब बच्चों को नियमित रूप से पानी की लहरों पर अभ्यास कराया जा रहा है। केरल की पारंपरिक नौका से सहारनपुर की नहरों तक का सफर आमतौर पर ड्रैगन बोट और लंबी नौकाओं का सबसे व्यापक उपयोग केरल की प्रसिद्ध वल्लमकाली प्रतियोगिताओं में देखने को मिलता है। इस खास तरह की बोट को संतुलित ढंग से चलाने के लिए एक साथ 8 से 10 लोगों की टीम की आवश्यकता होती है। वॉटर स्पोर्ट्स को आमतौर पर एक बेहद महंगा खेल माना जाता है, जिसकी ट्रेनिंग आम ग्रामीण परिवारों की पहुंच से बहुत दूर होती है। यदि कोई बच्चा बाहर जाकर इस खेल का प्रशिक्षण लेता है, तो प्रति खिलाड़ी करीब 15 हजार रुपये तक का भारी-भरकम शुल्क चुकाना पड़ता है। कई मामलों में तो यह रकम पंद्रह हजार रुपये से भी ज्यादा बैठती है। संदीप चौधरी ने इसी आर्थिक बाधा को तोड़ा है और अपने गांव के साथ-साथ आसपास के दूसरे गांवों के जरूरतमंद बच्चों को भी यह पूरी ट्रेनिंग पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध करा रहे हैं। मानकमऊ बड़ी नहर में पहली बार उतरी ड्रैगन बोट प्रशिक्षण के इसी सिलसिले में सहारनपुर की मानकमऊ बड़ी नहर में पहली बार ड्रैगन बोट को पानी में उतारा गया, जहां स्थानीय बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ अभ्यास सत्र में हिस्सा लिया। युवा खिलाड़ियों ने योगी लेक से आगे बढ़ते हुए नहर के पानी में नाव चलाने का कड़ा अभ्यास किया। इस दौरान खिलाड़ियों की टीम ने लगभग साढ़े तीन से चार किलोमीटर तक बहाव के विपरीत नाव चलाकर अपनी ताकत और तकनीकी संतुलन का बेहतरीन प्रदर्शन किया। ग्राम पंचायत की देखरेख में चलाए जा रहे इस प्रयास के तहत इस वर्ष बच्चों के लिए किसी भी तरह का कोई शुल्क नहीं रखा गया है, ताकि ग्रामीण परिवेश के होनहार खिलाड़ी पैसों की तंगी के कारण खेल मैदान से पीछे न हटें। राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने और पहचान बनाने की तैयारी थरौली के ग्राम प्रधान पति संदीप चौधरी ने आगामी ड्रैगन चैंपियनशिप की तैयारियों को लेकर विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य आने वाले खेलों और राष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए एक मजबूत टीम तैयार करना है, ताकि यहां के ग्रामीण बच्चे बड़े मंचों पर हिस्सा ले सकें। संदीप चौधरी का मानना है कि उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से सहारनपुर खेल के बुनियादी ढांचे और भागीदारी के मामले में काफी पिछड़ा रहा है, जहां बहुत कम माता-पिता बच्चों को खेलों में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उनका लक्ष्य अभिभावकों की इसी सोच को बदलना और हर बच्चे में खेल के प्रति रुचि जगाना है, ताकि ये युवा खिलाड़ी पदक जीतकर अपने गांव, जिले और पूरे भारत का नाम रोशन कर सकें। इसका आप पर असर ग्रामीण क्षेत्रों में महंगे वॉटर स्पोर्ट्स की मुफ्त ट्रेनिंग मिलने से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के दरवाजे खुल गए हैं। • भारत में: यह पहल दर्शाती है कि स्थानीय जलस्रोतों का उपयोग करके देश के दूरदराज हिस्सों में भी गैर-पारंपरिक खेलों की प्रतिभाएं तैयार की जा सकती हैं। इससे राष्ट्रीय स्तर पर वॉटर स्पोर्ट्स के विस्तार को बल मिलेगा और नए एथलीट सामने आएंगे। • सहारनपुर में: जिले के ग्रामीण युवाओं को बिना 15 हजार रुपये का भारी शुल्क चुकाए पेशेवर स्तर की बोटिंग सीखने का सीधा अवसर मिल रहा है। इच्छुक माता-पिता अपने बच्चों को मानकमऊ नहर पर चल रहे इस निशुल्क प्रशिक्षण से जोड़कर खेलों में उनका करियर संवार सकते हैं। • खेल प्रतिभाओं के लिए: आर्थिक तंगी के कारण खेल छोड़ने को मजबूर होने वाले बच्चों को अब अभ्यास के लिए बोट और मार्गदर्शन दोनों बिना किसी खर्च के उपलब्ध हो रहे हैं। यह तैयारी उन्हें आगामी ड्रैगन बोट चैंपियनशिप में पदक की दौड़ में शामिल होने के काबिल बनाएगी। • ग्रामीण परिवारों पर असर: पंचायत स्तर पर प्रशिक्षण शुल्क शून्य रखे जाने से गरीब परिवारों पर किसी तरह का आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। इससे अभिभावक बिना वित्तीय चिंता के अपने बच्चों को खेलकूद के क्षेत्र में आगे भेजने के लिए प्रेरित होंगे। ऐसा क्यों हुआ सहारनपुर में यह अनूठी खेल पहल इसलिए शुरू हुई क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभा होने के बावजूद महंगे वॉटर स्पोर्ट्स के बुनियादी ढांचे का घोर अभाव था। • निजी संघर्ष की पृष्ठभूमि: संदीप चौधरी अपने शुरुआती दिनों में खेल सुविधाओं और समर्थन की कमी के कारण खुद आगे नहीं बढ़ सके थे। इसी व्यक्तिगत दर्द ने उन्हें यह संकल्प लेने को प्रेरित किया कि गांव के अन्य बच्चे केवल आर्थिक तंगी की वजह से पीछे न छूटें। • महंगी कोचिंग का संकट: ड्रैगन बोट और वॉटर स्पोर्ट्स सीखने के लिए सामान्य अकादमियों में प्रति बच्चा करीब 15 हजार रुपये तक का शुल्क लिया जाता है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के अधिकांश परिवार यह भारी खर्च उठाने में असमर्थ रहते हैं, जिससे प्रतिभाएं दबकर रह जाती हैं। • बुनियादी संसाधन जुटाना: बच्चों को वास्तविक अभ्यास देने के लिए संदीप चौधरी ने निजी तौर पर कई लाख रुपये खर्च करके सीधे ड्रैगन बोट खरीदी। इसके बाद अभ्यास के लिए मानकमऊ बड़ी नहर और स्थानीय जलस्रोतों का चयन कर प्रशिक्षण सत्र शुरू किए गए। • आगामी प्रतियोगिताओं का लक्ष्य: ड्रैगन चैंपियनशिप के आयोजन को देखते हुए ग्रामीण खिलाड़ियों की एक मजबूत और अनुशासित टीम तैयार करने की जरूरत महसूस की गई। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए खिलाड़ियों को नहर के बहाव के विपरीत साढ़े तीन से चार किलोमीटर तक नाव चलाने का कड़ा अभ्यास कराया जा रहा है। सवाल-जवाब 1. सहारनपुर में बच्चों को मुफ्त बोटिंग ट्रेनिंग कौन दे रहा है? सहारनपुर के थरौली गांव निवासी और ग्राम प्रधान पति संदीप चौधरी बच्चों को ड्रैगन बोटिंग की मुफ्त ट्रेनिंग दे रहे हैं। 2. इस प्रशिक्षण के लिए ड्रैगन बोट कैसे लाई गई? संदीप चौधरी ने अपनी ओर से कई लाख रुपये खर्च करके सहारनपुर में बच्चों के अभ्यास के लिए यह ड्रैगन बोट मंगवाई है। 3. ड्रैगन बोट चलाने के लिए कितने लोगों की आवश्यकता होती है? ड्रैगन बोट को संतुलित ढंग से चलाने के लिए 8 से 10 खिलाड़ियों की टीम की जरूरत पड़ती है। 4. यह बोटिंग अभ्यास किस स्थान पर कराया जा रहा है? यह प्रशिक्षण सहारनपुर की मानकमऊ बड़ी नहर में कराया जा रहा है, जहां बच्चे योगी लेक से निकलकर नहर में बोट चला रहे हैं। 5. सामान्य तौर पर बाहर वॉटर स्पोर्ट्स सीखने का कितना खर्च आता है? बाहर किसी अकादमी से प्रशिक्षण लेने पर एक बच्चे से करीब 15 हजार रुपये तक का शुल्क लिया जाता है। 6. अभ्यास सत्र के दौरान बच्चों ने नहर में कितनी दूरी तय की? अभ्यास सत्र के दौरान खिलाड़ियों ने नहर के बहाव के विपरीत लगभग साढ़े तीन से चार किलोमीटर तक नाव चलाई। 7. इस पूरे प्रशिक्षण शिविर का मुख्य उद्देश्य क्या है? इसका मुख्य उद्देश्य आगामी ड्रैगन बोट चैंपियनशिप के लिए ग्रामीण बच्चों को तैयार करना है ताकि वे पदक जीतकर नाम रोशन कर सकें। प्रेरणा और सबक संदीप चौधरी की यह पहल साबित करती है कि व्यक्तिगत संसाधनों और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर ग्रामीण प्रतिभाओं की किस्मत बदली जा सकती है। • अतीत की कमियों को दूसरों की ताकत बनाना: खुद आगे न बढ़ पाने की निराशा में बैठने के बजाय संदीप चौधरी ने नई पीढ़ी के लिए रास्ते खोले। अपनी असफलताओं से सीख लेकर दूसरों के लिए साधन जुटाना सच्ची नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। • समाज की बेहतरी में निजी पूंजी का निवेश: कई लाख रुपये खर्च कर बच्चों के लिए बोट मंगवाना यह सिखाता है कि सामाजिक बदलाव के लिए केवल सरकारी मदद का इंतजार करने की जरूरत नहीं होती। व्यक्तिगत पहल से भी बड़े बदलाव की नींव रखी जा सकती है। • आर्थिक बाधाओं को प्रतिभा के आड़े न आने देना: प्रशिक्षण को पूरी तरह निशुल्क रखकर उन्होंने यह संदेश दिया कि खेल पर सिर्फ संपन्न वर्ग का अधिकार नहीं है। सही मौके और संसाधन मिलने पर ग्रामीण बच्चे भी किसी से पीछे नहीं रहते। • स्थानीय संसाधनों का रचनात्मक उपयोग: महंगी कृत्रिम झीलों की अनुपलब्धता के बावजूद उन्होंने गांव की नहर को ही अभ्यास का मैदान बना दिया। उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल करना ही वास्तविक प्रगति की कुंजी है। https://trendkia.com/sports/nahara-men-utari-dragon-boat-saharanpur-ke-tharauli-ganva-men-gramina-bachchon-ko-mila-rahi-water-sports-ki-muphta-treninga-40319 TrendKia — Har trend, sabse pehle.