पानी के खौफ और 5 दिन की तैयारी को पछाड़कर सलमान खान और सतनाम सिंह ने रचा रोइंग में इतिहास तैरना न जानने वाले पूर्व कैब ड्राइवर सलमान खान ने सतनाम सिंह के साथ महज पांच दिन की तैयारी में एशियाई खेलों की पुरुष युगल स्कल्स में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। अकसर माना जाता है कि पानी के खेल में वही बाजी मार सकता है जो जल की गहराइयों से भली-भांति वाकिफ हो, लेकिन भारतीय रोवर सलमान खान की कहानी इस धारणा को पूरी तरह उलट देती है। सलमान खान को तैरना नहीं आता और उनके भीतर पानी का गहरा खौफ भी बसा हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने अपने साथी सतनाम सिंह के साथ मिलकर एशियाई खेलों की रोइंग स्पर्धा में भारत के लिए ऐतिहासिक कांस्य पदक अपने नाम किया। पानी से डरने वाले खिलाड़ी का पानी के ऊपर ही देश का परचम लहराना किसी चमत्कार से कम नहीं है, खासकर तब जब पदक जीतने वाली यह जोड़ी रेस के फाइनल से महज पांच दिन पहले ही मैदान में उतारी गई थी। नागारागावा के पानी पर ऐतिहासिक रेस और कांस्य पदक जापान के नागारागावा वाटर कोर्स पर आयोजित पुरुष युगल स्कल्स स्पर्धा में भारतीय जोड़ी ने बेहतरीन गति और संतुलन का परिचय दिया। सलमान खान और सतनाम सिंह ने 6:13.25 का समय दर्ज करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया और कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। इस मुकाबले में स्वर्ण पदक जीतने वाली चीनी टीम से भारतीय जोड़ी सिर्फ 3.48 सेकंड पीछे रही, जबकि उज़्बेकिस्तान की रजत पदक विजेता टीम से उनका अंतर महज 2.76 सेकंड का रहा। साल 1982 में एशियाई खेलों में रोइंग को शामिल किए जाने के बाद से पुरुष युगल स्कल्स स्पर्धा में भारत का यह पहला ऐतिहासिक पदक है। रेस की शुरुआत बेहद रोमांचक रही और भारतीय रोवर्स ने शुरुआत से ही अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी। 2000 मीटर लंबी इस मैराथन रेस में 1500 मीटर तक सलमान और सतनाम दूसरे स्थान पर मजबूती से डटे हुए थे और भारत के लिए रजत पदक पक्का लग रहा था। हालांकि, आखिरी 500 मीटर के कठिन दौर में उज़्बेकिस्तान के रोवर्स ने अपनी रफ्तार बढ़ाई और भारतीय नाव तीसरे स्थान पर फिसल गई। इस मामूली अंतर के बावजूद दोनों खिलाड़ियों ने अपनी अद्भुत ऊर्जा से देश को गर्व का पल थमा दिया। कैब चलाने से सेना तक का संघर्ष सलमान खान की यह कामयाबी किसी साधारण खेल यात्रा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह अभावों और दुखों के खिलाफ लड़ी गई एक लंबी जंग का नतीजा है। दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर कभी ओला और उबर जैसी कैब चलाने वाले सलमान के जीवन में सब कुछ सामान्य नहीं था। उनके पिता के असमय इंतकाल ने पूरे परिवार को बेसहारा छोड़ दिया था। छह बच्चों वाले इस परिवार में चार भाई और दो बहनें थीं, जिनका कोई अभिभावक नहीं बचा था। ऐसे कठिन वक्त में सत्रह-अठारह साल के युवा सलमान ने आगे बढ़कर पूरे घर की जिम्मेदारी अपने मजबूत कंधों पर उठा ली। घर का चूल्हा जलाने के लिए उन्होंने दिल्ली में दिन-रात टैक्सी चलाई और जो भी काम मिला, मेहनत से किया। उनकी शारीरिक बनावट और कद-काठी को देखकर रिश्तेदारों व पड़ोसियों ने उन्हें फौज में भर्ती होने की नेक सलाह दी। हालांकि, पहली बार में किस्मत ने साथ नहीं दिया और वह सेना की भर्ती परीक्षा में असफल हो गए। इस विफलता से निराश होकर सलमान ने परिजनों से कह दिया था कि अब वह केवल गाड़ी चलाएंगे और इसी में अपना भविष्य देखेंगे। लेकिन परिवार के हौसले और अपनी जिद के दम पर उन्होंने दोबारा कोशिश की और सफल होकर सेना में दाखिला पा लिया। सेना में उनकी शानदार शारीरिक फिटनेस ने प्रशिक्षकों का ध्यान खींचा और उन्हें खेलों के लिए चुन लिया गया, यद्यपि उन्होंने खुद कभी रोइंग का खेल नहीं मांगा था। पानी का डर और शुरुआती हादसे की कड़वी यादें रोइंग में आने के बाद सलमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी का डर था। प्रशिक्षण के शुरुआती दिनों में एक अभ्यास सत्र के दौरान उनकी नाव पलट गई थी। इस हादसे ने उनके मन में ऐसा खौफ पैदा किया जो कभी पूरी तरह से नहीं मिट सका। आज भी सलमान को तैरना नहीं आता, लेकिन सेना के अनुशासन और खुद को साबित करने के जज्बे ने उन्हें इस मानसिक बाधा को पार करने की ताकत दी। हर बार जब वह चप्पू थामते, तो अपने डर का सामना करते हुए सिर्फ आगे की ओर देखते। सतनाम सिंह का साथ और 5 दिन की हैरान करने वाली तैयारी दूसरी तरफ, पंजाब से ताल्लुक रखने वाले सतनाम सिंह पहले राष्ट्रीय स्तर के हैंडबॉल खिलाड़ी थे। उनके खेल जीवन को नई दिशा तब मिली जब 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में लाइटवेट डबल स्कल्स के स्वर्ण पदक विजेता ओलंपियन स्वर्ण सिंह विर्क ने उनके भीतर छिपी रोइंग प्रतिभा को पहचाना और उन्हें तराशना शुरू किया। सतनाम के पास पहले से ही हांगझोउ 2023 एशियाई खेलों में जीती गई क्वाड्रपल स्कल्स स्पर्धा का कांस्य पदक था। नागोया में होने वाले इस मुकाबले से ठीक पहले भारतीय शिविर में एक बड़ा फेरबदल हुआ। आखिरी पलों में क्रू में बदलाव किए जाने से दोनों एथलीटों की महीनों की मेहनत और तैयारी पूरी तरह पटरी से उतर गई थी। सतनाम सिंह के मुताबिक, इस अचानक हुए फैसले से खेल शिविर के माहौल में भारी निराशा और मायूसी छा गई थी। दो ऐसे रोवर्स, जिनका आपस में पहले से कोई तालमेल या अभ्यास नहीं था, उन्हें फाइनल से सिर्फ पांच दिन पहले एक ही नाव में बैठाकर चप्पू थमा दिए गए। इतने कम समय में एक-दूसरे के स्ट्रोक्स को समझना और अंतरराष्ट्रीय मंच पर तालमेल बिठाना लगभग असंभव था, लेकिन इस जोड़ी ने पानी पर उतरकर करिश्मा कर दिखाया। घर में भोर की दुआएं और जश्न का माहौल जापान में जब सलमान पानी पर इतिहास रचने के लिए पसीना बहा रहे थे, उस वक्त हजारों मील दूर उनके घर पर उम्मीदों और दुआओं का दौर चल रहा था। सलमान की वालिदा जबरुन निशा बेटे के इस अहम मुकाबले से पहले कई रातों से ठीक से सो नहीं सकी थीं। फाइनल की सुबह करीब चार बजे पूरा परिवार नींद से जाग गया और सबने मिलकर सलमान की जीत के लिए दुआएं मांगीं। सुबह पांच बजते-बजते जापान से कांस्य पदक जीतने की सुखद खबर आ गई। पदक की पुष्टि होते ही घर में खुशी की लहर दौड़ गई। जबरुन निशा ने कहा कि यह कामयाबी सिर्फ उनके घर की नहीं, बल्कि पूरे गांव, पड़ोस और समूचे हिंदुस्तान की है, जिसके मान को उनके बेटे ने विश्व पटल पर ऊंचा कर दिया। गले में टंगे कांस्य पदक की मुस्कान के पीछे वर्षों का पसीना, कैब ड्राइवर के रूप में झेली गई तंगहाली और एक मां की सुबह की दुआएं छिपी हुई हैं। इसका आप पर असर इस ऐतिहासिक खेल उपलब्धि से भारतीय खेल तंत्र और युवाओं के लिए कई अहम बदलाव देखने को मिलेंगे। • एथलीटों की तैयारी: यह पदक साबित करता है कि संसाधनों और कम समय के बावजूद भारतीय खिलाड़ी शीर्ष स्तर पर मुकाबला कर सकते हैं। खेल संघों और अकादमियों में अंतिम समय के तालमेल और मानसिक मजबूती पर अब विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे। • खेल चयन का दायरा: युवाओं में पारंपरिक खेलों के अलावा रोइंग और वॉटर स्पोर्ट्स के प्रति आकर्षण बढ़ेगा। जल खेलों से जुड़े राज्य केंद्र अब ग्रामीण और गैर-पारंपरिक पृष्ठभूमि के युवाओं को ट्रायल के लिए बुलाएंगे। • सेना की खेल नीति: भारतीय सेना द्वारा खिलाड़ियों को तराशने के मॉडल को और अधिक प्रोत्साहन मिलेगा। इससे उन युवाओं को नई राह मिलेगी जो आर्थिक तंगी के कारण खेल में करियर नहीं बना पाते थे। • प्रोत्साहन व पुरस्कार: दोनों रोवर्स को राज्य और केंद्र स्तर पर नकद पुरस्कार और सम्मान मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार देखने को मिलेगा। ऐसा क्यों हुआ भारतीय टीम को यह ऐतिहासिक पदक एक अप्रत्याशित क्रू फेरबदल और दोनों खिलाड़ियों के जबरदस्त व्यक्तिगत जज्बे के तालमेल से हासिल हुआ। • अंतिम समय का क्रू बदलाव: फाइनल से महज पांच दिन पहले खेल शिविर में किए गए फेरबदल के कारण सलमान और सतनाम को एक साथ उतारा गया। योजनाएं बिगड़ने से शिविर में निराशा थी, लेकिन दोनों ने बिना तालमेल के भी तुरंत सामंजस्य बिठाने पर जोर दिया। • स्वर्ण सिंह विर्क का मार्गदर्शन: सतनाम सिंह की प्रतिभा को 2018 के स्वर्ण पदक विजेता ओलंपियन स्वर्ण सिंह विर्क ने समय रहते तराशा था। इस तकनीकी आधार ने सतनाम को नए जोड़ीदार के साथ जल्दी ढलने में सक्षम बनाया। • सेना का शारीरिक प्रशिक्षण: टैक्सी चलाने के बाद सेना में शामिल हुए सलमान की असाधारण फिटनेस ने तकनीकी कमियों की भरपाई की। पानी के डर के बावजूद उनकी शारीरिक ताकत ने नाव को आवश्यक गति प्रदान की। • शुरुआती 1500 मीटर की बढ़त: भारतीय जोड़ी ने शुरुआत से ही आक्रामक लय बनाए रखी और रेस के तीन-चौथाई हिस्से तक दूसरे स्थान पर रहकर पदक की स्थिति मजबूत कर ली थी। सवाल-जवाब 1. सलमान खान और सतनाम सिंह ने एशियाई खेलों में कौन सा पदक जीता? भारतीय जोड़ी ने रोइंग की पुरुष युगल स्कल्स स्पर्धा में 6:13.25 का समय निकालकर कांस्य पदक जीता। 2. क्या सलमान खान को तैरना आता है? नहीं, सलमान खान को तैरना नहीं आता और वे पानी के डर यानी एक्वाफोबिया से ग्रस्त हैं। 3. सलमान के मन में पानी का डर क्यों बैठ गया था? प्रशिक्षण के शुरुआती दिनों में एक अभ्यास सत्र के दौरान उनकी नाव पलट गई थी, जिसके बाद से उनके मन में पानी का डर बना रहा। 4. सेना में शामिल होने से पहले सलमान क्या काम करते थे? अपने पिता के निधन के बाद परिवार चलाने के लिए सलमान दिल्ली में ओला और उबर जैसी कैब चलाते थे। 5. फाइनल मुकाबले से कितने दिन पहले यह जोड़ी बनी थी? क्रू में अचानक हुए फेरबदल के कारण सलमान और सतनाम को फाइनल रेस से महज पांच दिन पहले एक साथ उतारा गया था। 6. रेस में पहले और दूसरे स्थान पर कौन से देश रहे? इस स्पर्धा में चीन ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि उज़्बेकिस्तान ने रजत पदक अपने नाम किया। 7. सतनाम सिंह को रोइंग खेल में कौन लाया था? 2018 के स्वर्ण पदक विजेता ओलंपियन स्वर्ण सिंह विर्क ने सतनाम की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें रोइंग में प्रशिक्षित किया था। 8. पुरुष युगल स्कल्स में भारत के लिए यह पदक क्यों ऐतिहासिक है? 1982 में एशियाई खेलों में रोइंग शामिल किए जाने के बाद से इस खास स्पर्धा में यह भारत का पहला पदक है। प्रेरणा और सबक सलमान खान और सतनाम सिंह की यह विजय दर्शाती है कि अपने सबसे बड़े डर और अप्रत्याशित बाधाओं से लड़कर भी इतिहास रचा जा सकता है। • अपने डर का सामना करना: पानी से खौफ खाने और तैरना न जानने के बावजूद सलमान ने उसी माध्यम में पदक जीता। व्यक्ति को अपनी कमजोरियों या डर के आगे झुकने के बजाय अनुशासन से उन्हें मात देनी चाहिए। • असफलता से हार न मानना: पहली बार सेना की भर्ती में असफल होने के बाद भी सलमान ने दोबारा प्रयास किया। अस्थायी विफलताएं अंतिम नहीं होतीं यदि हौसला और मेहनत जारी रहे। • कठिन जिम्मेदारियों को स्वीकारना: पिता के निधन के बाद 17-18 साल की उम्र में पूरे परिवार का बोझ उठाने के लिए उन्होंने कैब चलाई। पारिवारिक विपत्ति को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय उन्होंने उसे अपनी ताकत में बदल दिया। • अनपेक्षित बदलावों में तालमेल: पांच दिन पहले बनी नई जोड़ी ने परिस्थितियों पर विलाप करने के बजाय मुकाबले पर ध्यान लगाया। तैयारी में अचानक आने वाली बाधाओं के बावजूद सकारात्मक मानसिकता चमत्कार कर सकती है। https://trendkia.com/sports/pani-ke-khaupha-aura-5-dina-ki-taiyari-ko-pachharakara-salman-khan-aura-satnam-singh-ne-racha-roinga-men-itihasa-38593 TrendKia — Har trend, sabse pehle.