पारंपरिक लकड़ी के बाद अब प्लास्टिक बल्लों का बड़ा केंद्र बना मेरठ, शुरुआती ट्रेनिंग के लिए बढ़ी मांग खेल उपकरणों के लिए मशहूर मेरठ में अब आधुनिक मशीनों से प्लास्टिक के क्रिकेट बैट तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी कीमत 60 रुपये से 700 रुपये तक है। देश में खेल उपकरणों की राजधानी के रूप में विख्यात मेरठ अपनी औद्योगिक पहचान को एक नया विस्तार दे रहा है। पारंपरिक रूप से कश्मीरी विलो और इंग्लिश विलो की लकड़ी से तैयार होने वाले क्रिकेट बैट और गेंदों की आपूर्ति देश-विदेश में करने वाले इस शहर में अब प्लास्टिक के बल्लों का उत्पादन भी तेजी से बढ़ रहा है। खेल की दुनिया में शुरुआती अभ्यास और स्थानीय स्तर पर क्रिकेट का शौक रखने वाले युवाओं के बीच इन बल्लों का आकर्षण काफी गहरा हुआ है, जिसके चलते शहर के औद्योगिक क्षेत्रों में कई नई निर्माण इकाइयां स्थापित हो चुकी हैं। विभिन्न किस्मों और भारी गेंदों के अनुकूल विकल्प सूरजकुंड स्पोर्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुज कुमार सिंघल ने इस संबंध में जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि मेरठ खेल उद्योग में अपनी विशिष्ट पहचान दशकों से बनाए हुए है। दुनिया भर में यहां की लकड़ी से बने बल्लों की भारी मांग रहती है, लेकिन मौजूदा दौर में प्लास्टिक के बल्लों के प्रति भी युवाओं और उभरते खिलाड़ियों में खासा रुझान देखा जा रहा है। बाजार में प्लास्टिक के बैट की कई वैरायटी उतारी गई हैं। इन बल्लों की बनावट इस तरह तैयार की गई है कि खिलाड़ी इनके जरिए सामान्य गेंदों के साथ-साथ भारी गेंदों से भी आसानी से अभ्यास कर सकते हैं। किफायती दाम और बाजार में बढ़ती मौजूदगी कीमत के लिहाज से यह उत्पाद हर वर्ग की पहुंच में है। प्लास्टिक के इन बल्लों की शुरुआती कीमत मात्र 60 रुपये से शुरू होती है, जबकि बेहतर गुणवत्ता और मजबूत बनावट वाले विकल्प 700 रुपये तक की कीमत में आसानी से उपलब्ध हैं। पहले की तुलना में अब मेरठ के खेल बाजारों में थोक और फुटकर स्तर पर ऐसे बैट रखने वाली दुकानों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। हालांकि, यह साफ किया गया है कि ये बल्ले मुख्य रूप से बुनियादी अभ्यास, शुरुआती सीखने के चरण और शौक के लिए बेहतरीन विकल्प हैं, जबकि पेशेवर प्रतियोगिताओं में खेलने के लिए खिलाड़ी आज भी पारंपरिक लकड़ी के बल्लों का ही इस्तेमाल करते हैं। स्कूलों की मांग और चीनी उत्पादों का विकल्प शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को खेल गतिविधियों से जोड़ने के लिए विभिन्न स्कूलों में इन बल्लों की मांग बहुत बड़े पैमाने पर रहती है। पहले के समय में भारतीय बाजारों में प्लास्टिक के बल्लों की ज्यादातर आपूर्ति चीन से की जाती थी। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में आए बदलावों के बाद स्थानीय स्तर पर निर्मित खेल सामग्री को प्राथमिकता मिलने लगी है। इसी का परिणाम है कि मेरठ की औद्योगिक इकाइयों में तैयार होने वाले प्लास्टिक बैट की मांग देश भर में काफी तेज हो गई है। आधुनिक तकनीक और संतुलित वजन का संयोजन मेरठ के परतापुर और उद्योग पुरम जैसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में बड़े स्तर पर ऐसी इकाइयां स्थापित हैं जहां इन बल्लों का निर्माण किया जा रहा है। निर्माण प्रक्रिया पूरी तरह आधुनिक मशीनों पर आधारित है। फैक्ट्री में प्लास्टिक के विशेष दानों को उन्नत मशीनों में डाला जाता है, जहां से वे सटीक क्रिकेट बैट के आकार में ढलकर बाहर आते हैं। निर्माण के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि प्रत्येक बल्ले का वजन संतुलित रहे, जिससे बच्चों और युवाओं को अभ्यास करते समय लकड़ी के बल्ले जैसा स्वाभाविक अनुभव मिल सके। इसका आप पर असर सस्ते और टिकाऊ प्लास्टिक बैट उपलब्ध होने से शुरुआती स्तर के क्रिकेट खिलाड़ियों और स्कूलों को किफायती उपकरण मिल रहे हैं। • भारत में: स्कूल और खेल अकादमियां अब चीन के आयातित सामान के बजाय घरेलू स्तर पर बने सस्ते प्लास्टिक बैट खरीद सकती हैं। इससे 60 रुपये से 700 रुपये के बजट में बच्चों के लिए अभ्यास सामग्री उपलब्ध हो रही है। • मेरठ में: परतापुर और उद्योग पुरम के खेल निर्माताओं और थोक विक्रेताओं के व्यापार में विस्तार हुआ है। स्थानीय स्तर पर नई निर्माण इकाइयां लगने से विनिर्माण क्षेत्र को नया सहारा मिला है। • खिलाड़ियों के लिए: शुरुआती अभ्यास करने वाले युवा भारी गेंद से खेलने के लिए भी मजबूत बैट हासिल कर पा रहे हैं। इससे लकड़ी के महंगे बैट के टूटने का जोखिम लिए बिना बुनियादी तकनीक सीखी जा सकती है। • अभिभावकों के लिए: छोटे बच्चों को खेल से जोड़ने के लिए महंगे विलो बैट खरीदने का वित्तीय बोझ कम हुआ है। मात्र 60 रुपये के न्यूनतम खर्च में घर के आसपास खेलने के लिए उपयुक्त बल्ला मिल जाता है। ऐसा क्यों हुआ मेरठ में प्लास्टिक बैट के बढ़ते उत्पादन के पीछे खेल सामग्री की घरेलू मांग में तेजी और आयातित उत्पादों पर निर्भरता कम होना प्रमुख कारण हैं। • चीनी आपूर्ति में कमी: पहले भारतीय बाजार में प्लास्टिक के बल्लों की प्रमुख खेप चीन से आती थी। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और आपूर्ति श्रृंखला में आए बदलावों के चलते घरेलू निर्माण को बड़ा अवसर मिला। • स्कूलों में बुनियादी खेल प्रशिक्षण: प्राथमिक स्तर पर बच्चों को चोट से बचाने और बुनियादी खेल सिखाने के लिए स्कूलों में प्लास्टिक बैट की लगातार आवश्यकता रहती है। इस संस्थागत मांग ने उत्पादन इकाइयों को निरंतर काम दिया है। • आधुनिक तकनीक की उपलब्धता: परतापुर और उद्योग पुरम में आधुनिक मोल्डिंग मशीनों के उपयोग से प्लास्टिक दानों से मजबूत और सही वजन वाले बैट बनाना तकनीकी रूप से सुगम और सस्ता हो गया है। • किफायती अभ्यास की चाह: महंगे कश्मीरी और इंग्लिश विलो बैट के मुकाबले युवा रोजमर्रा के रफ अभ्यास के लिए टिकाऊ और सस्ते विकल्प पसंद कर रहे हैं। सवाल-जवाब 1. मेरठ में बने प्लास्टिक के बल्लों की कीमत क्या है? इन बल्लों की कीमत 60 रुपये से शुरू होकर 700 रुपये तक जाती है। 2. मेरठ के किन इलाकों में प्लास्टिक बैट का निर्माण मुख्य रूप से हो रहा है? मेरठ के परतापुर और उद्योग पुरम स्थित औद्योगिक क्षेत्रों में इनकी निर्माण इकाइयां स्थापित हैं। 3. क्या इन प्लास्टिक बल्लों से भारी गेंदों के साथ अभ्यास किया जा सकता है? हां, निर्माताओं ने ऐसी कई वैरायटी तैयार की हैं जिनसे भारी गेंदों से भी खेला जा सकता है। 4. क्या प्लास्टिक के बल्ले पेशेवर मैचों में लकड़ी के बल्लों की जगह ले सकते हैं? नहीं, ये बल्ले शुरुआती अभ्यास और स्कूलों के लिए उपयोगी हैं, जबकि पेशेवर मैचों में लकड़ी के बैट ही काम आते हैं। 5. पहले इन बल्लों की आपूर्ति कहां से होती थी? पहले भारतीय बाजार में प्लास्टिक बैट की बड़ी सप्लाई मुख्य रूप से चीन से की जाती थी। https://trendkia.com/sports/parnparika-lakari-ke-bada-aba-plastika-ballon-ka-bara-kendra-bana-meerut-shuruati-treninga-ke-lie-barhi-manga-51234 TrendKia — Har trend, sabse pehle.