आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्टार्टअप्स के लिए असली प्रोडक्ट-मार्केट फिट हासिल करना क्यों बना सबसे बड़ी चुनौती वेंचर कैपिटलिस्ट्स और टेक संस्थापकों ने चेतावनी दी है कि एआई के इस दौर में केवल ट्रायल प्रोजेक्ट्स या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए रेवेन्यू आंकड़ों को प्रोडक्ट-मार्केट फिट समझना भारी गलती साबित हो सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस तेज रफ्तार दौर में किसी नए स्टार्टअप के लिए ऐसा प्रोडक्ट तैयार करना जो बाजार में वास्तव में बिक सके और टिका रहे, पहले से कहीं अधिक पेचीदा हो गया है। आज तमाम नए उद्यम रिकॉर्ड गति से आगे बढ़ने का दावा कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ग्राहक लंबे समय तक टिक नहीं पा रहे हैं। इसके साथ ही आज की आधुनिक तकनीक के सहारे किसी भी सफल विचार या सॉफ्टवेयर की नकल तैयार करना बेहद आसान हो चुका है। ऐसे माहौल में प्रोडक्ट-मार्केट फिट की पुरानी परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं। पायलट प्रोजेक्ट से स्थायी उत्पादन तक का सफर शुरुआती दौर में कई कंपनियां नए तकनीकी प्रयोग करने और अलग-अलग टूल्स आजमाने के लिए बेहद उत्साहित रहती हैं। भारद्वाज ने इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि आज ढेरों पायलट प्रोजेक्ट हासिल करना कभी इतना आसान नहीं रहा क्योंकि हर क्षेत्र की कंपनियां नई चीजें आजमाने को तैयार हैं, लेकिन असली मुश्किल पायलट से स्थायी उत्पादन तक पहुंचने में आती है। जब शुरुआती ट्रायल की अवधि खत्म होती है, तब पता चलता है कि सामने वाली कंपनी वास्तव में उस सर्विस के लिए हर महीने या हर साल नियमित भुगतान करने को तैयार है या नहीं। इसी वजह से बहुत से संस्थापक निवेशकों के सामने अपने वित्तीय आंकड़े पेश करते समय स्थिति को घुमावदार बना देते हैं। भारद्वाज के मुताबिक कई संस्थापक यह स्पष्ट किए बिना रेवेन्यू के आंकड़े दिखाते हैं कि वह असली आंकड़े हैं या केवल अनुमानित रन रेट हैं। बाजार में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी यह चर्चा काफी जोरों पर रही है कि कैसे कई नए संस्थापक अपनी कंपनी की सेहत को कागजों पर मजबूत दिखाने के लिए एआरआर यानी एनुअलाइज्ड रन रेट या एनुअल रिकरिंग रेवेन्यू को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। एक आम तरीका यह अपनाया जाता है कि जो ग्राहक सिर्फ दो या तीन महीने के लिए किसी पायलट प्रोजेक्ट पर आए थे, उनके भुगतान को पूरे साल के हिसाब से जोड़कर वार्षिक कमाई का हिस्सा मान लिया जाता है, जिससे यह भ्रम फैलता है कि वह आमदनी पूरे साल लगातार मिलती रहेगी। कमाई की गुणवत्ता और ग्राहक जुड़ाव के खतरे वित्तीय आंकड़ों की सच्चाई पर जोर देते हुए भारद्वाज ने कहा कि यह संस्थापकों के लंबे समय के हित में है कि वे कमाई की गुणवत्ता को लेकर पूरी तरह ईमानदार और स्पष्ट रहें। किसी भी कंपनी के लिए हाइप और असलियत के बीच का फर्क समझना अनिवार्य है। अगर किसी स्टार्टअप का बड़ा रेवेन्यू केवल कुछ गिने-चुने ग्राहकों पर निर्भर है, तो यह खतरे की घंटी है। इसी तरह यदि ग्राहक थोड़ी सी कम कीमत मिलने पर आसानी से किसी दूसरे वेंडर के पास जा सकते हैं, तो वह बिजनेस कभी सुरक्षित नहीं हो सकता। ऐसे हालात सीधे तौर पर इस बात को प्रभावित करते हैं कि कितने ग्राहक सेवा छोड़ रहे हैं और कितने लंबे समय तक टिके रहते हैं। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए वोहरा का मानना है कि स्टार्टअप्स को डॉलर रिटेंशन और ग्राहकों के जुड़ाव पर बारीक नजर रखनी चाहिए, खासकर उन उत्पादों में जो सीधे आम उपभोक्ताओं के लिए बनाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि हर संस्थापक को यह समझना होगा कि उनके खास क्षेत्र में प्रदर्शन का कौन सा पैमाना सामान्य है, कौन सा बेहतर है और कौन सा सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सुपरह्यूमन में अपने अनुभवों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि वे केवल साधारण एआरआर पर निर्भर नहीं रहते थे, बल्कि उन्होंने डिलाइटेड एआरआर नाम से एक आंतरिक पैमाना तय किया था। यह पैमाना केवल उन ग्राहकों की कमाई को मापता था जो प्रोडक्ट का बेहद सक्रियता से उपयोग करते थे। इससे उन्हें यह साफ देखने में मदद मिली कि ग्राहक कितने वफादार हैं और वे कितने वक्त तक साथ बने रहेंगे। जो उपभोक्ता उस वक्त बेहद संतुष्ट थे, वे आज भी सेवाएं ले रहे हैं, क्योंकि पूरी टीम ने अपने उसी खास वर्ग के उपभोक्ताओं को बेहतरीन सेवा देने पर ध्यान केंद्रित किया। कब करें बदलाव और कैसे बनाएं स्थायी बिजनेस मॉडल उत्पाद के सफल होने के सकारात्मक संकेत पहचानने के लिए वोहरा ने एक व्यावहारिक तरीका साझा किया। उनके अनुसार संस्थापकों को सीधे अपने ग्राहकों से बात करनी चाहिए और यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उन्हें प्रोडक्ट से क्या वास्तविक लाभ मिल रहा है। इसके साथ ही यह सवाल पूछना चाहिए कि यदि वे अचानक इस प्रोडक्ट का उपयोग न कर पाएं तो उन्हें कैसा महसूस होगा। इसके बाद मिलने वाले उत्तरों का ईमानदारी से विश्लेषण करना जरूरी है। यदि यह आंकड़ा 15 प्रतिशत, 14 प्रतिशत या 13 प्रतिशत या उससे नीचे रहता है, तो पूरे मॉडल में बुनियादी बदलाव करने पर विचार करना चाहिए। ऐसी स्थिति में अपने कोडबेस और टीम के साथ किसी बिल्कुल नए विचार पर काम शुरू करना समझदारी है, लेकिन यदि यह प्रतिक्रिया 20 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तो लगातार सुधार करके उसे 40 प्रतिशत तक ले जाया जा सकता है। धाम का कहना है कि एक संस्थापक को अपने नजरिए और एक अच्छे मुनाफे वाले कारोबार के बीच के अंतर को कभी नहीं भूलना चाहिए। केवल एक बड़ा विजन होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह एक सफल बिजनेस भी बन जाएगा। शुरुआती स्तर यानी सीड स्टेज पर भारद्वाज का मानना है कि दिशा बदलना पूरी तरह स्वाभाविक है। वे उस शुरुआती दौर में तुरंत प्रोडक्ट-मार्केट फिट की उम्मीद नहीं करतीं, बल्कि यह देखती हैं कि क्या संस्थापक के पास कोई ठोस विचार है और क्या परिस्थितियों के बदलने पर वह खुद को तेजी से ढालने की क्षमता रखता है। धाम ने भी कहा कि वे आज के समय में उन संस्थापकों को और अधिक महत्व देते हैं जिन्होंने कई बार रणनीतिक बदलाव किए हैं, क्योंकि यह दर्शाता है कि उन्होंने इस तेजी से बदलते माहौल में कड़े फैसले लेने का साहस दिखाया है। एक अरब डॉलर का कारोबार खड़ा करने के बाद भी कंपनियों को लगातार नए प्रयोग करने पड़ते हैं, क्योंकि प्रोडक्ट-मार्केट फिट कोई एक बार मिलने वाला तमगा नहीं है, बल्कि इसे कारोबार के हर चरण में लगातार नए सिरे से हासिल करना पड़ता है। इसका आप पर असर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नए सॉफ्टवेयर का उपयोग करने वाले उद्यमियों, तकनीकी कर्मचारियों और ग्राहकों के लिए यह समझ जरूरी है कि शुरुआती चमक और वास्तविक उत्पाद की उपयोगिता में क्या अंतर होता है। • स्टार्टअप संस्थापकों के लिए: ट्रायल प्रोजेक्ट्स के अस्थायी रेवेन्यू को स्थायी कमाई मान लेने की भूल न करें। केवल उन ग्राहकों के आंकड़ों पर ध्यान दें जो आपके टूल का दैनिक आधार पर सक्रिय उपयोग कर रहे हैं। • टेक कर्मचारियों के लिए: किसी कंपनी में काम शुरू करते समय केवल उसके विजन या हाइप के बजाय उसके वास्तविक रिटेंशन और ग्राहक जुड़ाव को समझें। अत्यधिक पायलट पर निर्भर कंपनियों में लंबे समय का स्थिरता जोखिम हो सकता है। • सॉफ्टवेयर ग्राहकों के लिए: नए तकनीकी टूल्स को अपनी कंपनी में शामिल करते समय यह परखें कि क्या वह टूल वाकई लंबे समय का समाधान दे रहा है। केवल शुरुआती छूट या पायलट अवधि देखकर बड़े तकनीकी बदलाव करने से बचें। • एंजेल निवेशकों के लिए: कंपनियों द्वारा पेश किए जाने वाले एआरआर आंकड़ों की बारीकी से जांच करें। यह सुनिश्चित करें कि सामने आ रहा रेवेन्यू वास्तव में बार-बार आने वाली कमाई है या केवल अल्पावधि ट्रायल। ऐसा क्यों हुआ वर्तमान तकनीकी माहौल में पायलट प्रोजेक्ट्स को वास्तविक बिजनेस सफलता मान लेने के भ्रम और वित्तीय आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की प्रवृत्ति के पीछे कई स्पष्ट कारण हैं। • तकनीकी नकल में आसानी: एआई टूल्स की मदद से नए सॉफ्टवेयर की नकल बनाना बहुत आसान हो गया है। इस वजह से ग्राहक किसी एक सर्विस पर टिकने के बजाय बेहतर कीमत मिलते ही दूसरे वेंडर पर चले जाते हैं। • फंडिंग हासिल करने का दबाव: उद्यमों के बीच निवेशकों से पूंजी जुटाने की होड़ के चलते कई संस्थापक एनुअलाइज्ड रन रेट और वास्तविक एआरआर के बीच के अंतर को धुंधला कर देते हैं। वे दो महीने के पायलट को पूरे साल की पक्की कमाई की तरह पेश करते हैं। • ट्रायल और स्थायी उपयोग का फासला: कंपनियां नई चीजें आजमाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट तो आसानी से शुरू कर देती हैं, लेकिन जब उस टूल को स्थायी रूप से लागू करने और पूरा बजट देने की बात आती है, तब वास्तविक उपयोगिता की कमी सामने आ जाती है। सवाल-जवाब 1. प्रोडक्ट-मार्केट फिट हासिल करने में पायलट प्रोजेक्ट्स की मुख्य समस्या क्या है? कंपनियां नए प्रयोगों के लिए पायलट प्रोजेक्ट आसानी से शुरू कर लेती हैं, लेकिन जब उसे स्थायी उत्पादन और नियमित भुगतान में बदलने की बात आती है, तब अधिकांश ग्राहक सेवा छोड़ देते हैं। 2. एआरआर को लेकर संस्थापक क्या भ्रम फैलाते हैं? कई संस्थापक केवल दो-तीन महीने के पायलट से मिले पैसों को पूरे साल के हिसाब से जोड़कर वार्षिक कमाई के रूप में दिखा देते हैं, जबकि वह ग्राहक पूरे साल टिकेगा या नहीं, यह तय नहीं होता। 3. डिलाइटेड एआरआर क्या है और यह क्यों उपयोगी है? यह केवल उन ग्राहकों से आने वाले रेवेन्यू को मापता है जो प्रोडक्ट के साथ बेहद गहराई से जुड़े हुए हैं, जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि असली ग्राहक कितने वफादार हैं। 4. किसी स्टार्टअप को अपनी दिशा कब बदल लेनी चाहिए? यदि प्रोडक्ट का उपयोग न कर पाने पर असुविधा महसूस करने वाले गंभीर ग्राहकों का अनुपात 15 प्रतिशत या उससे कम है, तो पूरी रणनीति बदलने पर विचार करना चाहिए। 5. क्या बड़े पैमाने पर पहुंचने के बाद प्रोडक्ट-मार्केट फिट पक्का हो जाता है? नहीं, एक अरब डॉलर के रेवेन्यू पर पहुंचने के बाद भी कंपनियों को बदलते बाजार के साथ लगातार नए प्रयोग करके इसे बार-बार हासिल करना पड़ता है। https://trendkia.com/startups/ai-startaapsa-ke-lie-asali-product-market-fit-hasila-karana-kyon-bana-sabase-bari-chunauti-51635 TrendKia — Har trend, sabse pehle.