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  "type": "article",
  "title": "फ्यूजन ऊर्जा क्षेत्र को ईंधन उपलब्ध कराने के लिए लिक्यूब ने शुरू की लिथियम शुद्धिकरण तकनीक",
  "summary": "जापानी स्टार्टअप लिक्यूब ने फ्यूजन बिजली संयंत्रों के लिए आवश्यक लिथियम-6 के शुद्धिकरण की तकनीक विकसित की है, जिससे ट्रिटियम ईंधन की कमी को दूर किया जा सकेगा।",
  "content": "परमाणु संलयन यानी फ्यूजन ऊर्जा को भविष्य के बिजली ग्रिड से जोड़ने की दिशा में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के सामने सबसे बड़ी बाधाओं में से एक जरूरी ईंधन की उपलब्धता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए लिक्यूब नाम का एक उभरता हुआ उद्यम सामने आया है। इस कंपनी ने जापान के हिरोसाकी विश्वविद्यालय से विशेष तकनीक का लाइसेंस हासिल किया है, ताकि प्राकृतिक रूप से मिलने वाले लिथियम से लिथियम-6 को अलग और शुद्ध किया जा सके। फ्यूजन ऊर्जा संयंत्रों के सफल संचालन के लिए लिथियम-6 की मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती है, क्योंकि इसके बिना संयंत्र अपने लिए आवश्यक ईंधन तैयार नहीं कर सकते हैं।\n\nफ्यूजन संयंत्रों में ईंधन संकट और ट्रिटियम की कमी\nभविष्य के अधिकांश नियोजित फ्यूजन संयंत्र दो मुख्य ईंधनों के मिश्रण पर काम करने के लिए तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें ड्यूटेरियम और ट्रिटियम शामिल हैं। ड्यूटेरियम प्रकृति में प्रचुर मात्रा में सुलभ है, लेकिन ट्रिटियम का मिलना बेहद दुर्लभ है। संलयन ऊर्जा के क्षेत्र में यह एक खुली सच्चाई है कि दुनिया भर में बनने वाले तमाम नियोजित संयंत्रों को लगातार चालू रखने के लिए पर्याप्त ट्रिटियम मौजूद नहीं है।\n\nइस गंभीर संकट से पार पाने के लिए संयंत्र के भीतर ही जरूरत के हिसाब से ट्रिटियम बनाने का विकल्प चुना गया है। जब फ्यूजन प्रक्रिया शुरू होती है, तो अत्यधिक तीव्र गति से चलने वाले कण, जिन्हें न्यूट्रॉन कहा जाता है, बाहर निकलते हैं। ऊर्जा विकसित करने वाली कंपनियां रिएक्टर के चारों ओर लिथियम की एक सुरक्षात्मक परत यानी ब्लैंकेट लगाने की योजना बना रही हैं। जैसे ही कोई तेज न्यूट्रॉन लिथियम परमाणु से टकराता है, वह परमाणु विभाजित होकर हीलियम और ट्रिटियम का निर्माण करता है। इसके बाद इस ट्रिटियम को एकत्रित कर, शुद्ध करके दोबारा ईंधन के रूप में रिएक्टर में भेजा जा सकता है।\n\nलिथियम-6 को अलग करने की जटिल प्रक्रिया\nप्रकृति में मौजूद सभी लिथियम इस प्रक्रिया को समान दक्षता के साथ पूरा नहीं कर पाते हैं। लिथियम के दो अलग-अलग आइसोटोप होते हैं, जिन्हें उनके भार के आधार पर लिथियम-6 और लिथियम-7 कहा जाता है। न्यूट्रॉन को पकड़ने और ट्रिटियम उत्पन्न करने के मामले में लिथियम-6 कहीं अधिक असरदार और सक्षम साबित होता है। समस्या यह है कि प्राकृतिक लिथियम में लिथियम-6 की मात्रा मात्र 7.5 प्रतिशत के आसपास ही होती है, जबकि शेष 92.5 प्रतिशत हिस्सा भारी लिथियम-7 का होता है। इन दोनों रूपों को एक-दूसरे से अलग करना तकनीकी रूप से अत्यंत कठिन है और दुनिया में वर्तमान में ऐसा करने की क्षमता बेहद सीमित है, जिसके कारण दुनिया भर में लिथियम-6 की भारी कमी बनी हुई है।\n\nलिक्यूब की पूरी बुनियादी प्रणाली एक इलेक्ट्रोलाइजर उपकरण पर आधारित है, जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं को संचालित करने के लिए बिजली के करंट का उपयोग करता है। कंपनी की प्रक्रिया में एक सिरेमिक झिल्ली के एक तरफ तरल में लिथियम को घोला जाता है। जब सिरेमिक झिल्ली के एक सिरे से दूसरे सिरे की ओर विद्युत प्रवाह भेजा जाता है, तब लिथियम-6 के कण अधिक गति से आगे बढ़ते हैं। इसके बाद उस तरल को बाहर निकालकर लिथियम-6 को अलग कर लिया जाता है। इस तकनीक का अंतिम लक्ष्य लिथियम को कम से कम 99.995 प्रतिशत शुद्ध लिथियम-6 तक समृद्ध करना है, जिसे फ्यूजन कंपनियां अपने ईंधन निर्माण तंत्र में उपयोग कर सकेंगी।\n\nबाजार की संभावनाएं और वैकल्पिक उद्योग\nइस कमी को पूरा करने में कंपनी को एक बहुत बड़ा वाणिज्यिक अवसर दिखाई दे रहा है। लिक्यूब के सह-संस्थापक और सीईओ योहेई किगुची का मानना है कि यदि फ्यूजन ऊर्जा प्रणाली मुख्य ग्रिड पर सफलतापूर्वक आ जाती है, तो वर्ष 2040 तक यह अकेले 50 अरब डॉलर का बाजार बन सकता है। ऊर्जा का कुल वैश्विक बाजार कई खरबों डॉलर का है, जिसमें फ्यूजन की हिस्सेदारी काफी बड़ी हो सकती है, हालांकि पहले वाणिज्यिक बिजली संयंत्र बनने में अभी कई वर्षों का समय बाकी है।\n\nयोहेई किगुची ने इस बात को स्वीकार किया कि भविष्य का सबसे बड़ा बाजार संलयन ऊर्जा ही है, लेकिन उस भविष्य को हकीकत बनने में कुछ अतिरिक्त वर्षों की देरी भी हो सकती है। इसी वजह से जब तक संलयन संयंत्रों का व्यावसायिक बाजार पूरी तरह तैयार नहीं होता, तब तक लिक्यूब अपनी इसी तकनीक का उपयोग सेमीकंडक्टर, दवा निर्माण, विखंडन यानी फिशन परमाणु रिएक्टर और अंतरिक्ष यान उद्योगों के लिए लिथियम शुद्ध करने में करेगा।\n\nआईटीईआर के दौरे से मिली प्रेरणा\nयोहेई किगुची को इस उद्यम की स्थापना की प्रेरणा दक्षिणी फ्रांस में निर्माणाधीन प्रायोगिक फ्यूजन रिएक्टर आईटीईआर को देखने के बाद मिली थी। जापान में ऊर्जा परिवर्तन मंच नेटवर्क एनचेंज से सेवानिवृत्त होने के बाद वह उस समय पास ही मोनाको में रह रहे थे, जो उस संयंत्र से कुछ ही घंटों की दूरी पर था। उन्होंने महसूस किया कि अभी उनकी उम्र पूरी तरह संन्यास लेने की नहीं हुई है और वह ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति होने के नाते समाज और विज्ञान के लिए कुछ बहुत बड़ा काम करना चाहते थे। इसी सोच ने अंततः इस नए प्रयास की नींव रखी।\n\nइसका आप पर असर\nसंलयन ऊर्जा के लिए आवश्यक लिथियम-6 के व्यावसायिक उत्पादन से भविष्य में प्रदूषण रहित और असीमित बिजली उत्पादन का रास्ता आसान हो सकता है।\n\n• ऊर्जा आपूर्ति पर प्रभाव: फ्यूजन संयंत्रों को जरूरी ईंधन मिलने से आने वाले दशकों में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे लंबे समय में बिजली की दरों में स्थिरता आने और स्वच्छ ग्रिड बिजली मिलने की उम्मीद बंधेगी।\n• तकनीकी उपकरणों की लागत: लिथियम शोधन की यह तकनीक सेमीकंडक्टर और स्पेसक्राफ्ट उद्योगों में भी इस्तेमाल की जाएगी। इससे उच्च गुणवत्ता वाले चिप्स और विशेष इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में तेजी आ सकती है।\n• दवा निर्माण क्षेत्र: उन्नत लिथियम शोधन से फार्मास्युटिकल कंपनियों को आवश्यक रासायनिक यौगिक आसानी से उपलब्ध होंगे। इसके परिणामस्वरूप विशेष चिकित्सा शोध और नई दवाओं के विकास को गति मिल सकेगी।\n• पारंपरिक परमाणु ऊर्जा: यह प्रक्रिया मौजूदा फिशन परमाणु रिएक्टरों के लिए भी उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराएगी। इससे वर्तमान परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की कार्यकुशलता और सुरक्षा मानकों में सुधार संभव होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nफ्यूजन ऊर्जा संयंत्रों को चलाने के लिए ट्रिटियम ईंधन की जरूरत होती है, जो प्रकृति में न के बराबर पाया जाता है। इसे संयंत्र के अंदर ही बनाने के लिए लिथियम-6 आइसोटोप आवश्यक है, जिसकी आपूर्ति बढ़ाने के लिए यह नई तकनीक विकसित की गई है।\n\n• ट्रिटियम की प्राकृतिक अनुपलब्धता: प्रस्तावित फ्यूजन बिजली संयंत्रों को ड्यूटेरियम और ट्रिटियम के मिश्रण की आवश्यकता होती है, लेकिन प्राकृतिक ट्रिटियम अत्यंत दुर्लभ है। इस गंभीर ईंधन संकट को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने रिएक्टर के भीतर ही ट्रिटियम बनाने की योजना तैयार की।\n• लिथियम-6 की प्राकृतिक अल्पता: रिएक्टर में न्यूट्रॉन से टकराकर ट्रिटियम बनाने के लिए केवल लिथियम-6 ही सबसे उपयुक्त होता है, जबकि प्राकृतिक लिथियम में इसका अनुपात केवल 7.5% है। भारी लिथियम-7 की अधिकता के कारण शुद्ध लिथियम-6 की वैश्विक उपलब्धता बेहद कम रह गई थी।\n• पृथक्करण तकनीक का अभाव: दोनों आइसोटोप को अलग करने की मौजूदा औद्योगिक क्षमता लगभग नगण्य थी, जिसे हल करने के लिए हिरोसाकी विश्वविद्यालय की इलेक्ट्रोलाइजर और सिरेमिक झिल्ली तकनीक का लाइसेंस लिया गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. लिक्यूब किस प्रकार की तकनीक पर काम कर रहा है?\nलिक्यूब प्राकृतिक लिथियम से लिथियम-6 आइसोटोप को अलग और शुद्ध करने के लिए इलेक्ट्रोलाइजर और सिरेमिक झिल्ली तकनीक का उपयोग करता है।\n\n2. फ्यूजन ऊर्जा संयंत्रों को लिथियम-6 की आवश्यकता क्यों है?\nफ्यूजन संयंत्रों में दुर्लभ ट्रिटियम ईंधन बनाने के लिए रिएक्टर के चारों ओर लिथियम की परत लगाई जाती है, जहां लिथियम-6 न्यूट्रॉन से टकराकर ट्रिटियम बनाता है।\n\n3. प्राकृतिक लिथियम में लिथियम-6 की मात्रा कितनी होती है?\nप्राकृतिक लिथियम में लिथियम-6 की मात्रा केवल लगभग 7.5 प्रतिशत होती है, जबकि शेष 92.5 प्रतिशत हिस्सा लिथियम-7 होता है।\n\n4. लिक्यूब का लिथियम शुद्धिकरण लक्ष्य क्या है?\nकंपनी का लक्ष्य लिथियम को कम से कम 99.995 प्रतिशत लिथियम-6 की शुद्धता तक समृद्ध करना है।\n\n5. संलयन ऊर्जा से पहले कंपनी किन अन्य क्षेत्रों में सेवा देगी?\nफ्यूजन ऊर्जा बाजार तैयार होने तक कंपनी सेमीकंडक्टर, दवा निर्माण, विखंडन रिएक्टर और अंतरिक्ष यान उद्योगों के लिए लिथियम शुद्ध करेगी।\n\n6. योहेई किगुची के अनुसार 2040 तक यह बाजार कितना बड़ा हो सकता है?\nयोहेई किगुची के अनुसार यदि संलयन ऊर्जा मुख्य धारा में आती है, तो 2040 तक यह 50 अरब डॉलर का बाजार बन सकता है।",
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  "category": "स्टार्टअप्स",
  "publishedAt": "2026-10-14",
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