# अभावों को पछाड़कर भारतीय महिला हॉकी टीम की कमान संभालने वाली सलीमा टेटे की पूरी कहानी

> झारखंड के सिमडेगा जिले की सलीमा टेटे ने गरीबी और अभावों को हराकर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी संभाली है। बांस की कच्ची स्टिक से अभ्यास शुरू करने वाली सलीमा को अर्जुन अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-08-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/abhavon-ko-pachharakara-bharatiya-mahila-hoki-tima-ki-kamana-snbhalane-vali-salima-tete-ki-puri-kahani-19321 · **Language:** Hindi
**Tags:** सलीमा टेटे, भारतीय महिला हॉकी टीम, सिमडेगा, झारखंड, अर्जुन अवॉर्ड, हॉकी कप्तान

झारखंड के एक सुदूर गांव से निकलकर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी संभालने वाली सलीमा टेटे की जीवन यात्रा संघर्ष और अटूट संकल्प की मिसाल है। बेहद तंगहाली और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पली-बढ़ी सलीमा ने तमाम विपरीत परिस्थितियों को दरकिनार करते हुए अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर अपनी खास पहचान बनाई है। बिना हॉकी स्टिक और भोजन की तंगी के बीच शुरू हुआ उनका सफर आज देश के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है।

## बांस की लकड़ी और पत्थरों से खेल का आगाज
रांची से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित सिमडेगा जिले के छापर गांव की रहने वाली सलीमा टेटे का बचपन बेहद कड़े अभावों में बीता। उनके पिता एक साधारण किसान थे, जिनकी खेती से परिवार का गुजारा होना मुश्किल था। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि सलीमा की मां और बहन को दूसरों के घरों में काम करना पड़ता था। परिवार के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि सलीमा के लिए एक असली हॉकी स्टिक खरीदी जा सके।

ऐसे में सलीमा ने हार मानने के बजाय कुदरती संसाधनों का सहारा लिया। उनके खेतों के आसपास प्राकृतिक रूप से बांस उगते थे। सलीमा और उनके साथी उन्हीं बांसों को काटकर अपने लिए कच्ची हॉकी स्टिक तैयार कर लेते थे। गेंद खरीदने के पैसे न होने पर वे पत्थरों को ही गेंद बनाकर गलियों और खेतों में हॉकी खेला करते थे। घर में खान-पान भी बेहद साधारण था, जहां कई बार सिर्फ माड़-भात या चोखा-भात खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। हालांकि, इस तंगहाली के बावजूद सलीमा के भीतर खेल को लेकर अटूट निष्ठा बनी रही।

## प्रतिभा की पहचान और 10-12 घंटे का कड़ा अभ्यास
सलीमा की जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब सिमडेगा हॉकी एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कोंडेगी की नजर उनकी प्रतिभा पर पड़ी। उन्होंने सलीमा के भीतर छिपे कौशल को पहचाना और उन्हें मार्गदर्शन देना शुरू किया। मनोज कोंडेगी के विशेष प्रयासों से सलीमा को एक निःशुल्क आवासीय हॉकी प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला मिल गया।

इस प्रशिक्षण केंद्र में प्रवेश मिलते ही सलीमा को भोजन और रहने की चिंता से मुक्ति मिल गई। यहां उन्हें आधुनिक हॉकी स्टिक, खेल की सही किट और पेशेवर सुविधाएं प्राप्त हुईं। जीवन में मिले इस अवसर को सलीमा ने पूरी शिद्दत से भुनाया। उन्होंने खुद को निखारने के लिए रोजाना 10 से 12 घंटे तक मैदान पर पसीना बहाया। सलीमा का मानना है कि कोच के मार्गदर्शन और परिवार के समर्थन के बिना वह इस मुकाम तक नहीं पहुंच पातीं।

## पड़ोसी के टीवी पर देखा मैच और अर्जुन अवॉर्ड का ऐतिहासिक गौरव
जब सलीमा का चयन पहली बार राष्ट्रीय मैच के लिए हुआ, तब भी उनके घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वहां टीवी हो। उनके परिवार के पास मैच देखने का कोई साधन नहीं था, इसलिए सलीमा को पहली बार खेलते देखने के लिए उनके घरवालों को पड़ोसी के घर जाना पड़ा था। टीवी की स्क्रीन पर अपनी बेटी को देश के लिए खेलते देख उनका परिवार बेहद भावुक हो उठा था।

सलीमा टेटे ने अपने प्रदर्शन के दम पर न केवल भारतीय महिला हॉकी टीम में अपनी जगह पक्की की, बल्कि टीम की कप्तानी की जिम्मेदारी भी संभाली। उन्होंने ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई किया और कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल किए। सलीमा को केंद्र सरकार द्वारा प्रतिष्ठित अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। वह अर्जुन अवॉर्ड प्राप्त करने वाली झारखंड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी बनी हैं। बांस की स्टिक से शुरू हुआ सलीमा का यह सफर यह साबित करता है कि सच्ची लगन हो तो कोई भी बाधा मंजिल के रास्ते में नहीं आ सकती।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** यह कहानी देश के युवाओं और उभरते खिलाड़ियों को सीमित संसाधनों के बावजूद खेलों में सफलता पाने के लिए प्रेरित करती है।
- **झारखंड में:** सिमडेगा और राज्य के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए खेल अकादमियों व प्रशिक्षण सुविधाओं के महत्व को रेखांकित करती है।

## सवाल-जवाब

### 1. सलीमा टेटे का संबंध किस राज्य और जिले से है?
सलीमा टेटे झारखंड राज्य के सिमडेगा जिले के छापर गांव की रहने वाली हैं, जो रांची से लगभग 100 किलोमीटर दूर है।

### 2. बचपन में सलीमा टेटे हॉकी का अभ्यास कैसे करती थीं?
सलीमा के पास हॉकी स्टिक खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए वह खेतों के पास उगने वाले बांस काटकर स्टिक बनाती थीं और पत्थरों को गेंद बनाकर खेलती थीं।

### 3. सलीमा टेटे के करियर को संवारने में किसका योगदान रहा?
सिमडेगा हॉकी एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कोंडेगी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना, ट्रेनिंग दी और उन्हें निःशुल्क आवासीय हॉकी प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला दिलवाया।

### 4. सलीमा टेटे को केंद्र सरकार की ओर से कौन सा प्रमुख खेल पुरस्कार मिला है?
सलीमा टेटे को केंद्र सरकार की ओर से अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है, और वह यह सम्मान पाने वाली झारखंड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी हैं।

### 5. सलीमा के परिवार ने उनका पहला नेशनल मैच कहां देखा था?
घर में टीवी न होने के कारण उनके परिवार वालों ने सलीमा का पहला राष्ट्रीय मैच पड़ोसी के घर जाकर टीवी पर देखा था।

## प्रेरणा और सबक
- **अभावों के बावजूद नवाचार:** असली हॉकी स्टिक न होने पर बांस और पत्थरों से अभ्यास जारी रखकर सलीमा ने साबित किया कि लगन साधनों से बड़ी होती है।
- **कड़ा परिश्रम:** आवासीय केंद्र में चयन के बाद सलीमा ने रोजाना 10-12 घंटे अभ्यास करके अपने अवसर का पूरा लाभ उठाया।
- **सही मार्गदर्शन का महत्व:** कोच मनोज कोंडेगी की सही पहचान और सहयोग ने उनके करियर को सही दिशा दी।
- **अटूट विश्वास:** कठिन तंगहाली और माड़-भात खाकर भी सलीमा ने ईमानदारी से मेहनत करने पर सफलता मिलने का भरोसा बनाए रखा।

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