# अमेठी के रामखेलार चार दशकों से गढ़ रहे मिट्टी की सजीव मूर्तियां, दूसरों को भी दे रहे हुनर की ट्रेनिंग

> उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के रहने वाले रामखेलार पिछले 40 वर्षों से मिट्टी की कलाकृतियां बना रहे हैं। शुरुआती संघर्षों को पार कर आज वह एक सफल मूर्तिकार बन चुके हैं और अन्य लोगों को भी इस कला का प्रशिक्षण दे रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-09-10 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/amethi-ke-ramkhelaar-chara-dashakon-se-garha-rahe-mitti-ki-sajiva-murtiyan-30851 · **Language:** Hindi
**Tags:** अमेठी, मूर्तिकार, रामखेलार, मिट्टी की मूर्तियां, दूर्गा पूजा, उत्तर प्रदेश, सफलता की कहानी

अमेठी जिले की इस प्रेरणादायक कहानी में कला और संघर्ष का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यहां के एक प्रतिभावान कलाकार ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर यह साबित कर दिया है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सफलता हासिल की जा सकती है। रामखेलार नाम के यह मूर्तिकार बीते चार दशकों से मिट्टी के जरिए अद्भुत कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं। उनके हाथों से गढ़ी गई प्रतिमाएं इतनी जीवंत होती हैं कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे साक्षात देवी प्रकट हो गई हों। उनकी इस कला का दायरा अब केवल उनके गृह जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर-दराज के अन्य जिलों से भी लोग उनकी बनाई मूर्तियों को अपने यहां ले जाने के लिए पहुंचते हैं।

## शुरुआती दौर का संघर्ष और कला की सीख
यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी। रामखेलार के जीवन में एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें इस हुनर को सीखने के लिए दूसरों के दरवाजों पर जाना पड़ता था। उस समय उन्हें कड़ी मेहनत के बाद भी बहुत कम मेहनताना मिलता था। हालांकि, इन कठिनाइयों ने उनके हौसले को कमजोर करने के बजाय और मजबूत किया। उन्होंने परिस्थितियों से हार मानने के बजाय खुद का काम शुरू करने का फैसला किया। आज स्थिति यह है कि जो व्यक्ति कभी दूसरों से काम सीखने जाता था, उसके पास आज खुद नए लोग हुनर सीखने आते हैं। वर्तमान में वह एक बार में करीब 25 से 30 मूर्तियां तैयार करते हैं जिन्हें विभिन्न दुर्गा पंडालों में सजावट के लिए ले जाया जाता है।

## सामग्री और निर्माण की पूरी प्रक्रिया
मिट्टी की इन मनमोहक मूर्तियों को तैयार करने के लिए कई तरह की चीजों को जुटाना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य रूप से तालाब की मिट्टी, बांस, कपड़े, जूट, थर्मोकोल और अन्य छोटी-सामग्री का उपयोग किया जाता है। एक मूर्ति को पूरी तरह से आकार लेने और तैयार होने में लगभग तीन से चार दिन का समय लगता है। शुरुआती दिनों के कड़े संघर्ष को याद करते हुए वह बताते हैं कि आज जब उन्हें सफलता मिली है, तो उन्हें अपने इस सफर पर बेहद गर्व महसूस होता है। उनका मानना है कि यह सब भगवान की कृपा और उनकी खुद की निरंतर मेहनत का ही परिणाम है।

## लागत, मुनाफा और कारोबार का गणित
इस व्यवसाय के आर्थिक पहलू पर नजर डालें तो एक मूर्ति को बनाने में अनुमानित तौर पर ढाई से तीन हजार रुपये की लागत आती है। इसके बाद बाजार में यही मूर्ति सात से आठ हजार रुपये तक आसानी से बिक जाती है। इस तरह उन्हें प्रत्येक मूर्ति पर करीब दो से ढाई गुना तक का मुनाफा मिल जाता है। आज के समय में अमेठी के अलावा विभिन्न अन्य स्थानों से भी लोग विशेष रूप से उनके पास मूर्तियां तैयार करवाने आते हैं। उनका यह हुनर न केवल उनकी आजीविका का बड़ा जरिया बन चुका है, बल्कि स्थानीय स्तर पर कला को सहेजने और आगे बढ़ाने का एक बेहतरीन माध्यम भी साबित हो रहा है।

## इसका आप पर असर
यह खबर स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है।

- **भारत में:** पारंपरिक कला और कुटीर उद्योगों से जुड़े कारीगरों को अपने काम में निरंतरता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन मिलता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।
- **अमेठी में:** स्थानीय युवाओं और पारंपरिक कारीगरों को यह सीखने का अवसर मिलता है कि कैसे कम संसाधनों में हुनर को निखारकर आत्मनिर्भर बना जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह सफलता वर्षों के कड़े संघर्ष, लगातार अभ्यास और खुद का काम शुरू करने के साहसिक निर्णय का परिणाम है।

- **शुरुआती कठिनाइयां:** कम उम्र में दूसरों के पास काम सीखने के दौरान मिलने वाला कम मेहनताना और अत्यधिक परिश्रम ही वह पृष्ठभूमि थी जिसने उन्हें स्वतंत्र रूप से काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
- **कौशल और सामग्री का चयन:** तालाब की मिट्टी और बांस जैसी स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का सही उपयोग करने से उत्पादन लागत नियंत्रित रही और मुनाफा बढ़ा।
- **बढ़ती मांग:** मूर्तियों की उच्च गुणवत्ता और सजीवता के कारण धीरे-धीरे उनकी साख बढ़ी, जिससे जिले के बाहर से भी ग्राहक आने लगे।

## सवाल-जवाब

### 1. रामखेलार कितने वर्षों से मूर्तियां बना रहे हैं?
रामखेलार पिछले करीब 40 वर्षों से मिट्टी की मूर्तियां बना रहे हैं।

### 2. रामखेलार किस जिले के रहने वाले हैं?
वह उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के रहने वाले हैं।

### 3. एक मूर्ति को तैयार करने में कितना समय लगता है?
एक मूर्ति को पूरी तरह तैयार होने में लगभग तीन से चार दिन का समय लगता है।

### 4. एक मूर्ति को बनाने में कितनी लागत आती है और कितने में बिकती है?
एक मूर्ति की लागत करीब ढाई से तीन हजार रुपये आती है और वह सात से आठ हजार रुपये में बिकती है।

### 5. एक बार में वह कितनी मूर्तियां तैयार करते हैं?
वह एक बार में लगभग 25 से 30 मूर्तियां तैयार करते हैं जिन्हें दुर्गा पंडालों में सजाया जाता है।

## प्रेरणा और सबक
रामखेलार की यह यात्रा उन सभी लोगों के लिए एक मिसाल है जो सीमित संसाधनों के साथ कुछ बड़ा करना चाहते हैं।

- **संघर्ष से न घबराएं:** शुरुआती दौर में मिलने वाली कम कमाई और कठिनाइयों को अनुभव मानकर अपने कौशल को निखारते रहें।
- **स्वतंत्रता की ओर कदम:** दूसरों के अधीन काम सीखने के बाद अपने खुद के उद्यम की शुरुआत करने का साहस रखें।
- **गुणवत्ता पर ध्यान:** काम में इतनी बारीकी और जीवंतता लाएं कि लोग खुद-ब-खुद आपके पास खिंचे चले आएं।
- **दूसरों को सिखाएं:** अपने हुनर को अपने तक सीमित न रखें, बल्कि आने वाली पीढ़ी और जरूरतमंदों को भी उसका प्रशिक्षण दें।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._