# अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से आत्मनिर्भर बन रहीं महिलाएं, मुंज क्राफ्ट और कपड़ों के ऑनलाइन व्यापार से हर महीने कमा रहीं ₹25,000 तक

> अमेठी की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए मुंज क्राफ्ट, कपड़े और खाद्य उत्पाद बनाकर ऑनलाइन व स्थानीय बाजारों में बेच रही हैं। इससे वे न सिर्फ आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं, बल्कि महीने में 20 से 25 हजार रुपये तक का मुनाफा भी कमा रही हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-11-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/amethi-men-svayn-sahayata-samuhon-se-atmanirbhara-bana-rahin-mahilaen-munj-craft-aura-kaparon-ke-nalaina-vyapara-se-hara-mahine-ka-57144 · **Language:** Hindi
**Tags:** अमेठी, स्वयं सहायता समूह, महिला सशक्तिकरण, मुंज क्राफ्ट, आत्मनिर्भर भारत, ई-कॉमर्स

उत्तर प्रदेश के अमेठी में महिलाओं की जिंदगी में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। जो महिलाएं कभी केवल अपने घरों की चारदीवारी तक सीमित थीं, वे अब स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रही हैं। इन महिलाओं ने पारंपरिक हस्तशिल्प से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाले सामान और कपड़ों के निर्माण तक का काम संभाल रखा है। उनके बनाए उत्पाद न केवल स्थानीय दुकानों पर बिक रहे हैं, बल्कि अब ई-कॉमर्स और ऑनलाइन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी उनकी जबरदस्त मांग देखने को मिल रही है।

## विविध उत्पादों से तैयार हो रहा बड़ा कारोबार
अमेठी की महिलाएं 'एक जनपद एक उत्पाद' (ओडीओपी) योजना के तहत चयनित प्रसिद्ध मुंज क्राफ्ट तक ही सीमित नहीं हैं। उन्होंने अपने काम का दायरा काफी बढ़ा लिया है। अब वे मोटे अनाज से बने बिस्कुट, स्वादिष्ट नमकीन, झाड़ू, फिनायल और घर की सफाई के उत्पाद भी बड़े पैमाने पर तैयार कर रही हैं। इसके साथ ही, टेक्सटाइल और कपड़े के बिज़नेस में भी इन महिलाओं ने मजबूत पैठ बनाई है। ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से कपड़ों की बिक्री करके वे हर महीने लगभग 20,000 से 25,000 रुपये तक का मुनाफा कमा रही हैं। इसके अलावा, समूहों से जुड़ी कई अन्य महिलाएं अचार, मुरब्बा, चिप्स और पापड़ जैसे पारंपरिक खाद्य उत्पाद बनाकर भी अच्छी आय हासिल कर रही हैं।

## रोजगार से बदली आर्थिक स्थिति और पारिवारिक सोच
स्वयं सहायता समूह से जुड़ी रूबी चौरसिया ने बताया कि उनका समूह मुख्य रूप से पोषाहार तैयार करने का कार्य करता है। पहले रोजगार की तलाश में घर से बाहर भटकना पड़ता था, लेकिन समूह के जरिए अब उन्हें घर पर ही कमाई का जरिया मिल गया है। रूबी का कहना है कि शुरुआत में परिजनों की ओर से थोड़ी रोक-टोक और मनाही थी, लेकिन जैसे-जैसे काम आगे बढ़ा और कमाई होने लगी, परिवार की स्थिति में सुधार आया और घर वालों का नज़रिया भी बदल गया।

## स्थानीय महिलाओं को मिल रहा रोजगार का सहारा
समूह से जुड़ी अन्य महिलाओं की जिंदगी में भी इस बदलाव का बड़ा असर दिखा है। समूह की सदस्य संतोषी का कहना है कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद महिलाओं को बहुत बड़ा आर्थिक लाभ मिला है। वहीं फूलमती देवी ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि पहले कई तरह की आर्थिक परेशानियां हुआ करती थीं, लेकिन समूह का हिस्सा बनने के बाद से लगातार काम मिल रहा है। उनके काम वाली जगह पर 10 से 20 महिलाएं एक साथ मिलकर काम करती हैं। रोजगार मिलने से ये महिलाएं अब न केवल अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी हैं, बल्कि अपने परिवार का दैनिक खर्च भी आसानी से उठा रही हैं।

## इसका आप पर असर
यह खबर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और स्वयं सहायता समूहों के प्रभाव को दर्शाती है।

- **भारत में:** देश भर की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के जरिए ओडीओपी (ODOP) और ई-कॉमर्स का लाभ उठाकर घर बैठे 20,000 से 25,000 रुपये तक मासिक आय अर्जित कर सकती हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और महिलाओं की पारिवारिक वित्तीय निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है।
- **अमेठी (उत्तर प्रदेश) में:** जिले की स्थानीय महिलाएं मुंज क्राफ्ट, वस्त्र निर्माण और पोषाहार उत्पादन से जुड़कर स्थायी रोजगार पा रही हैं। 10 से 20 महिलाओं के समूह बनाकर काम करने से स्थानीय परिवारों की आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है।

## ऐसा क्यों हुआ
अमेठी में महिलाओं की वित्तीय आत्मनिर्भरता के पीछे स्वयं सहायता समूहों का ढांचा और सरकारी सहायता प्रमुख कारण हैं।

- **समूह आधारित कार्य प्रणाली:** व्यक्तिगत रूप से काम करने के बजाय स्वयं सहायता समूह बनाने से महिलाओं को संसाधन, कच्चा माल और शुरुआती पूंजी जुटाने में आसानी हुई।
- **उत्पादों का विविधीकरण:** केवल मुंज क्राफ्ट तक सीमित न रहकर महिलाओं ने खाद्य पदार्थ, सफाई के सामान और कपड़ों जैसे दैनिक उपयोग की वस्तुओं का निर्माण शुरू किया जिसकी मांग लगातार बनी रहती है।
- **ऑनलाइन मार्केटिंग तक पहुंच:** डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स बिज़नेस से जुड़ने के कारण स्थानीय स्तर पर बने कपड़ों और सामानों को राष्ट्रीय बाजार मिला जिससे बिक्री और मुनाफा दोनों बढ़ गए।

## सवाल-जवाब

### 1. अमेठी में महिलाएं स्वयं सहायता समूह के माध्यम से क्या उत्पाद बना रही हैं?
महिलाएं मुंज क्राफ्ट, मोटे अनाज के बिस्कुट, नमकीन, फिनायल, झाड़ू, कपड़े, अचार, मुरब्बा, चिप्स और पापड़ जैसे उत्पाद बना रही हैं।

### 2. कपड़े और वस्त्र व्यवसाय से महिलाएं हर महीने कितना मुनाफा कमा रही हैं?
ऑनलाइन बाजार में कपड़े बेचकर महिलाएं लगभग 20,000 से 25,000 रुपये प्रति माह का लाभ कमा रही हैं।

### 3. रूबी चौरसिया का स्वयं सहायता समूह किस तरह के उत्पाद तैयार करता है?
रूबी चौरसिया का समूह मुख्य रूप से पोषाहार उत्पाद बनाने का काम करता है।

### 4. एक स्वयं सहायता समूह में लगभग कितनी महिलाएं मिलकर काम कर रही हैं?
समूहों में सामान्यतः 10 से 20 महिलाएं एक साथ काम करके अपना और अपने परिवार का खर्च उठा रही हैं।

## प्रेरणा और सबक
अमेठी की महिलाओं की यह सफलता की कहानी कई महत्वपूर्ण सबक सिखाती है।

- **सीमित संसाधनों में अवसर खोजना:** घर की चौखट के भीतर रहकर भी स्थानीय कौशल और समूह की मदद से बड़ा व्यापार खड़ा किया जा सकता है।
- **समय के साथ बदलाव:** केवल पारंपरिक क्राफ्ट तक सीमित रहने के बजाय आधुनिक बाजार की मांग (जैसे कपड़े और पोषाहार) को समझना सफलता की कुंजी है।
- **सामूहिक शक्ति:** 10 से 20 महिलाओं के साथ मिलकर काम करने से जोखिम कम होता है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
- **सामाजिक बाधाओं को पार करना:** पारिवारिक मनाही के बावजूद धैर्य और निरंतर प्रयास से आर्थिक परिणाम हासिल करके सोच बदली जा सकती है।

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