अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से संवरी ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी, बन रहीं लखपति उद्यमी अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं अचार, चिप्स, फिनाइल और टेक्सटाइल जैसे उत्पाद तैयार कर रही हैं। बैंक लोन और सरकारी योजनाओं की मदद से वे हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक कमा रही हैं। गांव और कस्बों में आजीविका के सीमित साधनों के बीच अमेठी की ग्रामीण महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की एक मिसाल पेश की है। जो महिलाएं कभी रोजगार की तलाश में संघर्ष कर रही थीं, वे अब संगठित होकर खुद की छोटी विनिर्माण इकाइयां संचालित कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों के इस मजबूत नेटवर्क ने न केवल इन महिलाओं को घरेलू परिधि से बाहर निकाला है, बल्कि उन्हें अपने समुदाय में रोजगार प्रदाता के रूप में भी स्थापित किया है। घरेलू उत्पादों से लेकर टेक्सटाइल तक फैला कारोबार अमेठी के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में कार्यरत स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाएं बड़े पैमाने पर विविध उपभोक्ता उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों में सिलाई और कढ़ाई के परिधान, पारंपरिक अचार, पापड़, चिप्स, मुरब्बा तथा मिट्टी के कलात्मक बर्तन शामिल हैं। इसके साथ ही दैनिक घरेलू स्वच्छता से जुड़ी सामग्री जैसे फिनाइल, टॉयलेट क्लीनर, झाड़ू, मोमबत्ती, अगरबत्ती, धूपबत्ती और बच्चों के खिलौने भी महिलाएं स्वयं निर्मित कर रही हैं। इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि महिलाएं घर पर अपनी कड़ी मेहनत और लगन से इन्हें तैयार करती हैं। आमतौर पर छोटे उत्पादकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तैयार माल को बाजार तक पहुंचाने की होती है, लेकिन यहां व्यवस्था पूरी तरह से सुव्यवस्थित है। स्वयं सहायता समूह के अधिकारियों की निगरानी में विभिन्न स्थानों पर विशेष बिक्री स्टॉल लगाए जाते हैं, जहां ग्राहक सीधे खरीदारी करते हैं। इसके अतिरिक्त कई खरीदार सीधे समूह के केंद्रों पर पहुंचकर थोक व खुदरा खरीदारी भी कर रहे हैं, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता समाप्त हो गई है। सुधा देवी का टेक्सटाइल उद्यम और रोजगार सृजन इस बदलाव की जमीनी तस्वीर समूह से जुड़ी महिलाओं के अनुभवों में साफ दिखाई देती है। समूह की सदस्य सुधा देवी के अनुसार पहले उनके पास नियमित आय का कोई जरिया नहीं था और वे काम की कमी से जूझ रही थीं। इस दौरान उन्हें मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना की जानकारी मिली, जिसके लिए उन्होंने आवेदन किया। योजना के तहत सरकारी अनुदान स्वीकृत होने के बाद उन्होंने अपनी बचत से करीब दो से ढाई लाख रुपये की अतिरिक्त पूंजी लगाई और अपना टेक्सटाइल कारोबार शुरू किया। आज सुधा देवी इस व्यवसाय से हर महीने 40,000 से 50,000 रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित कर रही हैं। उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार करते हुए स्थानीय स्तर पर पांच से छह अन्य लोगों को भी रोजगार से जोड़ा है। उनका कहना है कि स्वयं सहायता समूह और सरकारी योजना के सहयोग से उनकी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। मोटे अनाज और आसान बैंक ऋण से बदली तस्वीर समूह से जुड़ी एक अन्य महिला रेणु देवी बताती हैं कि पहले उनका सारा समय केवल घर-परिवार की देखभाल में बीत जाता था। परिवार में जब भी कोई आर्थिक संकट आता था तो मजबूरी में दूसरों से कर्ज लेना पड़ता था। इस मजबूरी से बाहर निकलने के लिए उन्होंने समूह के माध्यम से मोटे अनाज यानी मिलेट्स के उत्पाद तैयार करने का काम शुरू किया। पौष्टिक मोटे अनाज से बने उत्पादों की बिक्री से अब उन्हें बेहतरीन लाभ मिल रहा है। उन्होंने गांव की अन्य महिलाओं को भी अपने साथ इस काम में जोड़ लिया है, जिससे पूरा समूह मिलकर लाभ कमा रहा है। वहीं नीलम का अनुभव बैंकिंग व्यवस्था में आए बदलाव को दर्शाता है। वे बताती हैं कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने से पहले समाज में उनकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं थी और बैंक भी बिना किसी गारंटी के लोन देने से साफ इनकार कर देते थे। आज समूह की साख के चलते उन्हें बैंकों से बिना किसी गारंटी के आसानी से वित्तीय मदद मिल जाती है। अपने खुद के काम से निरंतर आमदनी जुटाकर वे अब पूरी तरह से स्वावलंबी बन चुकी हैं। इसका आप पर असर अमेठी में स्वयं सहायता समूहों की यह प्रगति दिखाती है कि संस्थागत समर्थन और वित्तीय योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं किस तरह संगठित उद्यमी बन सकती हैं। • उत्तर प्रदेश में: मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना और सरकारी अनुदान के चलते ग्रामीण युवतियों को स्वयं का विनिर्माण व्यवसाय शुरू करने के लिए औपचारिक पूंजी मिल रही है। पात्र महिलाएं ब्लॉक स्तर पर आवेदन कर अनुदान और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकती हैं। • अमेठी में: स्थानीय प्रशासन द्वारा स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों के लिए स्टॉल और बिक्री केंद्र उपलब्ध कराए जाने से स्थानीय कारीगरों को बिचौलियों के बिना उचित मूल्य मिल रहा है। इससे जिले के ग्रामीण परिवारों की घरेलू आय में सीधा सुधार हो रहा है। • बैंकिंग पहुंच: समूह से जुड़ने के कारण महिलाओं को बैंकों से बिना किसी कोलैटरल या गारंटी के व्यावसायिक ऋण मिलना संभव हो रहा है। इससे ग्रामीणों को स्थानीय साहूकारों के भारी कर्ज और ब्याज के चंगुल से मुक्ति मिल रही है। • स्थानीय रोजगार: सूक्ष्म उद्यम शुरू करने वाली एक महिला अपने साथ पांच से छह अन्य लोगों को रोजगार देकर गांव में ही आजीविका उपलब्ध करा रही है। इससे काम की तलाश में शहरों की ओर होने वाले पलायन में कमी आ रही है। ऐसा क्यों हुआ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं के पास स्वरोजगार के सीमित अवसर और संस्थागत ऋण की कमी लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है। सरकारी अनुदान योजनाओं और समूह आधारित सामाजिक संगठन के समन्वय ने इस नई आजीविका प्रणाली को संभव बनाया है। • संगठित कार्यबल की शक्ति: अलग-थलग काम करने की तुलना में स्वयं सहायता समूह से जुड़ने पर महिलाओं को सामूहिक बातचीत और बाजार में एक साथ खड़े होने का बल मिला। इस संगठित ढांचे ने बिक्री और उत्पादन की लागत को काफी कम कर दिया। • योजनाओं और अनुदान का संबल: मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना जैसी सरकारी पहलों ने शुरुआती जोखिम को कम करने के लिए आवश्यक बीज पूंजी और अनुदान उपलब्ध कराया। सुधा देवी जैसी उद्यमियों ने इस मदद में अपनी बचत जोड़कर जोखिम उठाने का फैसला किया। • बाजार और बिक्री का प्रबंध: अधिकारियों द्वारा समय-समय पर स्टॉल लगवाने और समूह केंद्रों पर सीधी बिक्री की व्यवस्था से उत्पादों को स्थायी बाजार मिला। मांग की निरंतरता ने इन महिलाओं के काम को घाटे के जोखिम से बचाया। सवाल-जवाब 1. अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं कौन-कौन से उत्पाद तैयार कर रही हैं? महिलाएं अचार, चिप्स, पापड़, मुरब्बा, सिलाई-कढ़ाई के कपड़े, मिट्टी के बर्तन और घरेलू उपयोग के लिए फिनाइल, टॉयलेट क्लीनर, झाड़ू, मोमबत्ती, अगरबत्ती तथा खिलौने तैयार कर रही हैं। 2. तैयार उत्पादों को बेचने के लिए महिलाएं क्या व्यवस्था अपनाती हैं? उत्पादों की बिक्री के लिए स्वयं सहायता समूह के अधिकारियों द्वारा स्टॉल लगवाए जाते हैं, साथ ही ग्राहक सीधे समूह के केंद्रों पर आकर भी खरीदारी करते हैं। 3. सुधा देवी ने अपना टेक्सटाइल व्यवसाय किस योजना के तहत शुरू किया? सुधा देवी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के तहत अनुदान प्राप्त किया और अपने पास से दो से ढाई लाख रुपये लगाकर टेक्सटाइल कारोबार शुरू किया। 4. सुधा देवी अपने व्यवसाय से प्रति माह कितना कमा रही हैं? सुधा देवी अपने टेक्सटाइल व्यवसाय से हर महीने 40,000 से 50,000 रुपये का मुनाफा कमा रही हैं और पांच से छह लोगों को रोजगार दे रही हैं। 5. रेणु देवी किस उत्पाद के जरिए अपनी आजीविका चला रही हैं? रेणु देवी स्वयं सहायता समूह के जरिए मोटे अनाज के उत्पाद तैयार करके उनकी बिक्री से मुनाफा कमा रही हैं। 6. नीलम के अनुसार स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद बैंकों के रवैये में क्या बदलाव आया? नीलम के अनुसार पहले बैंक लोन देने से मना करते थे, लेकिन अब स्वयं सहायता समूह की साख के चलते उन्हें बिना किसी गारंटी के आसानी से बैंक ऋण मिल जाता है। प्रेरणा और सबक अमेठी की इन महिलाओं का सफर साबित करता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद अगर सही योजना, सामूहिक सहयोग और दृढ़ संकल्प हो तो कोई भी बाधा आत्मनिर्भरता के रास्ते में नहीं आ सकती। • सरकारी योजनाओं का सक्रिय लाभ उठाना: सुधा देवी ने काम की कमी की शिकायत करने के बजाय मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के लिए आवेदन किया और अनुदान का सही उपयोग किया। किसी भी योजना की सही जानकारी और समय पर आवेदन नए रास्ते खोल सकता है। • अपनी बचत के साथ जोखिम उठाने का साहस: सरकारी अनुदान के साथ उन्होंने दो से ढाई लाख रुपये की अपनी जमा पूंजी लगाकर उद्यम का आकार बढ़ाया। खुद पर भरोसा और नपा-तुला आर्थिक जोखिम उठाना ही कारोबार को सफल बनाता है। • पारंपरिक संसाधनों में नए अवसर खोजना: रेणु देवी ने रोजमर्रा के घरेलू काम से आगे बढ़कर मोटे अनाज के उत्पादों की मांग को पहचाना और उसी पर काम शुरू किया। स्थानीय उत्पादों और खानपान को व्यावसायिक रूप देकर लाभ कमाया जा सकता है। • दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ना: सफल होने के बाद इन महिलाओं ने खुद तक सीमित रहने के बजाय अपने साथ अन्य ग्रामीण महिलाओं को जोड़ा और रोजगार दिया। सच्चा नेतृत्व वही है जो पूरे समुदाय की आर्थिक स्थिति को ऊपर उठाए। https://trendkia.com/success-stories/amethi-men-svayn-sahayata-samuhon-se-snvari-gramina-mahilaon-ki-jindagi-bana-rahin-lakhapati-udyami-35126 TrendKia — Har trend, sabse pehle.