बहन से प्रेरणा, 23 की उम्र में MBBS और बिहार के पहले बोन ट्यूमर सर्जन बने डॉ. करुणेश रंजन की कहानी भागलपुर के पीरपैंती से निकले डॉ. करुणेश रंजन ने 23 साल में MBBS और 26 में पीजी पूरा कर बिहार के पहले बोन ट्यूमर सर्जन की पहचान बनाई, और 3डी प्रिंटिंग जैसी तकनीक से कई मरीजों के हाथ-पैर कटने से बचाए हैं। कम उम्र में बड़ी कामयाबी कैसी दिखती है, यह जानना हो तो बिहार के बोन कैंसर विशेषज्ञ डॉ. करुणेश रंजन की कहानी पढ़िए। भागलपुर के पीरपैंती के रहने वाले इस डॉक्टर ने सिर्फ 23 साल की उम्र में MBBS और 26 साल में पीजी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। आज महज 34 वर्ष की उम्र में वे बिहार के पहले बोन ट्यूमर सर्जन के तौर पर जाने जाते हैं और बोन कैंसर के इलाज में राज्य का एक भरोसेमंद नाम बन चुके हैं। 28 साल की उम्र में, यानी 2021 में, उन्होंने पटना में 3डी प्रिंटिंग तकनीक के सहारे बोन कैंसर का इलाज कर एक नई राह खोली थी और तब से कई मरीजों को नई जिंदगी दे चुके हैं। घर से मिली डॉक्टर बनने की प्रेरणा डॉ. करुणेश को डॉक्टर बनने का सपना किसी बाहरी प्रेरणा से नहीं, बल्कि अपने ही घर से मिला। बड़ी बहन को मेडिकल क्षेत्र में आगे बढ़ते देखकर उन्होंने भी इसी रास्ते पर चलने की ठानी और जी-जान से तैयारी में जुट गए। मेहनत का फल यह रहा कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा में पहले ही प्रयास में उन्हें ऑल इंडिया रैंक 228 मिली। इसके बाद देश के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज से उन्होंने MBBS की डिग्री ली और आगे की पढ़ाई के लिए पीजीआई रोहतक पहुंचे, जहां से पोस्ट ग्रेजुएशन और सीनियर रेजिडेंसी पूरी की। पीजी के दौरान बोन ट्यूमर सर्जरी से जुड़ाव पोस्ट ग्रेजुएशन के सालों में ही उनका रुझान बोन ट्यूमर सर्जरी की तरफ बढ़ा। यह ऑर्थोपेडिक्स का बेहद खास और दुर्लभ हिस्सा है, जिसमें माहिर डॉक्टर गिने-चुने ही हैं। इसी दौर में उन्हें देश के नामी बोन ट्यूमर सर्जन डॉ. जिले सिंह कुंडू का मार्गदर्शन मिला। डॉ. करुणेश बताते हैं कि अपने गुरु से जो ज्ञान और अनुभव मिला, उसी को आज वे बिहार के मरीजों की सेवा में लगा रहे हैं। पढ़ाई के बाद उन्होंने देश और विदेश के अलग-अलग संस्थानों में काम करके इस क्षेत्र में गहरा अनुभव बटोरा। बोन ट्यूमर सर्जरी के अलावा वे जॉइंट रिप्लेसमेंट, लिगामेंट सर्जरी और नी रिप्लेसमेंट जैसी जटिल ऑर्थोपेडिक सर्जरी भी करते हैं। अंग बचाना ही पहली प्राथमिकता डॉ. करुणेश बोन ट्यूमर को एक दुर्लभ लेकिन गंभीर बीमारी मानते हैं, जिसमें मरीज के पास इलाज के विकल्प सीमित रह जाते हैं। ऐसे में उनकी कोशिश यही रहती है कि उपलब्ध आधुनिक तकनीकों और इलाज के तरीकों का इस्तेमाल कर मरीज का हाथ या पैर बचाया जा सके, ताकि किसी को अपना अंग न गंवाना पड़े। कॉरपोरेट कल्चर रास नहीं आया, खुद का अस्पताल खोला पटना लौटने के बाद उन्होंने कुछ अस्पतालों के साथ जुड़कर काम किया, लेकिन वहां के कामकाज से उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। उनका साफ मानना है कि कॉरपोरेट वर्क कल्चर में मैनेजमेंट के दबाव का असर वे मरीज पर नहीं पड़ने देंगे। इसी सोच के साथ नौकरी छोड़कर उन्होंने अपना मौर्या सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शुरू किया। यहां वे मरीज की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर इलाज करते हैं और उसी हिसाब से उसका सफल उपचार करते हैं। उनकी यह सोच उनकी फीस में भी झलकती है। वे कहते हैं कि काम ऐसा होना चाहिए जिससे अपनी जरूरतें भी पूरी हों और सामने वाले को भी नुकसान न उठाना पड़े। पटना में पहली बार अंग बचाने वाली सर्जरी डॉ. करुणेश याद करते हैं कि जब उन्होंने पटना में काम शुरू किया, तब बोन कैंसर के मरीजों के सामने आमतौर पर दो ही रास्ते होते थे, या तो कैंसर से प्रभावित अंग कटवाना पड़ता था या फिर बेहतर इलाज के लिए मुंबई जैसे बड़े शहरों की ओर भागना पड़ता था। इसी कमी को देखते हुए उन्होंने बिहार में ही आधुनिक और अंग बचाने वाली सर्जरी को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। पटना में उन्हें पहला बड़ा मामला कंधे के बोन कैंसर से जूझ रहे एक मरीज का मिला। मरीज की आर्थिक हालत बेहद कमजोर थी और इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। ऐसे में आयुष्मान भारत योजना के तहत उसकी सर्जरी हुई और उसका हाथ सफलतापूर्वक बचा लिया गया। इस कामयाबी के बाद दूसरे अस्पताल और डॉक्टर भी जटिल तथा दुर्लभ बोन ट्यूमर के मरीजों को उनके पास भेजने लगे। 3डी प्रिंटिंग से बदली इलाज की तस्वीर डॉ. करुणेश के मुताबिक, 2021 में उन्होंने पटना में पहली बार 3डी प्रिंटिंग तकनीक की मदद से कस्टमाइज्ड इंप्लांट तैयार कर बोन कैंसर के एक मरीज की सर्जरी की। यह मामला बेहद दुर्लभ था और मरीज एक युवा छात्र था। आज वह पूरी तरह स्वस्थ है और अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए है। इस एक सफलता ने बिहार में बोन कैंसर के इलाज का बिल्कुल नया रास्ता खोल दिया। इसके बाद ऐसे कई मरीजों का इलाज हुआ, जिनके हाथ या पैर काटे जाने की नौबत आ चुकी थी। हालत अब यह है कि जब कई बड़े अस्पतालों में कैंसर प्रभावित अंग को बचाना मुमकिन नहीं हो पाता, तो ऐसे मरीज उनके पास रेफर किए जाते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि आधुनिक तकनीक और विशेष सर्जरी की मदद से मरीज का अंग बचे और उसे बेहतर जीवन मिले। डॉ. करुणेश को इस बात की संतुष्टि है कि बिहार में अंग बचाने वाली बोन ट्यूमर सर्जरी की इस सोच और तकनीक को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका रही है। अब कई मरीजों को कैंसर के चलते हाथ या पैर गंवाने की जरूरत नहीं पड़ रही और उन्हें अपने ही राज्य में उन्नत इलाज मिल रहा है। गरीब मरीजों तक सस्ता इलाज पहुंचाने का लक्ष्य डॉ. करुणेश का मानना है कि आधुनिक मेडिकल तकनीक सिर्फ पैसे वालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनकी कोशिश है कि 3डी प्रिंटिंग जैसी उन्नत तकनीक का फायदा उन मरीजों तक भी पहुंचे जो इसका खर्च नहीं उठा सकते। इसी मकसद से वे अलग-अलग कैंसर सहायता संस्थाओं और सामाजिक संगठनों से संपर्क बढ़ा रहे हैं, ताकि जरूरतमंद और गरीब मरीजों को आर्थिक मदद मिले और बेहतर इलाज मुहैया कराया जा सके। इसका आप पर असर • भारत में: बोन कैंसर के मरीजों के लिए 3डी प्रिंटिंग और अंग बचाने वाली आधुनिक सर्जरी अब महानगरों तक सीमित नहीं रही, जिससे अंग कटवाने की मजबूरी घट सकती है। • बिहार में: राज्य के मरीज अब पटना में ही उन्नत बोन ट्यूमर इलाज पा सकते हैं और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के सहारे कमजोर आर्थिक स्थिति में भी सर्जरी संभव है। सवाल-जवाब 1. डॉ. करुणेश रंजन कौन हैं? वे भागलपुर के पीरपैंती के रहने वाले बिहार के पहले बोन ट्यूमर सर्जन हैं, जो बोन कैंसर के इलाज में जाने-माने नाम हैं। 2. उन्होंने MBBS और पीजी किस उम्र में पूरा किया? उन्होंने 23 साल की उम्र में MBBS और 26 साल की उम्र में पीजी की पढ़ाई पूरी की। 3. उन्होंने पटना में 3डी प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल कब किया? साल 2021 में उन्होंने पटना में पहली बार 3डी प्रिंटिंग से कस्टमाइज्ड इंप्लांट बनाकर एक युवा छात्र की बोन कैंसर सर्जरी की। 4. उनका अपना अस्पताल कौन सा है? उन्होंने नौकरी छोड़कर मौर्या सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शुरू किया, जहां वे मरीज की आर्थिक स्थिति देखकर इलाज करते हैं। https://trendkia.com/success-stories/bahana-se-prerana-23-ki-umra-men-mbbs-aura-bihar-ke-pahale-bona-tyumara-sarjana--1151 TrendKia — Har trend, sabse pehle.