# बहराइच की मधु कुमारी घर के आंगन में उगा रहीं बैंगन की नर्सरी, दस साल से कर रही हैं आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम

> बहराइच जिले के मिर्जापुर गांव की रहने वाली मधु कुमारी बिना किसी वैज्ञानिक मदद के अपने घर के आंगन में बैंगन की नर्सरी तैयार कर रही हैं। वे पिछले 10 वर्षों से इस कार्य के जरिए हर सीजन में अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर रही हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-10-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/bahraich-ki-madhu-kumari-ghar-ke-aangan-me-ugaa-rahi-hain-baigan-ki-nursery-50823 · **Language:** Hindi
**Tags:** बहराइच, स्वरोजगार, कृषि, महिला सशक्तिकरण, उत्तर प्रदेश

बहराइच जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अब महिलाएं अपनी घरेलू जिम्मेदारियों के दायरे से बाहर निकलकर स्वरोजगार के नए रास्ते तलाश रही हैं। इसी बदलाव की एक प्रेरक तस्वीर मिर्जापुर गांव से सामने आई है, जहां एक गृहिणी ने अपने घर के छोटे से हिस्से में बैंगन की नर्सरी तैयार करके एक अनूठी पहल की शुरुआत की है। इस कार्य ने साबित कर दिया है कि सीमित संसाधनों और घर की चारदीवारी के भीतर रहकर भी महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत बन सकती हैं।

## छोटे से आंगन में हजारों पौधों की तैयार होती है पौध
मिर्जापुर गांव की निवासी मधु कुमारी ने अपने घर के लगभग 15 वर्ग फीट यानी 3×5 फीट के छोटे से आंगन में बैंगन के हजारों स्वस्थ पौधे उगाए हैं। इस पूरी नर्सरी की खास बात यह है कि इसे विकसित करने के लिए किसी भी कृषि विशेषज्ञ या वैज्ञानिक पद्धति की मदद नहीं ली गई है। इसके बजाय ग्रामीण महिलाओं ने अपनी पारंपरिक सूझबूझ और कड़ी मेहनत के बल पर इस पौधे की क्यारी को तैयार किया है। मधु कुमारी पिछले 10 वर्षों से इस काम को लगातार अंजाम दे रही हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि उनके पति बाहर रहकर खेती का काम संभालते हैं, ऐसे में वे घर की तमाम जिम्मेदारियों को पूरा करने के साथ इस नर्सरी की देखरेख की पूरी जिम्मेदारी खुद उठाती हैं।

## स्थानीय किसानों के बीच बैंगन के पौधों की भारी मांग
इस छोटी सी नर्सरी में तैयार किया जाने वाला बैंगन का एक पौधा दो रुपए की दर से बेचा जाता है। इस छोटे पैमाने के कारोबार से उन्हें हर सीजन में लगभग 2,000 से 4,000 रुपए तक की अतिरिक्त आय हो जाती है। जब पौधे पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, तो उनका कुछ हिस्सा अपने खेतों में लगवाया जाता है और बाकी बचे हुए पौधे स्थानीय किसानों को बेच दिए जाते हैं। जब क्षेत्र के किसानों को अगेती खेती के दौरान समय पर पौधे नहीं मिल पाते हैं, तो वे सीधे इन महिलाओं के पास आकर खरीदारी करते हैं।

## खरपतवार रहित क्यारियां और बेहतरीन पौधों की ग्रोथ
इन महिलाओं द्वारा पौधों की देखभाल इतनी बारीकी से की जाती है कि पूरी क्यारी में एक भी खरपतवार दिखाई नहीं देता है, जिसके परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि बहुत अच्छी होती है। केवल पांचवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाली मधु कुमारी आज अपनी दृढ़ मेहनत के बूते न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में सहयोग कर रही हैं, बल्कि आसपास की अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भरता का एक मजबूत प्रतीक बन चुकी हैं। यह अनूठा प्रयास इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि लगन सच्ची हो, तो महिलाएं अपनी मेहनत से सफलता की नई इबारत लिख सकती हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. मधु कुमारी किस जिले की रहने वाली हैं?
मधु कुमारी उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के मिर्जापुर गांव की रहने वाली हैं।

### 2. बैंगन की नर्सरी कितने क्षेत्र में तैयार की गई है?
यह नर्सरी घर के लगभग 15 वर्ग फीट यानी 3×5 फीट के छोटे से हिस्से में तैयार की गई है।

### 3. मधु कुमारी कितने वर्षों से यह कार्य कर रही हैं?
मधु कुमारी पिछले 10 वर्षों से बैंगन की नर्सरी तैयार करने का यह कार्य कर रही हैं।

### 4. एक पौधा कितने रुपए में बिकता है?
यहाँ तैयार किया गया बैंगन का एक पौधा दो रुपए के हिसाब से बिकता है।

### 5. इस नर्सरी से सीजन में कितनी आमदनी हो जाती है?
इस छोटी सी नर्सरी से सीजन में लगभग 2,000 से 4,000 रुपए तक की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।

## प्रेरणा और सबक
मधु कुमारी की यह प्रेरणादायक यात्रा दिखाती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद किस तरह आत्मनिर्भर बना जा सकता है।

- घर के छोटे स्थान का उपयोग: **स्थान का सदुपयोग:** केवल 15 वर्ग फीट के छोटे से आंगन में नर्सरी तैयार करके स्वरोजगार की शुरुआत की जा सकती है।
- पारिवारिक सहयोग: **आर्थिक मजबूती:** घर के कामकाज को संभालते हुए अतिरिक्त समय में खेती-किसानी से जुड़ा यह काम करके परिवार की आय बढ़ाई जा सकती है।
- स्थानीय स्तर पर मांग पूरी करना: **बाजार की समझ:** अगेती खेती के समय स्थानीय किसानों को पौधे उपलब्ध कराकर अपनी उद्यमिता को आगे बढ़ाया जा सकता है।
- कड़ी मेहनत का महत्व: **लगन और परिश्रम:** औपचारिक शिक्षा सीमित होने के बावजूद अपनी मेहनत के बल पर महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की जा सकती है।

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