बहराइच में गोबर और गौमूत्र से तैयार जैविक मिश्रण से किसानों को रासायनिक खादों से मुक्ति दिला रहीं लाल परी बहराइच के तेजवापुर ब्लॉक की कृषि सखी लाल परी अपनी अनूठी प्राकृतिक खेती तकनीकों और जीवामृत के फॉर्मूले से रासायनिक खादों के इस्तेमाल को समाप्त कर किसानों की लागत घटाने में मदद कर रही हैं। बढ़ती कृषि लागत और रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों के बीच उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से एक बेहद सकारात्मक बदलाव की कहानी सामने आई है। आज के इस दौर में जब खेती-किसानी काफी खर्चीली और जटिल होती जा रही है, तब ग्रामीण महिलाएं खुद आगे बढ़कर इस चुनौती का मुकाबला कर रही हैं। जिले के तेजवापुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत मिर्जापुर की निवासी लाल परी इस समय पूरे क्षेत्र में महिला आत्मनिर्भरता और रसायनमुक्त खेती के अभियान का नेतृत्व कर रही हैं। उनके प्रयासों से न सिर्फ खेतों की सेहत सुधर रही है, बल्कि किसानों के खर्चों में भी भारी कटौती हो रही है। कृषि सखी की रासायनिक खादों के खिलाफ जंग लाल परी अपने क्षेत्र में कृषि सखी के रूप में सेवा दे रही हैं। वह निरंतर किसानों के बीच जाकर उन्हें जहरीले कीटनाशकों और रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले नुकसान के प्रति सचेत कर रही हैं। वह किसानों को इस बात के लिए प्रेरित कर रही हैं कि वे यूरिया और डीएपी जैसी अत्यंत महंगी रासायनिक खादों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह समाप्त करें। इसकी जगह वे घर पर ही बहुत कम खर्च में प्राकृतिक तरीकों से अपनी फसलों के लिए पौष्टिक खाद तैयार कर सकते हैं। उनका मुख्य लक्ष्य मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता को बचाना और फसलों को विभिन्न प्रकार की जानलेवा बीमारियों से सुरक्षित रखना है। लाल परी के अनुसार, खेतों से रसायनों को हटाने के बाद किसान जीवामृत और घन जीवामृत जैसे प्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो यूरिया और डीएपी की कमी को पूरी तरह पूरा करने में सक्षम हैं। 200 लीटर जीवामृत तैयार करने का आसान फॉर्मूला प्राकृतिक रूप से जीवामृत तैयार करने की विधि काफी सरल है। इसके लिए सबसे पहले 200 लीटर की क्षमता वाले एक साफ प्लास्टिक ड्रम की आवश्यकता होती है। इस ड्रम में करीब 175 लीटर साफ पानी भरा जाता है। इसके बाद इसमें 10 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर और 10 लीटर गौमूत्र डाला जाता है। इस मिश्रण में पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए 2 किलोग्राम गुड़ और 2 किलोग्राम बेसन मिलाया जाता है। इसके साथ ही, इसमें 1 किलोग्राम सजीव मिट्टी डाली जाती है। यह मिट्टी किसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे की हो सकती है या फिर किसी ऐसे खेत की मेढ़ से ऊपर की सूखी परत हटाकर निकाली जा सकती है जहां रसायनों का इस्तेमाल न हुआ हो। इन सभी सामग्रियों को ड्रम में अच्छी तरह मिला दिया जाता है। मिट्टी के लिए वरदान साबित होते हैं सूक्ष्मजीव इस तैयार किए गए घोल में कुछ ही दिनों के भीतर अनगिनत संख्या में गुड बैक्टीरिया यानी फसलों के अनुकूल लाभकारी सूक्ष्मजीव विकसित हो जाते हैं। जब इस जैविक घोल को खेतों की मिट्टी में डाला जाता है, तो ये सूक्ष्मजीव मिट्टी की उर्वरा शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं। यह प्राकृतिक मिश्रण फसलों के विकास के लिए किसी अमृत से कम नहीं है, क्योंकि यह बिना किसी दुष्प्रभाव के पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। खेतों में जीवामृत डालने की आसान विधि खेतों में इस प्राकृतिक खाद का उपयोग करना बेहद सरल और व्यावहारिक है। कृषि सखी के अनुसार, घन जीवामृत को खेत की अंतिम जुताई से ठीक पहले पूरे खेत में बिखेर दिया जाता है और फिर जुताई कराकर फसलों की रोपाई की जाती है। वहीं, तरल जीवामृत को खड़ी फसल में सिंचाई के पानी के साथ इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए पानी चलाने वाले स्थान पर किसी मटके या डिब्बे में एक छोटा सा छेद करके उसे लटका दिया जाता है, जिससे बूंद-बूंद करके यह घोल पानी के साथ मिलकर पूरे खेत में फैल जाता है। यदि कोई बर्तन उपलब्ध न हो, तो सिंचाई की नाली या पाइप के मुहाने के पास किसी लोटे से थोड़ा-थोड़ा करके इसे पानी में मिलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, किसान चाहें तो इस मिश्रण को छानकर स्प्रे मशीन की मदद से फसलों पर सीधे छिड़काव भी कर सकते हैं। इसका आप पर असर जीवामृत जैसे प्राकृतिक जैविक विकल्पों को अपनाने से किसान महंगी व्यावसायिक खादों पर निर्भरता समाप्त कर सकते हैं, जिससे उनका खर्च घटेगा और वे आत्मनिर्भर बनेंगे। • लागत में भारी कमी: किसानों को यूरिया और डीएपी जैसे महंगे रासायनिक खादों को खरीदने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे प्रत्येक फसल चक्र में किसानों के हजारों रुपये की सीधी बचत होगी। • मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार: लाखों लाभकारी सूक्ष्मजीवों की मदद से खेत की मिट्टी की उपजाऊ क्षमता फिर से बहाल हो जाती है। समय के साथ मिट्टी में नमी बनी रहती है, जिससे सिंचाई के पानी की खपत भी कम होती है। • रसायनमुक्त फसल उत्पादन: जैविक तकनीकों से उगाई गई फसलें पूरी तरह से जहरीले रसायनों के अवशेषों से मुक्त होती हैं। किसान इन फसलों को बाजार में प्रीमियम जैविक उत्पाद के रूप में बेचकर बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं। • फसलों का बीमारियों से बचाव: पौधों के भीतर कीटों और रोगों से लड़ने की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। इसके परिणामस्वरूप किसानों को महंगे और हानिकारक कीटनाशक छिड़कने की जरूरत नहीं पड़ती है। • रोजगार के नए अवसर: ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जैविक खाद तैयार कर बेचने का व्यवसाय शुरू कर सकती हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार के नए द्वार खुलेंगे और उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। ऐसा क्यों हुआ प्राकृतिक खेती की ओर यह बदलाव छोटे किसानों पर रासायनिक खेती के कारण लगातार बढ़ रहे आर्थिक बोझ के कारण शुरू हुआ है। लाल परी ने कृषि सखी के रूप में आगे आकर किसानों को एक सस्ता और स्थायी विकल्प दिया जो मिट्टी की सेहत को सुधारने में मददगार है। • महंगे कृषि आदान: यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक खादों की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण छोटे किसानों का मुनाफा घट रहा था। इस वित्तीय संकट के कारण स्थानीय स्तर पर कम लागत वाले घरेलू जैविक विकल्पों की आवश्यकता महसूस की गई। • मिट्टी की उर्वरता में गिरावट: लगातार रसायनों और जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग से खेतों की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति समाप्त हो रही थी। मिट्टी को पुनः उपजाऊ बनाने के लिए मित्र जीवाणुओं और सूक्ष्मजीवों की तत्काल आवश्यकता थी। • जागरूकता का अभाव: तेजवापुर जैसे ग्रामीण इलाकों में किसानों को प्राकृतिक विकल्प तैयार करने की सही विधि की जानकारी नहीं थी। लाल परी ने इस कमी को दूर करने के लिए खुद प्रशिक्षण देकर सही अनुपात में जैविक खाद बनाने का व्यावहारिक तरीका सिखाया। सवाल-जवाब 1. लाल परी कौन हैं और वह क्या काम करती हैं? लाल परी बहराइच की मिर्जापुर ग्राम पंचायत की निवासी हैं, जो एक कृषि सखी के रूप में कार्यरत हैं और किसानों को रसायनमुक्त जैविक खेती के लिए जागरूक कर रही हैं। 2. जीवामृत तैयार करने के लिए कितने पानी और किस क्षमता के ड्रम की जरूरत होती है? इसके लिए 200 लीटर की क्षमता वाले एक ड्रम की आवश्यकता होती है, जिसमें 175 लीटर साफ पानी भरा जाता है। 3. जीवामृत बनाने के लिए कौन-कौन सी सामग्रियों की आवश्यकता होती है? इसे बनाने के लिए 10 किलोग्राम देशी गाय का गोबर, 10 लीटर गौमूत्र, 2 किलोग्राम गुड़, 2 किलोग्राम बेसन और 1 किलोग्राम सजीव मिट्टी की आवश्यकता होती है। 4. जीवामृत के लिए सजीव मिट्टी कहां से लानी चाहिए? सजीव मिट्टी को किसी बरगद के पेड़ के नीचे से या फिर खेत की मेढ़ की ऊपरी सूखी परत को हटाकर उसके नीचे से निकालना चाहिए। 5. किसान अपनी खड़ी फसलों में तरल जीवामृत का उपयोग कैसे कर सकते हैं? किसान सिंचाई के पानी के साथ मटके में छोटा सुराख करके बूंद-बूंद टपका सकते हैं, पानी की नाली के पास लोटे से मिला सकते हैं या फिर स्प्रे मशीन से छिड़काव कर सकते हैं। प्रेरणा और सबक ग्रामीण परिवेश से निकलकर जैविक क्रांति का नेतृत्व करने वाली लाल परी का यह सफर सामुदायिक सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण की अद्भुत सीख देता है। • व्यावहारिक उदाहरण पेश करना: लाल परी ने केवल सैद्धांतिक बातें नहीं कीं, बल्कि खुद 200 लीटर का घोल बनाकर व्यावहारिक डेमो दिया। किसी भी समुदाय में बदलाव लाने के लिए खुद काम करके परिणाम दिखाना सबसे प्रभावी तरीका है। • स्थानीय संसाधनों का सदुपयोग: वास्तविक आत्मनिर्भरता हमारे आसपास मौजूद संसाधनों जैसे गोबर, गौमूत्र और मिट्टी के सही उपयोग में निहित है। बेकार समझी जाने वाली चीजों से बहुमूल्य खाद बनाकर किसान बाहरी निर्भरता को खत्म कर सकते हैं। • शिक्षा से सशक्तिकरण: असली बदलाव तब आता है जब आप दूसरों को ज्ञान देकर सक्षम बनाते हैं। किसानों को सरल और चरणबद्ध तकनीक सिखाकर एक अकेली महिला पूरे गांव में जैविक आंदोलन खड़ा कर सकती है। https://trendkia.com/success-stories/bahraich-men-gobara-aura-gaumutra-se-taiyara-jaivika-mishrana-se-kisanon-ko-rasayanika-khadon-se-mukti-dila-rahin-lal-pari-32665 TrendKia — Har trend, sabse pehle.