बनासकांठा में महिला पशुपालकों का बड़ा कमाल, दूध और शहद से खड़ा किया करोड़ों का कारोबार गुजरात के बनासकांठा में महिला पशुपालकों ने सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद डेयरी से दो करोड़ रुपये और मधुमक्खी पालन से 35 लाख रुपये का शहद बेचकर मिसाल कायम की है। गुजरात के बनासकांठा जिले में ग्रामीण महिलाओं ने अपनी मेहनत और आधुनिक सोच के दम पर पशुपालन और उससे जुड़े क्षेत्रों में वित्तीय आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखी है। पारंपरिक रूप से केवल घर-परिवार और सीमित स्तर पर दूध बेचने तक सीमित रहने वाली महिलाओं ने अब करोड़ों रुपये के व्यावसायिक उपक्रम खड़े कर लिए हैं। शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन महिला पशुपालकों से सीधी बातचीत करके उनके कामकाज के तौर-तरीकों, चुनौतियों और उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी ली। इस संवाद के दौरान महिलाओं ने बताया कि कैसे वे न केवल दुग्ध उत्पादन, बल्कि मधुमक्खी पालन और गोबर से बायो-सीएनजी तैयार करने जैसे उपक्रमों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। दूध उत्पादन से दो करोड़ रुपये का कारोबार प्रधानमंत्री के साथ संवाद के दौरान एक महिला पशुपालक ने अपनी डेयरी गतिविधि का ब्योरा साझा करते हुए बताया कि वे अकेले डेयरी को दो करोड़ रुपये मूल्य का दूध उपलब्ध करा रही हैं। यह आंकड़ा सुनकर प्रधानमंत्री ने जब उनकी शैक्षणिक योग्यता के बारे में पूछा, तो महिला ने सहजता से उत्तर दिया कि उन्होंने केवल चार किताबें पढ़ी हैं। इस बातचीत का उल्लेख प्रधानमंत्री ने अपने सार्वजनिक भाषण में भी किया। उन्होंने रेखांकित किया कि किस तरह जमीनी अनुभव, लगन और सहकारी तंत्र के सही इस्तेमाल से सीमित औपचारिक पढ़ाई के बावजूद इतना बड़ा आर्थिक मुकाम हासिल किया जा सकता है। बनासकांठा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की यह भागीदारी डेयरी व्यवसाय की रीढ़ बन चुकी है, जहां बनास डेयरी और स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं को संगठित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है। गोबर से कमाई और दो नए बायो-सीएनजी संयंत्र पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए अब केवल दूध की बिक्री पर निर्भरता समाप्त की जा रही है। पशुओं के अपशिष्ट यानी गोबर को भी आय का नियमित माध्यम बनाने पर बड़े पैमाने पर काम हो रहा है। बनास डेयरी की सहायता से थराद और राधनपुर में दो नए बायो-सीएनजी संयंत्रों की आधारशिला रखी गई है। इन संयंत्रों में प्रतिदिन भारी मात्रा में गोबर को प्रसंस्कृत करने की क्षमता विकसित की जा रही है। थराद संयंत्र में हर दिन 75 मीट्रिक टन गोबर का प्रसंस्करण होगा, जबकि राधनपुर संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन 100 मीट्रिक टन गोबर को संसाधित करने की होगी। इन संयंत्रों से न केवल पर्यावरण अनुकूल बायो-सीएनजी और बायोगैस का उत्पादन होगा, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद भी तैयार की जाएगी जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता घटेगी। मधुमक्खी पालन से 35 लाख रुपये का शहद डेयरी के साथ-साथ बनासकांठा की महिलाएं मधुमक्खी पालन के जरिए भी अपनी आय में उल्लेखनीय इजाफा कर रही हैं। प्रधानमंत्री से चर्चा करते हुए इन महिलाओं ने साझा किया कि उन्होंने 35 लाख रुपये मूल्य का शहद बेचकर बेहतरीन मुनाफा कमाया है। प्रधानमंत्री ने इस प्रयास को देश की 'मीठी क्रांति' से जोड़ते हुए महिला स्वयं सहायता समूहों के कौशल की सराहना की। उन्होंने बताया कि बीते 12 वर्षों के दौरान भारत में प्राकृतिक शहद का कुल उत्पादन दोगुना हो चुका है। इस अभूतपूर्व वृद्धि के चलते भारत आज प्राकृतिक शहद का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश बन चुका है, जिसमें ग्रामीण महिला उत्पादकों की मेहनत का बहुत बड़ा योगदान है। वैज्ञानिक प्रजनन और भारत बोवाइन रिसर्च सेंटर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन को दीर्घकालिक मजबूती देने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीकों के समन्वय पर विशेष जोर दिया जा रहा है। उन्नत नस्ल के पशुओं के माध्यम से दूध उत्पादन में सतत वृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है, वहीं नियमित टीकाकरण और समय पर चिकित्सा सहायता पशुओं को गंभीर बीमारियों से बचाती है। इसी दिशा में बनासकांठा में भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर स्थापित किया गया है। यह अनुसंधान केंद्र गिर, साहीवाल और कांकरेज जैसी देशी गायों की नस्ल सुधारने के साथ-साथ भैंसों की बेहतर व अधिक दूध देने वाली नस्लों के संवर्धन पर केंद्रित होकर काम कर रहा है। इसका आप पर असर यह घटनाक्रम दिखाता है कि पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक सहकारी और वैज्ञानिक तरीकों से जोड़कर ग्रामीण परिवार अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा सकते हैं। • भारत भर में: देशभर के दुग्ध उत्पादक और किसान गोबर से बायोगैस बनाने और मधुमक्खी पालन जैसे सहायक व्यवसायों को अपनाकर अपनी मासिक कमाई में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। डेयरी सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर छोटे उत्पादक भी सीधे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बना सकते हैं। • गुजरात और बनासकांठा में: थराद और राधनपुर में स्थापित हो रहे बायो-सीएनजी संयंत्रों से स्थानीय पशुपालक रोजाना अपने पशुओं के गोबर की बिक्री करके नई आय कमा सकेंगे। भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर की मदद से क्षेत्र के किसानों को गिर, साहीवाल और कांकरेज जैसी उन्नत नस्लें मिलेंगी, जिससे पशुओं की दुग्ध क्षमता में दीर्घकालिक सुधार होगा। • महिला उद्यमियों के लिए: स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के पास मधुमक्खी पालन और बड़े पैमाने पर दुग्ध आपूर्ति जैसे उच्च मुनाफे वाले कारोबार शुरू करने के नए वित्तीय अवसर पैदा हो रहे हैं। सीमित औपचारिक शिक्षा होने के बावजूद व्यावहारिक प्रशिक्षण और सहकारी सहयोग से महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं। • जैविक खेती के क्षेत्र में: बायो-सीएनजी संयंत्रों से निकलने वाली जैविक खाद स्थानीय किसानों को सस्ते और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में उपलब्ध होगी। इससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार होगा और रासायनिक उर्वरकों पर किसानों का होने वाला भारी खर्च कम हो जाएगा। ऐसा क्यों हुआ बनासकांठा में महिला पशुपालकों की यह सफलता सहकारी आंदोलन, आधुनिक मूल्य संवर्धन और सरकारी योजनाओं के संगठित क्रियान्वयन का सीधा परिणाम है। परंपरागत पशुपालन में केवल दूध बेचने से मिलने वाला सीमित मार्जिन किसानों की आय बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं था, जिससे समग्र विविधीकरण की आवश्यकता महसूस हुई। • सहकारी ढांचे का विस्तार: बनास डेयरी और महिला स्वयं सहायता समूहों ने गांव-गांव में संग्रहण, परीक्षण और पारदर्शी भुगतान का मजबूत तंत्र खड़ा किया। इस व्यवस्था ने बिचौलियों को पूरी तरह समाप्त कर दिया, जिससे दूध की बिक्री का वास्तविक वित्तीय लाभ सीधे महिला उत्पादकों के खातों तक पहुंच रहा है। • अपशिष्ट से कंचन का दृष्टिकोण: पशुओं के गोबर का केवल उपले या अनुपचारित खाद के रूप में सीमित उपयोग होता था, जिससे पूरी आर्थिक क्षमता का दोहन नहीं हो पा रहा था। थराद में 75 मीट्रिक टन और राधनपुर में 100 मीट्रिक टन क्षमता वाले बायो-सीएनजी संयंत्र गोबर को स्वच्छ ऊर्जा और बायो-फर्टिलाइजर में बदलने के उद्देश्य से शुरू किए गए हैं। • मीठी क्रांति को प्रोत्साहन: किसानों की अतिरिक्त आमदनी बढ़ाने के लिए मधुमक्खी पालन को कृषि और डेयरी के साथ एक पूरक व्यवसाय के रूप में प्रोत्साहित किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर दिए गए समर्थन के कारण देश में 12 वर्षों में शहद उत्पादन दोगुना हुआ और भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक शहद निर्यातक बन गया। • नस्ल सुधार और वैज्ञानिक देखभाल: पारंपरिक रूप से कम दूध देने वाली और बीमारियों के प्रति संवेदनशील नस्लों के कारण पशुपालकों का मुनाफा घटता था। इस समस्या को हल करने के लिए बनासकांठा में भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर स्थापित किया गया, ताकि गिर, साहीवाल और कांकरेज जैसी मजबूत देशी नस्लों का संवर्धन हो सके। सवाल-जवाब 1. बनासकांठा की महिला पशुपालक ने डेयरी से कितनी कमाई दर्ज की? महिला पशुपालक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताया कि वे डेयरी को दो करोड़ रुपये मूल्य का दूध उपलब्ध कराती हैं। 2. दो करोड़ रुपये का दूध बेचने वाली महिला की शैक्षणिक पृष्ठभूमि क्या है? महिला ने प्रधानमंत्री के सवाल पर बताया कि उन्होंने केवल चार किताबें पढ़ी हैं। 3. बनासकांठा में महिलाओं ने मधुमक्खी पालन से कितना शहद बेचा? संवाद के दौरान महिलाओं ने जानकारी दी कि उन्होंने मधुमक्खी पालन के जरिए 35 लाख रुपये मूल्य का शहद बेचा है। 4. थराद और राधनपुर में बन रहे बायो-सीएनजी संयंत्रों की क्षमता क्या है? थराद संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन 75 मीट्रिक टन गोबर संसाधित करने की है, जबकि राधनपुर संयंत्र प्रतिदिन 100 मीट्रिक टन गोबर प्रसंस्कृत कर सकेगा। 5. भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर किन नस्लों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है? यह केंद्र गिर, साहीवाल और कांकरेज जैसी देशी गायों की नस्ल सुधारने के साथ-साथ भैंसों की उन्नत नस्लों के अनुसंधान पर काम कर रहा है। 6. प्राकृतिक शहद के वैश्विक निर्यात में भारत का क्या स्थान है? पिछले 12 वर्षों में शहद का उत्पादन दोगुना होने के साथ भारत अब प्राकृतिक शहद का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है। प्रेरणा और सबक बनासकांठा की महिला पशुपालकों की यह यात्रा दर्शाती है कि सीमित औपचारिक संसाधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प और सही दिशा से आर्थिक समृद्धि हासिल की जा सकती है। • सीमित शिक्षा प्रगति में बाधा नहीं: केवल चार किताबें पढ़ने के बावजूद दो करोड़ रुपये का कारोबार खड़ा करना यह साबित करता है कि व्यावहारिक हुनर और लगन किसी भी डिग्री से अधिक मूल्यवान हैं। • आय के स्रोतों का विविधीकरण: केवल दूध बेचने तक सीमित न रहकर मधुमक्खी पालन और गोबर प्रबंधन को अपनाना सिखाता है कि बहुआयामी काम जोखिम को कम और मुनाफे को कई गुना कर देता है। • सहकारिता और समूह की ताकत: स्वयं सहायता समूहों और बनास डेयरी से जुड़कर महिलाओं ने दिखाया कि संगठित होकर काम करने से व्यक्तिगत प्रयास बड़े औद्योगिक स्तर पर पहुंच सकते हैं। • आधुनिक तकनीक और विज्ञान का स्वागत: पशुओं के नस्ल सुधार, समय पर टीकाकरण और बायो-सीएनजी जैसी नई पहलों को अपनाकर पारंपरिक व्यवसायों को भविष्य के अनुकूल बनाया जा सकता है। https://trendkia.com/success-stories/banaskantha-men-mahila-pashupalakon-ka-bara-kamala-dudha-aura-shahada-se-khara-kiya-karoron-ka-karobara-53583 TrendKia — Har trend, sabse pehle.